और तब ईश्वर का क्या हुआ? – 2

और तब ईश्वर का क्या हुआ?

स्टीवन वाइनबर्ग


( 1933 में पैदा हुए अमेरिका के विख्यात भौतिक विज्ञानी स्टीवन वाइनबर्ग, अपनी अकादमिक वैज्ञानिक गतिविधियों के अलावा, विज्ञान के लोकप्रिय और तार्किक प्रवक्ता के रूप में पहचाने जाते हैं। उन्होंने इसी संदर्भ में काफ़ी ठोस लेखन कार्य किया है। कई सम्मान और पुरस्कारों के अलावा उन्हें भौतिकी का नोबेल पुरस्कार भी मिल चुका है।

प्रस्तुत आलेख में वाइनबर्ग ईश्वर और धर्म पर जारी बहसों में एक वस्तुगत वैज्ञानिक दृष्टिकोण को बखूबी उभारते हैं, और अपनी रोचक शैली में विज्ञान के अपने तर्कों को आगे बढ़ाते हैं। इस आलेख में उन्होंने कई महत्त्वपूर्ण प्रसंगों का जिक्र करते हुए, अवैज्ञानिक तर्कों और साथ ही छद्मवैज्ञानिकता को भी वस्तुगत रूप से परखने का कार्य किया है तथा कई चलताऊ वैज्ञानिक नज़रियों पर भी दृष्टिपात किया है। कुलमिलाकर यह महत्त्वपूर्ण आलेख, इस बहस में तार्किक दिलचस्पी रखने वाले व्यक्तियों के लिए एक जरूरी दस्तावेज़ है, जिससे गुजरना उनकी चेतना को नये आयाम प्रदान करने का स्पष्ट सामर्थ्य रखता है। )


दूसरा भाग

और तब ईश्वर का क्या हुआ : पहला भाग )

आज क्रमिक विकास के सबसे ज़्यादा सम्माननीय अकादमिक आलोचक कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के ‘स्कूल ऑफ लॉव’ के प्रोफ़ेसर फिलीप जॉनसन माने जा सकते हैं। जॉनसन स्वीकार करते हैं कि क्रमिक विकास हुआ है और यह कभी-कभी स्वाभाविक चयन प्रक्रिया द्वारा होता है, लेकिन वे तर्क पेश करते हैं कि ऐसा कोई ‘अकाट्य प्रायोगिक प्रमाण’ नहीं है जिससे यह साबित हो कि क्रमिक विकास किसी ईश्वरीय योजना से निर्देशित नहीं होता। वास्तव में यह प्रमाणित करने की आशा करना मूर्खता होगा कि ऐसी कोई अलौकिक शक्ति नहीं है जो कुछ उत्परिवर्तनों ( म्यूटेशन ) के पक्ष में और कुछ के विरोध में पलड़ा नहीं झुका देती। लेकिन ठीक यही बात किसी भी वैज्ञानिक सिद्धांत के लिए कही जा सकती है, न्यूटन या आइन्सटीन के गति के नियमों से सौरमंड़ल पर सफलतापूर्वक लागू करने में ऐसा कुछ भी नहीं है जो हमें यह मानने से रोके कि कुछ धूमकेतु बीच-बीच में किसी अलौकिक शक्ति से हल्का सा धक्का पा लेते हैं। यह अत्यंत स्पष्ट है कि जॉनसन यह मुद्दा निष्पक्ष उदारमति सोच के तहत नहीं उठाते हैं बल्कि उन धार्मिक कारणों से उठाते हैं जिनका जीवन के लिए तो वे महत्त्व समझते हैं पर धूमकेतु के लिए नहीं। लेकिन किसी भी प्रकार का विज्ञान इसी तरह आगे बढ़ सकता है कि पहले यह मान लिया जाए कि कोई अलौकिक हस्तक्षेप नहीं है और फिर यह देखा जाए कि इस मान्यता के तहत हम कितना आगे बढ़ सकते हैं।

