भावनाओं के रूप – संवेग तथा भाव

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने व्यक्तित्व के संवेगात्मक-संकल्पनात्मक क्षेत्रों को समझने की कड़ी के रूप में भावनाओं के शरीरक्रियात्मक आधारों पर विचार किया था, इस बार हम भावनाओं के विभिन्न रूपों पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय  अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


भावनाओं के रूप

भावना को किसी भी मानसिक प्रक्रिया ( mental process ) के अप्रिय, प्रिय अथवा मिश्रित अनुषंगी ( fringe, subsidiary ) के रूप में अनुभव किया जाता है। वह मनुष्य की चेतना में स्वयं अपने रूप में नहीं, अपितु वस्तुओं अथवा क्रियाओं के एक गुण के रूप में प्रवेश करती है ( इसी कारण हम कहते हैं : ‘प्रिय आदमी’, ‘अप्रिय स्वाद’, ‘डरावना सांड’, ‘हास्यजनक मुद्रा’, ‘कोमल पत्तियां’, ‘सुखद सैर’, वग़ैरह )। प्रायः यह ऐंद्रिय अनुषंगी ( sensual subsidiary ) और कुछ नहीं, बल्कि विगत संवेगात्मक अनुभवों की एक गूंज है। कभी-कभी यह मनुष्य की किसी वस्तु से तुष्टि की मात्रा ( level or degree of satisfaction ) या उसकी सक्रियता की सामान्य दिशा ( सफलता अथवा विफलता ) का परिचायक भी होता है। उदाहरण के लिए, एक ही ज्यामितीय प्रश्न को हल करते हुए मनुष्य उसमें सफलता या असफलता के अनुसार अलग-अलग तरह की भावनाएं अनुभव कर सकता है।

आवश्यकताओं की तुष्टि अथवा अतुष्टि से पैदा होने वाली विशिष्ट भावनाएं अलग-अलग रूप लेती हैं, जैसे संवेग ( impulse ), भाव ( sentiments ), मनोदशाएं ( moods ), खिंचाव ( stress ) की अवस्थाएं और शब्द के संकीर्ण अर्थ में स्वयं भावनाएं ( अनुभूतियां )( emotions, feelings )।

संवेग ( Impulse )

संवेग’ और ‘भावना’ शब्दों को कभी-कभी पर्यायों ( synonymous ) के तौर पर प्रयोग किया जाता है। संकीर्णतर अर्थ में संवेग को किसी अधिक स्थायी भावना की प्रत्यक्ष अल्पकालिक अवस्था के रूप में परिभाषित किया जा सकता है।  उदाहरण के लिए, किसी मनुष्य के एक स्थायी गुण के तौर पर संगीत के प्रति प्रेम की भावना संवेग नहीं है, किंतु वही मनुष्य जब किसी कंसर्ट में अच्छा संगीत सुनते हुए जो आनंद और उल्लास अनुभव करता है, उस आनंद और उल्लास की अवस्था संवेग है। वही भावना, क्षोभ ( indignation ) के नकारात्मक संवेग के रूप में भी अनुभव की जा सकती है, जब अच्छे संगीत को बुरे ढंग से पेश किया जाता है। एक भावना के तौर पर, अर्थात निश्चित वस्तुओं, उनके संयोजनों अथवा महत्त्वपूर्ण स्थितियों के प्रति एक निश्चित, विशिष्ट रवैये ( attitude ) के तौर पर भय को विभिन्न संवेगात्मक प्रक्रियाओं में अनुभव किया जा सकता है : कभी मनुष्य डरावनी चीज़ को देखकर भाग जाता है, कभी वह जहां का तहां जड़ हो जाता है और कभी अन्य कोई उपाय न देखकर सीधे खतरे से जा टकराता है।

