योग्यताओं के नैसर्गिक पूर्वाधारों के रूप में प्रवृत्तियां

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने व्यक्ति के वैयक्तिक-मानसिक अभिलक्षणों की कड़ी के रूप में ‘योग्यता’ के अंतर्गत योग्यताओं की नियतिनिर्दिष्ट अवधारणा की आधारहीनता पर चर्चा की थी, इस बार हम योग्यताओं के नैसर्गिक पूर्वाधारों के रूप में प्रवृत्तियों को समझने की कोशिश करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


योग्यताओं के नैसर्गिक पूर्वाधारों के रूप में प्रवृत्तियां

योग्यताओं ( abilities ) के जन्मजात स्वरूप का खंडन निरपेक्ष नहीं है। जन्मजात योग्यताओं को अस्वीकार करते हुए भी मनोविज्ञान मस्तिष्क की संरचना में अंतर्निहित कतिपय ( certain ) विशेषताओं के आनुवंशिक स्वरूप को स्वीकार करता है, जो सक्रियता की कुछ क़िस्मों में ( आम तौर पर कुछ व्यवसायों, धंधों, श्रम-सक्रियता, आदि में ) मनुष्य की सफलता के के पूर्वाधार का काम दे सकती हैं। मस्तिष्क की संरचना की इन प्रकार्यात्मक ( functional ) विशेषताओं को, ज्ञानेन्द्रियों तथा प्रेरक क्षेत्रों को, जो योग्यताओं के विकास के नैसर्गिक पूर्वाधार होते हैं, प्रवृत्तियां ( tendencies ) कहा जाता है

योग्यताओं तथा प्रवृत्तियों के बीच संबंधों पर घ्राणबोध ( olfactory sense ), यानि सूंघने की सूक्ष्म अनुभूति के उदाहरण से प्रकाश डाला जा सकता है। सूंघने की असामान्य रूप से तीक्ष्ण अनुभूति, यानि घ्राणविश्लेषक की अत्यधिक उच्च संवेदनशीलता, जन्मजात प्रवृत्तियों में से एक है। क्या यह योग्यता है? यक़ीनन नहीं, क्योंकि हर योग्यता किसी निश्चित विषय से, ठोस मानव सक्रियता से अथवा नाना कार्यकलापों से संबंधित होती है। यदि ऐसा न होता, तो ‘योग्यता’ शब्द ही अर्थहीन हो जाता। इसलिए मनुष्य के तंत्रिकीय-मानसिक गठन की ऐसी विशेषता, एक सामान्य प्रवृत्ति है। वस्तुतः, मस्तिष्क की संरचना उसकी पूर्वकल्पना नहीं कर सकती कि यह विशेषता, जो मनुष्य की तीक्ष्ण संवेदनशीलता का कारण है, मानव-समाज में इतिहास के प्रवाह के दौरान बने व्यवसायों तथा धंधों से किसी भी प्रकार जुड़ी हुई नहीं है, जो घ्राण की अतीव संवेदनशीलता की अपेक्षा करते हों।

मस्तिष्क की संरचना इस बात की पूर्वकल्पना नहीं कर सकती कि मनुष्य अपने लिए कार्यकलाप का कौन-सा क्षेत्र चुनेगा और वह क्या लक्षित प्रवृत्तियों के विकास की संभावना प्राप्त कर पाएगा। परंतु समाज यदि ऐसे व्यवसायों को, जिनमें विशेष रूप से तीक्ष्ण घ्राण-शक्ति की आवश्यकता पडती है, विकसित करता है और यदि संबद्ध मनुष्य विशेष में तदनुरूपी नैसर्गिक प्रवृत्तियां विद्यमान हैं, तो वह अपने अंदर तदनुरूपी योग्यताओं का विकास करना दूसरों की अपेक्षा अधिक सुगम पाएगा। उदाहरण के लिए, इत्रफ़रोशों का, जो एक बहुत ही विरल तथा अत्यंत मूल्यवान व्यवसाय में काम करते हैं, काम भिन्न-भिन्न प्रकार की महकों को मिलाकर मौलिक सुगंध तैयार करना है, ताकि नये प्रकार के इत्रों का बड़े पैमाने पर उत्पादन किया जा सके। स्वभावतः, इन लोगों की व्यवसायगत योग्यताएं उन प्रवृत्तियों के विकास का परिणाम हैं, जिनमें उनकी ध्राणेंद्रिय की रचना तथा उसके प्रकार्य शामिल हैं। मस्तिष्क उनका जीवन-पथ, व्यवसाय, तदनुरूपी योग्यताओं का विकास पूर्वनिर्धारित नहीं करता।

प्रवृत्तियां बहुआयामी ( multidimensional ) होती हैं। एक ही प्रवृत्ति नाना योग्यताओं में विकसित हो सकती है। यह कार्यकलाप की अपेक्षाओं के स्वरूप पर निर्भर करता है। साथ ही जन्मजात तथा कम उम्र में ग्रहण की जानेवाली नाना गंभीर मस्तिष्कीय अनियमितताओं ( ओलिगोफ़्रेनिया ) के फलस्वरूप प्रवृत्तियां प्रायः असाध्य रूप से दोषपूर्ण हो सकती हैं और योग्यताओं के विकास की लगभग कोई संभावना नहीं रह जाती।

