चरित्र निर्माण के लिए प्राकृतिक-सामाजिक पूर्वाधार

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने व्यक्ति के वैयक्तिक-मानसिक अभिलक्षणों की कड़ी के रूप में ‘चरित्र’ की संरचना के अंतर्गत चारित्रिक गुणों के प्रबलन को समझने की कोशिश की थी, इस बार हम चरित्र का स्वरूप तथा अभिव्यंजनाओं पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


चरित्र का स्वरूप तथा अभिव्यंजनाएं

प्रकृति तथा स्वभाव

स्वभाव की भांति चरित्र मनुष्य की शरीरक्रियात्मक विशेषताएं ( physiological features ) और, सबसे पहले, उसके तंत्रिका-तंत्र की क़िस्म ( type of nervous system ) पर अपनी निर्भरता प्रकट करता है। स्वभाव के गुण चरित्र की अभिव्यंजनाओं पर अपनी छाप डालते हैं, उसके मूल तथा रूपों की गत्यात्मक ( dynamic ) विशेषताएं निर्धारित करते हैं। अंततः, स्वभाव तथा चरित्र के गुण मनुष्य के सामान्य रूप-आकृति को, उसके व्यक्तित्व की अखंड अभिलाक्षणिकता ( characteristics ) को निर्धारित करते हुए एक अखंड समष्टि ( integrated, monolithic collectivity ) में मिल जाते हैं।

स्वभाव की विशेषताएं, चरित्र के निश्चित गुणों के विकास में सहायता दे सकती हैं अथवा उसे अवरुद्ध ( blocked ) कर सकती हैं। भावशून्य मनुष्य, क्रोधी तथा उत्साही मनुष्य की तुलना में अपने अंदर पहलकदमी और इच्छाशक्ति का विकास करना कठिन पाता है। भीरूता और चिंता पर क़ाबू पाना उदास मनुष्य के लिए गंभीर समस्या है। सामूहिक गतिविधियों में गठित चरित्र, क्रोधी मनुष्य में अधिक संयतता ( moderation ) तथा आत्मालोचना ( self-criticism ) का, उत्साही मनुष्य में धैर्य का, भावशून्य मनुष्य में क्रियाशीलता का विकास करने के लिए अनुकूल परिस्थितियों का निर्माण करता है।

चरित्र निर्माण के लिए प्राकृतिक तथा सामाजिक पूर्वाधार

चरित्र का स्वरूप, उसे बदलने की संभावना अथवा असंभावना तथा उनके गुणों का गठन, मनोवैज्ञानिकों के लिए लंबे अरसे से वाद-विवाद का विषय रहे हैं और बहुधा दैनंदिन चेतना के लिए लाक्षणिक निरुपाधिक कथनों ( typical unconditional statements ) का कारण रहे हैं।

व्यक्ति अपने चारित्रिक गुणों के गठन के बाद सामाजिक परिपक्वता ( social maturity ) प्राप्त करता है। गठन की यह प्रक्रिया दृष्टिगोचर नहीं होती, इसलिए मनुष्य को यह लगता है कि वह तो हमेशा से वही रहा है, जो वह आज है। अतः यह मत उत्पन्न होता है कि मनु्ष्य के चारित्रिक गुण उसे प्रकृति से प्राप्त होते हैं, वे अंतर्जात ( inborn ) होते हैं। इस तरह के कथन अत्यंत प्रचलित हैं : “वह अपनी प्रकृति से ही कायर और बदमाश है”, अथवा ” झूठ बोलना उसकी जन्मजात विशेषता है”, अथवा यहां तक कह दिया जाता है कि “यह तो उसका पुश्तैनी गुण है”। दरअसल यह बात असामान्य नहीं है कि दो भाई, जिनका एक ही परिवार में जन्म हुआ है, जिनकी लगभग एकसमान सी परवरिश हुई है, जिनकी आयु में दो-तीन साल का अंतर है, जो एक ही स्कूल में पढ़ते हैं, जिनके साथ उनके मां-बाप आम तौर पर एकसमान व्यवहार करते हैं, अपने चारित्रिक गुणों में एक दूसरे से ज़रा भी नहीं मिलते। इससे यह मत विश्वसनीय सा बन जाता है कि मनुष्य को अपने चारित्रिक गुण प्रकृति से मिलते हैं।

इसका क्या कारण है कि लगभग एक जैसी परिस्थितियों के होते हुए भी जीवन मनुष्य के व्यक्तित्व को भिन्न-भिन्न प्ररूपों के अनुसार “ढाल दिया करता है”? सबसे पहले यह मानना और जानना आवश्यक है कि “स्रोत सामग्री” ( source material ) भिन्न-भिन्न लोगों के मामले में सचमुच एक जैसी नहीं होती।

मनुष्य मस्तिष्क के, जो उच्च तंत्रिका-सक्रियता की एक या दूसरी क़िस्म से युक्त होता है, प्रकार्यों की भिन्न-भिन्न विशेषताओं के साथ जन्म लेता है। ये मानसिक नहीं, अपितु शरीरक्रियात्मक विशेषताएं होती हैं, फिर भी वे इस बात का पहला कारण होती हैं कि बच्चों पर एक जैसे प्रभाव भिन्न-भिन्न मानसिक परिणामों को जन्म दे सकते हैं। ये विशेषताएं वे अवस्थाएं निर्धारित करती हैं, जिनमें मन तथा चेतना का विकास होता है। शरीरक्रियात्मक अवस्थाओं से ये अंतर लोगों के चरित्र में अंतरों का पहला कारण मात्र है।

यह बात भी ध्यान में रखनी चाहिए कि “एक जैसी अवस्थाओं” की धारणा ( एक ही परिवार तक में ) नितांत सापेक्ष ( relative ) है। अकेला यही तथ्य कि बड़ा भाई अपने को बड़ा मानने और कुछ मामलों में छोटे भाई से ( जो रक्षा के लिए उसकी ओर देखता है या उसके निरंकुश व्यवहार के ख़िलाफ़ विद्रोह करता है ) श्रेष्ठ समझने का आदी है, बहुत ही असमान मानसिक परिस्थितियों को जन्म दे देता है, जो हेकड़ी अथवा चिंताशीलता, उत्तरदायित्व अथवा उदासीनता, निःस्वार्थपरता अथवा ईर्ष्या जैसे चारित्रिक गुणों के गठन में सहायक अथवा बाधक बनती हैं।

परिवार में अन्य परिस्थितियां भी भाइयों पर भिन्न-भिन्न प्रभाव डाल सकती हैं। पहले और दूसरे बच्चे ( अक्सर मां-बाप से दूसरे या छोटे बच्चे को ज़्यादा लाड़-प्यार मिलता है ) के जन्म के बीच परिवार के हालात में परिवर्तन, परिवार के अंदर संबंधों में परिवर्तन, लालन-पालन के दौरान के परिवेश के साथ अलग-अलग सुखद या दुखद अनुभव, अच्छे मित्र, जो एक भाई पर ज़्यादा ध्यान दे सकते हैं और दूसरे को नज़रअंदाज़ कर सकते हैं, उनके अध्यापकों की शिक्षाशास्त्रीय प्रतिभा में अंतर, आदि, ये सब चीज़ें दो व्यक्तियों में भिन्न-भिन्न मानसिक गुणों तथा वैयक्तिक विशेषताओं के गठन में मदद दे सकती हैं।

अंतरिक्षयान की कक्षा के निर्धारण में शुरुआती आधार-सामग्री ( दिशा, आरंभिक वेग, आदि ) में जरा सी ग़लती के घातक परिणाम होते हैं, यान कभी वहां नहीं पहुंच पाएगा, जिस ओर उसको भेजा जाता है। यही बात मनुष्य के साथ होती है। बच्चे के लालन-पालन और शिक्षा-दीक्षा में छोटी-सी चूक, वयस्क हो जाने पर जीवन के उसके आरोहण-पथ ( progression route ) पर ऐसे चारित्रिक गुणों में प्रकट हो सकती है, जो उसे किसी बंद गली में पहुंचा सकते है, और उसकी ही नहीं, अपितु उसके नज़दीकी लोगों तक की नींद हराम कर सकते हैं।

चरित्र बहुत हद तक आत्म-शिक्षा का परिणाम होता है। उसमें मनुष्य की आदतें संचित होती हैं। चरित्र लोगों के कार्यकलाप में प्रकट होता है, परंतु उसमें ही वह गठित भी होता है। यदि कोई व्यक्ति आत्म-आलोचना जैसे चारित्रिक गुण का विकास करना चाहता है, तो उसे आत्म-आलोचना करनी चाहिए। इसका अर्थ यह है कि उसे दूसरे लोगों की ही नहीं, अपितु अपनी त्रुटियों के प्रति भी असहिष्णु ( intolerant ) होना चाहिए, यानि उन पर पर्दा नहीं डालना चाहिए, अपनी आंखें खुली रखनी चाहिए। जैसा कि एक मानवश्रेष्ठ ने कहा था, “जीना सिर्फ़ तभी सीखा जा सकता है, जब तदनुरूप ढंग से जीया जाए।”

श्रम तथा अध्ययन की तो बात ही क्या, दैनंदिन जीवन, परिवार सदस्यों के बीच संबंध, मानव चरित्र का विद्यालय होते हैं। अध्यापकों तथा मां-बाप के समक्ष एक दायित्वपूर्ण कार्य सदैव उपस्थित रहता है : बच्चों के चरित्र में होनेवाले परिवर्तनों को ठीक समय पर देखना और उन्हें ध्यान में रखते हुए आचरण-व्यवहार तथा शिक्षा-दीक्षा के मामले में अपने लिए दिशा तय करना। शिक्षा-दीक्षा के मामले में शिक्षाशास्त्रीय व्यवहार के घिसे-पिटे सांचे ऐसे मामलों में ख़ास तौर पर ख़तरनाक होते हैं, जब बच्चे की ओर व्यक्तिगत ध्यान देने की आवश्यकता होती है।

एक परिवार में दूसरे शिशु, लड़के का जन्म तब हुआ, जब उसकी बहिन १२ वर्ष की हो चुकी थी। बेटी की परवरिश मां-बाप के प्रति पूर्ण आज्ञा-पालन के वातावरण में हुई थी, उसने कभी भी मां-बाप की अवज्ञा नहीं की – इसलिए नहीं कि इसके वास्ते कोई कारण रहा हो। मां-बाप की अपेक्षाएं बहुत ही विवेकसम्मत होती थीं। परंतु जिस रूप में ये अपेक्षाएं की जाती थीं, वह कठोर और कड़ा होता था तथा हर आपत्ति के प्रति असहिष्णुता बरती जाती थी। मां-बाप ने बेटे की भी इसी तरह परवरिश की। परंतु जल्द ही यह स्पष्ट हो गया कि जिस चीज़ को बेटी शिरोधार्य कर लेती थी, उनका बेटा मौन, परंतु हठपूर्वक प्रतिरोध करता था। यह कहना कठिन है कि इसकी शुरुआत कब हुई – स्वयं मां-बाप इसे उस समय से जोड़ते हैं, जब बेटा दादी के पास गया था। परंतु स्कूल में उसके आरंभिक वर्षों में ही दोनों पक्षों का यह विकट, क्लांतिकर ( fatiguing ) संघर्ष शुरू हो गया था। लड़का अपने मन की बात प्रकट नहीं करता था, अशिष्टता से पेश आता था, शक्की हो गया था। धीरे-धीरे हालात और खराब होते गए। 

मां-बाप एक मनोविज्ञानी से मिले और हैरानीभरे स्वर में बोले : “यह रही आपके सामने उसकी बहिन। उससे ही पूछकर देखिए। क्या हमने उसकी किसी और ढंग से परवरिश की? बिल्कुल वैसे ही परवरिश की। बेटी के रूप में हमें किस तरह का इन्सान मिला ! और बेटा – उसने हमारी नाक कटवा दी है !”

 “बिल्कुल वैसे ही परवरिश की !” बच्चों की परवरिश के लक्ष्यों तथा अंतर्वस्तु ( contents ) की दृष्टि से बात ऐसी ही है। इस मामले में मां-बाप का व्यवहार उच्च कोटि का था। परंतु परवरिश की उन विधियों ( methods ) को, जो बेटी के चरित्र के शायद कुछ अनुरूप रही होंगी, विवेकहीन ढंग से बेटे की, जिसका चरित्र बिल्कुल भिन्न प्रकार का था, परवरिश पर लागू करने से टकराव का होना अवश्यंभावी था। परिवार को झटके न लगते, अगर मां-बाप ने अपने बेटे के चरित्र को ठीक से आंका होता और उसके लिए तदनुरूप ही सही ‘कुंजी’ का उपयोग करने की कोशिश की होती।

एक जैसी शिक्षाशास्त्रीय विधियों को यदि भिन्न-भिन्न वैयक्तिक ( individual ) गुणोंवाले लोगों पर लागू किया जाए, तो सर्वथा विपरीत परिणाम निकल सकते हैं। यह तो शैक्षणिक कार्य की विधियों का स्वयंसिद्ध तथ्य है। बच्चे के व्यक्तित्व के गठन में घिसे-पिटे सांचों से बचने के लिए उसके चरित्र को गढ़ने के प्रति सृजनशील रुख़ ( creative approach ) अपनाना आवश्यक है। यह कंटीला पथ हो सकता है, परंतु गंभीर, सोच-समझकर, लीक से हटकर लिए जाने वाले निर्णय घिसे-पिटे शिक्षाशास्त्रीय सूत्रों से अधिक फलप्रद हो सकते हैं, यदि उसके प्रभावों पर अलग-अलग कार्रवाइयों से नहीं ( ‘बच्चे से यह या वह कराया’), अपितु चरित्र गढ़ने की प्रक्रिया के परिणामों के आधार पर निर्णय दिया जाए।

अतः चरित्र मनुष्य को प्रकृति से नहीं मिलता। ऐसा कोई चरित्र नहीं है, जिसे न बदला जा सके। इस बात का हवाला देना कि “मेरा चरित्र ही ऐसा है और मैं इस मामले में कुछ भी नहीं कर सकता”, मनोवैज्ञानिक दृष्टि से सर्वथा आधारहीन है। प्रत्येक मनुष्य अपने चरित्र की समस्त अभिव्यक्तियों के लिए उत्तरदायी होता है और प्रत्येक मनुष्य उसे आत्म-शिक्षा के माध्यम से सुधारने की स्थिति में होता है।

यदि चारित्रिक गुणों को नैसर्गिक, शरीरक्रियात्मक पूर्वाधारों के साथ जोड़ना ग़लत है ( हालांकि चरित्र के नैसर्गिक पूर्वाधारों को ध्यान में रखना भी आवश्यक है ), तो उनका पुश्तैनी मूल होने का दावा करना और भी ग़लत होगा। एकयुग्मज जुड़वों के, जिनमें शरीररचनात्मक-शरीरक्रियात्मक विशेषताओं का एक जैसा आनुवंशिक आधार होता है, अध्ययनों ने उनके स्वभावों में सादृश्य सिद्ध किया है, परंतु चरित्रों में नहीं। यदि एकयुग्मज जुड़वां भिन्न-भिन्न परिवारों में पाले-पोसे जाएं, तो उनके चरित्र भिन्न-भिन्न सिद्ध होते हैं।

पत्र-पत्रिकाओं में प्रायः इस तरह की रिपोर्टें पढ़ने को मिलती हैं कि एकयुग्मज जुड़वां कितनी भी भिन्न-भिन्न अवस्थाओं में रखे जाएं, उनमें एक जैसी रुचियों, रुझानों तथा चारित्रिक गुणों का ही विकास होता है। किंतु इस तरह की भी रिपोर्टें हैं कि कतिपय मनोविज्ञानियों द्वारा तथ्यों का जानबूझकर मिथ्याकरण किया गया है, जो मनुष्य के व्यक्तित्व की जैविक प्रकृति को सिद्ध करने के लिए किसी तरह की हितबद्धता में हैं। तथ्य बताते हैं कि भिन्न-भिन्न अवस्थाएं तथा परिस्थितियां एकसमान आनुवंशिक आधार होने के बावजूद भिन्न-भिन्न ही नहीं, अपितु परस्परविरोधी चारित्रिक गुणों का गठन कर सकती हैं।

अतः, चरित्र मनुष्य के पूर्ण जीवन के दौरान निर्मित होता है। मनुष्य सामाजिक संबंधों की प्रणाली में, अन्य लोगों के साथ संयुक्त सक्रियता तथा संप्रेषण में स्वयं अपने व्यक्तित्व का विकास करता है


इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

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2 टिप्पणियाँ (+add yours?)

  1. ram lal yadav
    फरवरी 11, 2012 @ 21:10:40

    lqUnjA thou ds izfr gekjk utjh;k dSlk gksuk pkfg;s] bldk ekxZ funsZ”ku feyrk gSA

    प्रतिक्रिया

  2. Trackback: योग्यता की संकल्पना ( concept of ability ) « समय के साये में

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