कुछ मामलों में, संवेगों में ओजस्विता होती है, वे मनुष्य को कार्य करने, निर्भीक बातें कहने को प्रेरित करती हैं और उसकी शक्ति बढ़ाती हैं। ऐसे संवेगों को सबल संवेग ( strong impulse ) कहा जाता है। अति प्रसन्न आदमी मुश्किल में पड़े मित्र की मदद के लिए ज़मीन आसमान एक करने को तैयार रहता है। सबल संवेग मनुष्य को कार्य करने को प्रेरित करता है। ऐसा मनुष्य निष्क्रिय नहीं बैठ सकता। इनके विपरीत क़िस्म के संवेग, जिन्हें दुर्बल संवेग ( weak impulse ) कहा जाता है, मनुष्य को क्षीण बनाते हैं और उसे उदासीनता, निराशा तथा निष्क्रियता के गर्त में धकेलते हैं। भय से उसके हाथ-पांव जवाब दे सकते हैं। कभी-कभी प्रबल भावना अनुभव करके मनुष्य अपने में सिमट जाता है। ऐसे मामलों में सहानुभूति की भावना अपने में एक अच्छी बात होने पर भी एक व्यर्थ भावना बन जाती है और लज्जा, गुप्त यंत्रणादायी पश्चाताप में बदल जाती है।

भाव ( Sentiments )

भाव तीव्र और अपेक्षाकृत लघु संवेगात्मक प्रक्रियाओं को कहते हैं। उनकी विशेषताएं हैं चेतना ( consciousness ) में काफ़ी अधिक परिवर्तन, अपने कार्यों पर अत्यल्प नियंत्रण, आत्मनियंत्रण का अभाव, और शरीर की सारी जीवन-सक्रियता का बदलना। भाव अल्पजीवी ( short-lived ) होते हैं, क्योंकि उनमें बड़ी मात्रा में ऊर्जा का सहसा मोचन ( sudden release ) और संवेगों का विस्फोट होता है।

अपने विकास में भाव कई क्रमिक चरणों से गुजरता है। सहसा अतिशय क्रोध, संत्रास, संभ्रम, अनियंत्रित उल्लास अथवा निराशा से ग्रस्त आदमी अलग-अलग क्षणों पर अलग-अलग ढंग से विश्व का परावर्तन तथा संवेगों की अभिव्यक्ति करता है। उसके आत्म-नियंत्रण और बाह्य क्रियाओं के नियमन ( regulation ) में कई सारे परिवर्तन आते हैं।

भावावस्था के आरंभ में मनुष्य की सभी मानसिक शक्तियां उसके संवेगों की वस्तु पर केंद्रित होती हैं और वह अन्य सब कुछ, यहां तक कि अपने लिए व्यावहारिक महत्त्व की चीज़ें भी भूल जाता है। उसके अभिव्यंजक हाव-भाव ( expressive gesture ) अधिकाधिक अनियंत्रणीय ( uncontrollable ) बनते जाते हैं। बढ़ते हुए भाव की पहचान आंसू, सिसकियां, ठहाके, विस्मयबोधक उद्‍गार, ठेठ ( typical ) हाव-भाव, तेज़ अथवा अनियमित सांस, आदि हैं। अतिशय तनाव ( excessive stress ) के कारण मनुष्य का चेहरा बिगड़ जाता है और हरकतों पर नियंत्रण नहीं रहता। प्रांतस्था पर आगमनिक प्रावरोध ( adventitious inhibit ) छा जाता है, जिससे चिंतन की प्रक्रियाओं में बाधा पड़ती है। अधःप्रांतस्था गुच्छिकाओं में उत्तेजन बढ़ जाता है। मनुष्य अपने को ग्रस्त करनेवाले संवेग ( भय, क्रोध, हताशा, आदि – के सामने आत्मसमर्पण करने की इच्छा अनुभव करता है। किंतु इस चरण में भी सामान्य मनुष्य अपने पर नियंत्रण बनाए रख सकता है, यानि संवेगों के तूफ़ान को उठने से रोक सकता है। मुख्य बात है भावावेश की अवस्था न आने देना, उनका विकास रोकना। आत्म-नियंत्रण बनाए रखने का एक सामान्य और परखा हुआ उपाय यह है कि मन ही मन में कम से कम दस तक गिने।

यदि भाव फिर भी हावी हो जाता है, तो मनुष्य आत्म-नियंत्रण खो देता है और ऐसी बेहूदी हरकतें कर बैठता हैं कि जिन्हें बाद में याद करके उसे अपने पर शर्म आएगी या हो सकता है कि उनकी उसे धुंधली-सी ही याद रहे। प्रावरोध प्रांतस्था पर छा जाता है और मनुष्य के अनुभवों तथा उसके सांस्कृतिक व नैतिक उसूलों का प्रतिनिधित्व करनेवाली कालिक संबंधों की विद्यमान पद्धतियों को निष्क्रिय बना देता है। भावात्मक दौरे के बाद मनुष्य को घोर थकान, निराशा, उदासीनता, जड़ता और प्रायः उनींदापन आ घेरते हैं।

यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि कुछ मामलों में कोई भी भावना भावात्मक रूप में अनुभव की जा सकती है। स्टेडियमों में या कंसर्ट हालों में दर्शकों अथवा श्रोताओं द्वारा भावात्मक उत्साह के प्रदर्शन की बहुत सारी मिसालें ज्ञात हैं।  ऐसी स्थितियों में भावावस्थाओं के कभी-कभी अत्यंत अवांछित परिणाम निकलते हैं ( हिस्टीरिया जैसे दौरे, मार-पीट, इत्यादी )। मनोविज्ञान में ‘दीवाना’ प्रेम की भावात्मक अवस्थाओं का अच्छा अध्ययन किया गया है और साहित्य में तो इनके बहुत ही उत्कृष्ट वर्णन मिलते हैं। पाया गया है कि वर्षों लंबे कठिन परिश्रम के बाद वैज्ञानिक अविष्कार या खोज के रूप में प्राप्त सफलता वैज्ञानिक को हर्षोंल्लास से पागल कर देती है। अतः भाव की प्रकृति और उसका प्रभाव मनुष्य द्वारा अनुभूत भावना पर और इस पर निर्भर करते हैं कि वह अपने व्यवहार का किस हद तक नियंत्रण करता है।


इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

भावनाओं का शरीरक्रियात्मक आधार

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने व्यक्तित्व के संवेगात्मक-संकल्पनात्मक क्षेत्रों को समझने की कड़ी के रूप में मनुष्य की भावनाओं और आवश्यकताओं के अंतर्संबंधों पर विचार किया था, इस बार हम भावनाओं के शरीरक्रियात्मक आधारों पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय  अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


भावनाओं का शरीरक्रियात्मक आधार

( the physiological basis of emotions )
सभी मानसिक प्रक्रियाओं की भांति संवेगात्मक अवस्थाएं ( भावनाएं ) मस्तिष्क की सक्रियता का उत्पाद ( product of brain activity ) होती हैं। संवेगों की उत्पत्ति का कारण परिवेश में होने वाले परिवर्तन होते हैं। ये परिवर्तन शरीर की जीवन-सक्रियता को बढ़ाते या घटाते हैं, पुरानी आवश्यकताओं की जगह पर नई आवश्यकताओं को जन्म देते हैं और स्वयं शरीर के भीतर भी परिवर्तन लाते हैं।

संवेगों ( भावनाओं ) के लिए लाक्षणिक शरीरक्रियात्मक प्रक्रियाएं जटिल अननुकूलित ( unconditioned ) और अनुकूलित प्रतिवर्तों ( conditioned reflexes ) से जुड़ी होती हैं। मालूम है कि अनुकूलित प्रतिवर्तों के परिपथ आपस में मिलकर प्रमस्तिष्कीय प्रांतस्था ( cerebral cortex ) में समेकित होते हैं, जबकि अननुकूलित प्रतिवर्त अधःप्रांतस्था गुच्छिकाओं, मध्यमस्तिष्क के पश्चभाग के निकट स्थित ऊर्ध्व वप्रों ( दृष्टि केंद्रों ) और जो अन्य केंद्र तंत्रिका-उत्तेजनों को मस्तिष्क के उच्चतर प्रखंड़ों से वर्धी तंत्रिका-तंत्रों को अंतरित करते हैं, उनके ज़रिए संपन्न होते हैं। भावना को अनुभव करना प्रांतस्था और अधःप्रांतस्था केंद्रों की संयुक्त सक्रियता का परिणाम होता है

मनुष्य के लिए जितने महत्त्वपूर्ण उसके शरीर तथा परिवेश के परिवर्तन होंगे, उतनी ही गहन उसकी भावनाएं होंगी। यह उत्तेजन ( stimulation ) की ऐसी प्रक्रियाएं शुरु करता है कि जो प्रांतस्था पर फैलकर सभी अधःप्रांतस्था केंद्रों को अपने घेरे में ले लेती हैं। प्रांतस्था के नीचे स्थित मस्तिष्क के प्रखंडों में शरीर की श्वसन, ह्रद्‍वाहिका, पाचन, स्राव, आदि क्रियाओं से संबंधित बहुत से केंद्र होते हैं। इस कारण अधःप्रांतस्था केंद्रों का उत्तेजन कई सारे आंतरिक अंगों में व्यापक सक्रियता पैदा करता है।

