मनुष्य की भावनाएं और आवश्यकताएं

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने व्यक्तित्व के संवेगात्मक-संकल्पनात्मक क्षेत्रों को समझने की कड़ी के रूप में भावनाओं पर चल रही चर्चा में भावना की सामान्य कल्पना पर बात की थी, इस बार हम मनुष्य की भावनाओं और आवश्यकताओं के अंतर्संबंधों पर विचार करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय  अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


मनुष्य की भावनाएं और आवश्यकताएं

भावनाएं मनुष्य की आवश्यकताओं ( needs ) की तुष्टि करनेवाली वस्तुओं को पहचानने में मदद देती हैं, और इस तुष्टि की ओर लक्षित सक्रियता को उत्प्रेरित करती हैं। वैज्ञानिक शोध में सफलता पाने से जो हर्ष की भावना पैदा होती है, वह शोधकर्ता के काम को और सक्रिय बना डालती हैं और संज्ञानमूलक आवश्यकता की तुष्टि की प्रक्रिया को शिथिल नहीं होने देती। आवश्यकता की अभिव्यक्ति के रूप के नाते रुचि में संवेगात्मक तत्व का सदा बहुत पुट रहता है।

आत्मपरक ( subjective ) दृष्टि से भावनाएं सदा इसकी परिचायक होती हैं कि मनुष्य अपनी आवश्यकताओं की तुष्टि कैसे करता है। संप्रेषण और सक्रियता की प्रक्रिया में पैदा होनेवाली सकारात्मक ( positive ) संवेगात्मक अवस्थाएं ( हर्ष, आनंद, आदि ) मनुष्य की आवश्यकताओं की सामान्य तुष्टि की सूचक होती हैं। इसके विपरीत, अतुष्ट आवश्यकताएं नकारात्मक ( negative ) संवेगों ( लज्जा, पश्चाताप, चिंता, आदि ) को जन्म देती हैं।

कुछ मनोविज्ञानियों का विश्वास है कि संवेगात्मक अवस्थाएं मनुष्य की वास्तविक आवश्यकता की गुणता ( quality ) तथा तीव्रता ( intensity ) पर और उसकी तुष्टि की संभावना के उसके मूल्यांकन पर निर्भर होती हैं। संवेगों की प्रकृति और मूल से संबंधित इस दृष्टिकोण को संवेगों का सूचना सिद्धांत कहा गया है। इसके अनुसार मनुष्य उसकी आवश्यकता की तुष्टि के लिए जो चाहिए और आवश्यकता के पैदा होने के क्षण में जो उपलब्ध है, उनसे संबद्ध सूचनाओं की जाने या अनजाने तुलना करता है। यदि आवश्यकता की तुष्टि की आत्मपरक संभावना काफ़ी अधिक है, तो मनुष्य सकारात्मक भावनाएं अनुभव करता है। नकारात्मक भावनाएं इसलिए पैदा होती हैं कि मनुष्य को अपनी आवश्यकताओं की तुष्टि यथार्थ या कल्पित रूप में असंभव लगती हैं। संवेगों के सूचना सिद्धांत में निस्संदेह कुछ खूबियां हैं, किंतु वह व्यक्तित्व के अत्यंत विविध और समृद्ध संवेगात्मक क्षेत्र की सभी परिघटनाओं ( phenomena ) का स्पष्टीकरण नहीं दे सकता। ऐसे बहुत से संवेग हैं कि जिन्हें किसी एक ही कोटि में नहीं रखा जा सकता। उदाहरण के लिए, आश्चर्य को न तो सकारात्मक संवेगों में शामिल किया जा सकता है और न नकारात्मक संवेगों में ही।

संवेगात्मक अवस्थाओं की मुख्य विशेषता उनकी नियामक भूमिका ( regulatory role ) है। मनुष्य के अनुभव, संकेतों का कार्य करते हुए उसे उसकी आवश्यकता की तुष्टि की चालू प्रक्रिया के बारे में और उसे जो बाधाएं लांघनी हैं, जो सवाल हल करने हैं या जिन सवालों पर ध्यान देना है तथा जो चीज़ें बदली जानी हैं, उनके बारे में सूचित करते हैं। इस तरह कार्यालय में किसी अप्रिय घटना से परेशान किसी व्यक्ति ने यदि अपनी झुंझलाहट किसी कनिष्ठ सहकर्मी पर उतारी थी, तो बिल्कुल संभव है कि शांत हो जाने पर वह अपने में आत्म-नियंत्रण के अभाव पर लज्जा और पश्चाताप अनुभव करे। ये संवेग उसे अपनी ग़लतियां सुधारने और सहकर्मी को यह जताने कि उसे अपने यों तैश में आ जाने पर अफ़सोस है, यानि कि सहकर्मी से द्वंद-स्थिति के वस्तुपरक मूल्यांकन के आधार पर संबंध बनाने के लिए प्रेरित करेंगे।

संवेग, घटनाओं के अनुकूल या प्रतिकूल मोड़ और वस्तुसापेक्ष तथा अंतर्वैयक्तिक संबंधों की पद्धति में कर्ता की स्थिति की निश्चितता की मात्रा के बारे में बताते हैं और इस तरह संप्रेषण तथा सक्रियता के दौरान उसके व्यवहार के लिए दिशा-निर्देश प्रदान करते हैं।

भावनाएं, यथार्थ ( reality ) के परावर्तन ( reflection ) का एक विशिष्ट रूप हैं। संज्ञानात्मक प्रक्रियाओं के विपरीत, जो यथार्थ की वस्तुओं और परिघटनाओं को परावर्तित करती हैं, भावनाएं कर्ता तथा उसकी विशिष्ट आवश्यकताओं और यथार्थ की वस्तुओं व परिघटनाओं ( जिनका वह ज्ञान अथवा रूपांतरण करता है ) के बीच मौजूदा संबंधों ( relations ) का परावर्तन करती हैं।

इसकी एक सरल-सी मिसाल दें। जब किसी उद्यम का एक कार्मिक सुनता है कि किसी दूसरे देश के उसी के जैसे उद्यमों में वेतन की कटौती की जा रही है, तो यह सूचना उसे दिलचस्प लग सकती है और वह उसका कारण जानने की कोशिश कर सकता है। किंतु यदि उसी कार्मिक को बताया जाता है कि किसी नये आदेश के अनुसार उसके अपने ही उद्यम में उसके वेतन में थोड़ी कमी की जा रही है, तो यह समाचार उसमें निश्चित ही प्रबल संवेगात्मक प्रतिक्रिया पैदा करेगा।

उसकी यह प्रतिक्रिया उसकी आवश्यकताओं ( समुचित जीवनयापन परिस्थितियों के निर्माण ) और इनके विषय ( इन जीवनयापन परिस्थितियों के निर्माण के लिए आवश्यक वेतन ) के बीच संबंध बदलने का परिणाम होगी।



इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

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1 टिप्पणी (+add yours?)

  1. दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi
    अगस्त 13, 2011 @ 17:54:45

    अपनी भावनाएँ टटोल रहे हैं।

    प्रतिक्रिया

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