इच्छाशक्ति और जोखिम

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने व्यक्तित्व के संवेगात्मक-संकल्पनात्मक क्षेत्रों को समझने की कड़ी के रूप में इच्छाशक्ति की संकल्पना को आगे बढ़ाते हुए नियतत्ववाद और “इच्छा-स्वातंत्र्य” पर चर्चा की थी, इस बार हम इच्छाशक्ति और जोखिम के अंतर्संबंधों को समझेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय  अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


इच्छाशक्ति और जोखिम
( will and risk )

जोखिमभरी स्थिति ( risky situations ) में मनुष्य का व्यवहार उसकी इच्छाशक्ति ( will power, volition ) का एक सबसे अचूक सूचक ( indicator ) है।

जोखिम ( risk ) उस स्थिति में सक्रियता का एक आवश्यक पहलू है, जब कर्ता परिणाम ( result ) के बारे में अनिश्चित होता है और उसे लगता है कि असफलता ( failure ) की सूरत में उसे प्रतिकूल परिणाम ( adverse results ) भुगतने पड़ सकते हैं ( दंड, पीड़ा, चोट, प्रतिष्ठा-हानि, आदि )। जोखिमभरी स्थिति में अपेक्षित हानि ( expected loss ), असफलता की संभाव्यता पर और व्यक्ति के लिए जो ख़तरा उत्पन्न हो सकता है, उसपर निर्भर होती है। स्वाभाविकतः प्रश्न उठता है : यदि सफलता पाने के अवसर कम हैं और असफलता के लिए भारी दंड मिलेगा, तो मनुष्य को जोखिम उठाने को क्या विवश करता है? मनोविज्ञान जोखिमभरी स्थिति के एक अनिवार्य मानसिक घटक के नाते इच्छाशक्ति द्वारा शासित जोखिमी व्यवहार के दो परस्परसंबंध कारण या अभिप्रेरक ( motivator ) बताता है।

जोखिम के लिए पहला अभिप्रेरक और इसलिए जोखिम का पहला रूप भी सफलता की प्रत्याशा ( anticipation ) पर आधारित है, जिसका परिणाम असफलता की सूरत में होनेवाली संभावित हानि की मात्रा से अधिक होता है। ( स्थितिपरक जोखिम situational risk )। सफलता की आकांक्षा, विफलता से बचने की इच्छा से अधिक बलवती सिद्ध होती है। यदि हम ध्यान में रखें कि दैनंदिन जीवन में यह संबंध उलट सकता है ( विफलता से बचने की इच्छा सफलता की आकांक्षा से अधिक बलवती निकल सकती है ), तो हमें स्वीकार करना होगा कि निर्णय लेने की प्रक्रिया में जोखिम एक प्रमुख स्थान रखता है। परंतु इस प्रकार का व्यवहार अनोखा नहीं है, यद्यपि इसके लिए संकल्पमूलक निर्णय लेना आवश्यक है।

मनोविज्ञानी उचित और अनुचित जोखिम के बीच अंतर करते हैं। जोखिमभरी स्थिति का परिणाम कितना भी अनिश्चित क्यों न हो, अनुचित जोखिम के विपरीत, उचित जोखिम में यह जरूरी होता है कि संकल्पमूलक निर्णय के सभी पहलुओं के बारे में, जोखिमभरे व्यवहार के पीछे जो अभिप्रेरक हैं, उनकी नैतिक तथा वैचारिक एकता के बारे में और अपेक्षाकृत निरापद पसंद के मुक़ाबले ख़तरनाक पसंद के लाभ के बारे में अच्छी तरह सोच-विचार कर लिया जाए। ऐसी भी स्थितियां हो सकती हैं जिनमें परिणाम संयोग ( “चित्त या पट”) पर या इसके विपरीत मनुष्य के वैयक्तिक गुणों ( योग्यताओं, अध्यवसाय diligence, कौशल skill, आदि ) पर निर्भर होता है। यह पाया गया है कि अन्य बातें समान होने पर लोग उन स्थितियों में कहीं अधिक जोखिम उठाने को तैयार रहते हैं, जिनमें परिणाम संयोग के बजाए मनुष्य की अपनी योग्यताओं, कौशलों और आदतों पर निर्भर होता है