नतीजे के तौर पर संवेगों के साथ श्वास और नाड़ी की गति में परिवर्तन आते हैं ( उदाहरण के लिए, उत्तेजना के मारे आदमी हांफ सकता है, उसकी सांस रुक सकती है, उसका दिल बैठ सकता है ), शरीर के विभिन्न भागों में रक्त का संचार घट-बढ़ जाता है ( मुंह का शर्म से लाल हो जाना या डर से पीला पड़ जाना ), अंतःस्रावी ग्रंथियों की क्रिया प्रभावित होती है ( दुख के मारे आंसू निकलना, उत्तेजना के मारे गला सूखना, डर के मारे पसीना छूटना )। आंतरिक अंगों की इन सभी प्रक्रियाओं को मनुष्य ख़ुद आसानी से देख सकता है, महसूस कर सकता है और दर्ज कर सकता है। इसीलिए बहुत समय तक उन्हें ही संवेगों का कारण माना जाता था। हम आज भी ‘पत्थरदिल’. ‘दिल जलाना’, ‘दिल जीतना’, ‘दिल देना’, आदि मुहावरे इस्तेमाल करते हैं। आधुनिक शरीरक्रियाविज्ञान और मनोविज्ञान के उजाले में ऐसी धारणाओं का बचकानापन बिल्कुल स्पष्ट है। जिसे कारण माना जाता था, वह वास्तव में मनुष्य के मस्तिष्क में घटनेवाली प्रक्रियाओं के प्रभाव के अलावा और कुछ नहीं है।
सामान्य परिस्थितियों में प्रमस्तिष्कीय प्रांतस्था अधःप्रांतस्था केंद्रों पर प्रावरोधक ( inhibitor ) प्रभाव डालती है और इस तरह से संवेगों की बाह्य अभिव्यक्ति को नियंत्रित करती है। किंतु जब अत्यंत प्रबल उद्दीपकों के प्रभाव से या अतिशय थकान अथवा नशे से प्रांतस्था अति-उत्तेजित हो जाती है, तो किरणन प्रभाव ( irradiation effects ) के कारण अति-उत्तेजन अधःप्रांतस्था केंद्रों पर अधिक प्रबलित रूप से फैलता है और मनुष्य अपना सामान्य आत्म-नियंत्रण खो बैठता है। दूसरी ओर, अधःप्रांतस्था केंद्र और आंतर अग्रमस्तिष्क, नकारात्मक प्रेरण के प्रभाव से प्रावरोध ( inhibit ) की व्यापक प्रक्रिया में शामिल हो सकते हैं, जो अपने को अवसाद, शिथिल अथवा अवरुद्ध पेशीय गतियों, नाड़ी तथा श्वास की मंद गति, आदि में व्यक्त करती है। अतः संवेग मनुष्य की जीवन-सक्रियता को तीव्र भी कर सकते हैं और मंद भी

आंतर अग्रमस्तिष्क के निश्चित भागों में इलेक्ट्रोड लगाकर पशुओं पर में किये गए शरीरक्रियात्मक प्रयोगों ने दिखाया है कि मस्तिष्क के कतिपय अत्यंत विशेषीकृत अंग संवेगात्मक अवस्थाओं के उद्दीपन में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं।
कुछ क्षेत्रों का उद्दीपन स्पष्टतः सुखद संवेगों को जन्म देता था और प्रयोगाधीन उन्हें फिर अनुभव करना चाहते थे। ऐसे क्षेत्रों को ‘आनंद के केंद्र’ कहा गया। यह पाया गया कि मस्तिष्क के अन्य अंगों का विद्युत द्वारा उद्दीपन पशु में नकारात्मक संवेग पैदा करता था और वह उसे हर तरह से कतराने की कोशिश करता था। इन क्षेत्रों को ‘कष्ट के केंद्र’ कहा गया। यह स्थापित किया गया है कि मस्तिष्क के विभिन्न भागों में स्थित नकारात्मक संवेगों के लिए उत्तरदायी क्षेत्र एक दूसरे से जुड़े हुए हैं और एक अविभाज्य तंत्र का निर्माण करते हैं। अतः नकारात्मक संवेग अपेक्षाकृत एक ही जैसे ढंग से अनुभव किये जाते हैं और वे शरीर की सामान्यतः असंतोषजनक अवस्था का संकेत देते हैं। इसके विपरीत ‘आनंद के केंद्रों’ में कम एकता पाई जाती है, जिसके कारण सकारात्मक संवेगों में बड़ी विविधता तथा भेद मिलती है।
निस्संदेह, मानव-मस्तिष्क की विशिष्ट क्रियाओं की पशुओं की संवेगात्मक अवस्थाओं के शरीरक्रियात्मक पहलुओं से तुलना करना ठीक नहीं होगा, फिर भी उपरोक्त तथ्य इस प्राक्कल्पना के प्रतिपादन के लिए पर्याप्त सैद्धांतिक आधार प्रदान करते हैं कि मानव-संवेगों की भी कुछ शरीरक्रियात्मक पूर्वापेक्षाएं होनी चाहिए।