जॉनसन का तर्क है कि प्राकृतिक क्रम-विकास, वह क्रमिक-विकास जो प्रकृति की दुनिया से बाहर किसी सृष्टिकर्ता के निर्देशन या हस्तक्षेप को शामिल नहीं करता, वास्तव में, जीव-जातियों ( स्पीसीज ) की उत्पत्ति की बहुत अच्छी व्याख्या प्रस्तुत नहीं करता। मुझे लगता है कि वे यहां गलती कर बैठते हैं क्योंकि वे उन समस्याओं को महसूस नहीं कर रहे हैं जिनका सामना किसी भी वैज्ञानिक सिद्धांत को हमारे अवलोकनों का स्पष्टीकरण देते हुए हमेशा करना पड़ता है। स्पष्ट गलतियों को छोड दिया जाए, तो भी हमारी गणनाएं और अवलोकन कुछ ऐसी मान्यताओं पर आधारित होती हैं जो उस सिद्धांत, जिसकी परीक्षा की हम कोशिश कर रहे होते हैं, की वैधता की सीमा से बाहर होती हैं। कभी ऐसा नहीं था जब न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत या अन्य किसी भी सिद्धांत पर आधारित गणनाएं सभी अवलोकनों से पूरी तरह मेल खाती हों। आज के जीवाश्म विज्ञानियों और क्रमिक विकासपंथी जीवविज्ञानियों के लेखन में हम उस स्थिति को पहचान सकते हैं जिससे भौतिक विज्ञान में हम वाकिफ़ हैं, यानि की प्राकृतिक क्रमिक-विकास के सिद्धांत जीव विज्ञानियों के लिए अत्यंत ही सफल सिद्धांत हैं, फिर भी इसके स्पष्टिकरण का कार्य अभी समाप्त नहीं हुआ है। मुझे लगता है यह सिद्धांत एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण खोज है जिससे हम जीवविज्ञान और भौतिकविज्ञान दोनों ही क्षेत्रों में बिना किसी अलौकिक हस्तक्षेप की परिकल्पना के दुनिया की व्याख्या बहुत आगे तक कर सकते हैं।

दूसरे संदर्भ में, मैं सोचता हूं जॉनसन सही हैं। उनका तर्क है, जैसा कि सभी समझते हैं, कि प्राकृतिक क्रमिक विकास के सिद्धांत और धर्म में एक विसंगति है, और जो वैज्ञानिक और शिक्षाविद इससे इनकार करते हैं उनके सामने वे चुनौती पेश करते हैं। वे आगे शिकायत करते हैं कि प्राकृतिक क्रमिक विकास और ईश्वर के अस्तित्व में तभी तालमेल संभव है, अगर ईश्वर शब्द का अर्थ हम उस प्रथम कारण से ज़्यादा न लें जो प्रकृति के नियमों को स्थापित करने और स्वाभाविक प्रक्रिया को लागू करने के बाद आगे की गतिविधियों से विरत हो जाता है।

आधुनिक क्रमिक विकास के सिद्धांत और हितबद्ध ईश्वर में विश्वास के बीच की विसंगति मुझे तर्क की विसंगति नहीं लगती। कोई यह कल्पना कर सकता है कि ईश्वर ने प्रकृति के नियमों को रचा और क्रमिक विकास की प्रक्रिया को इस उद्देश्य से स्थापित किया कि एक दिन स्वाभाविक चयन प्रक्रिया के द्वारा आप और हम प्रकट होंगे। वास्तविक विसंगति दृष्टि की है। आखिर ईश्वर उन नर नारियों के दिमाग़ की पैदाइश नहीं है जिन्होंने अनन्त दूरदर्शी प्रथम कारणों की परिकल्पना की, बल्कि उन दिलों की खोज है जो हितबद्ध ईश्वर के लगातार हस्तक्षेप के लिए लालायित थे।

