योग्यताओं की नियतिनिर्दिष्ट अवधारणा की आधारहीनता

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने व्यक्ति के वैयक्तिक-मानसिक अभिलक्षणों की कड़ी के रूप में ‘योग्यता’ के अंतर्गत प्रतिभा तथा शिल्पकारिता पर चर्चा की थी, इस बार हम योग्यताओं की नियतिनिर्दिष्ट अवधारणा की आधारहीनता को समझने की कोशिश करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


योग्यताओं तथा प्रतिभा के नैसर्गिक पूर्वाधार
योग्यताओं की नियतिनिर्दिष्ट अवधारणा की आधारहीनता

मनुष्य की योग्यताओं के स्वरूप को ठीक तरह से समझने के लिए सबसे पहले मस्तिष्क – समस्त मानसिक प्रक्रियाओं, अवस्थाओं, गुणों तथा विशेषताओं के अधःस्तर – के साथ उनके संबंध की स्थापना करना आवश्यक है। व्यक्ति के समस्त निजी मानसिक गुणों की भांति योग्यताएं भी मनुष्य द्वारा तैयारशुदा अवस्था में, किसी ऐसी वस्तु के रूप में प्राप्त नहीं की जातीं, जो जन्मजात ( inborn ) हो, प्रकृति की देन हो। वे तो सक्रियता के दौरान निर्मित होती हैं। मनुष्य मानसिक गुणों के बिना जन्म लेता है, उनके ग्रहण किए जाने की केवल सामान्य संभावना होती है। केवल सक्रियता में ही, परिवेश के साथ अन्योन्यक्रिया में ही मानव मस्तिष्क बाह्य विषयों को परावर्तित करना आरंभ करता है, योग्यताओं समेत अपने निजी मानसिक गुण तथा विशेषताएं प्रकट करता है। अतः इस अर्थ में वैज्ञानिक मनोविज्ञान द्वारा स्वीकृत यह प्रस्थापना सही है कि योग्यताएं जन्मजात नहीं होती

योग्यताओं के जन्मजात होने के प्रत्ययवादी ( भाववादी, idealistic ) सिद्धांत का खंडन सामान्य रूप से मनुष्य के अस्तित्व तथा विशेष रूप से उसकी योग्यताओं की समस्या के प्रति विज्ञानसम्मत दृष्टिकोण अपनाने के लिए नितांत आवश्यक है। मानव-योग्यताओं के जन्मजात स्वरूप के विचार ने प्लेटो  के समय में ही जन्म ले लिया था, जिन्होंने दावा किया था कि योग्यताएं जन्मजात होती हैं और वह समस्त ज्ञान, जिसका वह उपयोग करता है, “निरपेक्ष ज्ञान” के आदर्श जगत में अपने वास के बारे में उसकी स्मृतियों के अलावा और कुछ नहीं है। लगभग ऐसा ही अन्य सभी जगहों के धार्मिक-दार्शनिक मतों में भी कहा गया। जन्मजात योग्यताओं के इस मत को धर्म-सिद्धांत के रूप में अपना लिया गया।

१७वीं शताब्दी में फ्रांसीसी दार्शनिक देकार्त  की कृतियों में भी इस तरह का मत स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर हुआ। मनुष्य की योग्यताओं के जन्मजात स्वरूप को, जिसे धर्म की सत्ता का समर्थन प्राप्त था, लोगों की सामाजिक, क़ानूनी तथा राजनीतिक असमानता को न्यायोचित ठहराने के लिए और निम्न श्रेणियों को शिक्षा देने की निरर्थकता में नियतिनिर्दिष्ट ( destiny directed ) विश्वास की पुष्टि करने के लिए उपयोग में लाया गया। भौतिकेतर तथा अनश्वर आत्मा के साथ, जो मनुष्य को तैयारशुदा गुणों तथा विशेषताओं समेत मानों जन्म के समय प्राप्त होती है, घनिष्ठ रूप में जुड़े हुए इस प्रतिक्रियावादी तथा वैज्ञानिक दृष्टि से आधारहीन दृष्टिकोण को वैज्ञानिक मनोविज्ञान साफ़-साफ़ ठुकराता है।

यह व्यापक रूप से प्रचलित मत ग़लत है कि योग्यताएं मनुष्य को जन्म के समय ही तैयारशुदा रूप में प्राप्त होती हैं। इस मत का मूल इतना प्रतिक्रियावादी मनोवैज्ञानिक तथा शिक्षाशास्त्रीय सिद्धांतों में नहीं, जितना कि मनोवैज्ञानिक तथा शिक्षाशास्त्रीय अज्ञान में निहित है। कभी-कभी वह कतिपय अध्यापकों की शिक्षाशास्त्रीय उदासीनता और बेबसी पर पर्दा डालने का काम देता है। प्रकृति के तैयारशुदा वरदान के रूप में योग्यताओं की यह सुविधाजनक “मनोवैज्ञानिक प्राक्कल्पना” वस्तुतः अध्यापक को इस या उस छात्र के ठीक तरह काम न कर पाने के कारणों की जांच करने और उन्हें दूर करने के लिए कारगर कदम उठाने के दायित्व से मुक्त कर देती है।

अतः जन्मजात योग्यताओं की अवधारणा को अस्वीकार करते हुए वैज्ञानिक मनोविज्ञान सबसे पहले नियतिवाद ( fatalism ) का – किसी अपरिवर्तनीय नैसर्गिक कारक के रूप में नियति द्वारा पूर्वनिर्धारित योग्यताओं से संबंधित विचारों का – विरोध करता है।


इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

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