ज्ञान का मामला पूर्वी-पश्चिमी नहीं होता

हे मानवश्रेष्ठों,

काफ़ी समय पहले एक युवा मित्र मानवश्रेष्ठ से संवाद स्थापित हुआ था जो अभी भी बदस्तूर बना हुआ है। उनके साथ कई सारे विषयों पर लंबे संवाद हुए। अब यहां कुछ समय तक, उन्हीं के साथ हुए संवादों के कुछ अंश प्रस्तुत किए जा रहे है।

आप भी इन अंशों से कुछ गंभीर इशारे पा सकते हैं, अपनी सोच, अपने दिमाग़ के गहरे अनुकूलन में हलचल पैदा कर सकते हैं और अपनी समझ में कुछ जोड़-घटा सकते हैं। संवाद को बढ़ाने की प्रेरणा पा सकते हैं और एक दूसरे के जरिए, सीखने की प्रक्रिया से गुजर सकते हैं।


ज्ञान का मामला पूर्वी-पश्चिमी नहीं होता

लेकिन क्या कणाद, आर्यभट्ट, भास्कर, सुश्रुत, चरक आदि के ग्रन्थ को बेकार मान लें। डार्विन पश्चिम के हैं तो क्या हम पश्चिम को ही ज्ञान-विज्ञान का मूल मान लें। मेरे पास एक किताब है विज्ञान का इतिहास….उसमें लिखा है कि आज के सर्जरी के उपकरण सुश्रुत से बहुत मिलते हैं। ….तो जो लोग एलोपैथी और आयुर्वेद में आयुर्वेद या स्वदेशी चिकित्सा का पक्ष ले रहे हैं, वे सब अवैज्ञानिक हैं?

समय के किसी भी कालखंड में, ज्ञान का विकास, प्राचीन ज्ञान और अनुभव के आधारों पर ही क्रमिक रूप में हुआ करता है। अचानक कहीं भी, कुछ भी नहीं टपक जाया करता। गलत सिद्ध हुई चीज़ें पीछे छूट जाया करती हैं, और वस्तुगत प्राचीन अनुभवों पर ही, उन्हें समेटते हुए ही आगे का ज्ञान विकसित होता रहता है।

ज्ञान की राह में इससे कोई फर्क नहीं पड़ता, कि कौन कहां का है। ज्ञान का, सत्य की राह का, सोच का मामला पूर्वी-पश्चिमी नहीं होता, यह पूरी मानवजाति की थाति होता है। गलत हर जगह गलत ही होना चाहिए, सही सही, यह हम कहें या कोई और कहे। काम की चीज़ें, तकनीक, विज्ञान क्षेत्र और अन्य सीमाओं को लांघता हुआ प्राचीन समय से ही संपर्कशील सभ्यताओं में फैलता रहा था, और आज भी फैलता ही है। ज्ञान की राह मानवीय मूल्यों को और ऊंचा उठाने की दिशा के लिए ही अभिप्रेरित होती है, होनी चाहिए।

प्राचीन ज्ञान और तकनीक की अपनी कालगत सीमाएं होती हैं, परंतु उसी कालगत उपलब्धियों के आधार पर उन्हें यथोचित सम्मान दिया भी जाता है, परंतु विकास आगे बढ़ता ही है। पूरे विज्ञान का विकास इन्हीं प्राचीन आधरों पर हुआ है। जैसे कि आधुनिक चिकित्सा विज्ञान और तकनीक का विकास, पूरे विश्व की प्राचीन चिकित्सा परंपराओं जिनमें की आयुर्वेदिक, यूनानी, चीनी आदि सभी शामिल हैं, में से ही हुआ है।

अब यह तो नहीं हो सकता ना कि हम इस पूरी मानवजाति के अद्यतन ज्ञान और तकनीक के विकास को छोड़कर, जिनमें कि अधिकतर पश्चिमी-वश्चिमी है, बाहर का है, अपनी हज़ारों साल पहले की अवस्थाओं में पहुंच जाएं।

भारत में संस्कृत भाषा और नागरी लिपि का विकास ऐसे और क्यों हुआ। क्यो अभी तक की श्रेष्ठ और अत्यंत सक्षम लिपि वही है। आखिर मानव विकास में सब देश साथ रहे तब भारत में इस लिपि का, दशमलव का, शून्य का आविष्कार होना क्या बतलाता है। यहाँ उद्देश्य यह कहना नहीं है भारत श्रेष्ठ है लेकिन इन चीजों का आविष्कार भारत में ही किस वजह से हुआ। अगर भारत के लोग इन चीजों पर गर्व करते हैं तो क्या गलत है? गणित में मध्यकाल तक भारत आगे किस वजह से रहा? अगर कोई आदमी अलौकिक चीजों की बात करे तो गप्प मानेंगे लेकिन अगर भौतिक उपलब्धियों को तलाशे तो बुरा क्या है?