आज योग्यताओं के विकास के पूर्वाधारों के नैसर्गिक विकास के सार से संबंधित प्राक्कल्पना ( hypothesis ) की न्यूनाधिक फलप्रदता की बात करना संभव है। अनुसंधानों ने इस प्राक्कल्पना की पुष्टि नहीं की है कि मस्तिष्क की शरीररचनात्मक विशेषताएं निश्चित योग्यताओं से संबंधित होती हैं। यद्यपि यह विचार कि बौद्धिक विशेषताएं, प्रतिभा तथा योग्यताएं मस्तिष्क गोलार्धों तक में स्थित होती हैं, विज्ञान द्वारा बहुत पहले ही खंडित किया जा चुका है और उसमें केवल इतिहासकारों की ही दिलचस्पी रह गई है, परंतु आम मनुष्य के मन में यह विश्वास अभी तक मजबूती से जमा हुआ है कि मनुष्य की बुद्धि उसके मस्तिष्क के आकार पर निर्भर करती है।

निस्संदेह, अंतर्वैयक्तिक संबंधों में बड़े माथेवाले मनुष्य के बारे में आम तौर पर यह माना जाता है कि उसमें बुद्धि का स्तर बहुत ऊंचा है और उससे बुद्धिमतापूर्ण ढंग से बातें करने तथा अच्छी सलाह देने की अपेक्षा की जाती है – और जब उससे की जानेवाली अपेक्षाएं निराधार सिद्ध होती हैं, तो धोर निराशा होती है। इसके विपरीत, कम चौड़े माथेवाला मनुष्य अपनी मानसिक योग्यताओं के विषय में दूसरे लोगों में विश्वास पैदा नहीं करता, हालांकि उनका संशय आम-तौर पर आधारहीन सिद्ध होता है।

यह विचार कि योग्यता जैसी संजटिल मानसिक विशेषता मस्तिष्क के निश्चित भागों में अवस्थित हो सकती है, शरीरक्रियाविज्ञान तथा मनोविज्ञान के बारे में ज्ञान की आरंभिक मंज़िल को प्रतिबिंबित करता था और आगे चलकर उसे पूर्णतः ठुकरा दिया गया। जीवन ने मस्तिष्क के आकार, उसकी संहति पर प्रवृत्तियों की आश्रितता की प्राक्कल्पना को भी ग़लत सिद्ध कर दिया है। वयस्क मनुष्य के मस्तिष्क का औसत वज़न १४०० ग्राम होता है, परंतु कई महापुरुषों के मस्तिष्कों को तौले जाने पर परिणाम निकला कि मेधा, योग्यता का वज़न से कोई रिश्ता नहीं है। कईयों के मस्तिष्क के वज़न औसत से अधिक निकले तो ऐसी महान हस्तियों की भी कोई कमी नहीं थी जिनके मस्तिष्क के वज़न औसत से काफ़ी कम थे। जल्द ही यह भी पता चला कि कि सबसे बड़ा तथा सबसे भारी मस्तिष्क ऐसे मनुष्य का था, जिसमें केवल बौद्धिक योग्यताओं का ही अभाव नहीं था, अपितु जो मानसिक दृष्टि से अपूर्ण भी था।

वर्तमान काल में वे प्राक्कल्पनाएं सर्वाधिक फलप्रद सिद्ध हुई हैं, जो प्रवृत्तियों को मस्तिष्क की सूक्ष्म-संरचना तथा ज्ञानेन्द्रियों से जोड़ती हैं। प्रवृत्तियों को तंत्रिकीय प्रक्रियाओं ( उनकी शक्ति, संतुलन तथा गतिशीलता ) के कतिपय चरों ( variables ) से जोड़नेवाली प्राक्कल्पनाएं और उच्च तंत्रिका-तंत्र की क़िस्में भी अत्यधिक दिलचस्पी का विषय बन गई है। कई मनोविज्ञानियों ने यह स्पष्ट करने का प्रयत्न किया कि उच्च तंत्रिका-सक्रियता का रूप योग्यताओं की संरचना के गुणात्मक पहलू पर कैसे प्रभाव डालता है। यह भी प्रदर्शित किया गया कि तंत्रिकीय प्रक्रियाओं की निर्बलता तंत्रिका-तंत्र की नकारात्मक विशेषता मात्र नहीं है, अपितु वह तो सकारात्मक विशेषता भी है, क्योंकि तंत्रिका-प्रक्रियाओं की दुर्बलता उसकी उच्च अनुक्रियात्मकता ( high responsiveness ) का परिणाम है।

कतिपय परिस्थितियों में तंत्रिका-तंत्र की उच्च संवेदनशीलता ( याने उसकी दुर्बलता ) ऐसी प्रवृत्ति के रूप में प्रकट हो सकती है, जिसके आधार पर श्रम-सक्रियता की ऐसी क़िस्मों से जुड़ी योग्यता का विकास होता है जो उच्च अनुक्रियात्मकता, संवेदनशीलता, सह्रदयता की अपेक्षा करती हैं।

यह ऐसा क्षेत्र है, जिसमें मनुष्य के व्यक्तित्व की विशिष्टता बहुत स्पष्ट रूप में निखरती है। पशु के विपरीत, जिसको अपने तंत्रिका-तंत्र के निर्बल होने की सूरत में अस्तित्व के लिए घोर संघर्ष करना पड़ता है, मनुष्य को ऐसी ही अभिलाक्षणिकताओं ( characteristics ) की दशा में “अपंग” नहीं बनना पड़ता, क्योंकि उसका सामाजिक-ऐतिहासिक परिवेश पशु से सर्वथा भिन्न होता है। इसके अलावा, इस शरीरक्रियात्मक आधार पर विकसित होने वाली योग्यताएं उसके जीवन तथा विकास के लिए अत्यंत अनुकूल परिस्थितियां पैदा कर सकती हैं।


इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

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