उच्चतर तंत्रिका-तंत्र के भेद और स्वभाव

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने व्यक्ति के वैयक्तिक-मानसिक अभिलक्षणों को समझने की कड़ी के रूप में स्वभावो के भेदों को समझने की कोशिश की थी, इस बार हम उसी को आगे बढाते हुए उच्चतर तंत्रिका-तंत्र के गुणधर्मों और भेदों पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय  अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


उच्चतर तंत्रिका-तंत्र के गुणधर्म
( properties of higher nervous system )

उच्चतर तंत्रिका-तंत्र, अथवा तंत्रिका-सक्रियता के भेदों का सिद्धांत, स्वभाव के वैज्ञानिक अध्ययन के इतिहास में एक वास्तविक मोड़बिंदु सिद्ध हुआ है। वैज्ञानिकों ने प्रमस्तिष्कीय गोलार्धों के कार्य की सामान्य नियमसंगतियों के अलावा तंत्रिका-तंत्र के उन भेदों की भी खोज और जांच की, जो पशुओं की वैयक्तिकता ( individuality ) से संबंध रखते थे ( प्रयोग कुत्तों पर किये गए थे )। पाया गया कि कुत्ते के व्यवहार की कुछ विशेषताएं ( उदाहरणार्थ, सजीवता अथवा सुस्ती, साहसिकता अथवा कायरता ) मुख्य तंत्रिका-प्रक्रियाओं – उत्तेजन ( stimulation ) और प्रावरोध ( inhibition ) – की कतिपय विशेषताओं से संबद्ध थीं। वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि वे जिन वैयक्तिक अंतरों का अध्ययन कर रहे थे, वे ऐसे शरीरक्रियात्मक अभिलक्षणों पर आधारित हैं, जैसे उत्तेजन और प्रावरोध की प्रबलता ( predominance ), उनकी सचलता ( mobility ), अर्थात तेज़ी से एक दूसरे का स्थान लेने की योग्यता, और उत्तेजन तथा प्रावरोध के बीच संतुलन ( balance )। उच्चतर तंत्रिका-तंत्र के विभिन्न भेदों के मूल में इन गुणधर्मों के विभिन्न संयोजन ( combination ) ही होते हैं।

तंत्र की जीवन-क्षमता का परिचायक सबसे महत्त्वपूर्ण अभिलक्षण तंत्रिका-प्रक्रियाओं की प्रबलता है। उत्तेजन और प्रावरोध की प्रबलता पर ही प्रांतस्था के न्यूरानों की कार्यक्षमता तथा मज़बूती निर्भर होती है। वास्तव में परिवेश बहुसंख्य विभिन्न उद्दीपनों के रूप में तंत्रिका-तंत्र पर प्रबल प्रभाव डालता है : मनुष्य को लंबे समय तक कोई बहुत ही कठिन कार्य करना, आपात स्थिति से जूझना, अतिशय मानसिक तनाव पैदा करनेवाले प्रबल क्षोभकों पर प्रतिक्रिया दिखाना और कुछ क्षोभकों के प्रभाव में अपनी स्वाभाविक प्रतिक्रिया को इसलिए दबाना पड़ सकता है कि अन्य, अधिक महत्त्वपूर्ण क्षोभकों के संबंध में पूर्ण प्रतिक्रिया दिखाई जा सके। तंत्रिका-तंत्र कितना भार वहन कर सकता है, यह उत्तेजन और प्रावरोध की प्रक्रियाओं की प्रबलता पर निर्भर होता है।

अगला महत्त्वपूर्ण अभिलक्षण प्रमस्तिष्कीय प्रांतस्था में तंत्रिका-सक्रियताओं की सचलता है। परिवेश बदलता रहता है और मनुष्य पर उसका प्रभाव आकस्मिक और अप्रत्याशित हो सकता है। ऐसे में तंत्रिका-प्रक्रियाओं को पिछड़ना नहीं चाहिए। प्रयोगों ने दिखाया है कि कतिपय प्राणियों में उत्तेजन और प्रावरोध की वैकल्पिक प्रक्रियाएं अन्य प्राणियों की अपेक्षा अधिक तेज़ी से संपन्न होती हैं। तंत्रिका-तंत्र का तीसरा अभिलक्षण भी बड़ा महत्त्वपूर्ण है। यह है उत्तेजन और प्रावरोध की प्रबलता के बीच संतुलन। कभी-कभी इन कारकों के बीच संतुलन नहीं होता और प्रावरोध उत्तेजन से कमज़ोर सिद्ध हो जाता है। संतुलन का स्तर सभी पशुओं में समान नहीं होता।

उच्चतर तंत्रिका-सक्रियता के भेद

यह पाया गया है कि उच्चतर तंत्रिका-तंत्र के सभी वैयक्तिक अंतर उपरोक्त किसी एक अभिलक्षण से नहीं, अपितु सदा उनके संयोजनों से पैदा होते हैं। प्रयोगशाला-प्रयोगों ने दिखाया है कि इनमें से कुछ संयोजन और संयोजनों की अपेक्षा अधिक प्रायिकता ( probability ) के साथ घटित होते हैं अथवा उनकी अभिव्यक्तियां अन्यों की अपेक्षा अधिक सुस्पष्ट होती हैं। उच्चतर तंत्रिका-सक्रियता के मुख्य प्रभेद निश्चित किये गए, और तंत्रिका-प्रक्रियाओं की प्रबलता के अनुसार सभी कुत्तों को दो श्रेणियों में बांटा गया : बलवान और दुर्बल।

दुर्बल क़िस्म के पशुओं में दोनों ही तंत्रिका-प्रक्रियाएं ( विशेषतः प्रावरोध की प्रक्रिया ) दुर्बल होती है। ऐसे कुत्ते घबराहट और हड़बड़ी दिखाते हैं, लगातार पीछे झांकते रहते हैं या किसी एक मुद्रा में जड़, निश्चेष्ट बनकर खड़े रहते हैं। इसका कारण यह है कि बाह्य प्रभाव, जो कभी-कभी बिल्कुल मामूली होता है, उनके लिए बड़ा प्रबल सिद्ध होता है। दीर्घ अथवा प्रबल उद्दीपन उन्हें जल्दी थका डालता है। बेशक दुर्बल पशुओं में आपस में तंत्रिका-प्रक्रियाओं की प्रबलता के अनुसार ही भेद नहीं होता, फिर भी ये भेद उनके तंत्रिका-तंत्र की सामान्य दुर्बलता के सामने गौण बन जाते हैं।

प्रबल पशुओं को संतुलित और असंतुलित में बांटा जाता है। असंतुलित को सामान्यतः प्रबल उत्तेजन और क्षीण प्रावरोध से पहचाना जाता है। चूंकि ऐसे कुत्तों में उत्तेजन की प्रक्रिया, प्रावरोध की प्रक्रिया द्वारा संतुलित नहीं होती, इसलिए वे भारी मानसिक तनाव की स्थिति में तंत्रिकावसाद के शिकार बन जाते हैं। उनमें से अधिकांश आक्रामक, अति-उत्तेजनीय पशु होते हैं। प्रबल संतुलित कुत्तों को उनकी तंत्रिका-सक्रियता में परिवर्तन की गति के अनुसार फुरतीला और शांत, इन दो कोटियों में बांटा जाता है। उनके व्यवहार से उन्हें आसानी से पहचाना जा सकता है – फुरतीले कुत्ते हलचलपूर्ण तथा उत्तेजनीय होते हैं और शांत कुत्ते मंदगति तथा मुश्किल से उत्तेजित होनेवाले।

अतः वैज्ञानिकों ने उच्चतर तंत्रिका-सक्रियता के चार मुख्य भेद निर्धारित किये हैं : ( १ ) प्रबल संतुलित स्फूर्तिशील, ( २ ) प्रबल संतुलित शांत, ( ३ ) प्रबल असंतुलित ( निरंकुश ) और ( ४ ) दुर्बल।

तंत्रिका-सक्रियता का हर भेद शरीर का एक प्राकृतिक अभिलक्षण ( characteristics ) है। सारतः वंशागत होने पर भी वह अपरिवर्तनीय नहीं है और कुछ सीमाओं के भीतर परिवेश के प्रभावों पर प्रतिक्रिया करते हुए विकास की प्रक्रिया से गुजरता है। उदाहरण के लिए, प्रयोगों ने सिद्ध किया है कि उत्तेजन की तुलना में पिछड़ी हुई प्रावरोध की प्रक्रिया को समुचित प्रशिक्षण द्वारा प्रबलित किया जा सकता है। यह भी ज्ञात है कि उम्र के साथ तंत्रिका-प्रक्रियाओं का स्वरूप बदलता जाता है।

स्वभावों का शरीरक्रियात्मक आधार तंत्रिका-प्रक्रियाओं की प्रबलता, संतुलन और सचलता के विभिन्न संयोजन होते हैं, जिनके अनुसार उच्चतर तंत्रिका-सक्रियता के विभिन्न भेदों का निर्धारण किया जाता है। प्रबल संतुलित सफूर्तिशील प्रकार की तंत्रिका-सक्रियता का संबंध रक्तप्रकृति ( उत्साही स्वभाव ) से है, प्रबल संतुलित मंद तंत्रिका-सक्रियता का श्लैष्मिक प्रकृति ( शीत स्वभाव ) से, प्रबल अंसतुलित प्रकार का पित्तप्रकृति ( कोपशील स्वभाव ) से और दुर्बल प्रकार का वातप्रकृति ( विषादी स्वभाव ) से है।

पशुओं पर प्रयोगों के परिणामस्वरूप किया गया तंत्रिका-तंत्रों का वर्गीकरण पूर्णतः मनुष्यों पर भी लागू होता है। मनुष्य के तंत्रिका-तंत्र का हर गुणधर्म उसके स्वभाव के विभिन्न पहलुओं को प्रभावित करता है और क्रियाशीलता, संवेगात्मकता तथा गतिशीलता जैसा हर परिवर्तनशील अभिलक्षण उसके तंत्रिका-तंत्र के किसी एक गुणधर्म पर ही नहीं, बल्कि तंत्रिका-तंत्र के भेद पर भी निर्भर होता है।

मनुष्य के स्वभाव की अभिव्यक्तियां अपने पर उसके सामाजिक परिवेश, मानकों तथा अपेक्षाओं की छाप लिए रहती हैं। इसके अतिरिक्त हर मनुष्य का अपना स्वभाव होता है, जो उसके तंत्रिका-तंत्र के स्थिर गुणधर्मों से निर्धारित होता है। मनुष्य की प्रतिक्रियात्मक प्रवृत्ति के इस आधार की किसी भी प्रकार उपेक्षा नहीं की जानी चाहिए।


इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

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