मुख्य संवेगात्मक अवस्थाएं और उनकी विशेषताएं

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने व्यक्तित्व के संवेगात्मक-संकल्पनात्मक क्षेत्रों को समझने की कड़ी के रूप में भावनाओं के रूपों के अंतर्गत मनोदशा तथा खिंचाव पर विचार किया था, इस बार हम मुख्य संवेगात्मक अवस्थाएं और उनकी विशेषताओं पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय  अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


मुख्य संवेगात्मक अवस्थाएं
और उनकी मनोवैज्ञानिक विशेषताएं तथा बाह्य अभिव्यक्तियां

मनुष्य जब संवेगों ( impulses ), भावों ( sentiments ), मनोदशाओं ( moods ), और खिंचावों ( stresses ) के रूप में भावनाओं ( emotions ) को अनुभव करता है, तो सामान्यतः वह साथ ही इसके न्यूनाधिक प्रत्यक्ष संकेत( direct indications ) भी देता है। इन संकेतों में मनुष्य के हाव-भाव,मुद्राएं, बोलने का लहजा, पुतलियों का सिकुड़ना अथवा फैलना, आदि शामिल हैं।हाव-भाव अचेतन और सचेतन, दोनों प्रकार के हो सकते हैं। सचेतन हाव-भावों,मुद्राओं को संप्रेषण की प्रक्रिया में अवाचिक संप्रेषण-माध्यम के तौर परजान-बूझकर उपयोग किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, मनुष्य अपना रोषमुट्ठियां भींचकर, भौहों पर ज़ोर देते हुए देखकर या धमकाने के लहजे मेंबोलकर व्यक्त कर सकता है।

मुख्य संवेगात्मक अवस्थाएं निम्न हैं और इनमें से हरेक की अपनी मनोवैज्ञानिक विशेषताएं तथा बाह्य अभिव्यक्तियां हैं।

रुचि ( interest )( एक संवेग के तौर पर ) – यह सकारात्मक संवेगात्मक अवस्था अध्ययन, ज्ञान प्राप्ति और आदतों व कौशल ( skill ) के विकास में सहायक बनती है।

हर्ष ( joy )यह सकारात्मक संवेगात्मक अवस्था, किसी वास्तविक आवश्यकता, जो अब तकसंदिग्ध अथवा अनिश्चित थी, की पूर्ण तुष्टि की संभावना से जुड़ी हुई है।

आश्चर्य ( wonder ) यह नई परिस्थितियों के अकस्मात पैदा होने पर दिखाई जानेवाली संवेगात्मकअवस्था है, जिसका कोई निश्चित सकारात्मक या नकारात्मक प्रभाव नहीं होता।आश्चर्य पहले के सभी संवेगों को अवरुद्ध कर देता है और मनुष्य का ध्यानउसे ( आश्चर्य को ) पैदा करनेवाल वस्तु या स्थिति पर संकेंद्रित करके रुचिमें बदल सकता है।

कष्ट ( pain ) यह एक नकारात्मक संवेगावस्था है। वह मनुष्य द्वारा ऐसी प्रामाणिक ( अथवादेखने में प्रामाणिक ) सूचना पाने से पैदा होता है कि जिसने उसकी बुनियादीआवश्यकताओं की तुष्टि की आशाओं पर पानी फेर दिया है। कष्ट आम तौर परसंवेगात्मक खिंचाव का रूप लेता है और दुर्बलताकारी प्रभाव उत्पन्न करता है।

क्रोध ( anger ) यह भी नकारात्मक संवेगावस्था है, और सामान्यतः भाव का रूप लेता है। इसेमहत्त्वपूर्ण आवश्यकता की तुष्टि में पैदा होनेवाली गंभीर बाधा जन्म देतीहै। कष्ट के विपरीत क्रोध सबलताकारी प्रभाव डालता है और चाहे थोड़े समय केलिए ही सही, मनुष्य की जीवनीय शक्तियों में उभार लाता है।