संवेगों के शरीरक्रियात्मक आधार से संबंधित सभी अनुसंधान स्पष्टतः उनके द्विध्रुवीय स्वरूप को इंगित करते हैं: संतोष-असंतोष, आनंद-कष्ट, इत्यादि। संवेगात्मक अवस्थाओं की इस ध्रुवीयता का कारण मस्तिष्क के अंगों का विशेषीकरण है। यह ध्रुवीयता शरीरक्रियात्मक प्रक्रियाओं की नियमसंगतियों को प्रतिबिंबिंत करती है।


इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

मनुष्य की भावनाएं और आवश्यकताएं

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने व्यक्तित्व के संवेगात्मक-संकल्पनात्मक क्षेत्रों को समझने की कड़ी के रूप में भावनाओं पर चल रही चर्चा में भावना की सामान्य कल्पना पर बात की थी, इस बार हम मनुष्य की भावनाओं और आवश्यकताओं के अंतर्संबंधों पर विचार करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय  अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


मनुष्य की भावनाएं और आवश्यकताएं

भावनाएं मनुष्य की आवश्यकताओं ( needs ) की तुष्टि करनेवाली वस्तुओं को पहचानने में मदद देती हैं, और इस तुष्टि की ओर लक्षित सक्रियता को उत्प्रेरित करती हैं। वैज्ञानिक शोध में सफलता पाने से जो हर्ष की भावना पैदा होती है, वह शोधकर्ता के काम को और सक्रिय बना डालती हैं और संज्ञानमूलक आवश्यकता की तुष्टि की प्रक्रिया को शिथिल नहीं होने देती। आवश्यकता की अभिव्यक्ति के रूप के नाते रुचि में संवेगात्मक तत्व का सदा बहुत पुट रहता है।

आत्मपरक ( subjective ) दृष्टि से भावनाएं सदा इसकी परिचायक होती हैं कि मनुष्य अपनी आवश्यकताओं की तुष्टि कैसे करता है। संप्रेषण और सक्रियता की प्रक्रिया में पैदा होनेवाली सकारात्मक ( positive ) संवेगात्मक अवस्थाएं ( हर्ष, आनंद, आदि ) मनुष्य की आवश्यकताओं की सामान्य तुष्टि की सूचक होती हैं। इसके विपरीत, अतुष्ट आवश्यकताएं नकारात्मक ( negative ) संवेगों ( लज्जा, पश्चाताप, चिंता, आदि ) को जन्म देती हैं।

कुछ मनोविज्ञानियों का विश्वास है कि संवेगात्मक अवस्थाएं मनुष्य की वास्तविक आवश्यकता की गुणता ( quality ) तथा तीव्रता ( intensity ) पर और उसकी तुष्टि की संभावना के उसके मूल्यांकन पर निर्भर होती हैं। संवेगों की प्रकृति और मूल से संबंधित इस दृष्टिकोण को संवेगों का सूचना सिद्धांत कहा गया है। इसके अनुसार मनुष्य उसकी आवश्यकता की तुष्टि के लिए जो चाहिए और आवश्यकता के पैदा होने के क्षण में जो उपलब्ध है, उनसे संबद्ध सूचनाओं की जाने या अनजाने तुलना करता है। यदि आवश्यकता की तुष्टि की आत्मपरक संभावना काफ़ी अधिक है, तो मनुष्य सकारात्मक भावनाएं अनुभव करता है। नकारात्मक भावनाएं इसलिए पैदा होती हैं कि मनुष्य को अपनी आवश्यकताओं की तुष्टि यथार्थ या कल्पित रूप में असंभव लगती हैं। संवेगों के सूचना सिद्धांत में निस्संदेह कुछ खूबियां हैं, किंतु वह व्यक्तित्व के अत्यंत विविध और समृद्ध संवेगात्मक क्षेत्र की सभी परिघटनाओं ( phenomena ) का स्पष्टीकरण नहीं दे सकता। ऐसे बहुत से संवेग हैं कि जिन्हें किसी एक ही कोटि में नहीं रखा जा सकता। उदाहरण के लिए, आश्चर्य को न तो सकारात्मक संवेगों में शामिल किया जा सकता है और न नकारात्मक संवेगों में ही।

