योग्यताएं तथा रुचियां

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने व्यक्ति के वैयक्तिक-मानसिक अभिलक्षणों की कड़ी के रूप में ‘योग्यता’ के अंतर्गत योग्यता के गठन में शिक्षण प्रणालियों पर निर्भरता को समझने की कोशिश की थी, इस बार हम योग्यताएं तथा रुचियों पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


योग्यताएं तथा रुचियां
( abilities and interests )

स्थिरताप्राप्त विशेष रुचियां ( stable special interests ) मनुष्य की योग्यताओं के विकास का महत्त्वपूर्ण कारक होती हैं। विशेष रुचियां, मानव कार्यकलाप के निश्चित क्षेत्र को अपना केंद्र बनानेवाली रुचियां हैं, जो इस प्रकार के कार्यकलाप में व्यावसायिक ढंग ( professional manner ) से जुटने का रुझान ( trend ) पैदा करती हैं। यहां संज्ञानात्मक रुचि ( cognitive interests ) मनुष्य को संबद्ध क्षेत्र की विधियों तथा तकनीकों में सक्रिय रूप से पारंगत करने के लिए प्रेरित करती है।

यह लक्षित किया जा चुका है कि अध्ययन अथवा किसी प्रकार के श्रम में रुचि का जन्म तदनुरूपी योग्यताओं का आधार-बिंदु होता है। बच्चे की स्थिरताप्राप्त रुचि उसकी आरंभिक योग्यताओं का सूचक, ऐसा संकेत होता है, जिसे उसके आस-पास के लोगों को बच्चे में अंतर्निहित संभावनाओं की ओर सूक्ष्मतापूर्वक ध्यान देने के लिए बाध्य करना चाहिए।

किशोरों में ऐसी रुचियां अल्पकालिक शौक़ों ( short-term passion ) का स्वरूप धारण करती हैं, हालांकि वे सशक्त आवेगमय ( impulsive ) होती हैं। किशोरों की विभिन्न और बहुधा अल्पकालीन रुचियां व्यक्तित्व की गठित होती जाती योग्यताओं के सुदृढ़ीकरण में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करती हैं। शिक्षाशास्त्र के लिए इस बात का बहुत महत्त्व है कि किशोरों की रुचियों के क्षेत्र के प्रति शिक्षा-दीक्षा देनेवालों का दृष्टिकोण ऐसा हो, जो उनकी संज्ञानात्मक आवश्यकताओं को गहन बनाए तथा प्रसारित करे। परंतु अध्यापक तथा अभिभावकों को किशोरों के शौक़ों के अल्पकालीन स्वरूप के प्रति अपना असंतोष व्यक्त न करने की सावधानी बरतनी चाहिए।

निस्संदेह, यदि स्कूली बच्चा समुचित परिवेशी परिस्थितियों में है, तो वह बहुत कम उम्र में ही स्थिरताप्राप्त विशेष रुचि ( बड़ो की सहायता से ) प्रदर्शित करने लगता है, अपनी तदनुरूपी योग्यताओं को विकसित करता है, जो उसके लिए अपना जीवन-पथ बिना किसी ग़लती के निर्धारित करना संभव बनाती है। परंतु खेद है कि ऐसा सबके साथ नहीं हो पाता। फिर भी कोई किशोर किसी व्यवसाय में स्थिर रुचि के बिना ( परंतु ज्ञान के आवश्यक भंडार तथा श्रम के लिए मानसिक रूप से तत्परता के साथ ) स्कूल से बाहर निकलता है, तो उसके लिए अपनी तरह के उस दूसरे छात्र की तुलना में जीवन में सफलता की बेहतर संभावनाएं उपलब्ध होती हैं, जो बाहरी चमक-दमक से युक्त व्यवसायों के मोह में आकर ग़लत और जल्दबाज़ी में अपना रास्ता चुनता है।


इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

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