भाषा पर आपको अध्ययन करना चाहिए, इसके भाषावैज्ञानिक इतिहास का अध्ययन करना चाहिए। तभी वस्तुगत स्थिति पता चल सकती है, वरना कोई हर्ज नहीं है कि हम अपने श्रेष्ठताबोध के लिए कुछ भी श्रेष्ठ मानले और मस्त रहें। कई विकास पारिस्थितिक वज़हों से सांयोगिक और अनुपम होते हैं। भाषाविज्ञान बताता है कि मध्य एशिया में एक प्राचीन भारोपीय भाषा से ही, प्राचीन भारानी ( भारतीय-ईरानी ) अलग हुई, और फिर इससे भार्य ( भारतीय आर्य ) अलग हुई जिससे ही वैदिक संस्कृत विकसित हुई। तत्पश्चात इसी वैदिक संस्कृत से, लौकिक संस्कृत की उत्पत्ति। और यह भी कि इसने बाद में स्थानीय रूप से विकसित हुई देवनागरी लिपी को अपनाया, जिसमें ही कि उस वक़्त की यहां कि कई भाषाओं को लिपीबद्ध किया गया और उसका विकास किया गया।

मानव विकास में सभी क्षेत्र साथ रहे, यह कहना ठीक नहीं है। कई धाराएं बिल्कुल ही कट गई, कई धाराएं पारिस्थितिक सांयोगिक विकास करती रहीं, कई धाराओं में आपसी समन्वय से यह गति तेज़ हुई, और कहीं पारिस्थितिक संयोगों की ही वज़ह से ही यह अवरुद्ध भी हुई।

दशमलव और शून्य का अविष्कार बतलाता है, कि उस समय यहां की गणित और खगोलीय लौकिक ज्ञान की तकनीक पद्धतियां विकास की अवस्थाओं में सापेक्षतः आगे थीं, और उनकी तात्कालिक जरूरतों ने इन और ऐसे ही कई अन्य अविष्कारों को संभव बनाया। बाद में यह प्रक्रिया बाधित हो गई, और इस लौकिक ज्ञान की परंपराओं और धाराओं पर, काल्पनिक, अलौकिक तथा आध्यात्मिक चिंतन और ज्ञान हावी हो गया। आपको इस पर वस्तुगत दृष्टिकोण से युक्त किताबों का अध्ययन करना चाहिए।

तो यह भी किया जा सकता है, कि अपने पिछड़े होने की वास्तविकता से उपजे हीनता बोध की तुष्टि के लिए, अतीत से, इतिहास से श्रेष्ठताबोध पैदा करने वाली चीज़ें तलाशी जा सकती हैं, उनका ढोल पीटते रहा जा सकता है, उनका फायदा उठाकर, भावनाओं का मुद्दा बना कर अपनी रोटियां सैंकी जा सकती हैं, कूपमड़ूक रहते हुए अपने आपको एक कट्टरपंथी रूढ़ समाज में तब्दील किया जा सकता है। दूसरी ओर यह भी किया जा सकता है कि अपनी परंपराओं और अतीत का निरपेक्ष मूल्यांकन करते हुए, लुप्त या बाधित हुई लौकिक ज्ञान की धाराओं से अपने आपको जोड़ते हुए, वैश्विक रूप से मानवजाति के अद्यतन ज्ञान और विज्ञान के सापेक्ष इसे तौलते हुए, उन्हें काम में लेते हुए, उनके साथ चलते हुए अपने-आपको वैज्ञानिक दृष्टिकोण से संपृक्त करते हुए विकास की दौड में अपने आपको भी शामिल किया जा सकता है। अपनी इसी, जैसी भी है, वास्तविक समरस राष्ट्रीय चेतना को उभारकर, अपने संसाधनों पर अपने आपको आत्मनिर्भर बनाया जा सकता है, समानता और शोषणरहित समाज की स्थापना के लिए एकजुट हुआ जा सकता है।

आपको यदि देवीप्रसाद चट्टोपध्याय की पुस्तकें, ‘लोकायत’, ‘भारतीय दर्शन में क्या जीवंत है और क्या मृत’ और ‘प्राचीन भारत में विज्ञान और समाज’ कहीं से उपलब्ध हो जाएं तो जरूर पढ़नी चाहिएं। आपको एक सटीक दृष्टि मिलने में मदद होगी।


इस बार इतना ही।
आलोचनात्मक संवादों और नई जिज्ञासाओं का स्वागत है ही।
शुक्रिया।

समय

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1 टिप्पणी (+add yours?)

  1. Ved Beniwal
    नवम्बर 17, 2012 @ 14:51:58

    Reality of modern knowledge …..

    प्रतिक्रिया

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