फोबिया क्या है और क्यों होता है?

हे मानवश्रेष्ठों,

काफ़ी समय पहले एक मानवश्रेष्ठ से मेल के जरिए, फोबिया पर किए गए उनके प्रश्न पर एक संवाद स्थापित हुआ था। यह संवाद फोबिया को समझने के लिए एक आलेख के रूप में समेकित कर दिया गया है। इस बार यही संक्षिप्त आलेख प्रस्तुत किया जा रहा है।

वह कथन फिर से रख देते हैं कि आप भी इससे कुछ गंभीर इशारे पा सकते हैं, अपनी सोच, अपने दिमाग़ के गहरे अनुकूलन में हलचल पैदा कर सकते हैं और अपनी समझ में कुछ जोड़-घटा सकते हैं। संवाद को बढ़ाने की प्रेरणा पा सकते हैं और एक दूसरे के जरिए, सीखने की प्रक्रिया से गुजर सकते हैं।


फोबिया

फोबिया किसी भी चीज़ के प्रति अनजाने से भय से ग्रसित होना है। एक अतार्किक सा भय, जो हमें किसी चीज़ या स्थिति विशेष के प्रति इतना संवेदनशील और प्रतिक्रियात्मक बना देता है कि हम उनका सामना करना तो दूर, उनकी कल्पना मात्र से असामान्य हो जाते हैं। यह कुछ वास्तविक चीज़ों या स्थितियों के प्रति भी हो सकता है और कुछ काल्पनिक चीज़ों या स्थितियों के प्रति भी। कभी किन्हीं ख़ास चीज़ों या स्थितियों के प्रति यह कभी गंभीर भय का रूप ले लेता है, और कभी किन्हीं ख़ास चीज़ों या स्थितियों के प्रति यह बेचैनी मात्र के रूप में हो सकता है।

इनके मूल में कुछ आधारभूत जैविक सहजवृत्तियां और बाद की सक्रियता के दौरान विकसित हुए अनूकूलित प्रतिवर्तों की श्रृंखलाएं होती हैं। और इनके बने रहने के मूल में सक्रियता और व्यवहारों के उचित संगठन की कमी, परिवेश के वस्तुगत संज्ञान में कमी तथा सक्रियता के कौशलों में तथा परिस्थितियों और संभावनाओं के आकलन और तदनुकूल व्यवहार के निर्धारण की योग्यताओं का समुचित विकास की कमी होता है।

जैविक आधारों के नाते जीवन को नुकसान पहुंच सकने या मृत्यु की संभावनाओं के प्रति सहज रूप से ही एक विशेष प्रतिक्रियात्मक व्यवहार हमारे पास होता ही है, ऐसे में चीज़ों या स्थितियों के प्रति संसर्ग के हमारे पहले अनुभव जिनके कि आधार पर हमारे मस्तिष्क में प्राथमिक अनुकूलित प्रतिवर्त बन रहे होते हैं, बहुत महत्त्वपूर्ण होते हैं। यदि इनके परिणामस्वरूप किन्हीं बेहद अप्रिय परिस्थितियों का सांयोगिक निर्माण हो जाता है तो यह हमारी चेतना में गहरे पैठ कर बेहद तीव्र और संवेदनशील अनुकूलित प्रतिवर्तों का निर्माण कर देते हैं, इनके प्रति एक भय पैदा हो जाता है और हमारा आगे का व्यवहार इनसे बचने या सामना होने पर इन्हीं के अनुसार बेहद असामान्य रूप से प्रतिक्रियात्मक और रक्षात्मक हो जाता है। जैसे कि कुछ सक्रियता संबंधी व्यक्ति विशेष के भय, झूलना, सायकल या गाड़ी चलाना, सड़क पर जाना, किसी कीड़े या जानवर विशेष से ड़रना, ऊंचाई से कूदना, किसी उपकरण या औजार विशेष के उपयोग संबंधी, आग, रंग संबंधी, आदि-आदि।

कई बार ऐसा भी होता है कि इन फोबिया के पीछे कोई प्रत्यक्ष अनुभव ना जुड़ा हुआ हो, बल्कि अपने परिवेश के व्यक्तियों से किसी चीज़ या स्थिति के बारे में भय पैदा करती सूचनाओं का अपने पूर्व के भय और असुरक्षाओं के साथ गहन आत्मसातत्करण, उस चीज़ या स्थिति विशेष के प्रति काल्पनिक भय का जखीरा इकट्ठा कर लेता है और इनके प्रति हम एक अनजाने से भय का संचार महसूस करते है और तदअनुसार अपनी सक्रियता को सीमित कर लेते है। जैसे कि व्यक्ति, स्थिति, जानवर या जगह विशेष, भगवान, भूत-प्रेत, आदि संबंधी भय।