विद्वेष ( rancor ) इस नकारात्मक संवेग को वे वस्तुएं, लोग, स्थितियां, आदि जन्म देते हैं,जिनसे संपर्क ( अन्योन्यक्रिया, संप्रेषण, आदि ) मनुष्य के वैचारिक, नैतिकतथा सौंदर्यबोध संबंधी सिद्धांतों व विन्यासों ( configurations ) केविरुद्ध होता है। अंतर्वैयक्तिक ( interpersonal ) संबंधों में विद्वेष,क्रोध के साथ मिलकर आक्रामक व्यवहार को जन्म दे सकता है, जिसमें आक्रमण काकारण क्रोध होता है और विद्वेष का कारण ‘किसी आदमी या वस्तु से पीछाछुड़ाने’ की इच्छा होती है।

अवमानना ( contempt ) यह नकारात्मक संवेगात्मक अवस्था अंतर्वैयक्तिक संबंधों में पैदा होती हैऔर मनुष्य के अपने सिद्धांतों, दृष्टिकोणों तथा व्यवहार की अपनी भावना केविषय बने दूसरे मनुष्य के सिद्धांतों, दृष्टिकोणों तथा व्यवहार से असंगतिका परिणाम होती है। मनुष्य को लगता है कि उसकी भावना के विषय, दूसरेमनुष्य के सिद्धांत, आदि गर्हित ( hateful ) हैं और सामन्यतः स्वीकृतनैतिक मानकों तथा सौंदर्य-मानदंड़ों से मेल नहीं खाते।

भय ( fear ) यह नकारात्मक संवेग मनुष्य द्वारा यह सूचना पाने पर पैदा होता है कि उसकीखुशहाली के लिए ख़तरा उत्पन्न हो सकता है या स्वयं उसके लिए कोई ( वास्तविकया अवास्तविक ) ख़तरा है। कष्ट के विपरीत, जो मनुष्य की बुनियादीआवश्यकताओं की तुष्टि के प्रत्यक्ष अवरोध का परिणाम होता है, भयप्राक्कल्पनात्मक ( hypothetical ) हानि की प्रत्याशा से जन्म लेता है औरमनुष्य को एक अनिश्चित ( प्रायः अतिरंजित ) पूर्वानुमान के अनुसार कार्यकरने को उकसाता है। भय में आदमी तिल का ताड़ बनाता है। भय सबलताकारी औरदुर्बलताकारी, दोनों तरह के प्रभाव डाल सकता है और खिंचाव, अवसाद तथाचिंता अथवा भाव ( संत्रास भय की चरम अभिव्यक्ति है ) का रूप ले सकता है।

लज्जा ( shame ) इस नकारात्मक संवेग के मूल में मनुष्य की यह चेतना छिपी होती है कि उसकेइरादों, कार्यों तथा रूप और उसके आसपास के लोगों के मापदंडों तथा नैतिकअपेक्षाओं के बीच, जिनसे वह भी सहमत है, संगति नहीं है।

मुख्यसंवेगावस्थाओं की उपरोक्त सूची किसी वर्गीकरण ( classification ) परआधारित नहीं है ( संवेगों की कुल संख्या बहुत बड़ी है )। उपरोक्त हर संवेगको प्रखरता के क्रम में बढ़ती हुई अवस्थाओं का सोपान कहा जा सकता है, जैसेसामान्य संतुष्टि, हर्ष, आह्लाद, उल्लास, हर्षोन्माद, आदि, अथवा संकोच,घबराहट, लज्जा, अपराध-बोध, आदि, अथवा नाराज़गी, परेशानी, कष्ट, दुख। किंतुयह सोचना ग़लत होगा कि मुख्य सकारात्मक संवेगावस्थाओं की कम संख्या (उपरोक्त नौ में से तीन ) मानव-जीवन में नकारात्मक संवेगों की प्रधानता काप्रमाण है। नकारात्मक संवेगों कीअधिकता तथा विविधता से निश्चय ही मनुष्य को अपने को ज़्यादा कारगर ढंग सेप्रतिकूल परिस्थितियों के अनुकूल ढाल पाने में मदद मिलती है, क्योंकि नकारात्मक संवेगात्मक अवस्थाएं सही व सूक्ष्म ढंग से इनके संकेत दे देती हैं।