जोखिमी पसंद का दूसरा अभिप्रेरक और जोखिम का दूसरा रूप व्यक्ति की तथाकथित स्थिति-निरपेक्ष क्रियाशीलता से, उसकी दत्त स्थिति की अपेक्षाओं से ऊपर उठ पाने और अपने लिए आरंभिक कार्यभार ( assignments ) से ज़्यादा ऊंचे लक्ष्य निर्धारित करने की योग्यता से पैदा होते हैं। प्रयोगों में जोखिममापी नामक एक विशेष उपकरण की मदद से प्रकट किए गए जोखिम के दूसरे रूपभेद को “स्थिति-निरपेक्ष“, “निःस्वार्थ” अथवा “जोखिम की ख़ातिर जोखिम” की संज्ञा दी गई है।

कुछ लोगों को एक निश्चित प्रायोगिक क्षेत्र में ख़ुद अपने द्वारा चुने गए निशानों पर मार करने का काम दिया गया। किंतु उन्हें चेतावनी दे दी गई कि क्षेत्र में एक ख़तरनाक जगह है और उसपर मार करने से दंड मिल सकता है। पाया गया कि कुछ लोगों ने अपने निशाने उस ख़तरनाक जगह के आसपास ही चुने और इस तरह जान-बूझकर दंड का जोखिम उठाया, जबकि दूसरों ने निषिद्ध जगह से दूर के निशाने चुनकर ऐसे जोखिम से बचने का प्रयत्न किया। प्रयोग की कई बार पुनरावृत्ति और उसके डिज़ायन में परिवर्तनों से प्रयोगकर्ता इस निष्कर्ष पर पहुंचे पहले समूह के लोगों में निःस्वार्थ जोखिम के लिए परिस्थितिवश विकसित हुआ स्वाभाविक झुकाव था।

बाद के अध्ययनों ने दिखाया कि जोखिम की ख़ातिर जोखिम उठानेवाले, ऊंचाई पर काम करनेवाले निर्माण-मज़दूरों, मोटर-साइकिल के खेल के शौक़ीनों, उच्च-वोल्टता बिजली लाइनें बनानेवालों और उन पर काम करने वालों, आदि के बीच ज़्यादा मिलते हैं।

प्रयोगों ने यह भी दिखाया कि स्थितिमूलक जोखिम उठानेवालों में जोखिम की ख़ातिर जोखिम के लिए ज़्यादा झुकाव होता है। इसके विपरीत जिन लोगों ने प्रयोगों के दौरान निःस्वार्थ जोखिम की क्षमता नहीं दिखायी, वे सामान्यतः उस स्थिति में भी जोखिम उठाने को तैयार नहीं थे, जिसमें अपेक्षित लाभ और संभावित हानि बराबर-बराबर थे। निःस्वार्थ जोखिम के लिए रुझान, जिसे मनोवैज्ञानिक प्रयोग द्वारा, यानि अल्पकालिक जांच द्वारा प्रकट किया जा सकता है, दिखाता है कि वैसा मनुष्य वास्तविक ख़तरेवाली स्थिति में भी संकल्पात्मक क्रियाएं करने की क्षमता रखता है। इस तरह जोखिममापी की मदद से, एक दमकल दल का मुखिया अपने लोगों में काम का इष्टतम वितरण कर सकता है, जिसमें जोखिम उठाने का झुकाव नहीं है, उन्हें सहायक कामों में और जो जोखिम के लिए झुकाव रखते हैं, उन्हें सीधे आग से लड़ने के काम में लगाया जा सकता है।

दृढ़ इच्छाशक्ति और निःस्वार्थ जोखिम के लिए क्षमता एक ही चीज़ नहीं है। प्रयोग दिखाते हैं कि दमकल दल के जोखिम उठाने को तैयार लोगों को जब सहायक कामों पर लगाया जाता है, तो वे उनमें कोई ज़्यादा सफल नहीं रहते। रोजमर्रा का काम, जो कभी-कभी बड़ा कठिन तथा नीरस होता है, कठोर परिश्रम और दृढ़ इच्छाशक्ति के प्रयोग की अपेक्षा करता है। अध्यवसाय, धेर्य, निर्देशों का ईमानदारी से पालन, आदि संकल्पमूलक गुण ख़तरे का सामना करने के लिए आवश्यक गुणों से भिन्न होने पर भी समाज के लिए कम मूल्यवान नहीं है।


इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

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2 टिप्पणियाँ (+add yours?)

  1. Dineshrai Dwivedi
    अक्टूबर 30, 2011 @ 17:44:19

    जानते हुए भी जोखिम उठाता है मनुष्य। शायद यह खंड अधिक विस्तार चाहता है।

    प्रतिक्रिया

  2. Ratan Singh Shekhawat
    अक्टूबर 31, 2011 @ 01:54:28

    ज्ञानवर्धक आलेख Gyan DarpanRajputsParinay

    प्रतिक्रिया

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