आधारभूत जानकारी होना आवश्यक है

हे मानवश्रेष्ठों,

काफ़ी समय पहले एक युवा मित्र मानवश्रेष्ठ से संवाद स्थापित हुआ था जो अभी भी बदस्तूर बना हुआ है। उनके साथ कई सारे विषयों पर लंबे संवाद हुए। अब यहां कुछ समय तक, उन्हीं के साथ हुए संवादों के कुछ अंश प्रस्तुत किए जा रहे है।

आप भी इन अंशों से कुछ गंभीर इशारे पा सकते हैं, अपनी सोच, अपने दिमाग़ के गहरे अनुकूलन में हलचल पैदा कर सकते हैं और अपनी समझ में कुछ जोड़-घटा सकते हैं। संवाद को बढ़ाने की प्रेरणा पा सकते हैं और एक दूसरे के जरिए, सीखने की प्रक्रिया से गुजर सकते हैं।


आधारभूत जानकारी होना आवश्यक है

लेकिन अगर सभी में विद्रोह कभी पैदा होता है, खासकर भारत में तब हमारा देश ऐसा क्यों है?

क्योंकि परम्पराओं से विद्रोह के इस अंकुर के पास सैद्धांतिक व्यापकता नहीं होती। समझ नहीं होती। वैकल्पिक अवधारणाएं नहीं होती। यह कूपमंडूकता वैयक्तिकता में ही उलझकर रह जाती और व्यापक सामाजिक परिवर्तनों की आकांक्षा से नाभीनालबद्ध नहीं हो पाती। कमजोर वैयक्तिक प्रयास, मजबूत सामाजिक-राजनैतिक संरचनाओं से टकरा-टकरा कर दम तोड देते हैं।

इतना तो मैं भी मानता हूँ कि गणित में भारत बहुत आगे रहा है और मैं मानता हूँ कि गुलामी ने विकसित नहीं होने दिया क्योंकि सभी गणित की खोजें 1000 के पहले हुई हैं। गुलामी स्वतंत्रता में बाधक और प्रगति में बाधक है, इससे कौन इनकार करेगा? फिर हम पश्चिम की बात अधिक क्यों करते हैं।

विषयगत रूप से कितना आगे रहा है, और वस्तुगतता क्या थी, इसका अध्ययन करना चाहिए। एक समय में यहां की तकनीकी और शुरुआती वैज्ञानिक प्रगति की स्थिति सापेक्षतः काफ़ी बेहतर थी। भौतिकवादी धारा के अंतर्गत लोकायत-चार्वाक दर्शन का विकास भी हो रहा था और चिकित्सा में भी काफ़ी प्रगति यहां की मेधाएं कर रही थीं। नालंदा विश्वविद्यालय का उत्कर्ष था, और शैक्षिक तौर पर भी काफ़ी वैज्ञानिक और तकनीकी विषयों पर काम हो रहा था। यह परवर्ती बुद्धकालीन समय था। फिर विकास बाधित हुआ, यह भी एक कड़ुवा सत्य है। इसके कारणों की पड़ताल का अध्ययन भी करना होगा, समझना होगा। गुलामी की जो अवधारणा हमारे दिमाग़ में है, क्या वैसे हालात तब तक पैदा हो गये थे या नहीं हुए थे ये भी जानना होगा।

अगर नहीं हुए थे, तो फिर और क्या कारण रहे थे जिनके चलते भौतिक-वैज्ञानिक ज्ञान की प्रगति बाधित हुई, और भारत में धार्मिक-आध्यात्मिक चिंतन की काल्पनिक ऊंचाइयां परवान चढ़ी। इन सबके सापेक्ष पश्चिम में क्या चल रहा था? उसका स्तर क्या था? वहां धर्म-चिंतन और विज्ञान के क्षेत्र में क्या चल रहा था? इन सवालों से जूझने के दौरान ही हम समझ पाएंगे कि पश्चिम की बात का मामला क्या है?

कुछ इतिहास और दर्शन-विषयक पुस्तकों से आपको माथापच्ची करनी चाहिए। यह ध्यान में रखें कि इसके लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखने वाले महानुभावों की पुस्तकें प्राप्त करने की कोशिश करें।  इतिहास और दर्शन को वस्तुपरकता के साथ समझना एक लंबे समय का अध्ययन-मनन उद्यम है। यह इसलिए भी कि यहां काफ़ी घालमेल है, कम तथ्यों से इतिहास की पुनर्रचना करना कष्टसाध्य काम है। इसके विद्वानों के लिए भी, और अध्येताओं के लिए भी।

मेरी समझ में डार्विन का क्रमविकास कम या नहीं के बराबर आता है लेकिन मैं इसे स्वीकार करता हूँ जैसे हवाई जहाज या सापेक्षता के सिद्धान्त को बिना समझे मानता हूँ। क्योंकि यह सम्भव नहीं कि एक मानव अब इतने अधिक और विस्तृत ज्ञान और आविष्कारों की समझ अकेले रख सके और इन बातों के सबूत पर विश्वास कर सके। क्योंकि अब अरस्तू का समय नहीं है कि उपलब्ध जानकारी बहुत कम हो।

कुछ चीज़ों के लिए आपकी बात वाज़िब है, हर जटिल विषयगत वैज्ञानिक सिद्धांतों में विस्तार से पारंगत होना संभव नहीं है। परंतु जितना हो सके, विभिन्न विषयों पर आधारभूत जानकारी होना आवश्यक है, इतना तो हो ही कि कम-से-कम हम उनके अंतर्संबंधों और अपने विश्लेषणों में उन्हें काम में लाने की संभावनाएं पैदा कर सके। बाकी विस्तार से जब भी जरूरत हो, वैज्ञानिक दृष्टिकोण वाले विशेषज्ञों के कार्यों और सिद्धांतों से संदर्भ प्राप्त किये जा सकते हैं, पर इसके लिए भी इतनी जानकारी प्राप्त करना तो आवश्यक होगा ही कि हमें इनके बारे में पता हो।

कुछ मूलभूत सिद्धांतो के बारे में तो समझ विकसित करनी ही होगी, वैज्ञानिक दृष्टिकोण तो विकसित करना ही होगा, कि किसे माना जाना चाहिए और किसे छोड देना चाहिए। अन्यथा इस मानने में और भाववादी दर्शन जैसे ईश्वर, आत्मा को मानने में कोई अंतर नहीं रह जाता। नये ज्ञान और सूचनाओं को, नई विचारधाराओं को भी हम वैसे ही ओढ़ सकते हैं जैसे कि धर्म और पुरानी विचारधाराओं को ओढ़ा हुआ रहता है और व्यावहारिक क्रियाविधियां हमारी वैसी ही बनी रहती है।


इस बार इतना ही।
आलोचनात्मक संवादों और नई जिज्ञासाओं का स्वागत है ही।
शुक्रिया।

समय

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