और तब ईश्वर का क्या हुआ? – 1

और तब ईश्वर का क्या हुआ?

स्टीवन वाइनबर्ग


( 1933 में पैदा हुए अमेरिका के विख्यात भौतिक विज्ञानी स्टीवन वाइनबर्ग, अपनी अकादमिक वैज्ञानिक गतिविधियों के अलावा, विज्ञान के लोकप्रिय और तार्किक प्रवक्ता के रूप में पहचाने जाते हैं। उन्होंने इसी संदर्भ में काफ़ी ठोस लेखन कार्य किया है। कई सम्मान और पुरस्कारों के अलावा उन्हें भौतिकी का नोबेल पुरस्कार भी मिल चुका है। 

प्रस्तुत आलेख में वाइनबर्ग ईश्वर और धर्म पर जारी बहसों में एक वस्तुगत वैज्ञानिक दृष्टिकोण को बखूबी उभारते हैं, और अपनी रोचक शैली में विज्ञान के अपने तर्कों को आगे बढ़ाते हैं। इस आलेख में उन्होंने कई महत्त्वपूर्ण प्रसंगों का जिक्र करते हुए, अवैज्ञानिक तर्कों और साथ ही छद्मवैज्ञानिकता को भी वस्तुगत रूप से परखने का कार्य किया है तथा कई चलताऊ वैज्ञानिक नज़रियों पर भी दृष्टिपात किया है। कुलमिलाकर यह महत्त्वपूर्ण आलेख, इस बहस में तार्किक दिलचस्पी रखने वाले व्यक्तियों के लिए एक जरूरी दस्तावेज़ है, जिससे गुजरना उनकी चेतना को नये आयाम प्रदान करने का स्पष्ट सामर्थ्य रखता है। )


पहला भाग

   तुम जानते हो पोर्ट ने कहा और उसकी आवाज़ फिर रहस्यमय हो गई, जैसा प्रायः किसी शांत जगह पर लंबे अंतराल पर कही गई बातों से प्रतीत होता है।

     यहां आकाश बिल्कुल अलग है। जब भी मैं उसे देखता हूं, मुझे ऐसा महसूस होता है जैसे कोई ठोस वस्तु हो जो हम लोगों को पीछे की हर चीज़ से रक्षा कर रही हो।

     किट ने हल्के से कांपते हुए पूछा – पीछे की हर चीज़ से?

     हाँ

     लेकिन पीछे है क्या? उसकी आवाज़ एकदम धीमी थी।

     मेरा अनुमान है, कुछ भी नहीं। केवल अंधेरा। घनी रात।

                                   – पॉल बोल्स, द शेल्टरिंग स्काई

स्वर्ग ईश्वर के गौरव की घोषणा करते हैं और यह आकाश उनके दस्तकारी की प्रस्तुति है। राजा डेविड या जिसने भी ये स्त्रोत लिखे हैं, उन्हें ये तारे किसी अत्यंत क्रमबद्ध अस्तित्व के प्रत्यक्ष प्रमाण प्रतीत हुए होंगे, जो हमारी चट्टानों, पेड़ों और पत्थरों वाली नीरस सांसारिक दुनिया से काफ़ी अलग रही होगी। डेविड के दिनों की तुलना में सूरज और अन्य तारों ने अपनी विशेष स्थिति खो दी है। अब हम समझते हैं कि ये ऐसे चमकते गैसों के गोले हैं जो गुरुत्वाकर्षण बल के कारण परस्पर बंधे हैं और अपने -अपने केन्द्र में चलने वाली उष्मानाभिकीय प्रतिक्रियाओं से उत्सर्जित ऊष्मा के दबाब के कारण सिमट जाने से बचे हुए हैं। ये तारे हमें ईश्वर के गौरव के बारे में उतना ही बताते हैं जितना कि हमारे आसपास पाये जाने वाले धरती के पत्थर।

ईश्वर की दस्तकारी में कुछ विशेष अन्तर्दृष्टि प्राप्त करने के लिए अगर प्रकृति में कुछ चीज़ों की खोज करनी हो तो निश्चित ही वह होगा प्रकृति के अंतिम नियम। इन नियमों को जानकर हम मालिक होंगे उन नियमों की किताब के जो तारों और पत्थरों और हर अन्य चीज़ को नियंत्रित करते हैं। इसीलिए यह स्वाभाविक है कि स्टीफन हॉकिंग ने प्रकृति के नियमों को ईश्वर के दिमाग़ की संज्ञा दी है। एक अन्य भौतिकविद चार्ल्स मिजनर ने भी भौतिक विज्ञान और रसायन विज्ञान के परिप्रेक्ष्यों की तुलना करते हुए इसी तरह की भाषा का प्रयोग किया, एक कार्बनिक रसायनज्ञ इस प्रश्न के जवाब में कि बानवे तत्व क्यों हैं और ये कब बने, यह कह सकता है कि- कोई दूसरा ही इसका जवाब दे सकता है। लेकिन किसी भौतकविद से अगर पूछा जाए कि यह दुनियां क्यों कुछ भौतिक नियमों का अनुसरण करने और शेष का अनुसरण नहीं करने के लिए बनाई गई है? तो वह जवाब दे सकता है- ईश्वर जाने। आइन्सटीन ने एक बार अपने सहायक अर्न्स्ट स्ट्रास से कहा था- मुझे यह जानने की इच्छा है कि दुनिया की रचना में ईश्वर के पास कोई विकल्प मौजूद थे या नहीं। एक अन्य मौके पर वे भौतिकी के उपक्रम ( विषय ) के उद्देश्य का वर्णन करते हुए कहते हैं- “इसका उद्देश्य न केवल यह जानना है कि प्रकृति कैसी है और वह कैसे अपना कार्य संपादित करती है बल्कि उस आदर्शमय और दंभपूर्ण लगने वाले उद्देश्य को जहां तक संभव हो प्राप्त करना है- जिनके तहत हम यह भी जानना चाहते हैं कि प्रकृति ऐसी ही क्यों है और दूसरी तरह की क्यों नहीं है।…इस प्रकार यह् अनुभव होता है, जिसे यूं कहा जाए कि ईश्वर ख़ुद इन संबंधों को जैसे वे हैं इससे अलग किसी तरीके से व्यवस्थित नहीं कर सकते थे”। वैज्ञानिक अनुभव का यही प्रोमिथीयन तत्व है। मेरे लिए हमेशा से यही वैज्ञानिक प्रयास का विशिष्ट जादू रहा है।

आइन्स्टीन का धर्म इतना अस्पष्ट था कि मुझे संदेह है, और उनके यूं कहा जाए से स्पष्ट होता है, कि उनका यह कथन नए रूपक की तरह है। भौतिक विज्ञान इतना मूलभूत है कि भौतिक विज्ञानियों के लिए यह् रूपक स्वाभाविक ही है। धर्म तत्वज्ञ पॉल टिलिच ने पाया कि वैज्ञानिकों में केवल भौतिक विज्ञानी ही बिना किसी उलझन के ईश्वर शब्द का उपयोग करने में सक्षम हैं। किसी का धर्म चाहे जो हो या बिना धर्म के भी प्रकृति के अंतिम नियमों को ईश्वर के दिमाग़ के रूप में बताना एक अत्यंत सम्मोहक रूपक है।

इस संबध में मेरा सामना हुआ एक विचित्र सी जगह पर वाशिंगटन के रेबर्न हाउस ऑफिस बिल्डिंग में। जब मैं वहां १९८७ में विज्ञान, अंतरिक्ष और प्रोद्योगिकी की हाउस समिति के सामने सुपरकन्डक्टिंग सुपर कोलाइडर ( एस.एस.सी.) प्रोजेक्ट के पक्ष में साक्ष्य के लिए उपस्थित हुआ। मैंने जिक्र क्या कि किस प्रकार प्राथमिक कणों के हमारे अध्ययन के दौरान हम नियमों की खोज कर रहे हैं और ये नियम लगातार और ज़्यादा सुसंगत और सार्वभौम होते जा रहे हैं और हमें यह आभास होने लगा है कि यह मात्र संयोग नहीं है। हमने यह भी बताया कि इन नियमों में एक व्यापक सुसंगठन ( सौन्दर्य ) है जो विश्व की संरचना में गहरे छिपे सुसंगठन को प्रतिबिंबित करता है। मेरी टिप्पणी के बाद अन्य साक्ष्यों ने भी बयान दिये और समिति के सदस्यों ने प्रश्न भी पूछे। इसके बाद वहां समिति के दो सदस्यों, एक इलियॉनस के रिपब्लिकन प्रतिनिधि हैरिस डब्लू फावेल जो सुपर कोलाइडर प्रोजेक्ट् के कुलमिलाकर पक्षधर थे, और दूसरे पेनसिल्वानिया के रिपब्लिकन प्रतिनिधि डॉन रिटर एक् पूर्व धातुकीय अभियंता जो कांग्रेस में प्रोजेक्ट के धुर विरोधियों में से थे, के बीच एक बहस छिड़ गई।

