चरित्र की अवधारणा

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने व्यक्ति के वैयक्तिक-मानसिक अभिलक्षणों को समझने की कड़ी के रूप में स्वभाव और शिक्षा पर चर्चा की थी, इस बार से हम “चरित्र” पर चर्चा शुरू करेंगे और चरित्र की अवधारणा को समझने की कोशिश करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय  अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


चरित्र की अवधारणा
चरित्र की परिभाषा

चरित्र ( character ) शब्द उन अभिलाक्षणिक चिह्नों ( characteristic signs ) का द्योतक है, जिन्हें सामाजिक प्राणी के रूप में मनुष्य ग्रहण करता है। जिस प्रकार मनुष्य की वैयक्तिकता ( individuality ) अपने को मानसिक प्रक्रियाओं ( अच्छी स्मृति, फलप्रद कल्पना, हाज़िर जवाबी, आदि ) की विशिष्टताओं और स्वभाव के लक्षणों में प्रकट करती है, उसी प्रकार वह मनुष्य के चरित्र के गुणों को प्रदर्शित करती है।

चरित्र की परिभाषा इस प्रकार की जा सकती है : चरित्र मनुष्य के स्थिर वैयक्तिक गुणों का कुल योग है, जो उसके कार्यकलाप तथा संसर्ग-संपर्क में उत्पन्न तथा उजागर होते हैं और उसके आचरण के अभिलाक्षणिक रूपों को निर्धारित करते हैं।

मनुष्य का व्यक्तित्व केवल इसी बात से अभिलक्षित नहीं होता है कि वह क्या करता है, अपितु इस बात से भी अभिलक्षित होता है कि वह उसे किस तरह करता है। साझे हितों तथा आस्थाओं को अपना आधार बनाते हुए तथा जीवन में साझे ध्येयों की सिद्धी की कामना करते हुए लोग अपने सामाजिक आचरण-व्यवहार तथा कार्यकलाप में सर्वथा भिन्न-भिन्न, कभी-कभी तो एक-दूसरे के विपरीत वैयक्तिक गुण प्रदर्शित करते हैं।

एक जैसी कठिनाइयां झेलते हुए, एक जैसे दायित्व निभाते हुए, एक जैसी वस्तुएं पसंद या नापसंद करते हुए भी कुछ लोगों में नरमी और सुनम्यता होती है, तो कुछ कठोर और असहिष्णु होते हैं, कुछ प्रफुल्लचित्त होते हैं, तो कुछ उदास रहते हैं, कुछ में आत्मविश्वास होता है, तो कुछ कायर होते हैं, कुछ सब को साथ लेकर चल सकते हैं, तो कुछ ऐसा नहीं कर पाते। छात्रों को संबोधित एक ही अर्थ से युक्त व्याख्याएं कुछ अध्यापकों द्वारा नरमी, भद्रतापूर्वक और प्रीतिकर ढंग से, तो कुछ द्वारा कर्कश और शिष्टताहीन ढंग से की जाती हैं। ऐसे अंतर्निहित वैयक्तिक गुण उन लोगों में तो आम तौर पर और भी अधिक स्पष्ट रूप से पाये जाते हैं, जिनका जीवन के प्रति दृष्टिकोण भिन्न-भिन्न होता है, जिनकी रुचियां, सांस्कृतिक स्तर तथा नैतिक सिद्धांत भिन्न-भिन्न होते हैं।

वैयक्तिक गुण, जिनसे मनुष्य का चरित्र बनता है, सर्वप्रथम तथा सर्वोपरि इच्छा ( उदाहरण के लिए, संकल्प अथवा अनिर्णय, भीरूता ) और अनुभूतियों ( उदाहरण के लिए, प्रफुल्लचित्तता अथवा विषाद ) और कुछ हद तक बुद्धि ( उदाहरण के लिए, चंचलता अथवा विचारशीलता ) से जुड़े होते हैं। परंतु चरित्र की अभिव्यक्तियां संजटिल ( complex ) प्रक्रियाएं हैं और सांकल्पिक ( volitional ), भावनात्मक अथवा बौद्धिक गुणों के अर्थ में उनका बहुधा वर्गीकरण नहीं किया जा सकता ( उदाहरण के लिए, संदेही स्वभाव, ह्र्दय की विशालता, उदारता, विद्वेष, आदि को इन तीन प्रवर्गों ( categories ) में से किसी के भी अंतर्गत नहीं रखा जा सकता )।

चरित्र, सामाजिक संबंध तथा सामाजिक समूह

व्यक्तिगत चरित्र का निर्माण विकास के भिन्न-भिन्न स्तरोंवाले भिन्न-भिन्न सामाजिक समूहों में ( परिवार में, मित्रमंडली में, अध्ययन-समूहों अथवा व्यवसायिक कार्य-समूहों में, किसी समाज-उदासीन संगठन, आदि में ) होता है। किसी व्यक्ति में, उदाहरण के लिए, किसी किशोर में खुलेपन, बेलागपन ( mindedness ), साहस तथा अडिगता के गुण, तो दूसरे मामले में घुन्नेपन, मिथ्यावादिता, कायरता, लीकपरस्ती और ढीलेपन के गुण विकसित हो सकते हैं। यह संदर्भ-समूह में मनुष्य की वैयक्तिकता तथा अंतर्वैयक्तिक संबंधों ( interpersonal relationship ) के स्तर पर निर्भर करता है। विकास के उच्च स्तरवाला सामाजिक-समूह, सर्वोत्तम मानव गुणों के विकास तथा सुदृढ़ीकरण के लिए सबसे अधिक अनुकूल परिस्थितियां पैदा करता हैं। यह प्रक्रिया व्यक्तित्व के समूह के साथ इष्टतम समेकन ( optimize integration ) तथा स्वयं समूह के आगे विकास को बढ़ावा देती है।

व्यक्ति के चरित्र को जानने पर यह पहले से कहा जा सकता है कि वह इन या उन परिस्थितियों में किस तरह से पेश आएगा। और इसके फलस्वरूप उसके व्यवहार का निदेशन किया जा सकता है। अतः अध्यापक को अपने छात्रों को सामाजिक कार्य सौंपते समय उनके ज्ञान तथा हुनर को ही नहीं, अपितु उनके चरित्र को भी ध्यान में रखना चाहिए। उदाहरण के लिए, कोई छात्र अपनी धुन का पक्का और अध्यवसायी ( diligent ), परंतु साथ ही कुछ मंथर ( slow ) और आवश्यकता से अधिक सावधान होता है। दूसरा स्फूर्तिवान है, उसे साझा ध्येय बहुत प्रिय हैं, परंतु अपने से ज़रा भी भिन्न रायों के प्रति असहिष्णु ( intolerant ) होता है और इस कारण वह अकारण रूखा और अशिष्ट हो सकता है। छात्र के चरित्र के मूल्यवान गुणों को ध्यान में रखते हुए अध्यापक द्वारा उन्हें सुदृढ़ और सशक्त बनाने का तथा उनके नकारात्मक गुणों को निर्बल बनाने या कम से कम उनका प्रतिकार करने का प्रयास करना चाहिए और इसके लिए वह उनमें निहित अन्य समाजोपयोगी गुणों का विकास कर सकता है।

प्रत्येक बालक-बालिका के चरित्र तथा स्वभाव के विषय में अध्यापक की जानकारी प्रत्येक पर व्यक्तिगत रूप से ध्यान दिए जाने की पूर्वशर्त है। अध्यापन और शिक्षा के क्षेत्र में यह बात अत्यधिक महत्त्व रखती है।


इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

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  1. Trackback: चारित्रिक गुणों के संबंध « समय के साये में

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