ऐसा भी हो सकता है कि जब हम ऐसी स्थितियों में होते हैं जिसके कारण हमारा संज्ञान क्षेत्र या सक्रियता क्षेत्र सीमित हो जाता है और हम परिवेश का तत्काल विश्लेषण और संभावनाओं का आकलन करने में अक्षम हो जाते हैं, तब हमारे काल्पनिक भय उभर आते हैं और हम इनसे बचने के कोशिश और सापेक्षतः सुरक्षित परिवेश में रहना पसंद करते हैं। जैसे कि अंधेरे, बंद जगहों, अकेलेपन, तेज़ गति, अत्यधिक ऊंचाई आदि सबंधी भय।

कई बार ऐसा भी होता है कि जब हम अपने श्रेष्ठता-बोध या सफलता के लिए कुछ ज़्यादा ही सचेत रहते हैं और अपमान या असफलता के प्रति अधिक ही संवेदनशील हो उठते है और इन्हें अपने संपूर्ण अस्तित्व से जोड कर देखने लगते हैं तथा जीवन-मरण का प्रश्न बना लेते हैं, तो यह सचेतनता हमें ऐसी सक्रियताओं के प्रति एक भय उत्पन्न करती है और हम इनसे बचने और कतराने में ही अपना श्रेष्ठ समझने लगते हैं। जैसे संवाद, प्रतियोगी सक्रियताओं, आदि के भय।

ऐसी ही कई मानसिक संक्रियाएं और अन्योन्यक्रियाएं, ऐसे कई घालमेल कर सकती है कि अनोखे ही घटाघोप भी पैदा हो सकते हैं। कई तरह के अंतर्गुथित भय और प्रतिक्रियाएं व्यवहार का अंग बन सकती हैं।

कुलमिलाकर यह एक मानसिक भय की तरह है जो व्यवहार और सक्रियता के दौरान किन्हीं वास्तविक या काल्पनिक अप्रिय अनुभवों के कारण विकसित होता है। जाहिर है इससे मुक्ति के स्रोत भी व्यवहार और सक्रियता की उन नियंत्रित प्रक्रियाओं में ही उभर सकते हैं जो हमें इन अप्रिय अनुभवों के बारे में हमारी राय, प्रवृत्ति और रवैये में आमूलचूल परिवर्तन ला सकती हो, जो हमें इन फोबियाओं के प्रति हमारी प्रतिक्रिया को नियंत्रण में रखने और इनसे निबट सकने का आत्मविश्वास पैदा कर सकती हो, जो हमें काल्पनिकताओं के असुरक्षित घटाघोप से वास्तविकता की सुरक्षित ज़मीन दिखा सकती हो।


इस बार इतना ही।

आलोचनात्मक संवादों और नई जिज्ञासाओं का स्वागत है ही।
शुक्रिया।

समय

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3 टिप्पणियाँ (+add yours?)

  1. hsonline
    जुलाई 16, 2012 @ 12:16:36

    विश्लेषण तो अच्छा लगा किन्तु समाधान पर कुछ अधिक लिखने की दरकार है। किसी उदाहरण के माध्यम से इसे स्पष्ट करने एवं एक और लेख के द्वारा समाधान पर अधिक प्रकाश डालने का अनुरोध करता हूं आपसे।

    -हितेन्द्र अनंत

    प्रतिक्रिया

  2. समय
    जुलाई 22, 2012 @ 10:16:35

    आदरणीय हितेन्द्र जी,

    समस्या का समाधान, समस्या के सटीक विश्लेषण और निरूपण में ही छिपा होता है, उसी से निसृत होता है। मूल कारणों को यदि समुचित सटीकता से व्याख्यायित कर लिया गया है तो समाधान इन कारणों के निपटारे, इनके निषेध की प्रक्रिया से ही निकला करते हैं।

    इसीलिए अंतिम अनुच्छेद में यह इशारा किया गया है कि फोबिया के स्रोत व्यवहार और सक्रियता में है तो इनके समाधान भी व्यवहार और सक्रियता के नियंत्रण में ही निकलेंगे जो कि फोबिया के प्रति हमारे रवैयों में आधारभूत परिवर्तन कर उससे निपटने में हमारे आत्मविश्वास को और बढ़ाते हैं। फोबिया के भय से, उससे सम्बंधित सक्रियता को बढ़ाकर, उससे संघर्ष करके ही शनैः शनैः मुक्त हुआ जा सकता है।

    आपके अनुरोध पर विस्तार से उदाहरण सहित लिखने की कोशिश करते हैं। आप यदि किसी विशेष समस्या के समाधान पर विस्तार चाहते हैं, तो मेल पर अलग से भी संवाद किया जा सकता है।

    शुक्रिया।

    प्रतिक्रिया

  3. hsonline
    जुलाई 25, 2012 @ 13:49:20

    उत्तर के लिए धन्यवाद। यह मानना होगा कि कारण का निरूपण समाधान की ओर ही ले जाता है। आभार।

    प्रतिक्रिया

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