संवेगात्मक अवस्थाओं की मुख्य विशेषता उनकी नियामक भूमिका ( regulatory role ) है। मनुष्य के अनुभव, संकेतों का कार्य करते हुए उसे उसकी आवश्यकता की तुष्टि की चालू प्रक्रिया के बारे में और उसे जो बाधाएं लांघनी हैं, जो सवाल हल करने हैं या जिन सवालों पर ध्यान देना है तथा जो चीज़ें बदली जानी हैं, उनके बारे में सूचित करते हैं। इस तरह कार्यालय में किसी अप्रिय घटना से परेशान किसी व्यक्ति ने यदि अपनी झुंझलाहट किसी कनिष्ठ सहकर्मी पर उतारी थी, तो बिल्कुल संभव है कि शांत हो जाने पर वह अपने में आत्म-नियंत्रण के अभाव पर लज्जा और पश्चाताप अनुभव करे। ये संवेग उसे अपनी ग़लतियां सुधारने और सहकर्मी को यह जताने कि उसे अपने यों तैश में आ जाने पर अफ़सोस है, यानि कि सहकर्मी से द्वंद-स्थिति के वस्तुपरक मूल्यांकन के आधार पर संबंध बनाने के लिए प्रेरित करेंगे।

संवेग, घटनाओं के अनुकूल या प्रतिकूल मोड़ और वस्तुसापेक्ष तथा अंतर्वैयक्तिक संबंधों की पद्धति में कर्ता की स्थिति की निश्चितता की मात्रा के बारे में बताते हैं और इस तरह संप्रेषण तथा सक्रियता के दौरान उसके व्यवहार के लिए दिशा-निर्देश प्रदान करते हैं।

भावनाएं, यथार्थ ( reality ) के परावर्तन ( reflection ) का एक विशिष्ट रूप हैं। संज्ञानात्मक प्रक्रियाओं के विपरीत, जो यथार्थ की वस्तुओं और परिघटनाओं को परावर्तित करती हैं, भावनाएं कर्ता तथा उसकी विशिष्ट आवश्यकताओं और यथार्थ की वस्तुओं व परिघटनाओं ( जिनका वह ज्ञान अथवा रूपांतरण करता है ) के बीच मौजूदा संबंधों ( relations ) का परावर्तन करती हैं।

इसकी एक सरल-सी मिसाल दें। जब किसी उद्यम का एक कार्मिक सुनता है कि किसी दूसरे देश के उसी के जैसे उद्यमों में वेतन की कटौती की जा रही है, तो यह सूचना उसे दिलचस्प लग सकती है और वह उसका कारण जानने की कोशिश कर सकता है। किंतु यदि उसी कार्मिक को बताया जाता है कि किसी नये आदेश के अनुसार उसके अपने ही उद्यम में उसके वेतन में थोड़ी कमी की जा रही है, तो यह समाचार उसमें निश्चित ही प्रबल संवेगात्मक प्रतिक्रिया पैदा करेगा।

उसकी यह प्रतिक्रिया उसकी आवश्यकताओं ( समुचित जीवनयापन परिस्थितियों के निर्माण ) और इनके विषय ( इन जीवनयापन परिस्थितियों के निर्माण के लिए आवश्यक वेतन ) के बीच संबंध बदलने का परिणाम होगी।



इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

भावनाएं ( emotions )

