राष्ट्र की अवधारणा

हे मानवश्रेष्ठों,

काफ़ी समय पहले एक युवा मित्र मानवश्रेष्ठ से संवाद स्थापित हुआ था जो अभी भी बदस्तूर बना हुआ है। उनके साथ कई सारे विषयों पर लंबे संवाद हुए। अब यहां कुछ समय तक, उन्हीं के साथ हुए संवादों के कुछ अंश प्रस्तुत किए जा रहे है।

आप भी इन अंशों से कुछ गंभीर इशारे पा सकते हैं, अपनी सोच, अपने दिमाग़ के गहरे अनुकूलन में हलचल पैदा कर सकते हैं और अपनी समझ में कुछ जोड़-घटा सकते हैं। संवाद को बढ़ाने की प्रेरणा पा सकते हैं और एक दूसरे के जरिए, सीखने की प्रक्रिया से गुजर सकते हैं।


राष्ट्र की अवधारणा

अब हम राष्ट्र का सिद्धान्त बिना माने कैसे छोड़ सकते हैं। इसकी आवश्यकता नहीं है?  मेरी बातों में अंधराष्ट्रवाद अगर लगा तो यह राष्ट्रवाद क्या है?  क्या राष्ट्रवाद लाभकारी नहीं? मैं मानता हूँ किसी द्वेष के बिना यह होना चाहिए।

शायद आप राष्ट्र की अवधारणा को सुनिश्चित करना चाहते हैं। इस पर काफ़ी विद्वानों द्वारा काफ़ी कुछ कहा जा चुका है, आप देखिए और इसे समझिए। एक नज़र यहां भी डाल लेते हैं।

मानव-समुदाय अपने प्रारंभिक रूपों, रक्त-संबंधों से उत्पन्न हुए गोत्र तथा कबीलों के रूप में सहजीवन किया करते थे। उत्पादक शक्तियों के विकास तथा विनिमय-व्यापार में वृद्धि के कारण धीरे-धीरे रक्त संबंधों की अपेक्षा क्षेत्रीय संबंध अधिक महत्त्वपूर्ण होते चले गए और इसके परिणामस्वरूप जातियों तथा बाद में राष्ट्रों का आविर्भाव हुआ।

एक क्षेत्र में दीर्घकालीन सामुदायिक निवास, साझी भाषा तथा रीति-रिवाज़ बड़े जनसमुदायों की ऐतिहासिक नियति को सूत्रबद्ध करते हैं, एक सा चरित्र निरूपित करते हैं और एक समान संस्कृति के निर्माण में योग देते हैं। इस प्रकार जाति का निर्माण होता है ( इस अवधारणा को आपको भारतीय परिप्रेक्ष्य में श्रम-विभाजन के फलस्वरूप पनपने वाली शाब्दिक रूप से ‘जाति’ की अवधारणा से थोड़ा भिन्न देखना होगा )। दासप्रथा काल और सामंतवादी युग में जातियों का आविर्भाव हुआ। जैसे कि, प्राचीन मिस्री, यूनानी, रोमन जातियां, सामंतवादी युग में पश्चिमी यूरोपीय जातियां, पूर्वी स्लाव क़बीलों से रूसी जाति, भारतीय वैदिक आर्य-जाति।

जाति, समुदाय का अस्थिर रूप है। कई प्राचीन जातियों का कालांतर में विघटन हुआ, कुछ जातियों ने अन्य भिन्न जातियों का सूत्रपात किया। जाति के अस्थिर होने का कारण यह है कि उसके पास एकीकृत अर्थव्यवस्था नहीं होती, एकसमान संस्कृति के स्थानीय रूपों में बड़ा अंतर होता है और भाषा एक न रहकर स्थानीय बोलियों में बंट जाती है।

पूंजीवादी संबंधों के विकास के साथ जातियां राष्ट्र के रूप में उभरती हैं। पूंजीवाद स्थानीय सीमाओं को तोड़ डालता है, एक या अनेक जातियों को समान आर्थिक जीवन के बंधनों से आपस में सूत्रबद्ध करता है। क्षेत्रीय एकत्व के अलावा आर्थिक एकत्व भी उत्पन्न होता है और इस आधार पर समान राष्ट्रीय संस्कृति का आविर्भाव होता है, राष्ट्रीय चेतना और देशभक्ति की भावना का विकास होता है।

राष्ट्र लोगों की स्थायी समष्टि को कहते हैं, जिन्हें आर्थिक, क्षेत्रीय, भाषाई, सांस्कृतिक-मनोवैज्ञानिक संबंध एकजुट करते हैं

बात ऐसी ही है, परंतु कुछ सिद्धांतकार राष्ट्र की इस अवधारणा को इस ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्यों में नहीं देखकर, इसे नस्ली लक्षणों के, धर्म के आधार पर व्याख्यायित करते हैं। इसी प्रवृति को आप फ़ासिस्टों, नाज़ियों की आर्य नस्ल की श्रेष्ठता के मानवद्वेषी सिद्धांतों में और इसी तरह के भारत में हिंदुत्ववादी दक्षिणपंथी शक्तियों के धार्मिक हिंदू-राष्ट्रवादी सिद्धांत में देख सकते हैं।

इतिहास बताता है कि राष्ट्र-निर्माण की प्रक्रिया में नस्ली, या धार्मिक लक्षण मुख्य भूमिका अदा नहीं करते। लैटिन अमरीका में कई देशों में तीन नस्लों के लोगों से एक राष्ट्र का निर्माण हुआ है। उत्तर अमरीकी राष्ट्र में गोरे लोगों के साथ नीग्रों भी शामिल हैं। ब्रिटिश साम्राज्यवादियों के उपनिवेश से स्वतंत्रता के संघर्षों में भारतीय राष्ट्रीयता धर्म, क्षेत्र, भाषा आदि से ऊपर उठकर ही विकसित हुई। ये बात अलग है कि ये सवाल और इनके अंतर्विरोध साथ-साथ चल रहे थे, इसीलिए स्वतंत्रता के सामूहिक लक्ष्य की प्राप्ति के पश्चात कई संबंधित समूहों में अभी भी ये सवाल अहम बने हुए हैं, बनाए रखे हुए हैं।

राष्ट्रीय संबंधों के विकास के लिए दो प्रवृत्तियां लाक्षणिक होती हैं। पहली प्रवृत्ति राष्ट्रीय है, यानि लोगों के ऐतिहासिक समुदाय के रूप में राष्ट्र की चेतना का जागरण, राजनीतिक तथा आर्थिक आत्मनिर्भरता पाने, सृजनात्मक शक्तियों का विकास करने, साझी संस्कृति का उत्थान करने की इच्छा। दूसरी प्रवृत्ति अंतर्राष्ट्रीय होती है, यानि राष्ट्रों के बीच संबंध बढ़ाने, बाधाएं हटाने, अर्थव्यवस्था, संस्कृति और समूचे सामाजिक जीवन का अंतर्राष्ट्रीयकरण करने की प्रवृत्ति। अंततः इन दोनों प्रवृत्तियों से मानव सभ्यता की प्रगति में योग मिलता है। परंतु अभी की साम्राज्यवादी शक्तियां इन दो शक्तिशाली धाराओं को आपस में मिलने न देने के लिए एड़ी-चोटी का ज़ोर लगाती हैं। अपनी स्वार्थ-सिद्धी के लिए राष्ट्रीय चेतना तथा भावनाओं का उपयोग करने के लिए कुछ राष्ट्रों के अन्य जातियों से श्रेष्ठ होने का प्रचार करती हैं, विभिन्न राष्ट्रों के संकीर्ण-राष्ट्रवादी भावनाओं को प्रश्रय देती हैं उन्हें भड़काती हैं।

राष्ट्रवाद की भूमिका, अपनी स्वतंत्रता के लिए, साम्राज्यवादी आधिपत्य के विरुद्ध संघर्षरत उत्पीडित जातियों के राष्ट्रवादी आंदोलन में प्रगतिशील होती है। मगर अनुभव से पता चलता है कि बाद में यह अंतर्राष्ट्रीय एकजुटता के दृढीकरण में, संपूर्ण मानवजाति की प्रगति की राह में बाधा बनकर खड़ी हो जाती है, और सत्ताधारी वर्ग अपनी सत्ता बनाए रखने के लिए इसका दुरुपयोग करते हैं। कई देशों में तो सरकारें इसी राष्ट्रीयता विरोध के भावनात्मक ज्वार में अपने -आपको बनाए रखने में सहूलियत महसूस करती हैं, दूसरे देशों के साथ अपने तनावों को बना कर युद्ध की स्थितियां सी बनाए रखती हैं, इससे राष्ट्रीय-भावना को उभारकर अपनी सत्ता को दूसरे सवालों से अक्षुण्ण बनाए रखती हैं। आप इसे भारत और पाकिस्तान के संदर्भ में समझ सकते हैं।

यानि राष्ट्रवाद को संकीर्ण अर्थों में ना लेकर, इसे सभी धार्मिक, क्षेत्रीय, भाषाई सवालों से ऊपर उठकर एक राष्ट्रीय चेतना के निर्माण, राजनीतिक तथा आर्थिक आत्मनिर्भरता पाने, सृजनात्मक शक्तियों का विकास करने, साझी संस्कृति का उत्थान करने की दिशा में लक्षित होना चाहिए। जो कि अंततः अंतर्राष्ट्रीयकृत साम्राज्यवाद के विरुद्ध लक्षित संघर्षों के अंतर्राष्ट्रीयकरण से हमसाया हो सके, और एक शोषण रहित अंतर्राष्ट्रीय मानव संस्कृति का निर्माण संभव हो सके।


इस बार इतना ही।
आलोचनात्मक संवादों और नई जिज्ञासाओं का स्वागत है ही।
शुक्रिया।

समय

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