नियतत्ववाद और "इच्छा-स्वातंत्र्य"

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने व्यक्तित्व के संवेगात्मक-संकल्पनात्मक क्षेत्रों को समझने की कड़ी के रूप में इच्छाशक्ति की संकल्पना को समझा था, इस बार हम इसी को आगे बढ़ाते हुए नियतत्ववाद और “इच्छा-स्वातंत्र्य” पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय  अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


नियतत्ववाद और “इच्छा-स्वातंत्र्य”
( determinism and freedom of will )

प्रत्ययवादीया भाववादी ( idealistic ) दर्शन तथा मनोविज्ञान में इच्छा को एक अलौकिक, समाज-निरपेक्ष,यानि अनियत शक्ति बताया जाता है, जो मानो मनुष्य की कोई कार्य आरंभ वसंपन्न करने की क्षमता का स्रोत है। इस संकल्पना में सारी मानसिक सक्रियताको इच्छाशक्ति का कार्य और स्वयं इच्छाशक्ति को क्रियाशीलता का अचेतन परमस्रोत समझा जाता है। इसी तरह कुछ मशहूर भाववादी मनोविज्ञानियों ने भी किसी भीक्रिया में सर्वोच्च भूमिका पूर्णतः स्वतंत्र इच्छागत निर्णय की मानी थी।यह तो कुछ ऐसा कहने के समान है कि मनुष्य अपने से कहता है, ‘ऐसा हो !’, औरजो उसने चाहा था, हो जाता है। दूसरे शब्दों में , जैसे कि इस रहस्यमय परमतत्व के अलावा और किसी चीज़ की ज़रूरत नहीं है।

वास्तव में मनुष्य के कार्य तथा व्यवहार यथार्थ की उपज( yield of reality ) होते हैं। अभिप्रेरकों को और संकल्पात्मक क्रियाओं को भी, वे बाह्य प्रभावजन्म देते हैं, जिन्होंने पहले की सक्रियताओं और परिवेश से अन्योन्यक्रिया( mutual action ) के दौरान मनुष्य के मस्तिष्क पर अपनी छाप छोड़ी थी। किंतु संकल्पात्मकक्रियाओं के नियतत्व ( कारणसापेक्षता ) का यह अर्थ नहीं है कि मनुष्य काएक निश्चित तरीक़े से ही काम करना पूर्वनियत है, कि उसे चुनने की कोईस्वतंत्रता नहीं है और वह अपने कार्यों के अवश्यंभावी स्वरूप का हवालादेकर स्वयं उत्तरदायित्व ( responsibility ) से बच सकता है।

मनुष्य कोई भी संकल्पात्मकक्रिया एक व्यक्ति के तौर पर करता है और इसलिए चह उसके परिणामों के लिएउत्तरदायी भी होता है। मनुष्य का संकल्पमूलक व्यवहार, उसकी क्रियाशीलता कीसामाजिक संबंधों की एक निश्चित संबंधों की एक निश्चित पद्धति पर निर्भर एकउच्चतर अवस्था है, जिसकी विशेषता मनुष्य की ज्ञान के आधार पर निर्णय लेनेकी योग्यता है। मनुष्य की क्रियाशीलता और विशेषतः उसकी इच्छाशक्ति कर्मका रूप ले लेती है, जो सक्रियता का एक सामाजिकतः सार्थक परिणाम है, ऐसापरिणाम कि जिसके लिए मनुष्य तब भी उत्तरदायी होता है, जब वह उसके आरंभिकइरादों की सीमा से बाहर निकल जाता है।

दूसरे व्यक्ति को उसकीसमस्याओं के हल में मदद देकर मनुष्य प्रशंसनीय काम करता है। वह दूसरेमनुष्य के जीवन में अपनी भूमिका से अनभिज्ञ ( unaware ) हो सकता है, फिर भी उसे उदात्तकार्य के हितकर परिणामों के लिए श्रेय दिया ही जाना चाहिए। इसी तरह यदिकोई आदमी किसी अन्य को बिला वज़ह हानि पहुंचाता है, उसकी आवश्यकताओं कीतुष्टि में बाधा डालता है, तो वह बुरा काम करता है और इसके लिए वह उस सूरतमें उत्तरदायी होता है, अगर वह इसके परिणामों का पूर्वानुमान कर सकता थाया अगर ऐसा पूर्वानुमान कर लेना उसका कर्तव्य था। जब मनुष्य किसी कर्मद्वारा अन्य लोगों के जीवन, व्यवहार तथा चेतना में परिवर्तन लाता है, तोऐसा वह नेक अथवा बुरी इच्छा के वाहक के तौर पर करता है और इसलिए प्रशंसाअथवा निंदा का पात्र बनता है।

लोग अपने कामों  के लिए किसेउत्तरदायी ( responsible ) ठहराते हैं ( मनोविज्ञान में इसे ‘नियंत्रण का स्थान-निर्धारण’,‘कन्ट्रोल लोकेलाइज़ेशन’ कहा जाता है ), इसके अनुसार उन्हें दो कोटियों मेंबांटा जा सकता है। अपने व्यवहार को बाह्य कारणों ( भाग्य, परिस्थितियों,संयोग, आदि ) का परिणाम माननेवालों को ‘बाह्य स्थान-निर्धारण’ शीर्ष केअंतर्गत रखा जाता है। जो प्राप्त परिणामों को अपने प्रयासों या योग्यता काफल समझते हैं, वे ‘नियंत्रण का आंतरिक स्थान-निर्धारण’ शीर्ष के अंतर्गतआते हैं।

पहली कोटि में आनेवाले बच्चे अपने कम अंक पाने के लिएअपनी लापरवाही के सिवाय और किसी भी चीज़ को जिम्मेदार ठहरा देते हैं ( सवालठीक नहीं लिखा गया था, किसी ने ग़लत हल बताया, मेहमानों ने पढ़ने नहीं दिया,पुस्तक में इस बारे में नहीं था, वग़ैरह )। अनुसंधानों ने दिखाया है कि ऐसीबाह्य स्थान-निर्धारण की प्रवृत्ति का कारण चरित्र के उत्तरदायित्वहीनता ( irresponsibility ),अपनी योग्यताओं में विश्वास का अभाव, दुश्चिंता, इरादों का क्रियान्वयनस्थगित करने की आदत, आदि लक्षण होते हैं।

इसके विपरीत जो मनुष्यसामान्यतः अपने कार्यों के लिए अपने को उत्तरदायी ठहराता है और उनकी सफलताया असफलता का स्रोत अपने चरित्र, अपनी योग्यताओं अथवा उनके अभाव में देखताहै, उसके बारे में उचित ही कहा जा सकता है कि उसमें नियंत्रण के आंतरिकस्थान-निर्धारण की क्षमता है। नियंत्रण का आंतरिक स्थान-निर्धारण करनेवालाछात्र यदि कम अंक पाता है, तो बहुत करके वह इसका कारण अपनी ओर से विषय मेंरुचि का अभाव, भुलक्कड़पन, ध्यान कहीं और होना बताएगा। यह स्थापित किया जाचुका है कि इस तरह के मनुष्यों में गहन उत्तरदायित्व-बोध, बड़ी लगन,आत्म-परीक्षा की प्रवृत्ति, मिलनसारी और स्वतंत्रता होती है।

संकल्पात्मककार्यों के नियंत्रण का आंतरिक या बाह्य स्थान-निर्धारण, जिसके सकारात्मकऔर नकारात्मक, दोनों ही तरह के सामाजिक परिणाम निकलते हैं, शिक्षा तथापालन की प्रक्रिया में विकास करनेवाली स्थिर चरित्रगत विशेषता है


इस बार इतना ही।

जाहिरहै, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओंके द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकताहै।

शुक्रिया।

समय

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1 टिप्पणी (+add yours?)

  1. चंदन कुमार मिश्र
    नवम्बर 02, 2011 @ 19:05:29

    हाँ, ऐसा पहले लगता था कई बार कि परीक्षा में कम अंक के लिए दूसरे ही जिम्मेदार हैं…जब छोटी कक्षाओं में था…वैसे हम यह भी मान सकते हैं कि ऐसी भावना यानी उत्तरदायित्वहीनता के कारण हमारी शिक्षा व्यवस्था, शिक्षकों का स्वभाव, सरकार का शिक्षा पर प्रभाव और नियंत्रण आदि के कारण पनपती है या पल्लवित होती है…

    प्रतिक्रिया

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