प्रतिभा और उसका सामाजिक-ऐतिहासिक स्वरूप

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने व्यक्ति के वैयक्तिक-मानसिक अभिलक्षणों की कड़ी के रूप में ‘योग्यता’ के अंतर्गत योग्यताएं तथा लोगों के भेदविज्ञान को समझने की कोशिश की थी, इस बार हम प्रतिभा और उसके सामाजिक-ऐतिहासिक स्वरूप पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



प्रतिभा और उसका सामाजिक-ऐतिहासिक स्वरूप

( talent and its social-historical nature )

योग्यताओं के विकास के उच्चतम स्तर को प्रतिभा ( talent ) कहते हैं। वह योग्यताओं का संयोजन है, जो मनुष्य को किसी भी तरह के जटिल कार्यकलाप की सफलतापूर्वक, स्वावलंबनपूर्ण ढंग से तथा मौलिक ढंग से पूर्ति करने की संभावना प्रदान करता है

योग्यताओं की ही भांति प्रतिभा भी सृजनशील कार्य में उच्च कौशल तथा उल्लेखनीय सफलता की प्राप्ति की मात्र संभावना ( possibility, potential ) होती है। अंततः, सृजनशील उपलब्धियां लोगों के अस्तित्व की सामाजिक-ऐतिहासिक परिस्थितियों पर निर्भर करती हैं। यदि समाज प्रतिभाशाली लोगों की आवश्यकता अनुभव करता है और उनके विकास के लिए अनुकूल परिस्थितियां तैयार करता है तो ऐसे लोगों का प्रकट होना संभव हो जाता है।

इसी कारण विज्ञान, कला तथा सामाजिक जीवन में, उपलब्धियों की संभावना के रूप में प्रतिभा को, समाज में भौतिक और आत्मिक संस्कृति की वस्तुओं में, इस संभावना के मूर्त्तकरण के सदृश मानना सही नहीं होगा। मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण पर आधारित सामाजिक विरचनाओं का इतिहास इस तथ्य का साक्षी है कि अनगिनत प्रतिभाएं आवश्यक सामाजिक-आर्थिक अवस्थाओं के अभाव के फलस्वरूप फलने-फूलने से पहले ही मुरझा जाया करती हैं। सामंती तथा दास-स्वामी समाजों की भांति ही, पूंजीवादी समाज भी उत्पीड़ित वर्गों के प्रतिभाशाली प्रतिनिधियों की भारी संख्या के लिए सारे रास्ते बंद कर देता है।

हर सामान्य या विशिष्ट प्रतिभाशाली व्यक्ति, अपने सामाजिक-ऐतिहासिक परिवेश की देन होती है। सामाजिक-ऐतिहासिक परिस्थितियां ही वे वास्तविक आवश्यकताएं पैदा करती है, जिनसे व्यक्ति इसी परिवेश से विकसित हुई योग्यताओं के संयोजनों के साथ यथार्थ का अतिक्रमण करता है, नई योग्यताएं भी अर्जित करता है, उनका विकास करता है और अपनी विकसित प्रतिभा के ज़रिए नवीन सृजनों में सफलता प्राप्त करता है, विशिष्ट उपलब्धियां प्राप्त करता है।

अतः यह कहा जा सकता है, प्रतिभाओं को जगाना सामाजिक दृष्टि से निर्धारित प्रक्रिया है। युग की आवश्यकताएं तथा समाज के समक्ष विद्यमान विशिष्ट कार्यभार, प्रत्येक ठोस मामले में यह निर्धारित करते हैं कि कौन-सी प्रच्छन्न ( disguised ), सुषुप्त ( dormant ) प्रतिभाओं को अपने विकास के लिए सर्वाधिक अनुकूल अवस्थाएं उपलब्ध होंगी। युद्धकाल में प्रतिभाशाली सैनिक, जनरल और शांतिकाल में प्रतिभाशाली इंजीनियर, डिज़ाइनर, आदि उभरते हैं।

अतएव, सामाजिक विरचनाओं ( social structures ) का इस तरह से समाज के हितार्थ संगठित किया जाना आवश्यक है ताकि समाज के प्रत्येक नागरिक को अपनी योग्यताओं तथा प्रतिभा का चहुंमुखी विकास करने की पूर्ण संभावना प्रदान की जा सके। इस संभावना को इस तरह की सामाजिक विरचनाओं में, जन शिक्षा-प्रणाली, संस्कृति तथा विज्ञान के उच्च स्तर, जन-जीवन की संपूर्ण सामाजिक सुरक्षा की व्यवस्था, आदि के ज़रिए ही सुनिश्चित किया जा सकता है।


इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

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