धार्मिक रूढ़ीवादी यह समझते हैं, जैसा कि उनके उदारवादी विरोधी नहीं समझ पाते, कि विद्यालयों ( पब्लिक स्कूल ) में क्रमिक विकास के शिक्षण की बहस में कितनी बड़ी चीज़ दाव पर लगी है। १९८३ में, टेक्सस से आने के थोड़े दिनों बाद, उस अधिनियम पर टेक्सस सीनेट के समक्ष गवाही देने के लिए मुझे आमंत्रित किया गया, जिसके अनुसार राज्य द्वारा खरीदी हुई माध्यमिक विद्यालयों की पाठ्‍य-पुस्तकों में क्रमिक विकास के सिद्धांत के पठन-पाठन की तब तक मनाही थी, जब तक उतना ही महत्त्व सृष्टिवाद को न दिया जाए। समिति के एक सदस्य ने मुझसे पूछा कि राज्य क्रमिक विकास जैसे वैज्ञानिक सिद्धांत के शिक्षण को कैसे मदद दे सकता है जो धार्मिक विश्वासों से इतना खिलवाड़ करता है। मैने जवाब दिया कि नास्तिकता से भावनात्मक रूप से जुडे लोगों के लिए जीव-विज्ञान में शिक्षण के लिए उपयुक्त महत्त्व से ज़्यादा महत्त्व क्रमिक विकास पर कम महत्त्व देने में है। यह जन विद्यालयों का काम नहीं है कि वे वैज्ञानिक सिद्धांतों के धार्मिक प्रभावों के पक्ष या विपक्ष में अपने को शामिल करें। मेरे उत्तर ने सीनेटर को संतुष्ट नहीं किया क्योंकि वह मेरी तरह, जानता था कि जीव विज्ञान के पाठ्‍यक्रम में क्रमिक विकास के सिद्धांत पर उपयुक्त जोर देने का क्या प्रभाव पड़ेगा। ज्योंही मैंने समिति कक्ष से बाहर कदम रखा, वह बुदबुदाया-“अभी ईश्वर स्वर्ग में है।” ऐसा हो सकता है, लेकिन लड़ाई में जीत हमारी हुई। टेक्सस के माध्यमिक स्कूल की पाठ्‍यपुस्तकों में केवल आधुनिक क्रमिक विकास के सिद्धांत को शामिल करने की छूट ही नहीं मिली बल्कि इसे शामिल करना अब अनिवार्य हो गया है और वह भी सृष्टि के बारे में बकवास के बिना। लेकिन ऐसी बहुत सी सारी जगहें हैं ( खासकर आज के इस्लामिक देशों में ) जहां यह लड़ाई अभी जीती जानी है और कहीं भी यह गारंटी नहीं है कि यह जीत कायम रहेगी।

हम प्रायः सुनते हैं कि विज्ञान और धर्म में कोई विरोध नहीं है। उदाहरण के लिए जॉनसन की पुस्तक की विवेचना करते हुए स्टीफन गोल्ड कहते हैं कि ‘विज्ञान और धर्म एक-दूसरे के विरोध में खड़े नहीं होते, क्योंकि विज्ञान तथ्यात्मक सच्चाइयों से नाता जोड़ता है, जबकि धर्म मानव को नैतिकता से’। बहुत सी बातों पर में गोल्ड़ से सहमत हूं किंतु मुझे लगता है वे दूसरी दिशा में चले गये हैं। धर्म के अर्थ की परिभाषा, धार्मिक लोगों के वास्तविक विश्वास की परिधि में ही की जा सकती है और दुनिया के धार्मिक लोगों को के विशाल बहुमत को यह जानकर आश्चर्य होगा कि धर्म का तथ्यात्मक सच्चाइयों से कुछ लेना-देना नहीं है।

लेकिन गोल्ड़ के विचार वैज्ञानिकों और धार्मिक उदारपंथियों के बीच बहुत प्रचलित हैं। लेकिन मुझे लगता है कि यह धर्म के उस स्थान से जहां कभी वह विराजमान था, पीछे हटने का महत्त्वपूर्ण संकेत है। एक समय था जब हर नदी में बिना एक जलपरी के और हर पेड़ में बिना एक वन देवी के प्रकृति की व्याख्या नहीं की जा सकती थी। उन्नीसवीं शताब्दी तक भी पेड़ और जंतुओं की संरचना सृष्टिकर्ता के प्रत्यक्ष प्रमाण के रूप में देखी जाती थी। आज भी प्रकृति की ऐसी अनंत वस्तुएं हैं जिनकी व्याख्या हम नहीं कर सकते, लेकिन हम उन सिद्धांतों को जानते हैं जो उनकी कार्य-पद्धति को नियंत्रित करते हैं। आज वास्तविक रहस्यों के लिए हमें ब्रह्मांड विज्ञान औए प्राथमिक-कण भौतिकी की तह में जाना पड़ेगा। उन लोगों के लिए जो धर्म और विज्ञान में कोई विरोध नहीं देखते, विज्ञान द्वारा कब्जा की गई ज़मीन से धर्म के पीछे हटने की प्रक्रिया लगभग पूरी हो चुकी है।

