गर्व करने वाली मानसिकता

हे मानवश्रेष्ठों,

काफ़ी समय पहले एक युवा मित्र मानवश्रेष्ठ से संवाद स्थापित हुआ था जो अभी भी बदस्तूर बना हुआ है। उनके साथ कई सारे विषयों पर लंबे संवाद हुए। अब यहां कुछ समय तक, उन्हीं के साथ हुए संवादों के कुछ अंश प्रस्तुत किए जा रहे है।

आप भी इन अंशों से कुछ गंभीर इशारे पा सकते हैं, अपनी सोच, अपने दिमाग़ के गहरे अनुकूलन में हलचल पैदा कर सकते हैं और अपनी समझ में कुछ जोड़-घटा सकते हैं। संवाद को बढ़ाने की प्रेरणा पा सकते हैं और एक दूसरे के जरिए, सीखने की प्रक्रिया से गुजर सकते हैं।


गर्व करने वाली मानसिकता

क्या आप मानते हैं कि भारतीय मस्तिष्क पहले ही इतना विकसित था? आखिर नास्तिक दर्शन भी भारत में ही पहले पैदा हुआ था, क्यों? भारत पुराने देशों में से है और जीवित भी है, वजह क्या है? जवाब मेल से देने का कष्ट करेंगे।

इस सवाल में से उसी अंधराष्ट्रीयवाद की गंध आ रही है, जो क्षेत्रीय, जातीय, धार्मिक, नस्लीय श्रेष्ठता की वकालत करते हैं। भारत नाम की राष्ट्रीयता आधुनिक काल की देन है, और इस क्षेत्र की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक उपलब्धियां काफ़ी प्राचीन। यह कई तरह के नस्लीय, जातीय, संस्कृतियों के आवागमन, सम्मिलन, मिश्रण और विकास से संबंधित है।

मानवजाति का विकास, मानव मस्तिष्क का विकास सार्वभौमिक आदानप्रदान और सक्रियता का परिणाम है, जो मुख्यधारा में बने रहे। मुख्यधारा से विलगित, कई आदिवासी समुदायों के सीमित विकास को अभी भी यहीं एक साथ देखा जा सकता है। इसके अलावा मुख्यधारा में ही विभिन्न वर्गों के असमान विकास को भी आसानी से लक्षित किया जा सकता है।

एक जैसी परिस्थितियों ने लगभग एक जैसे ही प्राचीन विश्वास और मान्यताएं पैदा की, और सापेक्षतः अलग परिस्थितियों ने उनमें स्थानीयता का अंतर भी पैदा किया। कमोबेश लगभग आगे-पीछे ही, एक-दूसरों से प्रभावित होते हुए ही दर्शन, विचारधाराओं का विकास हुआ है। इसके लिए हमें मानवजाति की व्यापकता को, उसके इतिहास को, धर्म और दर्शन के इतिहास को वैश्विक व्यापकता और सापेक्षता के साथ पढ़ना और समझना होगा। और भारतीय दर्शन और इतिहास को भी वैश्विक सापेक्षता के साथ देखना और समझना होगा। आपके सवाल इसी जरूरत की आवश्यकता को प्रतिबिंबित कर रहे हैं।

यह सवाल काफ़ी व्यापक परिप्रेक्ष्य को समेटे हुए है। आपको इस संदर्भ में सवालों को थोड़ा विशेष विषयगत करना होगा, ताकि हमें इशारे करने में आसानी होगी।

आपने मेरे सवाल में अंधराष्ट्रवाद की गंध महसूस की है। अभी कल ही आपकी एक पोस्ट पर मैंने नास्तिकता को लेकर शायद रामसेतु मुद्दे पर देखा कि आपने कहा है कि हमारे पास गर्व करने लायक बहुत कुछ होगा। ऐसा तो कहा है आपने, पूछा जा सकता है क्यों?

आपकी इस तात्कालिक प्रतिक्रिया में सिर्फ़ एक प्रतिप्रश्न लक्षित कर पाया हूं, सबसे अंत में। जो कि आपने समय के एक पूर्वकथन के संदर्भ में उठाया है। वह कथन पुनः देखना हुआ, जो इस तरह से था।

“अगर आप वाकई वैज्ञानिक तरीकों से इतिहास और मानवजाति के क्रमविकास को समझना चाहते हैं तो आपकों वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ लिखे इतिहास और ऐतिहासिक समझ से गुजरना पड़ेगा। ना कि तथ्यों और निष्कर्षों का मनचाहा मानसिक जाल बुनकर अपने को तुष्ट करने का रास्ता अख्तियार करना पड़ेगा। और निश्चिंत रहें, उसके बाद भी हमारे पास गर्व करने के लिए काफ़ी सामग्री होगी साथ ही ढ़ेर सारे सबक भी होंगे जिनसे भविष्य को संवारने का उचित रास्ता निकाल सकने की असीम संभावनाएं भी मौजूद रह सकें।”

उपरोक्त कथन इसी गर्व करने वाली मानसिकता के संदर्भ में लिखा गया है, इसी में इसका सही परिप्रेक्ष्य भी उपलब्ध है। इतिहास की मनचाही व्याख्या करके, उससे अपने गर्व को झूठी तसल्ली देने के बजाए, इतिहास को वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ समझने पर ही वह वास्तविक सामग्री सामने आ सकती है जिसके मानवजाति की अद्यतन स्थिति के सापेक्ष तुलना करने पर हमें अपने अतीत और अपनी परंपराओं में सच्चा गर्व महसूस करने के वास्तविक आधार निर्मित किए जा सकें। साथ ही बेहतर भविष्य रच सकने के लिए ढेर सारे सबक भी। बस यही मंतव्य है, जो यहां स्पष्ट है ही।


इस बार इतना ही।
आलोचनात्मक संवादों और नई जिज्ञासाओं का स्वागत है ही।
शुक्रिया।

समय

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