स्वभावो के भेद

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने व्यक्ति के वैयक्तिक-मानसिक अभिलक्षणों को समझने की कड़ी के रूप में स्वभाव की संकल्पना को समझने की कोशिश की थी, इस बार हम स्वभावो के भेद पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय  अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


स्वभावो के भेद
( differences in human natures )

व्यक्ति के स्वभाव ( nature ) के बारे में हमारी राय सामान्यतः इस व्यक्ति की मानसिक विशेषताओं के हमारे ज्ञान पर आधारित होती है। इस तरह मानसिकतः सक्रिय मनुष्य को, जो सामाजिक परिवेश में परिवर्तनों पर तुरंत प्रतिक्रिया दिखाता है, नये-नये अनुभव पाना चाहता है, उचित हद तक आशावादी है, स्फूर्तिवान और ज़िंदादिल है और हाव-भाव के मामले में उन्मुक्त है, उसे रक्तप्रकृति ( प्रफुल्लस्वभाव ) मनुष्य कहा जाता है। श्लैष्मिक प्रकृति ( शीतस्वभाव ) उसे कहा जाता है, जो अति-संयत है, जिसकी इच्छाएं तथा मनोदशाएं बदलती नहीं रहतीं, जिसकी भावनाओं में स्थायित्व तथा गहनता है, जो अपना संतुलन नहीं खोता, ऊंची आवाज़ में नहीं बोलता और मन के भावों को बाहर नहीं आने देता। इसके विपरीत पित्तप्रकृति ( कोपशील ) व्यक्ति की विशेषताएं उर्जा का उफान, काम के प्रति घोर लगन, कर्मठता, सहज ही भावावेश में आ जाना, मनोदशा में एकाएक परिवर्तन और असंयत चेष्टाएं हैं। वातप्रकृति ( विषादी ) मनुष्य संवेदनशील, सहज ही चोट खा जानेवाला, बाहर से संयत लगने पर भी भावुक, मंदगति और मंदभाषी होता है।

हर प्रकार के स्वभाव में मानसिक विशेषताओं का अपना अन्योन्यसंबंध, क्रियाशीलता तथा संवेगात्मकता का अपना अनुपात और अपनी विशिष्ट गतिशीलता होती है। दूसरे शब्दों में कहें, तो हर स्वभाव के लिए मनुष्य की प्रतिक्रियात्मक प्रवृत्ति की एक निश्चित संरचना अभिलाक्षणिक है। स्वाभाविकतः सभी लोगों को इन चार कोटियों में नहीं रखा जा सकता। फिर भी उपरोक्त भेदों को सामान्यतः मुख्य भेद माना गया है और अधिकांश लोग उसके अंतर्गत आते हैं।

१२-१३ वर्ष की आयु में स्वभाव के मुख्य भेदों की ठेठ मिसालें कुछ इस तरह दी जा सकती हैं।

रक्तप्रकृति ( प्रफुल्लस्वभाव ) – राहुल बड़ा ज़िंदादिल तथा चंचल है, कक्षा में कभी चैन से नहीं बैठता, हर समय कुछ न कुछ करता रहता है, तेज़ और कूदते हुए चलता है, जल्दी-जल्दी बोलता है। बड़ा संवेदनशील है और आसानी से प्रभावित हो जाता है। फिल्म या किताब के बारे में बड़े चाव और उत्साह से बातें करता है, पाठ के दौरान हर नई जानकारी को तुरंत ग्रहण कर लेता है और नये कार्यभारों ( assignments ) को पूरा करने को तैयार रहता है। साथ ही उसकी रुचियां और शौक बड़े अस्थायी हैं तथा जैसे आसानी से पैदा होते हैं, वैसे ही आसानी से खत्म भी हो जाते हैं। उसका चेहरा उसकी मनोदशाओं तथा रवैयों ( attitudes ) को साफ़-साफ़ दिखा देता है। जो पाठ उसे दिलचस्प लगते हैं, उनमें वह अत्यधिक क्षमता दिखाता है, और जो पाठ नीरस ( monotonous ) लगते हैं उनमें जम्हाइयां लेता है, बगल के बच्चों से बातों में व्यस्त रहता है। उसकी भावनाएं और मनोदशाएं बड़ी परिवर्तनशील हैं। कम अंक आने पर उसकी आंखों में आंसू छलछला आते हैं, पर थोड़ी देर बाद ही आधी छुट्टी में गलियारे में उछल-कूद मचाने लगता है। उसकी चंचलता और शोख़पन के बावज़ूद उसे क़ाबू में किया जा सकता है, अनुभवी शिक्षकों की कक्षाओं में वह कभी ऊधम नहीं मचाता। वह अन्य लड़के-लड़कियों से खूब हिला-मिला हुआ है और सामूहिक कार्यों में सक्रिय भाग लेता है।

पित्तप्रकृति ( कोपशील ) – कमल सहपाठियों के बीच अपने उतावलेपन के लिए प्रसिद्ध है। शिक्षक की बातें यदि उसे दिलचस्प लगती हैं, तो वह अत्यंत उत्तेजित हो जाता है और बीच में ही अपनी प्रतिक्रिया दिखाने लगता है। वह बिना सोचे ही प्रश्नों का उत्तर देने को तैयार रहता है और इसीलिए प्रायः अप्रासंगिक ( irrelevant ) उत्तर देता है। चिढ़ने या निराश होने पर बड़ी जल्दी संयम खो बैठता है और लड़ने लगता है। वह अध्यापक को ध्यान से सुनता है और ऐसे ही ध्यान से गृहकार्य और कक्षा में दिया गया काम भी करता है। मध्यांतर में दौड़ता-भागता रहता है या किसी से गुत्थमगुत्था हो जाता है। जल्दी-जल्दी और जोर से बोलता है, और चेहरा अत्यंत अभिव्यक्तिपूर्ण है। सामूहिक कार्यों, खेलकूद में समर्पण भाव से भाग लेता है। कमल की रुचियां स्थायी और स्थिर हैं, वह कठिनाइयों से नहीं घबराता और उन्हें लांघकर ही दम लेता है।

वातप्रकृति ( विषादी ) – सुमित पाठों के दौरान चुपचाप, एक ही स्थिति में बैठा और हाथों में कोई चीज़ लिए उलटता-पुलटता रहता है। उसकी मनोदशा मामूली-सी वजह से भी बदल सकती है। वह बड़ा संवेदनशील है। एक बार शिक्षक ने उसे दूसरी जगह पर बैठने को कहा, यह उसे अच्छा न लगा और वह बहुत देर तक इसके बारे में सोचता रहा और सारे दिन परेशान और उदास रहा। दूसरी ओर, उसमें भावनाएं धीरे-धीरे ही जागृत होती हैं। सर्कस में वह काफ़ी समय तक चुपचाप , भावशून्य बैठा रहता है, फिर धीरे-धीरे चेहरे पर मुस्कान उभरती है और वह हंसने तथा पडौ़सियों से बातें करने लगता है। वह बड़ी जल्दी घबड़ा जाता है। वह अपनी भावनाओं को मुश्किल से ही प्रकट होने देता है। कम अंक मिलने पर वह चुपचाप, चेहरे के भाव में कोई परिवर्तन लाए बिना अपनी जगह पर जाकर बैठ जाता है, मगर जब घर पहुंचता है, तो देर तक शांत नहीं हो पाता। प्रश्नों के उत्तर झिझकते-झिझकते और रुकते-रुकते देता है। अपनी योग्यताओं और ज्ञान के बारे में कोई ऊंची राय नहीं रखता, हालांकि उनका स्तर सामान्य से ऊंचा ही है। कठिनाइयों से विचलित हो जाता है और अक्सर काम को अंत तक पूरा नहीं कर पाता।

श्लैष्मिक प्रकृति ( शीतस्वभाव ) – सुधीर मंदगति और शांत लड़का है। उत्तर अच्छी तरह जानने पर भी विलंब से और बिना किसी उत्साह के देता है। वह अतिरिक्त दिमाग़ी मेहनत से कतराता नहीं और चाहे कितनी भी देर तक काम करे, कभी थकता नहीं है। वह बोलते समय आवाज़ एक सी बनाए रखता है, अपनी बात को विस्तार से और लंबे-चौडें तर्कों के साथ पेश करना पसंद करता है। वह बाहर से सदा शांत बना रहता है और कक्षा की कोई भी घटना उसे चकित नहीं करती। उसे गणित और शारीरिक व्यायाम के पाठ शुरु से ही पसंद थे, और आज भी लगाव बना हुआ है। वह खेलकूद प्रतियोगिताओं में भाग लेता है, पर अन्य अधिकांश बच्चों जैसे अतिशय जोश और उत्तेजना का प्रदर्शन नहीं करता। किसी ने उसे कभी तमाशा करते, खुलकर हंसते-खेलते या परेशान होते नहीं देखा है।

स्वभावो के इन भेदों के पीछे उच्चतर तंत्रिका-तंत्र के जन्मजात गुणधर्म और तंत्रिका-सक्रियताओं के वैयक्तिक विकास के दौरान उत्पन्न हुए भेद हैं।


इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

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