इच्छाशक्ति ( volition, will power )

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने व्यक्तित्व के संवेगात्मक-संकल्पनात्मक क्षेत्रों को समझने की कड़ी के रूप में इच्छाशक्ति की संकल्पना को समझने की शुरुआत ऐच्छिक और संकल्पात्मक क्रियाओं पर चर्चा से की थी, इस बार हम इच्छाशक्ति की संकल्पना पर चर्चा को आगे बढ़ाएंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय  अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


इच्छाशक्ति ( volition, will power )
व्यक्ति की क्रियाशीलता का एक रूप

इच्छाशक्ति,मनुष्य द्वारा अपनी सक्रियता और व्यवहार का सचेतन संगठन व स्वतःनियमन है,ताकि निर्धारित लक्ष्यों की प्राप्ति में सामने आनेवाली कठिनाइयों को लांघाजा सकेइच्छाशक्तिमनुष्य की क्रियाशीलता का एक विशिष्ट रूप और स्वेच्छा से निर्धारितलक्ष्यों द्वारा निदेशित उसके व्यवहार के संगठन का एक प्रकार है।इच्छाशक्ति की उत्पत्ति श्रम के दौरान होती है, जब मनुष्य प्रकृति केनियमों का ज्ञान प्राप्त करता है और इस तरह उसे अपनी आवश्यकताओं के अनुसारबदलता है।

इच्छाशक्ति दो परस्परसंबद्ध कार्य करती है : अभिप्रेरणात्मक ( motivational ) और प्रावरोधात्मक ( prohibitory )।

अभिप्रेरणात्मक कार्य का मूल मनुष्य की क्रियाशीलता में है। प्रतिक्रियाशीलता ( reactivity ) केविपरीत, जब मनुष्य की क्रिया पूर्ववर्ती स्थिति पर निर्भर होती है ( बुलाएजाने पर मुड़कर देखना, अपनी ओर फेंकी गई गेंद को वापस फेंकना, बेहूदी बातपर नाराज़ होना, वगै़रह ), क्रियाशीलताक्रिया को जन्म मनुष्य की आंतरिक अवस्थाओं के विशिष्ट स्वरूप के कारण देतीहै, जो अपने को क्रिया के निष्पादन ( execution ) के क्षण में प्रकट करती है ( उदाहरण केलिए, आवश्यक सूचना पाने के लिए मनुष्य अपने साथी को बुलाता है, या अच्छीमनःस्थिति में न होने के कारण बेहूदगी से बात करता है, वगै़रह )।

क्षेत्र व्यवहारके विपरीत, जिसकी विशेषता अनैच्छिकता है, क्रियाशीलता में संकल्प का तत्वहोता है, यानि वह किसी सचेतन लक्ष्य की ओर निर्दिष्ट ( directed ) होती है। क्रियाशीलताका वर्तमान स्थिति द्वारा, इसकी मांगों को पूरा करने और निर्धारित सीमाओंके भीतर काम करने की इच्छा द्वारा उत्प्रेरित होना आवश्यक नहीं है। इसकास्वरूप स्थिति-निरपेक्ष होताहै, यानि वह आरंभिक लक्ष्यों की सीमाओं को लांघती है और उसमें मनुष्य कीदत्त स्थिति की अपेक्षाओं के सार से ऊपर उठने तथा आरंभिक लक्ष्यों से ऊंचेलक्ष्य रखने की योग्यता ( उदाहरणार्थ, ‘जोखिम के लिए जोखिम उठाना’,सृजनात्मक उत्साह, आदि ) महत्त्व रखती है।

मनुष्य की सामाजिकक्रियाशीलता की एक अभिव्यक्ति उसका सामान्य कर्तव्य-बोध से ऊपर उठकर ऐसेकार्यकलाप में प्रवृत्त होना है, जो उसके अपने लिए आवश्यक नहीं है ( यदिउसे वह नहीं करता है, तो कोई इसके लिए उसपर उंगली नहीं उठाएगा ), मगर जोसामाजिक अपेक्षाओं के अनुरूप है।