इस ऐतिहासिक अनुभव से सीख लेते हुए, हम यह अनुमान लगा सकते हैं कि यद्यपि प्रकृति के अंतिम नियमों में हमें विशेष सौन्दर्य के दर्शन् होंगे, लेकिन जीवन या बुद्धि के लिए यहां कोई विशेष जगह नहीं होगी। आगे चलकर, मूल्य या नैतिकता के मापदंड़ नहीं बनेंगे और इसीलिए हमें ईश्वर का कोई संकेत नहीं मिलेगा, जो इन चीज़ों पर ही टिके हुए हैं। यह चीज़े कहीं और भले मिल जाएं, पर प्रकृति के नियमों में नहीं।

मुझे यह स्वीकार करना होगा कि प्रकृति कभी-कभी जरूरत से ज़्यादा खूबसूरत लगती है। मेरे घर के कार्यालय की खिड़की के सामने एक हैकबेरी का पेड़ है। उस पर बार-बार आयोजित सुसभ्य पक्षियों का समारोह – नीलकंठ, पीले गले वाले वाईरोज और सबसे प्यारे कभी-कभी पहुंचने वाले लाल कार्डिनल। यद्यपि मैं अच्छी तरह समझता हूं कि किस प्रकार चमकीले रंग की पंखुड़ियां अपने साथी जोड़े को आकर्षित करने की प्रतिद्वंदता में विकसित हुए, फिर भी यह कल्पना किये बिना नहीं रहा जा सकता कि यह सारा सौन्दर्य हमारी सुविधा के लिए बनाया गया है। लेकिन यह भी तय है कि पक्षियों और पेड़ों के ईश्वर को, जन्म से ही अंग-भंग करने वाले या कैंसर देने वाला ईश्वर भी बनना पड़ेगा।

सहस्त्राब्दियों से धार्मिक लोग ईशशास्त्र में उलझे हुए हैं। उनके सामने वह समस्या खड़ी है कि एक अच्छे ईश्वर द्वारा शासित मानी जाने वाली दुनिया में दुखों का अस्तित्व क्यों है। अलग-अलग दैनिक योजनाओं की कल्पना कर उन्होंने इस समस्या के कई विलक्षण हल निकालें हैं। इन समाधानों पर मैं तर्क नहीं करूंगा और न ही अपनी ओर से एक और समाधान प्रस्तुत करूंगा। विध्वंस की यादों ने मुझे ईश्वर के मनुष्यों के प्रति रवैयों को नयायपूर्ण बताने की कोशिशों से विमुख कर दिया है। अगर कोई ईश्वर है जिनके पास मनुष्यों के लिए खास योजनाएं हैं तो हमारे लिए अपने इस भाव को छिपाये रखने के लिए वे इतना कष्ट क्यों मोल ले रहे हैं? मुझे तो यह अगर अपवित्र नहीं तो कठोर लगेगा कि ऐसे ईश्वर की हम अपने प्रार्थनाओं में फिक्र करें।

अंतिम नियमों के प्रति मेरे कठोर दृष्टिकोण से सभी वैज्ञानिक सहमत नहीं होंगे। मैं किसी को नहीं जानता जो स्पष्ट रूप से यह कहे कि देवता के अस्तित्व के प्रमाण हैं। लेकिन बहुत सारे वैज्ञानिक प्रकृति में बुद्धियुक्त जीवन की एक विशेष स्थिति के लिए अवश्य तर्क देते हैं। वस्तुतः यह तो हर कोई जानता है कि जीवविज्ञान और मनोविज्ञान का अध्ययन अपनी-अपनी परिधि में होना चाहिए, न कि प्राथमिक-कण-भौतिकी के संदर्भ में। लेकिन यह बुद्धि या जीवन के लिए किसी विशेष स्थिति का द्योतक नहीं है, क्योंकि यही बात रसायन विज्ञान और द्रवगति विज्ञान के संबंध में भी सही है। दूसरी ओर, यदि हम अभिमुखी व्याख्याओं के मिलनबिंदु पर अंतिम नियमों में बुद्धियुक्त जीवन की विशेष भूमिका खोजें तो हम यह निष्कर्ष निकालेंगे कि वे सृष्टिकर्ता, जिन्होंने ये नियम बनाए, हमलोगों में खास दिलचस्पी रखते थे।

जॉन व्हीलर इस तथ्य से काफ़ी प्रभावित हैं कि क्वान्टम यांत्रिकी की मानक कोपेनहेगन व्याख्या के अनुसार किसी भौतिक प्रणाली में स्थान, ऊर्जा का संवेग जैसे गुणमापकों ( तत्वों ) का एक निश्चित मान तब तक नहीं बताया जा सकता जब तक कि किसी पर्यवेक्षक के यंत्र से इन्हें माप न लिया जाए। व्हीलर के लिए क्वांटम यांत्रिकी सार्थकता के लिए एक प्रकार के बुद्धियुक्त जीवन को विश्व में दिखना ही नहीं बल्कि उसके हर हिस्से में फैल जाना चाहिए ताकि विश्व की भौतिक स्थिति के बारे में सूचना का हर बिट प्राप्त किया जा सके। मेरे हिसाब से व्हीलर के निष्कर्ष प्रत्यक्षवाद के मत को अत्यंत गंभीरता से लेने के खतरे का अच्छा उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। प्रत्यक्षवाद का तर्क है कि विज्ञान को उन्हीं चीज़ों तक अपने आपको सीमित रखना चाहिए जिनका हम अवलोकन कर सकते हैं। मैं और मेरे अन्य भौतिक विज्ञानी क्वान्टम यांत्रिकी की दूसरी यथार्थवादी पद्धति को वरीयता देते हैं जो तरंग फलन के आधार पर प्रयोगशालाओं और पर्यवेक्षकों, साथ ही साथ, अणुओं और परमाणुओं की व्याख्या कर सकता है, जो नियमों द्वारा नियंत्रित होते हैं और इस बात पर वस्तुगत रूप से निर्भर नहीं रहते कि पर्यवेक्षक मौजूद है या नहीं।

( क्रमशः )


इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

अगली बार इस आलेख का तीसरा भाग प्रस्तुत किया जाएगा।

शुक्रिया।

समय

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4 टिप्पणियाँ (+add yours?)

  1. Trackback: और तब ईश्वर का क्या हुआ? – 3 « समय के साये में
  2. Sidharth Joshi
    जून 20, 2012 @ 03:37:28

    “ईश्‍वर उन नर नारियों के दिमाग़ की पैदाइश नहीं है जिन्होंने अनन्त दूरदर्शी प्रथम कारणों की परिकल्पना की, बल्कि उन दिलों की खोज है जो हितबद्ध ईश्वर के लगातार हस्तक्षेप के लिए लालायित थे।”

    “प्रत्यक्षवाद का तर्क है कि विज्ञान को उन्हीं चीज़ों तक अपने आपको सीमित रखना चाहिए जिनका हम अवलोकन कर सकते हैं।”

    पहले कथन के बारे में मेरी सोच यह है कि घोस्‍ट इन द मशीन के रास्‍ते से आगे आ रहे स्‍त्री पुरुषों से इससे अधिक की अपेक्षा भी नहीं की जा सकती थी। ऐसे में दिमाग से पैदा हुए ईश्‍वर या सर्वव्‍यापी ईश्‍वर में अंतर्द्वद्व सहज था।

    दूसरे कथन के बारे में कुछ दिन पहले मेरी एक मनु शर्मा नामक के एक ज्‍योतिषी से बात हुई। वह मेधावी विद्यार्थी अभी ज्‍योतिश में पीएचडी कर रहा है। उसने सरलता और सहजता से कहा कि प्रत्‍यक्षवाद पर चल रहा विज्ञान भौतिक के नए नियमों के सामने सौ साल पहले ही घुटने टेक चुका है। ऐसे में प्रयोगशाला में प्रयोग प्रेक्षण और परिणाम से परे की जितनी चीजें सामने आती जा रही हैं, विज्ञान उनता ही बौना सिद्ध हो रहा है। ऐसे में कई वैज्ञानिक पारंपरिक दर्शन को किसी भी कीमत पर ओछा सिद्ध कर अपने हिस्‍से के विज्ञान को बचाने में जुटे हैं।

    जितनी सहजता से मनु ने कहा, उतनी ही सहजता से मैं निगल गया… (बाद में पचाने के लिए खासी मशक्‍कत करनी पड़ी।)

    प्रतिक्रिया

  3. समय
    जून 24, 2012 @ 23:29:02

    प्रिय सिद्धार्थ,
    वस्तुगत वास्तविकता दिमाग़ से पैदा हुए ईश्वर और सर्वव्यापी ईश्वर में कोई भेद नहीं करती।

    अलग-अलग दिमाग़ों की अलग-अलग सीमाएं हैं। अलौकिक शक्तियों के वज़ूद की काल्पनिकता में उलझे दिमाग़, इन तक नहीं पहुंच पाने को दूसरे दिमागों की सीमाएं समझते हैं। वहीं वस्तुगत वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखने वाले दिमाग़, काल्पनिकता के इस गड़बड़झाले से नहीं उबर पाने की कमजोरियों को दूसरे दिमागों की सीमाएं समझते हैं।

    ईश्वर की तरह ही, सर्वव्यापकता भी दिमाग़ों की काल्पनिकता की ही उपज है। मनुष्य से इतर, बाकी प्राणीजगत की कल्पनाहीन परिस्थितियों और दिमाग़ो को किसी हितबद्ध ईश्वर की आवश्यकता पैदा नहीं हुई या नहीं होती।

    वस्तुगत विज्ञान में वाद नहीं हुआ करते। वादों का दृष्टिकोण वैज्ञानिक या अवैज्ञानिक हुआ करता है। वैज्ञानिक तथ्यों को व्याख्याओं और हितबद्धताओं में बांधने का काम दर्शन का है। प्रत्यक्षवाद एक दार्शनिक धारा ही थी जिसने वैज्ञानिक तथ्यों की व्याख्या का एक विशिष्ट दृष्टिकोण प्रस्तुत और विकसित करने की कोशिश की। यह ठोस ( आनुभाविक ) विज्ञानों को सच्चे ज्ञान का एकमात्र स्रोत मानती है और दार्शनिक अध्ययन के संज्ञानात्मक मूल्य को अस्वीकार कर देती है।प्रत्यक्षवादियों ने ज्ञान की प्राप्ति के साधन के रूप में सैद्धांतिक परिकल्पना को अस्वीकार कर दिया। कोम्त से शुरू होते हुए, मिल, स्पेन्सर, माख़, कर्नाप, राइख़ेनबाख़ आदि दार्शनिकों ने इसे विकसित किया।

    कहने का तात्पर्य यह है कि विज्ञान प्रत्यक्षवाद मात्र पर नहीं चल रहा, बल्कि प्रत्यक्षवाद एक दार्शनिक अवधारणा है, जिसकी अपनी हितबद्धताएं थीं। उसकी व्याख्याएं नये वैज्ञानिक तथ्यों के आगे घुटने टेक सकती हैं, परंतु विज्ञान अपनी सीमाओं को निरंतर लांघते हुए निरंतर विकसित हो रहा है। वह प्रकृति के सामने मनुष्य के बौनेपन से शुरुआत करते हुए निरंतर इस बौनेपन को समृद्ध करता जा रहा है। मनुष्य जाति के एकत्रित विशाल ज्ञान के आगे व्यक्तिपरकताएं, आत्मपरकताएं बौनी ही साबित होने को अभिशप्त होती हैं।

    विज्ञान की विशेषता उसकी सार्वभौमिकता होती है। वह विशिष्टता से नहीं, सामान्यता से जुड़ता है। जब विज्ञान किसी के हिस्से का होने लगता है, तब वह विज्ञान कम रह जाता है और मान्यता अधिक। उन्हें ओछा साबित होने दीजिए, परंतु मनुष्य द्वारा प्रकृति के संज्ञान से उत्पन्न वास्तविकताएं, जो उसके जीवन का अभिन्न हिस्सा बन चुकी हैं, किसी भी तरह की काल्पनिकताओं से नकारी नहीं जा सकती।

    पचाने में मशक्कत अभीष्ट है। खासकर प्रचलित परंपराओं और अपनी मान्यताओं के विरुद्ध जाती सी लगती चीज़ों में। अक्सर दिमाग़ों का हाज़मा अच्छा नहीं होता। 🙂

    शुक्रिया।

    प्रतिक्रिया

  4. Trackback: और तब ईश्वर का क्या हुआ? – 4 « समय के साये में

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