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञानात्मक प्रक्रियाओं को समझने की कड़ी के रूप में कल्पना पर चल रही चर्चा में कलात्मक तथा वैज्ञानिक सृजन में कल्पना पर बात की थी, इस बार हम व्यक्तित्व के संवेगात्मक-संकल्पनात्मक क्षेत्र के अंतर्गत भावनाओं पर विचार शुरू करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय  अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


व्यक्तित्व का संवेगात्मक-संकल्पनात्मक क्षेत्र
भावनाएं ( Emotions )
सामान्य संकल्पना ( general concept )

प्रत्यक्ष ( perception ), स्मृति, कल्पना और चिंतन की प्रक्रियाओं में मनुष्य यथार्थ का संज्ञान ही नहीं करता, बल्कि जीवन के विभिन्न तथ्यों के बारे में निश्चित रवैया ( attitude ) भी बनाता है और कुछ खास भावनाएं ( emotions ) भी महसूस करता है। ऐसे आंतरिक वैयक्तिक रवैये की जड़ें सक्रियता और संप्रेषण में होती हैं, जिनके दायरे में उसका जन्म, परिवर्तन, सुदृढ़ीकरण ( strengthening ) अथवा विलोपन ( deletion ) होता है। भावनाओं में हम कुत्सित इरादों से दूसरे व्यक्ति को धोखा देनेवाले झूठे मनुष्य के प्रति घृणा ( hate ) को भी शामिल करते हैं और लंबे समय तक की गर्मी की तपिश के बाद, बारिश की पहली फुहारों को देखकर अनुभव किए गए क्षणिक आह्लाद ( hilarity ) को भी शामिल करते हैं।

भावनाएं ( अनुभूतियां ) मनुष्य के वे आंतरिक रवैये हैं, जिन्हें वह अपने जीवन की घटनाओं और अपने संज्ञान व सक्रियता की वस्तुओं के प्रति, विभिन्न रूपों में अनुभव करता है

मनुष्य द्वारा अनुभव की गई भावना एक विशेष मानसिक अवस्था ( mental state ) है, जिसमें किसी वस्तु का प्रत्यक्ष, समझ अथवा ज्ञान उस वस्तु के प्रति व्यक्ति के अपने रवैये से एकाकार होता है, जो दत्त क्षण में उसके प्रत्यक्ष, समझ, ज्ञान अथवा अज्ञान का विषय बनी हुई है। ऐसे सब मामलों में मनुष्य एक विशिष्ट संवेगात्मक अवस्था के रूप में कोई न कोई भावना अनुभव भी करता है। यह एक मानसिक प्रक्रिया है, जिसके अपने गतिक गुण होते हैं।

उदाहरण के लिए, किसी प्रिय व्यक्ति को खोने की अनुभूति में जीवन में अपने स्थान का, जो उस अपूरणीय क्षति के बाद बदल गया है, सक्रिय पुनर्मूल्यांकन ( revaluation ), मूल्यों ( values ) का पुनर्निर्धारण ( rescheduling ), संकटपूर्ण स्थिति से उबरने के लिए साहस जुटाना, आदि शामिल रहते हैं। इस प्रचंड संवेगात्मक प्रक्रिया का अंत, क्षति के फलस्वरूप उत्पन्न स्थिति के और इस स्थिति में अपने आपके सकारात्मक तथा नकारात्मक मूल्यांकनों के बीच एक निश्चित संतुलन क़ायम करने में होता है। संवेगात्मक अनुभव इस तरह उस स्थिति का सामना करने की वस्तुपरक आवश्यकता से जुड़ा हुआ है, जो संकटपूर्ण बन गई है। ऐसा अनुभव एक विशिष्ट, अत्यंत प्रबल, प्रायः अत्यंत उत्पादक और मनुष्य के अंतर्जगत् के पुनर्गठन ( restructuring ) तथा आवश्यक संतुलन की स्थापना में सहायक संवेगात्मक सक्रियता के तौर पर सामने आता है।

भावनाएं संवेगों, भावों, मनोदशाओं, खिंचावों, आवेगों और, अंत में, शब्द के संकीर्ण अर्थ में भावनाओं का रूप लेती हैं। ये सब मिलकर मनुष्य के संवेगात्मक क्षेत्र का निर्माण करते हैं, जो उसके व्यवहार का एक नियामक, ज्ञान का सजीव स्रोत और लोगों के बीच मौजूद जटिल तथा अत्यंत विविध संबधों की एक अभिव्यक्ति है।


इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय