कल्पना और खेल

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञानात्मक प्रक्रियाओं को समझने की कड़ी के रूप में कल्पना पर चल रही चर्चा में कल्पना की प्रक्रियाओं पर बात की थी, इस बार हम कल्पना और खेल पर विचार करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय  अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


कल्पना और खेल

( imagination and games )

स्कूलपूर्व और आरंभिक स्कूली आयुवर्ग के बच्चों में, जिनकी सक्रियता का मुख्य रूप खेल है, कल्पना की प्रक्रियाओं का बड़ी तेज़ी से विकास होता है।

खेल का मुख्य तत्व एक ऐसी काल्पनिक स्थिति है, जिसमें बच्चा अपने द्वारा संचित सभी धारणाओं और बिंबों का खुलकर प्रयोग करता है, क्योंकि उसपर तर्क ( logic ) के नियमों और सत्याभास के तकाज़ों का कोई अंकुश नहीं होता। कल्पना के बिंब खेल का कार्यक्रम बन जाते हैं : अपनी पायलट के रूप में कल्पना करते हुए बच्चा अपने व्यवहार और समवयस्क साथियों के व्यवहार का उसके अनुरूप गठन करता है। भूमिकामूलक खेल, बच्चे को सोचने के लिए प्रचुर सामग्री मुहैया करने के साथ-साथ उसमें महत्त्वपूर्ण व्यक्तित्व-गुणों ( साहस, संकल्प, आत्मानुशासन, सूझ-बूझ, आदि ) का विकास करते हैं। एक काल्पनिक स्थिति में अपने और अन्य बच्चों के व्यवहार का किसी वास्तविक संदर्भ-व्यक्ति के व्यवहार से मिलान करके बच्चा आवश्यक मूल्यांकन और तुलनाएं करना सीखता है।

कल्पना सक्रियता के संगठन तथा निष्पादन में अत्यंत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है और स्वयं कई प्रकार की सक्रियताओं से बनी होती है तथा तब समाप्त हो जाती है, जब बच्चा काम बंद कर देता है। स्कूलपूर्व अवस्था में बच्चे की कल्पना को आरंभ में किसी बाह्य सहारे ( मुख्यतः खिलौनों ) की आवश्यकता होती है, किंतु फिर वह शनैः शनैः एक स्वतंत्र आंतरिक सक्रियता में परिणत हो जाती हैं और बच्चे को साधारण शाब्दिक सृजनात्मक कार्य ( कहानियां व कविताएं गढ़ना ) और कलात्मक कार्य ( चित्र बनाना , आदि ) में लगने की संभावना देती हैं। बच्चे की कल्पना का विकास भाषा के आत्मसात्करण के साथ-साथ और इसलिए वयस्कों से संप्रेषण की प्रक्रिया में होता है। भाषा, वाक् ( speech ) बच्चों को पहले न देखी हुई वस्तुओं की भी कल्पना करने में समर्थ बनाती है। उल्लेखनीय है कि वाक् का विकास अवरुद्ध होने से कल्पना पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है और वह कम सजीव तथा सीमित बन जाती है।

कल्पना बच्चे के व्यक्तित्व के सामान्य विकास की एक महत्त्वपूर्ण पूर्वापेक्षा ( prerequisites ) है। उसके बिना बच्चा अपनी सृजन-शक्तियों का खुलकर इस्तेमाल नहीं कर सकता। एक लेखक, बच्चों के बारे में सूक्ष्म तथा गहन प्रेक्षणों और निष्कर्षों के लिए प्रसिद्ध अपनी पुस्तक में एक ऐसी मां का किस्सा बताते हैं, जिसे बच्चों का परीकथाएं व काल्पनिक कहानियां पढ़ना पसंद नहीं था और जिसका बेटा मानो परीकथाएं न पढ़ने देने का बदला लेने के लिए उसे सुबह से शाम तक अपनी मनगढ़ंतों से परेशान किये रहता था : “कभी वह गढ़ता है कि उसके कमरे में एक लाल हाथी आया था, कभी वह हठ करता है कि उसका एक दोस्त भालू है, जिसका नाम कोरा है, और कभी किसी को अपने बगलवाली कुर्सी पर नहीं बैठने देता, क्योंकि वह कहता ‘देखते नहीं, इसपर कोरा बैठा हुआ है!’ या कभी वह एकाएक मां से चिल्लाकर कहता है, ‘खबरदार, उधर न जाना, वहां भेड़िए हैं!’” जब किसी कारणवश ( अधिकांशतः शिक्षा में किसी गंभीर दोष के  कारण ) बच्चों की कल्पना विकास नहीं कर पाती, तो वे सर्वथा यथार्थ ( real ), मगर असामान्य चीज़ों के अस्तित्व में संदेह करने लगते हैं। इस संबंध में इसी पुस्तक में एक घटना का जिक्र है। एक बार एक कक्षा में शार्कों के बारे में पढ़ाया जा रहा था, सहसा एक बच्चा खड़ा होकर चिल्लाया, ‘शार्क-वार्क कुछ नहीं होता!’

स्कूलपूर्व अवस्था में कल्पना सामाजिक अनुभव के आत्मसात्करण की एक सबसे महत्त्वपूर्ण पूर्वापेक्षा होती हैबच्चे के चेतन मन में परिवेश से संबंधित सही, पर्याप्त धारणाएं केवल कल्पना के ज़रिए जड़े जमाती हैं। इस संबंध में किसी जाने-पहचाने बिंब का निर्माण करने वाले घटकों ( ingredients ) का तथाकथित विपर्यय ( rearrangement ) अथवा क्रम-परिवर्तन बड़ा महत्त्व रखते हैं। उदाहरण के लिए, एक चारवर्षीया लड़की गाती है, ‘लो ये टुकड़ा दूध का और भरा गिलास केक का’। ऐसे विपर्ययों में सभी बच्चों को आनंद आता है और संवेगात्मक हास्य प्रभाव की आवश्यकता से उत्पन्न अन्य सभी काल्पनिक बिंबों की भांति वे भी उनकी कल्पना का परिणाम होते हैं। महत्त्वपूर्ण यह है कि यथार्थ के इस प्रकार के जान-बूझकर किए गए विरूपण ( distortion ) के साथ-साथ मापदंड़ ( standards ) जैसी विश्व की एक सही समझ भी मौजूद रहती है, जो इन अनर्गलताओं का खंड़न करती है और सच कहा जाए, तो उनकी मदद से बच्चे की चेतना में और भी गहरे जम जाती हैं। वस्तुओं का ग़लत बेतुका समन्वय ( communion ) उनके बीच नियमसंगत संबंधों का अहसास करने में सहायक होता है और इस तरह बच्चे की संज्ञानमूलक सक्रियता ( cognitive activity ) का एक कारगर औज़ार ( tool ) बन जाता है।

अतएव यह कहने के लिए पर्याप्त मनोवैज्ञानिक प्रमाण मौजूद हैं कि कल्पनाजनित बिंब बच्चे के लिए संज्ञान का और सामाजिक अनुभव के आत्मसात्करण का साधन होते हैं। कल्पना बच्चे को खेल में विश्व का संज्ञान करने और वयस्कों को अपनी सृजनात्मक सक्रियता में इस विश्व का रूपांतरण ( conversion ) करने की संभावना देती है


इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

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3 टिप्पणियाँ (+add yours?)

  1. रेखा
    जुलाई 23, 2011 @ 17:55:37

    कल्पना बच्चे को खेल में विश्व का संज्ञान करने और वयस्कों को अपनी सृजनात्मक सक्रियता में इस विश्व का रूपांतरण ( conversion ) करने की संभावना देती है।बेहतर कल्पनाये बेहतर विकास में सहायक होती हैं .

    प्रतिक्रिया

  2. दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi
    जुलाई 23, 2011 @ 18:10:24

    यही तो बात है, कि अपुन को जब भी कल्पना की कमी होने लगती है, खेलना शुरू।

    प्रतिक्रिया

  3. चंदन कुमार मिश्र
    जुलाई 24, 2011 @ 15:11:16

    शार्क-वार्क कुछ नहीं होता! पसन्द आया, यह अन्दाज। लेकिन हमारे आधुनिक शिक्षा में बच्चों को मशीन बनाया जा रहा है या फिर पूरा पागल।

    प्रतिक्रिया

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