ऐच्छिक और संकल्पात्मक क्रियाएं

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने व्यक्तित्व के संवेगात्मक-संकल्पनात्मक क्षेत्रों को समझने की कड़ी के रूप में प्रेम की भावना पर विचार किया था, इस बार हम इच्छाशक्ति की संकल्पना को समझने की शुरुआत ऐच्छिक और संकल्पात्मक क्रियाओं पर चर्चा से करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय  अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


ऐच्छिक और संकल्पात्मक क्रियाएं
( voluntary and volitive actions )

मनुष्य की सक्रियता किन्हीं निश्चित लक्ष्य की पूर्ति की ओर लक्षित,परस्परसंबद्ध क्रमानुवर्ती क्रियाओं की पद्धति है। क्रियाओं का उद्देश्यएक निश्चित परिणाम प्राप्त करना है, जो संबंधित सक्रियता का अभीष्ट लक्ष्यहोता है या ऐसा प्रतीत होता है। उदाहरण के लिए, जब हम कोई वृक्ष लगातेहैं, अर्थात उसके लिए एक निश्चित गहराई का गड्ढ़ा खोदते है, उसमें खादडालते हैं, बीच में डंडा गाड़ते हैं, फिर गड्ढ़े में पौधा रोपकर उसकी जड़ोंपर अच्छी तरह मिट्टी जमाकर उसे डंडे के सहारे खड़ा करते हैं वग़ैरह, तो हमअपने लक्ष्य को पाने के लिए एक निश्चित योजना के अनुसार काम करते हैं। कामके दौरान यह योजना विचारों तथा परिकल्पनों ( बिंबों ) के एक क्रम के रूप में सामने आती है और अलग-अलग बल, वेग, विस्तार, समन्वय और सुतथ्यतावाली गतियों के माध्यम से साकार, क्रियान्वित होती है।

निश्चितगतियां, जो मिलकर क्रिया या कार्य कहलाती हैं, और सामान्य योजना से संबद्धचिंतन की संक्रियाएं संपन्न करते हुए मनुष्य, अपना ध्यान श्रम की वस्तुतथा प्रक्रिया में प्रयुक्त उपकरणों पर संकेन्द्रित करता है। इसके साथ हीविभिन्न क्रियाएं करते हुए वह निश्चित भावनाएंभी अनुभव करता है, जैसे बाधाएं एवं कठिनाइयां सामने आने पर चिढ़ना,आवश्यकताओं की तुष्टि पर खुश होना, श्रम के लिए उत्साह, थकान, श्रम मेंआनंद पाना, इत्यादि।

सीधे क्षोभकों द्वारा निर्धारित अनैच्छिक क्रिया ( involuntary action, reflex ) के विपरीत संकल्पात्मक क्रिया ( volitive action ) समुचित साधनों ( संकेतों, मानक मूल्यों, आदि ) की मददसे, यानि किसी माध्यम के ज़रिए संपन्न की जाती हैं। इस तरह शल्यचिकित्सकपहले अपने मन में भावी आपरेशन का बिंब बनाता है और इसके बाद ही वास्तविकआपरेशन करने लगता है।

संकल्पात्मक क्रिया स्वतःनियमन( self regulation ) की मदद से की जाती है। इसकी संरचना में निम्न चीज़ेंशामिल रहती हैं : कर्ता का लक्ष्य, इस लक्ष्य को पाने के लिए की जानेवालीक्रियाओं व संक्रियाओं का कार्यक्रम, क्रियाओं की सफलता के मापदंड कानिर्धारण और उनकी वास्तविक परिणामों से तुलना, और अंत में, इस बारे मेंनिर्णय कि क्रिया को पूर्ण माना जाए या समुचित सुधार के बाद आगे जारी रखाजाए। अतः किसी भी ऐच्छिक क्रिया के स्वतःनियमन के लिए उसकी आयोजना (planning ) व निष्पादन ( execution ) पर संकल्पात्मक नियंत्रणआवश्यक होता है। व्यक्तिवृत में नियमन व नियंत्रण का कार्य आरंभ मेंवयस्कों द्वारा बच्चे के साथ संयुक्त सक्रियता एवं संप्रेषण के दौरानसंपन्न किया जाता है। बाद में सक्रियता के प्रचलित मानकों तथा संरूपों केआभ्यंतरीकरण के फलस्वरूप बच्चा अपनी क्रियाओं का स्वयं नियंत्रण करनासीखता है।

ऐच्छिक क्रियामें मनुष्य पहले यह मालूम करता है कि उसकी क्रिया के भावी परिणाम का बिंबउसकी सक्रियता के प्रयोजन ( purpose ) से, यानि जो लक्ष्य उसने स्वयं तयकिया है, उससे संगत ( compatible ) है या नहीं। इसके बाद उसकी क्रिया वैयक्तिक महत्त्व ( personal importance ) ग्रहण कर लेती है और उसकी सक्रियता के लक्ष्यके रूप में सामने आती है। सक्रियता की संरचना में ऐच्छिक क्रियाएं उसकाउच्चतर स्तर होती हैं और उनकी विशेषता होती है सचेतन लक्ष्य और उनकीप्राप्ति के लिए साधनों का सचेतन चयन। छात्र द्वारा निबंध की रूपरेखा केबारे में सोचना, सामग्री की मन में पुनरावृति, आदि ऐच्छिक क्रियाएं बिनाकिसी बाह्य चिह्नों के संपन्न की जा सकती हैं।

संकल्पात्मक क्रियाएं एक विशेष प्रकार की ऐच्छिक सक्रियता है। ऐच्छिक क्रिया के सभी लक्षणों से युक्त संकल्पात्मक क्रिया की एक मुख्य शर्त कठिनाइयों को लांघनाहै। दूसरे शब्दों में, ऐच्छिक क्रिया को हम संकल्पात्मक क्रिया तभी कहसकते हैं, जब इसकी निष्पत्ति  ( achievement ) के लिए विशेष प्रयास कियाजाता है।

संकल्पात्मक क्रियाएं कम या अधिक जटिल ( complex ) होसकती हैं। उदाहरण के लिए, नदी या तरणताल में ऊंचाई से कूदने का प्रयत्नकरनेवाले को पहले अपने तत्संबंधी भय पर विजय पानी पड़ती है। इन्हें सरल संकल्पात्मक क्रियाएं कहा जाता हैं। जटिलसंकल्पात्मक क्रियाओं में कई सारी सरल क्रियाएं शामिल होती हैं। उदाहरण केलिए, कोई कठिन धंधा सीखने का निर्णय करनेवाले नौजवान को अपना लक्ष्य पानेके लिए कई सारी अंदरूनी और बाहरी बाधाएं व कठिनाइयां लांघनी होती हैं।अपनी बारी में जटिल क्रियाएं मनुष्य की सचेतन रूप से निर्धारित निकटवर्तीतथा सुदूर लक्ष्यों की प्राप्ति की ओर लक्षित संकल्पात्मक सक्रियता मेंसम्मिलित होती हैं।

ऐसी सक्रियता मनुष्य की संकल्पात्मक विशेषताओं को, उसकी इच्छाशक्ति ( volition, will power ) को प्रकट करती है।


इस बार इतना ही।

जाहिरहै, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओंके द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकताहै।

शुक्रिया।

समय

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