योग्यता का गठन और शिक्षण

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने व्यक्ति के वैयक्तिक-मानसिक अभिलक्षणों की कड़ी के रूप में ‘योग्यता’ के अंतर्गत योग्यताएं तथा आनुवंशिकता पर चर्चा की थी, इस बार हम योग्यता के गठन में शिक्षण प्रणालियों पर निर्भरता को समझने की कोशिश करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


योग्यता का गठन और शिक्षण प्रणालियां

प्रवृत्तियों ( tendencies ) तथा योग्यताओं ( abilities ) के पारस्परिक संबंधों का विवेचन यह दर्शाता है कि यद्यपि योग्यताओं का विकास नैसर्गिक पूर्वाधारों पर निर्भर होता है, जो लोगों में एकसमान नहीं होते, फिर भी वे ( योग्यताएं ) इतनी प्रकृति की देन नहीं है, जितनी कि मानव इतिहास की उपज हैं। पशुओं के विपरीत, जिनमें एक पीढ़ी की उपलब्धियां दूसरी पीढ़ी के पास शरीर में आनुवंशिक आकृतिक परिवर्तनों के रूप में स्थानान्तरित होती है, मनुष्य में यह सामाजिक-ऐतिहासिक प्रक्रिया के माध्यम से, यानि श्रम के औजारों, भाषा, कलाकृतियों, आदि की सहायता से होता है।

प्रत्येक मनुष्य को अपनी पूर्ववर्ती पीढ़ी से उपलब्धियों की मशाल प्राप्त होती है : उसके लिए श्रम के औजारों में पारंगत बनना, भाषा का उपयोग करना, कलाकृतियों से आनंद प्राप्त करना आवश्यक है, आदि। ऐतिहासिक उपलब्धियों के विश्व का ज्ञान प्राप्त करते हुए लोग अपनी योग्यताएं गठित करते हैं। मनुष्य किस हद तक अपनी योग्यताएं प्रदर्शित कर सकता है, यह सीधे उन प्रणालियों ( systems ) पर निर्भर करता है, जो उसे पूर्वजों द्वारा समाज की आवश्यकताओं की पूर्ति करते हुए विगत इतिहास के दौरान विकसित ज्ञान तथा कौशल को आत्मसात करने में सहायता देने के लिए इस्तेमाल की जाती हैं

यदि इस प्रश्न को मानवजाति के इतिहास की दृष्टि से देखा जाए, तो उपरोक्त प्रस्थापना की सत्यता को देखना सुगम है। उदाहरण के लिए, आज इस कथन पर कोई संदेह नहीं करता कि पांच से लेकर सात वर्ष की आयु का प्रत्येक सामान्य बच्चा लिखना-पढ़ना सीख सकता है। परंतु दो सौ वर्ष पहले आम तौर पर यह विचार काफ़ी प्रचलित था कि केवल असाधारण विशेषताओं से संपन्न बच्चे ही ऐसा कर सकते हैं। शेष बच्चों ( लगभग दो तिहाई ) को शुरू से ही साक्षरता के रहस्यों के संसार में प्रवेश करने में असमर्थों की कोटि में रख दिया जाता था। यह दृष्टिकोण अध्यापन की वास्तविक कठिनाइयां प्रतिबिंबित करता था, क्योंकि उस समय विद्यमान विधियां ( methods ) आदतों के गठन में रुकावट डालती थीं। कालांतर में शिक्षा की प्रणालियों के परिष्करण ( refinement ) ने “आनुवंशिक व्याकरणीय योग्यताओं” की समस्या हल करना संभव बनाया। व्यवहार ने दर्शाया कि सभी बच्चे लिखना-पढ़ना सीख सकते हैं

इस कथन के संबंध में क्या निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं? यह मानने का आधार है कि संबद्ध सक्रियता के लिए योग्यताओं का गठन पूरी तरह शिक्षण की प्रणालियों पर निर्भर करता है। नियमतः, हर बार, जब शिक्षण की प्रणाली अपर्याप्त सिद्ध होती है, और शिक्षकों को अपनी विफलता स्वीकार करनी पड़ती है, तो योग्यताओं के जन्मजात स्वरूप की चर्चा की जाने लगती है। स्वभावतः प्रणालियां परिष्कृत होती जाएंगी तथा ‘जन्मजात’ योग्यताओं का दायरा अधिकाधिक संकुचित होता जाएगा। और यह माना जा सकता है कि काव्यात्मक, सांगीतिक, कलात्मक, अध्यापकीय, संगठनात्मक, आदि योग्यताएं अंततः ‘व्याकरणीय’ अथवा ‘गणितीय’ योग्यताओं के समकक्ष हो जाएंगी। इस संबंध में बहुत-से मनोविज्ञानी प्रयोग कर रहे हैं।

इस बात की मिसालें मौज़ूद हैं, जो बताती है कि संगीत की मानो ज़रा भी पकड़ न रखनेवाले छात्रों में, याने संगीत की प्रवृत्तियों से सर्वथा वंचित छात्रों में मनोविज्ञानी, संगीत की समझ पैदा करने में सफल रहे। व्यक्तिगत अभ्यासों ( संगीत के सुरों के श्रवण तथा उसके एक साथ अनुकरण ) की सहायता से ऐसी योग्यता के, जिसे जन्मजात गुणों का क्लासिकीय उदाहरण माना जाता रहा, विकास में सफलता प्राप्त हुई है।

इसी तरह की सफलता मास्को के एक स्कूल में प्राप्त हुई, जहां मनोविज्ञानियों तथा शिक्षकों का एक समूह छात्रों में कई वर्षों में गणितीय योग्यताओं गठित करने के काम में जुटा रहा ; उनके निदेशन में पहली कक्षा में ही बच्चे अमूर्त अवधारणाओं में पारंगत बनने में सफल रहे, हालांकि बीजगणित के मूल सिद्धांतों के बारे में आम तौर पर यह माना जाता था कि उन्हें केवल पांचवीं और छठी कक्षाओं के छात्र ही समझ सकते हैं।

योग्यताओं तथा प्रतिभाओं का गठन समग्र रूप से समाज तथा राज्य का महत्त्वपूर्ण कार्य है। तमाम बच्चों में योग्यताओं के चहुंमुखी विकास के कार्यभार का, विशेष रूप से गुणी बच्चों में विशेष प्रतिभाओं के विकास से कोई अंतर्विरोध ( contradiction ) नहीं है।


इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

Advertisements

1 टिप्पणी (+add yours?)

  1. Trackback: योग्यताएं तथा रुचियां « समय के साये में

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

%d bloggers like this: