प्रतिभा की संरचना ( structure of talent )

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने व्यक्ति के वैयक्तिक-मानसिक अभिलक्षणों की कड़ी के रूप में ‘योग्यता’ के अंतर्गत प्रतिभा और उसके सामाजिक-ऐतिहासिक स्वरूप पर चर्चा की थी, इस बार हम प्रतिभा की संरचना को समझने की कोशिश करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


प्रतिभा की संरचना

( structure of talent )

प्रतिभा ( talent ), जैसा कि पहले भी कहा जा चुका है, योग्यताओं का संयोजन ( combination ) अथवा उनका कुल योग है। किसी अलग-थलग योग्यता को प्रतिभा नहीं माना जा सकता, भले ही वह विकास के बहुत ऊंचे स्तर पर पहुंच चुकी हो और ज्वलंत रूप में दृष्टिगोचर होती हो।

इसे विशेष रूप से विलक्षण स्मरण-शक्ति से युक्त लोगों के बारे में की जानेवाली जांच-पड़ताल प्रमाणित करती है ( सुदृढ़ स्मरण-शक्ति और उसकी अनोखी क्षमता को आम लोग प्रतिभा का समतुल्य मान बैठते हैं )। कुछ मनोविज्ञानियों के एक समूह ने एक व्यक्ति पर प्रयोग किए, जिसकी स्मरण-शक्ति ( memory ) स्पष्ट रूप से असाधारण ( extraordinary ) थी। उसकी अदभुत स्मृतिगत योग्यता पर किसी को कोई संदेह नहीं था, पर उसे किसी व्यावहारिक प्रयोजन के लिए उपयोग में नहीं लाया जा सकता ( मंच पर प्रदर्शन, और दर्शकों को चमत्कृत करने के अलावा )। परंतु मनुष्य के सृजनशील कार्यकलाप में स्मरण-शक्ति एक कारक ( factor ) मात्र है, जिस पर उसकी सृजनशीलता की सफलता तथा फलप्रदता निर्भर करती है। वे मन की सुनम्यता ( good flexibility ), प्रखर कल्पनाशक्ति, दृढ़ संकल्प, गहन रुचियों तथा अन्य मनोवैज्ञानिक गुणों पर कोई कम आश्रित नहीं होती। उस व्यक्ति ने स्मरण-शक्ति के अलावा अपनी और किसी योग्यता का विकास नहीं किया था और इसलिए वह सृजनशील सक्रियता के प्रयोगों में ऐसी सफलता प्राप्त नहीं कर सका, जो उसकी विरल प्रतिभा के अनुरूप होती।

निस्संदेह, सुविकसित स्मरण-शक्ति एक महत्त्वपूर्ण योग्यता है, जिसकी भिन्न-भिन्न प्रकार की सक्रियता में जरूरत पड़ती है। उल्लेखनीय स्मरण-शक्ति से संपन्न चोटी के लेखकों, चित्रकारों, संगीतकारों तथा राजनीतिज्ञों के नामों की सूची बहुत बड़ी है। परंतु ऐसे लोगों की और बड़ी सूचि पेश की जा सकती है, जो कम प्रसिद्ध तथा प्रतिभाशाली नहीं थे, परंतु जिनकी स्मरण-शक्ति किसी भी अर्थ में विलक्षण नहीं थी। स्मरण-शक्ति की अत्यंत सामान्य मात्रा तथा स्थिरता किसी भी समाजोपयोगी कार्यकलाप की सृजनशील ढंग से, सफलतापूर्वक तथा मौलिक ढंग से ( यानि प्रतिभाशाली ढंग से ) पूर्ति के लिए पर्याप्त है।

अतः प्रतिभा व्यक्तित्व के मानसिक गुणों का इतना अधिक संजटिल संयोजन ( complex combination ) है कि वह किसी अकेली योग्यता से निर्धारित नहीं हो सकती, भले ही अत्यधिक फलप्रद स्मरण-शक्ति जितनी मूल्यवान योग्यता हो। मनोवैज्ञानिक अनुसंधान बताते हैं कि किसी एक गुण के अभाव, अथवा अधिक सटीक शब्दों में, अपर्याप्त विकास की अन्य गुणों के गहन विकास से सफलतापूर्वक प्रतिपूर्ति ( compensate ) की जा सकती है, जिनसे प्रतिभा के गुणो की समष्टि बनती है।

अंततः, प्रतिभा की संरचना उन अपेक्षाओं ( expectations ) के स्वरूप से निर्धारित होती है, जो संबद्ध सक्रियता ( राजनीति, विज्ञान, कला, उद्योग, खेलकूद, सैन्य-सेवा, आदि के क्षेत्रों ) में किसी व्यक्ति से की जाती है। इसलिए प्रतिभा में मिल जानेवाली योग्यताएं भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में कार्यरत व्यक्तियों में भिन्न-भिन्न होंगी। जैसा कि सुविदित है, मनोविज्ञानी योग्यताओं के अधिक सामान्य ( more common ) तथा अधिक विशिष्ट ( more specific ) गुणों में भेद करते हैं। प्रतिभा का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण, अपनी बारी में, योग्यताओं की आम संरचना का पता लगाना संभव बना देता है। वे मानसिक गुणों के सबसे अधिक अभिलाक्षणिक समुच्चय के रूप में प्रकट होती हैं, जो नाना प्रकार की सक्रियता का सर्वोत्तम स्तर सुनिश्चित करती हैं।

बहुत से मेधावी ( brilliant ) बच्चों की जांच के परिणामस्वरूप अनुसंधानकर्ता सारतः महत्त्वपूर्ण कुछ योग्यताओं का, जो बौद्धिक देनों का कुल योग होती है, पता लगाने में सफल रहे। इस प्रकार प्रकाश में आनेवाली सर्वप्रथम विशेषताएं हैं : मनोयोग, एकाग्रता, श्रमसाध्य कार्य करने के लिए सदैव तत्परता। कक्षा में पाठ के समय, इनसे संपन्न छात्रों का ध्यान कभी विचलित नहीं होता, वह कुछ भी अनसुना या अनदेखा नहीं रहने देते, उत्तर के लिए हमेशा तैयार रहते हैं। जिनमें उनकी दिलचस्पी होती है, उसमें वे पूरी तरह तल्लीन हो जाते हैं। कुछ नैसर्गिक खूबियों से संपन्न बच्चों के व्यक्तित्व का दूसरा गुण, जो पहले से अविच्छेद्य ( inseparable ) रूप से जुड़ा होता है, श्रम में जुटने की उसकी तत्परता, उसके प्रति उसके झुकाव से उत्पन्न होता है। विशेषताओं के तीसरे समूह में, जो प्रत्यक्ष रूप से बौद्धिक सक्रियता से जुड़ा होता है, चिंतन की अनुपमता ( unrivaled thinking ), चिंतन-प्रक्रियाओं की गति, बुद्धि का सुव्यवस्थित रूप, विश्लेषण ( analysis ) तथा सामान्यीकरण ( generalization ) की अधिक उच्च क्षमता, मानसिक सक्रियता की उच्च फलप्रदता ( fruitfulness ) शामिल हैं।

मानसिक रूप से समुचित विकसित हो रहे बच्चों के विषय में किए गये नाना मनोवैज्ञानिक पर्यवलोकनों के प्रमाण के अनुसार, उपरिलिखित योग्यताएं, जिनसे समग्र रूप से बौद्धिक मेधा की संरचना गठित होती है, ऐसे बच्चों की विशाल बहुसंख्या में प्रकट होती है और उनकी मात्रा में केवल तभी भिन्नता पाई जाती है, जब इन योग्यताओं में से हरेक को अलग-अलग से लिया जाता है। जहां तक प्रतिभा में विशिष्ट अंतरों का सरोकार है, वे मुख्यतया हितों के रुझान ( trends of interests ) में प्रकट होती हैं। छानबीन की कुछ अवधि गुज़रने पर एक छात्र गणित का, दूसरा जैविकी, तीसरा साहित्य का, चौथा इतिहास और पुरातत्वविज्ञान का चयन करना चाहता है, आदि। अतः इन बच्चों में से प्रत्येक की योग्यताएं ठोस सक्रियता में आगे और विकसित होती हैं।

अतः विशिष्ट प्रतिभा की संरचना में गुणों की उपरोक्त समष्टि होती है, जिसमें व्यक्तित्व के उपरोक्त गुणों के अलावा बहुत-सारी अन्य योग्यताएं भी शामिल हैं, जो ठोस सक्रियता की संबद्ध क़िस्म की अपेक्षाओं की पूर्ति करती है। उदाहरण के लिए, यह सिद्ध हो चुका है कि गणित विषयक प्रतिभा की अभिलाक्षणिकता ( characteristics ), कुछ विशिष्ट गुणों की विद्यमानता है, जिनमें ये शामिल हैं : गणितीय सामग्री का आकारपरक बोध प्राप्त करने की क्षमता, यानि संबद्ध प्रश्नों की शर्तों का शीघ्रतापूर्वक बोध प्राप्त करने तथा उनकी आकारपरक संरचना व्यक्त करने की क्षमता ( इस बोध में प्रश्न की ठोस अंतर्वस्तु, कहा जा सकता है, विलीन हो जाती है और कोरे गणितीय अनुपात बाक़ी बच जाते हैं, जो एक तरह से मानों से मुक्त ‘पंजर’ carcase  होते हैं ) ; गणितीय विषयों, संबंधों तथा संक्रियाओं का सामान्यीकरण करने की क्षमता, विशिष्टों के पीछे विद्यमान सामान्य सिद्धांतों को पहचानने तथा प्रश्न के सार को आत्मसात् करने की क्षमता ; साध्यों की बहुअंकीय संरचना को, क्रमिक पदों को गणितीय संक्रियाओं के एक ठोस अनुक्रम में परिणत ( transform ) करने की क्षमता।


इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

प्रतिभा और उसका सामाजिक-ऐतिहासिक स्वरूप

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने व्यक्ति के वैयक्तिक-मानसिक अभिलक्षणों की कड़ी के रूप में ‘योग्यता’ के अंतर्गत योग्यताएं तथा लोगों के भेदविज्ञान को समझने की कोशिश की थी, इस बार हम प्रतिभा और उसके सामाजिक-ऐतिहासिक स्वरूप पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



प्रतिभा और उसका सामाजिक-ऐतिहासिक स्वरूप

( talent and its social-historical nature )

योग्यताओं के विकास के उच्चतम स्तर को प्रतिभा ( talent ) कहते हैं। वह योग्यताओं का संयोजन है, जो मनुष्य को किसी भी तरह के जटिल कार्यकलाप की सफलतापूर्वक, स्वावलंबनपूर्ण ढंग से तथा मौलिक ढंग से पूर्ति करने की संभावना प्रदान करता है

योग्यताओं की ही भांति प्रतिभा भी सृजनशील कार्य में उच्च कौशल तथा उल्लेखनीय सफलता की प्राप्ति की मात्र संभावना ( possibility, potential ) होती है। अंततः, सृजनशील उपलब्धियां लोगों के अस्तित्व की सामाजिक-ऐतिहासिक परिस्थितियों पर निर्भर करती हैं। यदि समाज प्रतिभाशाली लोगों की आवश्यकता अनुभव करता है और उनके विकास के लिए अनुकूल परिस्थितियां तैयार करता है तो ऐसे लोगों का प्रकट होना संभव हो जाता है।

इसी कारण विज्ञान, कला तथा सामाजिक जीवन में, उपलब्धियों की संभावना के रूप में प्रतिभा को, समाज में भौतिक और आत्मिक संस्कृति की वस्तुओं में, इस संभावना के मूर्त्तकरण के सदृश मानना सही नहीं होगा। मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण पर आधारित सामाजिक विरचनाओं का इतिहास इस तथ्य का साक्षी है कि अनगिनत प्रतिभाएं आवश्यक सामाजिक-आर्थिक अवस्थाओं के अभाव के फलस्वरूप फलने-फूलने से पहले ही मुरझा जाया करती हैं। सामंती तथा दास-स्वामी समाजों की भांति ही, पूंजीवादी समाज भी उत्पीड़ित वर्गों के प्रतिभाशाली प्रतिनिधियों की भारी संख्या के लिए सारे रास्ते बंद कर देता है।

हर सामान्य या विशिष्ट प्रतिभाशाली व्यक्ति, अपने सामाजिक-ऐतिहासिक परिवेश की देन होती है। सामाजिक-ऐतिहासिक परिस्थितियां ही वे वास्तविक आवश्यकताएं पैदा करती है, जिनसे व्यक्ति इसी परिवेश से विकसित हुई योग्यताओं के संयोजनों के साथ यथार्थ का अतिक्रमण करता है, नई योग्यताएं भी अर्जित करता है, उनका विकास करता है और अपनी विकसित प्रतिभा के ज़रिए नवीन सृजनों में सफलता प्राप्त करता है, विशिष्ट उपलब्धियां प्राप्त करता है।

अतः यह कहा जा सकता है, प्रतिभाओं को जगाना सामाजिक दृष्टि से निर्धारित प्रक्रिया है। युग की आवश्यकताएं तथा समाज के समक्ष विद्यमान विशिष्ट कार्यभार, प्रत्येक ठोस मामले में यह निर्धारित करते हैं कि कौन-सी प्रच्छन्न ( disguised ), सुषुप्त ( dormant ) प्रतिभाओं को अपने विकास के लिए सर्वाधिक अनुकूल अवस्थाएं उपलब्ध होंगी। युद्धकाल में प्रतिभाशाली सैनिक, जनरल और शांतिकाल में प्रतिभाशाली इंजीनियर, डिज़ाइनर, आदि उभरते हैं।

अतएव, सामाजिक विरचनाओं ( social structures ) का इस तरह से समाज के हितार्थ संगठित किया जाना आवश्यक है ताकि समाज के प्रत्येक नागरिक को अपनी योग्यताओं तथा प्रतिभा का चहुंमुखी विकास करने की पूर्ण संभावना प्रदान की जा सके। इस संभावना को इस तरह की सामाजिक विरचनाओं में, जन शिक्षा-प्रणाली, संस्कृति तथा विज्ञान के उच्च स्तर, जन-जीवन की संपूर्ण सामाजिक सुरक्षा की व्यवस्था, आदि के ज़रिए ही सुनिश्चित किया जा सकता है।


इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

योग्यताएं तथा लोगों के भेद

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने व्यक्ति के वैयक्तिक-मानसिक अभिलक्षणों की कड़ी के रूप में ‘योग्यता’ के अंतर्गत योग्यता की संरचना पर चर्चा शुरू की थी, इस बार हम उसे ही आगे बढ़ाते हुए योग्यताएं तथा लोगों का भेदविज्ञान को समझने की कोशिश करेंगे ।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


योग्यताएं तथा लोगों का भेदविज्ञान

व्यक्ति की सामान्य योग्यताएं अथवा सामान्य गुण पूर्णतः ठोस मानसिक परिघटनाएं ( mental phenomenon ) हैं, जिनका मनोविज्ञान प्रायोगिक अनुसंधान करता है। व्यक्ति के सामान्य गुणों में, जो विशिष्ट प्रकार की सक्रियता में योग्यताओं के रूप में अपने को प्रकट कर सकते हैं, वे वैयक्तिक मानसिक गुण शामिल किए जाते हैं, जो लोगों के तीन भेदों से एक की लाक्षणिकता हैं। इन तीन भेदों को “कलात्मक“, “चिंतक” तथा “औसत” नाम दिए गये थे। यह वर्गीकरण मनुष्य के उच्च तंत्रिका-तंत्र का नियमन करने वाली दो संकेत प्रणालियों के सिद्धांत से संबंधित हैं : पहली संकेत-प्रणाली बिंबों और भावनाओं को जन्म देती है, दूसरी प्रणाली शब्द ( संकेतों के संकेत ) के रूप में इन बिंबों और भावनाओं का प्रतिनिधित्व करती है।

मनुष्य की मानसिक सक्रियता में पहली संकेत-प्रणाली के संकेतों का अपेक्षाकृत प्राधान्य कलात्मक मनुष्य की, दूसरी संकेत-प्रणाली का प्राधान्य चिंतक मनुष्य की तथा उनकी समतुल्यता औसत मनुष्य की अभिलाक्षणिकता है।

कलात्मक व्यक्ति की विशेषताएं हैं, परिवेश के साथ प्रत्यक्ष संपर्क के फलस्वरूप उत्पन्न होनेवाले ज्वलंत बिंब-विधान, मन पर सजीव छापें तथा तुरंत भावनात्मक प्रतिक्रिया। चिंतक व्यक्ति की विशेषताएं हैं, अमूर्त चिंतन का प्राधान्य, तार्किक निर्मिति, सैद्धांतीकरण। कलात्मक व्यक्तित्व का अर्थ कदापि यह नहीं है कि संबद्ध मनुष्य का कलाकार बनना नियतिनिर्दिष्ट है। इस क़िस्म के व्यक्ति के लिए दूसरों की तुलना में ऐसे कार्यकलाप में पारंगत बनना सुगम है, जो प्रखर कल्पना-शक्ति, घटनाओं के प्रति अति संवेदनशील तथा भावनात्मक दृष्टिकोण की अपेक्षा करता है। यह कोई संयोग की बात नहीं है कि कलात्मक व्यवसायों में जुटे लोगों ( चित्रकारों, मूर्तिकारों, सांगीतकारों, अभिनेताओं, आदि ) में इस क़िस्म के न्यूनाधिक रूप से उभरे हुए गुण ही होते हैं। चिंतक मनुष्य के लिए लाक्षणिक गुण ऐसे कार्यकलाप में शामिल होने के वास्ते अनुकूल परिस्थितियां जुटाते हैं, जिनमें अमूर्त प्रत्ययों, गणितीय निर्मितियों, आदि का उपयोग किया जाता है। यह समझना सुगम है कि ये गुण नाना विशिष्ट क्षेत्रों ( गणित, दर्शन, भौतिकी, भाषा विज्ञान, आदि ) में सफलता के पूर्वाधार हैं।

इस बात पर ज़ोर देना आवश्यक है कि मनुष्य के कलात्मक भेद से जुड़े होने का अर्थ कदापि बौद्धिक कार्यकलाप में दुर्बलता, विवेक-बुद्धि में त्रुटी नहीं है। कहने का तात्पर्य केवल यह है कि चिंतनपरक अवयवों पर मन के बिंबात्मक अवयवों का सापेक्ष प्राधान्य है।

सामान्यतया, मनुष्य में दूसरी संकेत-प्रणाली का पहली संकेत-प्रणाली पर प्राधान्य रहता है और इस प्राधान्य का स्वरूप निरपेक्ष होता है, क्योंकि भाषा तथा चिंतन मनुष्य की श्रम-सक्रियता में निश्चित भूमिका अदा करते हैं तथा परिवेश के विषय में उसके विचारों की प्रक्रिया शब्दों में व्यक्त उसके चिंतन द्वारा व्यवहित होती है। फलस्वरूप, मनुष्य में पहली संकेत-प्रणाली का निरपेक्ष प्राधान्य हमें केवल उन अनियंत्रित तथा बेतरतीब बिंबों से युक्त अव्यवस्थित स्वप्नों में मिलता है, जो किसी भी प्रकार के विवेकसम्मत नियंत्रण के अंतर्गत नहीं होते।

दो संकेत प्रणालियों में से एक के सापेक्ष प्राधान्य का अर्थ क्या है? दूसरी संकेत-प्रणाली पर पहली संकेत-प्रणाली के सापेक्ष प्राधान्य ( कलात्मक मनुष्य ), व्यक्तित्व के लिए संबद्ध भेद के लिए लाक्षणिक भावनाओं तथा बिंबों के अर्थ में विश्व के बोध की संरचनात्मक विशिष्टता का द्योतक है। इसके विपरीत चिंतक मनुष्य, यानि पहली संकेत-प्रणाली पर दूसरी संकेत-प्रणाली का प्राधान्य विश्व के प्रति सैद्धांतिक तथा सार-ग्रहणकारी दृष्टिकोण की संरचनात्मक विशिष्टता का द्योतक है, जो इस प्रकार के मनुष्यों को बाक़ी सबसे विभेदित करती है। किसी एक संकेत-प्रणाली का दूसरी संकेत-प्रणाली पर सापेक्ष प्राधान्य उसके निरपेक्ष प्राधान्य के सदृश नहीं होता और, उदाहरण के लिए, ‘कलात्मक’ श्रेणी में आनेवाले लोगों की बुद्धि दो अन्य श्रेणियों के प्रतिनिधियों से कम विकसित नहीं होती, हालांकि उनकी मानसिक योग्यताओं के कतिपय विशिष्ट गुण होते हैं।

संक्षेप में, किसी संबद्ध कार्यकलाप के लिए व्यक्ति की तत्परता के रूप में प्रत्येक ठोस योग्यता की संरचना की लाक्षणिकता अत्यधिक संजटिल होती है, उसमें गुणों का पूरा समुच्चय होता है, जिसमें प्रमुख तथा आनुषंगिक ( auxillary ) गुण, सामान्य तथा विशिष्ट गुण आ जाते हैं।


इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है। 

शुक्रिया।

समय

योग्यता की संरचना ( structure of ability )

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने व्यक्ति के वैयक्तिक-मानसिक अभिलक्षणों की कड़ी के रूप में ‘योग्यता’ के अंतर्गत योग्यता की परिमाणात्मक अभिलाक्षणिकताओं को समझने की कोशिश की थी, इस बार हम योग्यता की संरचना पर चर्चा करेंगे ।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


योग्यता की संरचना

( structure of ability )

प्रत्येक सक्रियता ( श्रम, अध्ययन, खेलकूद, आदि ) मनुष्य के मानसिक गुणों ( बुद्धि की विशेषता, संवेगात्मक-संकल्पात्मक क्षेत्र, संवेदी गतिशीलता ) से बहुत कड़ी अपेक्षा करती है। ये अपेक्षाएं कभी किसी एक गुण तक सीमित नहीं रहतीं, भले ही वह विकास का बहुत ऊंचा स्तर प्राप्त कर चुका हो। इस मत में कि कोई भी एक मानसिक विशेषता कार्यकलाप की उच्च उत्पादनशीलता प्राप्त कर सकती है और समस्त योग्यताओं का स्थान ले सकती है, वैज्ञानिक सत्य नहीं है। योग्यताएं मानसिक गुणों का कुल योग है तथा उनकी बहुत ही संजटिल संरचना होती है

योग्यताएं तथा सक्रियता

( abilities and activity )

मानसिक गुणों के समुच्चय की संरचना को, जो योग्यताओं के रूप में प्रकट होती हैं, ठोस सक्रियता की अपेक्षाएं निर्धारित करती हैं और वह भिन्न-भिन्न सक्रियताओं में भिन्न-भिन हो सकती हैं।

अतः गणित के वास्ते योग्यता की संरचना में, उपलब्ध तथ्य-सामग्री के अनुसार, नाना विशिष्ट योग्यताएं शामिल हैं : गणितीय सामग्री का सामान्यीकरण ( generalization ) करने की योग्यता, गणितीय तर्कणा की प्रक्रिया और तदनुरूपी गणितीय संक्रियाएं करने की योग्यता, चिंतन की प्रक्रिया को उल्टी ओर मोड़ने की, यानि प्रत्यक्ष से विलोम तर्कणा की ओर सुगमतापूर्वक बढ़ने की योग्यता, गणितीय समस्याओं के समाधान में चिंतन की प्रक्रियाओं में सुनम्यता ( good flexibility ), आदि। साहित्यिक योग्यताओं की संरचना सौंदर्यबोध के विकास के उच्च स्तर, विविधतामय बिंब-विधान, भाषा के बोध,  प्रचुर कल्पना-शक्ति, लोगों की मनोदशा में गहरी रुचि, आत्म-अभिव्यक्ति की आवश्यकता, आदि की पूर्वकल्पना करती है। संगीत, अध्यापन, डिज़ाइन, चिकित्साशास्त्र, आदि के लिए भी योग्यताओं का अत्यंत विशिष्ट स्वरूप होता है।

मानसिक संक्रियाओं की प्रतिपूर्ति ( compensation ) चाहे कितनी ही व्यापक क्यों न हो, व्यवसायगत योग्यताओं की विशिष्ट संरचनाओं का ज्ञान होना एक अध्यापक के लिए अत्यधिक महत्त्वपूर्ण है, जिसे अपने कार्य में उनका आश्रय लेना चाहिए और उनके अभाव में अथवा अल्पविकास की सूरत में इस कमी को पूरा करने के लिए बच्चे में व्यक्तित्व के अन्य गुणों का गठन करना अध्यापक के लिए नितांत आवश्यक है।

व्यक्तित्व की विशेषताओं तथा गुणों में से, जो विशिष्ट योग्यताओं की संरचना के घटक हैं, कुछ का प्रमुख ( main, major ) तथा कुछ का आनुषंगिक ( auxillary ) स्थान होता है। इस तरह शिक्षाशास्त्रीय योग्यताओं की संरचना में मुख्य गुण ये होंगे : शिक्षाशास्त्रीय व्यवहारकुशलता, प्रखर प्रेक्षण-शक्ति, बच्चों से कड़ी अपेक्षाओं के साथ उनके प्रति प्यार की भावना के साथ संयोजन, दूसरों को ज्ञान के अंतरण की आवश्यकता, एक पृथक ( different ) आधार जैसी संगठनात्मक योग्यताओं का समुच्चय, आदि। आनुषंगिक गुणों में कला-कौशल, वक्तृत्व-क्षमता, आदि शामिल हैं। स्वभावतः, शिक्षाशास्त्रीय योग्यताओं के प्रमुख तथा आनुषंगिक अवयव मिलकर एक पूर्ण समष्टि बनते हैं, जो सक्षम अध्यापक तथा निजी गुणों के अनुपम समुच्चय से युक्त मौलिक व्यक्तित्व के रूप में मनुष्य की अभिलाक्षणिकता ( characteristics ) होती है।

सामान्य तथा विशेष योग्यताएं

( general and specific abilities )

भिन्न-भिन्न योग्यताओं की ठोस मनोवैज्ञानिक अभिलाक्षणिकताओं का विश्लेषण करते समय हम अधिक सामान्य गुणों को, जो एक नहीं, अपितु कई प्रकार की सक्रियता की आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं, तथा विशिष्ट गुणों को, जिनकी एक ही प्रकार की सक्रियता के लिए आवश्यकता पड़ती है, पहचान सकते हैं। कतिपय व्यक्तियों की योग्यताओं की संरचना में ये सामान्य गुण अत्यधिक ज्वलंत रूप से प्रकट होते हैं, जो यह कहने की संभावना देते है कि भिन्न-भिन्न कार्य तथा व्यवसाय, जिनकी परिधि व्यापक होती है, करने में समर्थ इन लोगों में चहुंमुखी योग्यताएं हैं।

इन सामान्य योग्यताओं तथा गुणों को, विशेष योग्यताओं तथा गुणों के मुकाबले में नहीं रखना चाहिए, जैसा कि कुछ मनोविज्ञानी प्रयास करते हैं कि ‘सामान्य बुद्धि’ को एक रहस्यमय कारक के रूप में अलग से चुन दिया जाए, जिसे केवल बुद्धि-परीक्षाओं की सहायता से प्रकट किया जा सकता है।


इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

योग्यता की मात्रा

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने व्यक्ति के वैयक्तिक-मानसिक अभिलक्षणों की कड़ी के रूप में ‘योग्यता’ के अंतर्गत योग्यता की गुणात्मक अभिलाक्षणिकताओं को समझने की कोशिश की थी, इस बार हम योग्यता की परिमाणात्मक अभिलाक्षणिकताओं पर चर्चा करेंगे ।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


योग्यता की परिमाणात्मक अभिलाक्षणिकताएं

( quantitative characteristics of ability )

योग्यता के परिमाणात्मक माप ( quantitative measurement ) की समस्या पर मनोवैज्ञानिक कई दशकों से काम करते आए हैं। १९वीं शताब्दी के अंत तथा २०वीं शताब्दी के आरंभ में ही बहुत-से पश्चिमी मनोवैज्ञानिकों ने बड़े पैमाने के व्यवसायों के लिए उम्मीदवारों के चयन की आवश्यकता को अनुभव करते हुए प्रशिक्षार्थियों की योग्यताओं का पता लगाने का सुझाव रखा। उन्होंने साथ ही एक या अन्य श्रम-सक्रियता के लिए, विश्वविद्यालयों या कालेजों में अध्ययन के वास्ते, उत्पादन-क्षेत्र, सेना और सामाजिक जीवन में संचालनकारी पदों पर नियुक्ति के लिए उम्मीदवार के व्यक्तित्व तथा उपयुक्तता की कोटि निर्धारित करने का भी प्रस्ताव रखा।

परंतु पूंजीवादी उत्पादन की सामाजिक परिस्थितियों के अंतर्गत योग्यता की परिमाणात्मक अभिलाक्षणिकताओं की समस्या ने अपने जन्म के समय से ही दुहरा स्वरूप ग्रहण कर लिया।  एक ओर उसका उद्देश्य यह था कि मेहनतकश मनुष्य की वास्तविक और ठोस श्रम-सक्रियता के लिए उसके वास्तविक सामर्थ्य का पता लगाया जाए, जिसके बिना उसके लिए उपयुक्त काम की तलाश करना ( व्यवसायगत दिशा-निर्धारण ) तथा किसी संबद्ध काम के लिए उपयुक्त मनुष्य का चयन ( व्यवसायगत चयन ) करना सचमुच कठिन होता है। यह मनुष्य की योग्यता के परिमाणात्मक माप के विचार का प्रगतिशील पहलू तथा पूर्ववर्ती रुख़ की तुलना में प्रगति है, जब श्रम-सक्रियता में मानवरूपी कारक ( यानि वास्तविक मनुष्य तथा उसकी योग्यता ) को ध्यान में नहीं रखा जाता था। दूसरी ओर, पूंजीवादी उत्पादन की व्यवस्था में जन्म ले चुकने पर इस विचार का, इसी व्यवस्था के हितार्थ सत्तासंरक्षण और समर्थन प्राप्त मनोवैज्ञानिकों ने सत्ताधारी वर्गों के प्रतिनिधियों की विशेषाधिकारप्राप्त स्थिति ( privileged position ) का मनोवैज्ञानिक औचित्य ठहराने के लिए उपयोग किया, जिनके बीच विशेष विधियों की सहायता से योग्यता का अधिक उच्च स्तर “उजागर हुआ”। इसमें ही योग्यता के परिमाणात्मक माप, जो वर्तमान समाज की अवस्थाओं के अंतर्गत सामाजिक उत्पीड़न तथा भेदभाव का साधन बन गया, के सिद्धांत को ठोस ढंग से अमली रूप देने का वास्तविक प्रतिक्रियावादी स्वरूप निहित था।

योग्यता-माप की विधि ने तब बुद्धि-परीक्षा ( intelligence test ) का रूप ग्रहण कर लिया, जो २०वीं शताब्दी के आरंभ में चालू हुई थी। स्कूलों के छात्रों की उनकी योग्यता के अनुसार श्रेणी निर्धारित करने, सशस्त्र सेना में अफ़सरों तथा उद्योग में सबसे महत्त्वपूर्ण स्थानों में संचालकों के पदों पर नियुक्ति करने के लिए इन विधियों का कई पश्चिमी देशों ( अमरीका, ब्रिटेन, आदि ) में उपयोग किया जाता है, जो अब उनके प्रभावों वाले अन्य देशों में भी फैलती जा रही हैं। उदाहरण के लिए, ब्रिटेन में बुद्धि-परीक्षाओं के परिणामस्वरूप छात्रों को तथाकथित ग्रामर स्कूलों में भर्ती किया जाता है, जो उन्हें विश्वविद्यालय में प्रवेश करने का अधिकार देते हैं।

अंतर्वस्तु ( content ) की दृष्टि से बुद्धि-परीक्षा में छात्रों को कई प्रश्न या काम दिए जाते हैं, जिनके समाधानों की सफलता ( उत्तर देने में लगनेवाले समय को ध्यान में रखते हुए ) का मूल्यांकन कुल नंबरों से किया जाता है। ब्रिटिश स्कूल में ग्यारहवर्षीय छात्रों की प्रतिभा का पता लगाने के लिए परीक्षा का एक उदाहरण यहां दिया जा रहा है : “अगर पीटर का क़द जेम्स से ऊंचा है और एडवर्ड का क़द पीटर से छोटा है, तो सबसे ऊंचा क़द किसका है?” और उससे इन चारों उत्तरों में से एक चुनने के लिए कहा जाता है : ( १ ) पीटर, ( २ ) एडवर्ड, ( ३ ) जेम्स, ( ४ ) बता नहीं सकता। एक अन्य परीक्षा में परीक्षार्थी से पांच शब्दों में से एक चुनने के लिए कहा जाता है जो बाक़ी दूसरे शब्दों से कतई नहीं मिलता। ये शब्द हैं : “लाल, हरा, नीला, गीला, पीला” ; “अथवा, परंतु, यदि, इस समय, यद्यपि”, आदि। आम तौर पर ये परीक्षाएं एक श्रृंखला में होती हैं और क्रम के अनुसार अधिकाधिक कठिन होती जाती हैं। परीक्षाओं में केवल मौखिक परीक्षाएं ही नहीं, अपितु सब तरह की “भूलभुलैयाएं”, “पहेलियां”, आदि शामिल हो सकती हैं।

सभी परीक्षाओं की श्रृंखला से गुज़र चुकने के बाद परिणामों का एक मानक विधि से यानि हरेक द्वारा प्राप्त अंकों की संख्या की गिनती के ज़रिए मूल्यांकन किया जाता है। इससे कथित “बुद्धि-लब्धि” ( आईक्यू ) निर्धारित करने की संभावना मिलती है। उदाहरण के लिए, यह माना जाता है कि साढ़े ग्यारह वर्ष की उम्र के बच्चों के लिए अंकों का औसत योग १२० होना चाहिए। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि जो भी बच्चा १२० अंक प्राप्त कर लेता है, उसकी मानसिक आयु साढ़े ग्यारह वर्ष है। बुद्धि-लब्धि का मूल्यांकन इस आधार पर किया जाता है :

   बुद्धि-लब्धि ( IQ ) = ( मानसिक आयु ) * 100 / ( बच्चे की वास्तविक आयु )

यदि, उदाहरण के लिए, एक साढ़े दस साल की उम्र का और दूसरा चौदह साल का लड़का एक ही अंक ( 120 ) पाते हैं और फलस्वरूप पता चलता है कि दोनों की मानसिक आयु एक ही, साढ़े ग्यारह वर्ष की है, तो उनकी बुद्धि-लब्धि निम्नलिखित होगी :

पहले लड़के की बुद्धि-लब्धि = 11.5* 100 / 10.5 =109.5

दूसरे लड़के की बुद्धि-लब्धि = 11.5* 100 / 14 = 82.1

वहां के कुछ मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, बुद्धि-लब्धि योग्यताओं की, अथवा अधिक सटीक शब्दों में, अपरिवर्त्य ( immutable, inconvertible ) चहुंमुखी मानसिक प्रतिभा की परिमाणात्मक सूचक है, सामान्य बुद्धि है।

परंतु विज्ञानसम्मत विश्लेषण बताता है कि बुद्धि-लब्धि एक कपोल-कल्पना है। वस्तुतः, उपरोक्त क्रियाविधियां मनुष्य की बुद्धि को उजागर नहीं कर सकती, वे तो इस अथवा उस क्षेत्र में, यानि किसी क्षेत्र विशेष में केवल उसके ज्ञान के भंड़ार तथा प्रवीणता ( कौशल तथा आदतों ) को ही प्रकट करती हैं, जिन्हें जैसा कि हम पहले यहां पढ़ चुके है, योग्यताओं के साथ गड्डमड्ड नहीं किया जा सकता। परीक्षाएं, ज्ञान तथा आदतों के आत्मसात्करण के गत्यात्मक पहलुओं को, यानि योग्यताओं के सार की ओर ज़रा भी ध्यान नहीं देती। इसके अलावा, यह बात सर्वथा स्पष्ट है कि उन छात्रों के परीक्षा-फल सर्वोत्तम होते हैं, जो अध्यापकों अथवा मां-बाप द्वारा विशेष रूप से प्रशिक्षित किए जाते हैं, यानि जो साधन-संपन्न या अमीर घरानों के होते हैं। अतः मनोवैज्ञानिक दृष्टि से आधारहीन बुद्धि-परीक्षाएं पूंजीवादी समाज के सत्ताधारी वर्गों के हाथों में सामाजिक भेदभाव का साधन बन जाती हैं ( उल्लेखनीय है कि ब्रिटिश ग्रामर स्कूलों के अधिकांश छात्र आबादी की समृद्ध श्रेणियों से आते हैं )।

परंतु इस सबका अर्थ यह नहीं है कि योग्यताओं का परिमाणात्मक मूल्यांकन तथा माप असंभव है, कि भिन्न-भिन्न नैदानिक विधियों, परीक्षाओं तथा जांच-परख का उपयोग अवांछनीय होता है। योग्यताओं के स्तर की जानकारी प्राप्त करने का कार्यभार सदा की भांति अत्यंत महत्त्वपूर्ण बना हुआ है, जब उन बच्चों का पता लगाना होता है, जिनके लिए मस्तिष्क के विकास में जन्मजात दोषों के कारण सामान्य स्कूलों में पढ़ाई करना संभव नहीं होता, जब किन्हीं विशेष कार्यभारों वाले व्यवसायों या क्रियाकलापों के लिए चयन करना पड़ता है। ऐसे मामलों में न तो संक्षिप्त परीक्षाओं पर न परिमाणात्मक अर्थ में उनके फल व्यक्त करने पर कोई आपत्ति की जा सकती है। परीक्षाएं, जिनकी सहायता से योग्यता मापी जा सकती है, उसी सूरत में मान्यता पाने का अधिकार प्राप्त कर सकती हैं, जब वे विज्ञानसम्मत स्वरूप ग्रहण कर लेती हैं, जब, सर्वप्रथम, परीक्षक के लिए यह स्पष्ट हो जाता है कि वह ज्ञान, आदतों और कौशल का नहीं, वरन् ठीक योग्यता की जांच-परख कर रहा है।

बुद्धि-परीक्षाओं के अवांछनीय उपयोग की आलोचना करते हुए एक प्रमुख मनोविज्ञानी ने लक्षित किया था कि अपने को सौंपे गए प्रश्नों को हल करने में छात्र की विफलता उसकी योग्यता के स्तर का सूचक कदापि नहीं हुआ करती ; इसका कारण, उदाहरण के लिए यह हो सकता है कि बच्चे में संबंधित ज्ञान तथा कौशल का अभाव हो और इस कारण प्रश्नों का स्वतंत्र रूप से आवश्यक समाधान करने में असमर्थ हो। बच्चे का मानसिक विकास स्वतःस्फूर्त ( spontaneous ) प्रक्रिया नहीं है, वह तो अध्यापन का, यानि वयस्कों के साथ सतत संप्रेषण ( communication ) का परिणाम होता है। अतः जो काम बच्चा स्वयं नहीं कर पाता, उसे वह किसी वयस्क की सहायता से कर सकता है। अतः वह उस काम को कल स्वतंत्र रूप से कर सकता है, जिसे वह आज नहीं कर पाता है। इस विचार को आधार बनाते हुए उन्होंने यह सुझाव रखा कि परीक्षक को एक नहीं, अपितु दो परीक्षाओं को अपने निष्कर्ष का आधार बनाना चाहिए। पहली परीक्षा बताएगी कि बच्चा सौंपे गये प्रश्नों को किस तरह हल करता है और दूसरी परीक्षा बताएगी कि वह उसे वयस्क की सहायता से किस तरह हल करता है। उनकी राय में, बच्चे की योग्यता के मूल्यांकन को परीक्षा में दिए गए प्रश्न के स्वतंत्र समाधान ( independent solution ) पर नहीं, अपितु स्वतंत्र समाधान तथा वयस्क की सहायता से समाधान में अंतर पर आधारित होना चाहिए। बच्चे की योग्यता के स्तर को केवल तभी अपर्याप्त माना जाना चाहिए, जब वह उन प्रश्नों को, जिन्हें उसके हमउम्र हल कर लेते हैं, न तो स्वतंत्र रूप से और न बड़ों की सहायता से हल कर पाता है। योग्यता के मूल्यांकन के इस तरीक़े को उन्होंने विकास के निकटतम क्षेत्र के निर्धारण की प्रणाली ( system to determine the closest area of development ) का नाम दिया था।

योग्यताएं मनुष्य की ठोस सक्रियता के बाहर अस्तित्वमान नहीं होतीं और वे अध्यापन तथा शिक्षा-दीक्षा की प्रक्रिया में विकसित होती हैं। अतः बच्चे की योग्यता निर्धारित करने का सबसे बढ़िया तरीक़ा यह है कि अध्यापन की प्रक्रिया के दौरान उसकी सफलताओं की गतिशीलता का पता लगाया जाए। बच्चे की योग्यता का सही-सही मूल्यांकन वयस्कों के निदेशन में नये ज्ञान तथा कौशल में पारगंत बनने में उसकी प्रगति से ही नहीं, अपितु इस बात से भी किया जा सकता है वह इस सहायता का किस हद तक उपयोग करता है ( कुछ बच्चे सहायता पाते हैं, फिर भी बहुर धीरे-धीरे आगे बढ़ते हैं, दूसरे उन्हीं परिस्थितियों में उल्लेखनीय सफलता प्राप्त कर लेते हैं )। यदि मनोवैज्ञानिक परीक्षाएं कड़ी विज्ञानसम्मत अपेक्षाओं के अनुसार तैयार की जाएं और मनुष्य के मानसिक विकास की सारभूत अवस्थाओं तथा ज्ञान और कौशल में पारंगत होने की उसकी गत्यात्मकता को ध्यान में रखती हों, तो वे प्रयोगों ( व्यवहार ) में निस्संदेह बहुत सहायक हो सकती हैं। परंतु इस मामले में भी परीक्षाओं को सदा व्यक्तित्व के अनुसंधान की अन्य विधियों के साथ मिलाकर उपयोग में लाया जाना चाहिए।


इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय