पढ़ाई तथा श्रम-सक्रियता में स्वभाव की भूमिका

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने व्यक्ति के वैयक्तिक-मानसिक अभिलक्षणों को समझने की कड़ी के रूप में उच्चतर तंत्रिका-तंत्र के गुणधर्मों और भेदों को समझने की कोशिश की थी, इस बार हम पढ़ाई तथा श्रम-सक्रियता में स्वभाव की भूमिका पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय  अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


 पढ़ाई तथा श्रम-सक्रियता में स्वभाव की भूमिका

 मन की प्रतिक्रियात्मक प्रवृत्ति अपने को मनुष्य के व्यवहार के ढंग में ही नहीं, उसकी क्रियाओं में ही नहीं, अपितु उसके बौद्धिक क्षोभ ( excitement ), उसके अभिप्रेरकों और उसकी सामान्य कार्य-क्षमता में भी व्यक्त करती है। ऐसे में स्वाभाविक ही है कि मनुष्य के स्वभाव की विशेषताएं उसकी पढ़ाई या श्रम-सक्रियता को प्रभावित करती है।

यह अत्यंत महत्त्वपूर्ण है कि स्वभावगत अंतरों का संबंध मनुष्य की मानसिक क्षमताओं ( mental abilities ) से नहीं, उसके मानस की अभिव्यक्तियों ( expressions ) से है। हर स्वभाव में कुछ सकारात्मक और कुछ नकारात्मक बातें होती हैं, जिन्हें तंत्रिका-तंत्र के भेद का स्वभाव के संबंधित गुणधर्मों के साथ, मनुष्य की सक्रियता के लिए उनके महत्त्व की दृष्टि से, संबंध स्थापित करके ही आंका जा सकता है।

प्रबल और दुर्बल प्रकार की सक्रियताएं

विशेष अनुसंधानों ने दिखाया है कि तंत्रिका-तंत्र का दौर्बल्य ( infirmity ), उत्तेजन ( stimulation ) और प्रावरोध ( inhibit ) की प्रक्रियाओं की अल्प प्रबलता का ही नहीं, अपितु मनुष्य की अति संवेदनशीलता ( high sensitivity ) अथवा प्रतिक्रियात्मकता का भी सूचक है। इसका मतलब है कि दुर्बल तंत्रिका-तंत्र के अपने लाभ हैं। उसकी अभिलाक्षणिक विशेषताएं और अंतर्निहित संभावनाएं अनेक प्रयोगों और दैनंदिन प्रेक्षणों द्वारा प्रकाश में लाई जा चुकी हैं।

एक प्रयोग में छात्रों के एक समूह को सारे पाठ के दौरान सरल सवाल हल करने को दिये गए। छात्रों के तंत्रिका-तंत्र की क़िस्मों का पहले ही पता लगा लिया गया था। पाया गया कि दुर्बल तंत्रिका-तंत्रवाले छात्रों ने परिवेश के प्रति अपनी अधिक संवेदनशीलता और प्रतिक्रियात्मकता के कारण आरंभ में प्रबल तंत्रिका-तंत्रवाले छात्रों से अधिक सवाल किए, किंतु वे ज़्यादा ही जल्दी थक जाते थे। इसके विपरीत जिन छात्रों के स्वभाव का निर्धारण प्रबल तंत्रिका-तंत्र द्वारा हुआ था, उन्हें ‘उत्प्रेरण-अवधि’ ( trigger – period ) की जरूरत पड़ी और फिर वे अपनी उत्पादिता घटाए बिना कहीं ज़्यादा लंबे समय तक काम करते रहे।

एक अन्य जांच में प्रयोगकर्ताओं ने ऊंची कक्षाओं के पढ़ाई में अच्छे छात्रों की अध्ययन-प्रक्रिया का प्रेक्षण किया। इनके तंत्रिका-तंत्र की प्रबलता पहले प्रयोगशाला-प्रयोगों द्वारा मालूम की गई थी। पता चला कि उनमें प्रबल और दुर्बल, दोनों तरह के तंत्रिका-तंत्रवाले छात्र हैं। किंतु उनके काम करने के ढंग अलग-अलग और उनके स्वभाव के अनुरूप थे। उनके स्वतंत्र कार्य को तीन कालों – तैयारी, निष्पादन तथा जांच के कालों – में बांटकर प्रयोगकर्ताओं ने देखा कि ज़्यादा तेज़ छात्र तैयारी और जांच पर कम समय खर्च करते थे ( उदाहरणार्थ, वे अपने निबंधों को उन्हें लिखने की प्रक्रिया में ही जांच या सुधार लेते थे ),  जबकि अपेक्षाकृत कमज़ोर छात्र तैयारी और जांच में ज़्यादा समय लगाते थे और आवश्यक सुधार करने के लिए उन्हें अतिरिक्त समय की जरूरत पड़ती थी। दूसरा अंतर यह था कि तेज़ छात्र कई सारे काम विशेष आयोजना ( planning ) तथा समय-वितरण के बिना कर लेते थे, जबकि कमज़ोर छात्र नया काम पहले काम को पूरा कर लेने के बाद ही शुरू करना पसंद करते थे और दीर्घकालिक कामों के लिए दैनिक, साप्ताहिक, आदि योजनाएं बना लेते थे। जहां तक कार्य की सामान्य दक्षता का प्रश्न है, तो किसी भी स्वभाव को अधिमान ( precedence ) नहीं दिया जा सकता था।

यह पाया गया है कि कुछ प्रकार के नीरस कामों में अपेक्षाकृत कमज़ोर तंत्रिका-तंत्रवाले मनुष्य फ़ायदे में रहते हैं : उनकी अधिक संवेदनशीलता आवश्यक प्रतिक्रिया-स्तर पर बनाए रखने में और इंद्रियों को सुस्त बनानेवाली निद्रालुता ( somnolence ) को रोकने में सहायक बनती है। दूसरी ओर, जिन सक्रियताओं में मनुष्य का विशेषतः प्रबल, अप्रत्याशित अथवा भयावह क्षोभकों से वास्ता पड़ता है, उनमें अपेक्षाकृत दुर्बल लोग मात्र अपनी शरीरक्रियात्मक विशिष्टताओं के कारण चालू कार्यभारों ( assignments ) को पूरा करने में असमर्थ सिद्ध होते है।

इसका प्रमाण खेलकूद संबंधी गतिविधियों के मनोवैज्ञानिक प्रेक्षण से प्राप्त जानकारी से मिलता है। एक अध्ययन में अनुसंधान का विषय प्रशिक्षण और प्रतियोगिताओं के दौरान स्कूली बच्चों के खेल के व्यक्तिपरक अंतर ( subjective difference ) थे। पाया गया कि प्रबलतर तंत्रिका-तंत्रवाले छात्रों ने प्रशिक्षणात्मक अभ्यासों के बजाए महत्त्वपूर्ण प्रतियोगिताओं में बेहतर परिणाम दिखाए, जबकि दुर्बलतर तंत्रिका-तंत्रवालों ने प्रशिक्षण के चरण में बेहतर और ज़्यादा स्थिर उपलब्धियां प्रदर्शित कीं। इसका कारण उनके स्वभावों के अंतर, अर्थात उत्तेज्यता, तंत्रिका-प्रबलता और बढ़े हुए उत्तरदायित्व तथा जोखिम के प्रभाव से संबंधित अंतर थे।

इस तरह प्रबल तंत्रिका-तंत्रवाले एक तरह की समस्याओं को हल करने में बेहतर परिणाम दिखाते हैं और कमज़ोर तंत्रिका-तंत्रवाले दूसरी तरह की समस्याओं को हल करने में। प्रायः तंत्रिका-तंत्र प्रबलता के मामले में असमान लोगों को एक ही तरह के कार्यभार की पूर्ति के लिए एक दूसरे से भिन्न मार्ग अपनाने पड़ते हैं।

गतिशील और जड़ सक्रियताएं

तंत्रिका प्रक्रियाओं की जड़ता ( inertia ), यानि उनकी अल्प सचलता, जो अपने को एक प्रक्रिया से विरोधी कर्षणशक्ति ( anti traction power ) की दूसरी प्रक्रिया में मंद परिवर्तन में प्रकट करती है, और धीरे उत्तेजन तथा प्रावरोध में व्यक्त उनकी भिन्न अस्थिर संवेगिता के नकारात्मक और सकारात्मक, दोनों पहलू हो सकते हैं। जड़ता का नकारात्मक पहलू तंत्रिका-प्रक्रियाओं की धीमी गति है और सकारात्मक पहलू उनकी दीर्घता तथा स्थायित्व। संबंधित मानसिक अंतर मुख्यतः एक प्रक्रिया के रूप में सक्रियता की विशेषताओं ( characteristics ) की उपज होते हैं, न कि उसकी प्रभाविता ( effectiveness ) की उपज।

इस दृष्टि से विशेष प्रयोगों में अपेक्षाकृत गतिशील तथा जड़ स्वभावोंवाले छात्रों द्वारा श्रम-कौशल अर्जित करने की आरंभिक अवस्था में प्रदर्शित अंतर बड़े महत्त्वपूर्ण हैं। अनुसंधानों ने दिखाया कि गतिशील छात्र, एक ओर, विभिन्न कार्यभारों की पूर्ति की उच्च दर प्रदर्शित करते हैं, तो, दूसरी ओर, अपर्याप्त विश्वसनीयता भी दिखाते हैं ( अनावश्यक जल्दबाजी के कारण कार्यभार के कुछ घटकों को छोड़ देना )। जिन कार्यभारों के लिए धीमी गतियों की जरूरत होती है, वे जड़ छात्रों द्वारा बेहतर तथा अधिक समरूप ढंग से संपन्न किए जाते हैं। बेशक, उनके काम में कभी-कभी अवांछित ( unwanted ) विलंब हो जाता है, किंतु कुलमिलाकर काम अधिक सावधानी के साथ पूरा किया जाता है। उनमें से अधिकांश अपने अपेक्षाकृत धीमेपन की कमी को शिक्षक की बातों तथा नक़्शों पर अधिक ध्यान देकर पूरी कर लेते हैं।


इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

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