किसीभी भावना का अनुभव सदा एकरूप नहीं होता। संवेगात्मक अवस्था में दो विरोधीभावनाएं सम्मिलित हो सकती हैं, जैसे ईर्ष्या में प्रेम तथा घृणा का संयोग( भावनाओं की द्वेधवृत्ति )।

महान प्रकृतिविज्ञानी चार्ल्स डार्विनने यह प्राक्कल्पना पेश की थी कि मनुष्य की भावनाओं के सहवर्ती हाव-भावोंका जन्म उसके पशु पूर्वजों की सहजवृत्तिक ( instinctive ) क्रियाओं से हुआथा। प्राचीन मानवाभ वानरों में ग़ुस्से के दौरान मुट्ठियां भींचने या दांतनिकालना और कुछ नहीं, बल्कि शत्रु को भयरहित दूरी पर रखनेवालेप्रतिरक्षात्मक अननुकूलित प्रतिवर्त ( unconditioned reflex ) ही हैं।

अननुकूलित प्रतिवर्तों का परिणाम होने पर भी मनुष्य की भावनाएं अपनी प्रकृति से सामाजिक हैं। मनुष्य और पशु की भावनाओं में फ़र्क़ यह है कि पहले,मनुष्य की भावनाएं उन मामलों में भी अतुलनीय रूप से जटिल होती हैं, जब वेपशुओं की भावनाओं से समानता रखती हैं। यह मनुष्यों और पशुओं में क्रोध,भय, जिज्ञासा, हर्ष, अवसाद, आदि भावनाओं की उनकी उत्पत्ति तथाअभिव्यक्तियों की दृष्टि से तुलना करने पर स्पष्ट हो जाता है।

दूसरे,मनुष्य ऐसी बहुत सारी भावनाएं अनुभव कर सकता है, जो पशुओं में नहींमिलतीं। श्रम की प्रक्रिया, राजनीतिक तथा सांस्कृतिक गतिविधियों औरपारिवारिक जीवन में लोगों के बीच बननेवाले अति विविध संबंध बहुत सारीशुद्धतः मानवीय भावनाओं को जन्म देते हैं, जैसे अवमानना, गर्व, ईर्ष्या,विजयोल्लास, ऊब, आदर, कर्तव्यबोध, आदि। इनमें से प्रत्येक भावना कीअभिव्यक्ति के अपने विशिष्ट तरीक़े हैं ( लहजे, हाव-भाव, हंसी, आंसुओं, आदिके ज़रिए )।

तीसरे, मनुष्यअपनी भावनाओं पर नियंत्रण कर सकता है, उनकी अनुचित अभिव्यक्ति को रोक सकताहै। प्रायः प्रबल तथा गंभीर संवेगों को अनुभव करनेवाले लोग बाहर से शांतरहते हैं और उदासीन होने का बहाना करते हैं, ताकि अपनी भावनाओं का पता नचलने दें। अपनी वास्तविक भावनाओं छिपाने या दबाने के लिए मनुष्य कभी-कभीउनसे बिल्कुल विपरीत भावनाएं भी प्रदर्शित कर सकता है, जैसे दुख या पीड़ामें भी मुस्कुराना, हंसने की इच्छा होने पर भी मुंह लटकाना, आदि।


इस बार इतना ही।

जाहिरहै, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओंके द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकताहै।

शुक्रिया।

समय

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1 टिप्पणी (+add yours?)

  1. सिद्धार्थ जोशी Sidharth Joshi
    सितम्बर 10, 2011 @ 17:18:40

    बहुत दिन बाद आपके ब्‍लॉग पर वापस आ पाया हूं… मनोविज्ञान के विषय को लेकर आपका उत्‍साह प्रेरणा देता है। परिभाषा के स्‍तर पर संवेग और उनकी अवस्‍थाओं की बेहतरीन प्रस्‍तुति लगी। शारीरिक तौर पर इसके क्‍या लक्षण दिखाई देते हैं… क्‍या इस पर आगे की कक्षाओं में बताया जाएगा ?

    प्रतिक्रिया

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