    मि. फावेल – बहुत-बहुत धन्यवाद, मैं आप सभी के साक्ष्यों का आभारी हूं। यह बहुत अच्छा था। अगर कभी मुझे किसी को एस.एस.सी. की जरूरत के बारे में समझाना होगा तो यह निश्चित है कि में आपके साक्ष्यों का सहारा लूंगा। यह बहुत लाभदायक होगा। मैं कभी-कभी सोचता हूं कि हमारे पास कोई एक शब्द होता जो यह सब बयान कर देता। पर यह लगभग असंभव है। मेरा अनुमान है कि शायद डॉ. वाईनबर्ग इसके कुछ निकट पहुंचे थे। मैं एकदम निश्चित तो नहीं कह सकता पर मैंने यह लिख लिया है। उन्होंने कहा है कि उनका अनुमान है कि यह सब संयोग नहीं है कि कुछ नियम हैं जो पदार्थ को नियंत्रित करते हैं। और मैंने तुरंत लिखा कि क्या यह हमें ईश्वर को खोजने में मदद करेगा? यह तय है कि आपने यह दावा नहीं किया, लेकिन् निश्चित ही यह विश्व को और अधिक समझने में हमें बहुत सक्षम बनायेगा।

    मि. रिटर – क्या महाशय ने इस विषय में कुछ कहा? अगर ये इस पर कुछ प्रकाश डालें तो मैं कहूंगा कि…

    मि. फावेल – मैं ऐसा दावा नहीं कर रहा हूं।

    मि. रिटर – अगर यह मशीन वह सब करेगी तो मैं निश्चित ही इसके पक्ष में खड़ा रहूंगा।

मेरे विवेक ने मुझे इस विचार-विनिमय में पड़ने से रोक दिया, क्योंकि मैं नहीं समझता कि कांग्रेस के सदस्य यह जानने के लिए उत्सुक थे कि एस.एस.सी. प्रोजेक्ट में ईश्वर की खोज के बारे में मैं क्या सोचता हूं और इसलिए भी भी क्योंकि मुझे नहीं लगा कि इसके बारे में मेरे विचार जानना प्रोजेक्ट के लिए फायदेमंद होता।

कुछ लोगों का ईश्वर के बारे में दृष्टिकोण इतना व्यापक और लचीला होता है कि यह निश्चित, अवश्यम्भावी है कि वे जहां भी ईश्वर को देखना चाहेंगे उन्हें वहीं पा लेते हैं। हम प्रायः सुनते हैं कि “ईश्वर अंतिम सत्य है” या “यह विश्व ही ईश्वर है”। वस्तुतः किसी भी अन्य शब्द की तरह ईश्वर का भी वही अर्थ निकाला जा सकता है जो हम चाहते हैं। अगर आप कहना चाहते हैं कि “ईश्वर ऊर्जा है” तो आप ईश्वर को कोयले के एक टुकड़े में पा सकते हैं। लेकिन यदि शब्दों का हमारे लिए महत्त्व है तो हमें उन रूपों की कद्र करनी होगी जिनमें उनका इतिहास से उपयोग होता आया है, और ख़ासकर हमें उन विशिष्टताओं की रक्षा करनी होगी जो शब्दों के अर्थों को अन्य शब्दों में विलीन हो जाने से बचाते हैं।

इसी स्थिति में मुझे लगता है कि “ईश्वर” शब्द का अगर कुछ भी उपयोग है तो इसका अर्थ ईश्वर के रूप में ही लिया जाना चाहिए। वे जो रचयिता हैं और नियम बनाते हैं, जिन्होंने केवल प्रकृति के नियमों और विश्व को ही स्थापित नहीं किया है बल्कि अच्छे और बुरे के मापदण्ड़ भी निर्धारित किये हैं, ऐसा व्यक्तित्व जो हमारी गतिविधियों से संबद्ध, संक्षेप में ऐसे जो हमारे आराध्य हो सकते हैं। यह स्पष्ट होना चाहिए कि इन विषयों पर बहस करते हुए मैं अपना दृष्टिकोण रख रहा हूं और इस अध्याय में किसी ख़ास विशेषता का दावा नहीं करता। यही वो ईश्वर है जो पूरे इतिहास पुरुषों और नारियों के लिए महत्त्वपूर्ण रहे हैं। वैज्ञानिक और अन्य लोग कभी-कभी “ईश्वर” शब्द का उपयोग इतने अमूर्त और असम्बद्ध अर्थों में करते हैं कि प्रकृति के नियमों और “उन” में कोई अंतर नही रह जाता। आइन्सटीन ने एक बार कहा था कि “मेरा विश्वास उस स्पीनोजा के ईश्वर पर है जो सभी वस्तुओं की क्रमबद्ध समरसता के रूप में प्रकट होता हैं। मैं उस ईश्वर को नहीं मानता जो मनुष्य की गतिविधियों और उनके भाग्य से हितबद्ध है”। लेकिन ‘क्रमबद्धता’ या ‘समरसता’ की जगह अगर हम ‘ईश्वर’ शब्द का प्रयोग करें तो इससे क्या फ़र्क पड़ेगा, इस इल्ज़ाम से बचने के अलावा कि ईश्वर है ही नहीं। ऐसे तो इस प्रकार से ‘ईश्वर’ शब्द के प्रयोग के लिए हर व्यक्ति स्वतंत्र है, पर मुझे लगता है कि इससे ईश्वर की अवधारणा और महत्त्वपूर्ण हो जाती है, गलत साबित नहीं होती।

क्या हम प्रकृति के अंतरिम नियमों में हितबद्ध ईश्वर को पा सकते हैं? यह प्रश्न कुछ बेतुका सा लगता है। केवल इसलिए नहीं कि हम अब तक अंतिम नियमों को नहीं जान पाये हैं, बल्कि इसलिए ज़्यादा कि यह कल्पना करना भी मुश्किल है कि ऐसे अंतिम सिद्धांतों को प्राप्त भी किया जा सकता है जिनकी और गहन सिद्धांतों की मदद से व्याख्या करने की जरूरत ना पड़े। लेकिन यह प्रश्न चाहे कितना भी अधूरा हो, इस पर कौतूहल ना होना असंभव है कि क्या हम अंतिम सिद्धांत में अपने गंभीरतम सवालों का जवाब हितबद्ध ईश्वर के कारनामों का कोई प्रतीक ढूंढ़ पाएंगे? मेरा अनुमान है कि हम ऐसा नहीं कर पाएंगे।

विज्ञान के इतिहास से हमारे सभी अनुभव एक विपरीत दिशा में, एक रूखे अवैयक्तिक प्रकृति के नियमों की ओर अग्रसर हैं। इस पथ पर पहला पहला महत्तवपूर्ण कदम था आकाश ( स्वर्ग ) का रहस्योद्‍घाटन। इससे जुड़े महानायकों को तो हर कोई जानता है। कॉपरनिकस, जिन्होंने प्रस्तावित किया कि विश्व ( यूनिवर्स ) के केन्द्र में पृथ्वी नहीं है। गैलीलियो, जिन्होंने यह् सिद्ध किया कि कॉपरनिकस सही था। ब्रूनो, जिनका अनुमान था कि सूरज असंख्य तारों में से केवल एक तारा है और न्यूटन जिन्होंने दिखाया कि एक ही गति और गुरुत्वाकर्षण के नियम सौरमंड़ल और पृथ्वी पर स्थित वस्तुओं पर लागू होते हैं। मेरे विचार में महत्त्वपूर्ण क्षण वह था जब न्यूटन ने यह अवलोकन किया कि जो नियम पृथ्वी के चारों ओर चन्द्रमा की गति को नियंत्रित करता है वही पृथ्वी की सतह पर किसी वस्तु का गिरना भी निर्धारित करता है। हमारी ( २०वीं ) शताब्दी में आकाश के रहस्योद्‍घाटन को एक कदम और आगे बढ़ाया अमेरिकन खगोलविद्‍ एडविन हबॅल ने। उन्होंने एन्ड्रोमिडा नीहारिका ( नेबूला ) की दूरी मापकर यह सिद्ध किया कि यह नीहारिका, और निष्कर्षतः ऐसी ही हजारों अन्य नीहारिकाएं, हमारी आकाशगंगा के मात्र बाहरी हिस्से नहीं हैं बल्कि वे ख़ुद में कई आकाशगंगा हैं और हमारी आकाशगंगा की तरह प्रभावशाली भी हैं। आधुनिक ब्रह्मांड़ विज्ञानी कापर्निकन ( सिद्धांत ) की भी बात करते हैं, जिसके अनुसार कोई भी ब्रह्मांड़ शास्त्रीय सिद्धांत जो हमारी आकाशगंगा को विश्व में एक विशेष स्थान देता हो उसे गंभीरता से नहीं लिया जा सकता।

जीवन के रहस्यों पर से भी पर्दा उठा है। जस्टन वॉन लीबिग व अन्य कार्बनिक रसायनज्ञों ने उन्नीसवीं सदी के प्रारंभ में यह प्रदर्शित किया कि जीवन से संबंधित रसायनों, जैसे यूरिक एसिड, के प्रयोगशाला संश्लेषण की कोई सीमा नहीं है। सबसे महत्त्वपूर्ण खोज चार्ल्स डार्विन और अल्फ्रेड रसेल वैलेस की थी, जिन्होंने दर्शाया कि सजीव वस्तुओं की आश्चर्यजनक क्षमताओं का क्रमिक विकास स्वाभाविक चयन प्रक्रिया द्वारा बिना किसी बाह्य योजना या निर्देशन के हो सकता है। रहस्योद्‍घाटन की यह प्रक्रिया इस शताब्दी में और तेज हो गई है जब जैव रसायन और आणविक जीव विज्ञान के क्षेत्र में सजीव वस्तुओं के क्रिया-कलापों की व्याख्या में लगातार सफलताएं हासिल हो रही हैं।

भौतिक विज्ञान की किसी अन्य खोज की तुलना में जीवन के रहस्यों से पर्दा उठाने का धार्मिक संवेदनशीलता पर दूरगामी प्रभाव पड़ा। यह आश्चर्य की बात नहीं है कि भौतिकी और खगोल विज्ञान के क्षेत्र में खोज नहीं, बल्कि जीव-विज्ञान में न्यूनीकरण ( रिडक्शनिज्म ) और क्रम विकास ( इवोल्यूशन ) के सिद्धांत सबसे ज़्यादा दुराग्रहपूर्ण विरोधों को जन्म देते रहे हैं।

वैज्ञानिकों में भी यदा-कदा उस जैवशक्तिवाद ( वाइटलिज्म ) के संकेत मिलते हैं, जिसका मत है कि जैविक प्रक्रियाओं की व्याख्या भौतिकी और रसायन के आधार पर नहीं की जा सकती। यद्यपि इस शताब्दी में जीव-विज्ञानी ( न्यूनीकरण विरोधियों, जैसे अर्न्स्ट् मेयर, सहित ) कुल मिलाकर जैवशक्तिवाद से मुक्ति की दिशा में अग्रसर है, लेकिन १९४४ तक भी इरविन शॉडिंगर ने अपनी प्रसिद्ध् व्हाट इज लाइफ ( जीवन क्या है ) में तर्क दिया कि जीवन की भौतिक संरचना के बारे में इतनी जानकारियां हैं कि यह सही-सही इंगित किया जा सकता है कि क्यों आज का भौतिक विज्ञान जीवन को व्याख्यायित नहीं कर सकता। उनका तर्क था कि आनुवंशिक सूचनाएं जो जीव-जंतुओं को नियंत्रित करती हैं बहुत ही स्थायी होती हैं जिन्हें जिन्हें क्वान्टम और सांख्यिकीय यांत्रिकी में वर्णित त्वरित और लगातार बदलावों वाले संसार में समायोजित नहीं किया जा सकता। शॉडिंगर की गलती को आणविक जीव-विज्ञानी मैक्स पेरुज ने चिन्हित किया, जिन्होंने अन्य चीज़ों के अलावा हीमोग्लोबिन की रचना पर भी काम किया था। शॉडिंगर ने इन्जाइम-उत्प्रेरण नाम रासायनिक प्रक्रिया द्वारा उत्पन्न किये जा सकने वाले स्थायित्व पर ध्यान नहीं दिया था।

( क्रमशः )


इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

अगली बार इस आलेख का दूसरा भाग प्रस्तुत किया जाएगा।

शुक्रिया।

समय

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4 टिप्पणियाँ (+add yours?)

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  3. Sidharth Joshi
    जून 20, 2012 @ 03:22:26

    मनोविज्ञान शृंखला के दौरान तो मैं उचट ही गया था, अब फिर से आपके साथ आ गया हूं। आप ब्‍लॉगर से वर्डप्रेस पर कब आए पता ही नहीं चला… 🙂

    प्रतिक्रिया

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