संकल्पात्मक प्रक्रियाओं ( volitive processes ) की एक औरविशेषता है, जो इच्छाशक्ति के अभिप्रेरणात्मक कार्य के रूप में सामने आतीहै। यदि मनुष्य के लिए कोई ऐसा कार्य करना तत्काल ज़रूरी नहीं है, जिसकीवस्तुपरक आवश्यकता ( objective need ) को वह समझता है, तो इच्छाशक्ति कुछ अतिरिक्त अभिप्रेरण ( motive )पैदा कर देती है, जो उस कार्य के अर्थ को बदल देते हैं और मनुष्य को उसकेपरिणामों का पूर्वानुमान लगाने को प्रेरित करके उसे और अधिक महत्त्वपूर्णबना डालते हैं। उदाहरण के लिए, एक स्कूल की बालीबाल की टीम का कप्तान यदिथका हुआ है, तो अपनी बची-खुची ताक़त जुटाकर अभ्यास के लिए शहर के दूसरे छोरपर स्थित जिम में जाने में वह कठिनाई महसूस कर सकता है। फिर भी जब वहसोचता है कि उसकी टीम की की सफलता और उसके स्कूल की प्रतिष्ठा उसकी कप्तानके रूप में तैयारी पर निर्भर है, तो वह अपनी सारी इच्छाशक्ति जुटा लेता हैऔर कठिन कार्य के लिए एक अतिरिक्त अभिप्रेरक पैदा कर डालता है।

इच्छाशक्ति का प्रावरोधात्मक कार्यअभिप्रेरणात्मक कार्य से एकता बनाए रखते हुए अपने को क्रियाशीलता कीअवांछित अभिव्यक्तियों को रोकने में प्रकट करता है। मनुष्य सामान्यतः अपनेअभिप्रेरकों और कार्यों पर अंकुश लगा लेता है, जो उसके विश्व-दृष्टिकोण,विचारों और विश्वासों से मेल नहीं खाते। अवरोध के बिना व्यवहार का नियमनअसंभव होता। ‘प्रावरोधात्मक आदतों’ का विकास परिपक्व और सुरुचीपूर्णव्यक्तित्व के निर्माण के लिए एक आवश्यक शर्त है। शिक्षकों को बच्चों मेंअपनी अति-चंचलता, बातूनीपन और शोर-शराबे को नियंत्रित करने की क्षमताविकसित करनी चाहिए। यह नियंत्रण बच्चे के शरीर के लिए उपयोगी है, सुरुचिका सूचक है और सामूहिक जीवन की अपेक्षाओं के अनुकूल है।

मनुष्य कीकार्य करने की प्रेरणा बुनियादी आवश्यकताओं ( भोजन, वस्त्र तथा आवास ) सेलेकर नैतिक, सौंदर्यात्मक तथा बौद्धिक आवश्यकताओं तक विभिन्न अभिप्रेरकों के सोपानतंत्रका प्रतिनिधित्व करती है। इच्छाशक्ति का प्रयोग करके मनुष्य अपने निम्नतरअभिप्रेरकों पर, जिनमें कुछ जीवनावश्यक अभिप्रेरक भी हैं, अंकुश लगाता हैऔर उच्चतर अभिप्रेरकों को बढ़ावा देता है। अभिप्रेरणात्मक और प्रावरोधात्मक कार्यों की एकता की बदौलत इच्छाशक्ति मनुष्य को लक्ष्य-प्राप्ति में आड़े आनेवाली कठिनाइयों पर विजय पाने में समर्थ बनाती है।


इस बार इतना ही।

जाहिरहै, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओंके द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकताहै।

शुक्रिया।

समय

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3 टिप्पणियाँ (+add yours?)

  1. रेखा
    अक्टूबर 15, 2011 @ 13:53:38

    अभिप्रेरणात्मक और प्रावरोधात्मक कार्यों की एकता की बदौलत इच्छाशक्ति मनुष्य को लक्ष्य-प्राप्ति में आड़े आनेवाली कठिनाइयों पर विजय पाने में समर्थ बनाती है।सार्थक चिंतन ….

    प्रतिक्रिया

  2. रविकर
    अक्टूबर 15, 2011 @ 14:10:19

    बहुत बढ़िया प्रस्तुति ||शुभ-कामनाएं ||http://neemnimbouri.blogspot.com/2011/10/blog-post_15.html

    प्रतिक्रिया

  3. दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi
    अक्टूबर 15, 2011 @ 15:05:30

    कुछ बेहतर बातें और समझीं।

    प्रतिक्रिया

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