कल्पना की प्रक्रियाएं

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञानात्मक प्रक्रियाओं को समझने की कड़ी के रूप में कल्पना पर चल रही चर्चा में कल्पना के भेदों पर बात की थी, इस बार हम कल्पना की प्रक्रियाओं पर विचार करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय  अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


कल्पना की प्रक्रियाएं
और उनका विश्लेषणात्मक व संश्लेषणात्मक स्वरूप

मनुष्य की सक्रियता में कल्पना की भूमिका जान लेने के बाद आवश्यक है कि हम उन प्रक्रियाओं व उनकी संरचना पर ग़ौर करें, जिनके फलस्वरूप मन में बिंब उत्पन्न होते हैं।

मन में कल्पना के बिंब कैसे पैदा होते हैं, जो मनुष्य के व्यावहारिक तथा सृजनात्मक कार्यकलाप में उसका मार्गदर्शन करते हैं, और इन बिंबों की संरचना क्या है? कल्पना की प्रक्रियाओं का स्वरूप विश्लेषणात्मक व संश्लेषणात्मक होता है। वे प्रत्यक्ष ( perception ), स्मृति और चिंतन की प्रक्रियाओं से काफ़ी अधिक समानता रखती हैं। प्रत्यक्ष और स्मृति में ही, विश्लेषण ( analysis ) वस्तु की कतिपय सामान्य, आवश्यक विशेषताओं को पहचानना और अनावश्यक विशेषताओं को अनदेखा करना संभव बनाता है। इस विश्लेषण की परिणति संश्लेषण ( synthesis ) में, अर्थात् एक ऐसे मानक के निर्माण में होती है, जिससे मन उन वस्तुओं का अभिज्ञान करता है, जो चाहे कितनी भी क्यों न बदल जाएं, आपस में एक निश्चित मात्रा में समानता फिर भी बनाए रखती हैं। कल्पना में विश्लेषण और संश्लेषण का कार्य भिन्न होता है और बिंबों के सक्रिय उपयोग की प्रक्रिया में वे भिन्न प्रवृत्तियां प्रकट करते हैं।

स्मृति की मुख्य प्रवृत्ति बिंबों को सुरक्षित रखना और उन्हें मानक के अधिकतम समीप लाना है। दूसरे शब्दों में, स्मृति का कार्य अतीत की किसी व्यवहार-स्थिति की या पहले कभी प्रत्यक्ष एवं ह्रदयंगम की हुई वस्तु की हूबहू नक़ल प्रस्तुत करना है। इसके विपरीत कल्पना की मुख्य प्रवृत्ति परिकल्पनों ( बिंबों ) को रूपांतरित ( conversion ) करना और एक नई, पहले अज्ञात स्थिति के मॉडल का निर्माण संभव बनाना है। दोनों प्रवृत्तियां सापेक्ष हैं : हम अपने पुराने परिचितों को वर्षों बाद भी और शक्ल-सूरत, कपड़ों, आवाज़, आदि के काफ़ी बदल जाने पर भी पहचान जाते हैं ; ठीक इसी तरह हम अपनी कल्पना द्वारा पैदा किये गए नये बिंब में पुराने जाने-पहचाने लक्षणों का समावेश कर सकते हैं।

कल्पना के क्रियातंत्रों के सिलसिलें में इस बात को रेखांकित करना आवश्यक है कि कल्पना सारतः परिकल्पनों ( बिंबों ) के रूपांतरण की प्रक्रिया, मस्तिष्क में पहले से विद्यमान बिंबों के आधार पर नए बिंबों के निर्माण की प्रक्रिया है। कल्पना ( imagination ) या स्वैर-कल्पना ( phantasy ) को यथार्थ ( reality ) का नये, अपरिचित, अप्रत्याशित संयोगों ( unexpected combination ) तथा साहचर्यों ( associations ) में परावर्तन ( reflection ) कहा जा सकता है। वास्तव में, हम चाहे किसी सर्वथा असामान्य वस्तु की भी कल्पना क्यों न करें, उसकी ग़ौर से जांच करने पर हम यही पाएंगे कि हमारी कल्पना द्वारा सृजित बिंब के सभी घटक वास्तविक जीवन से, हमारे विगत अनुभव से लिए गए हैं और बहुत सारे तथ्यों के सायास ( intended ) तथा अनायास ( unintended ) विश्लेषण के परिणाम हैं।

कल्पना की प्रक्रिया में बिंबों का संश्लेषण तरह-तरह के रूप ग्रहण करता है ( देखें साथ का चित्र )। बिंबों के संश्लेषण का सबसे सामान्य रूप योजन ( combine ) अथवा यथार्थ में अलग-अलग मिलने वाले विभिन्न गुणों को, विशेषताओं या हिस्सों को आपस में जोड़ना है। परीकथाओं के बहुत से पात्रों ( जलकन्याओं, नागदैत्य, सींग और बड़े दांतों वाले राक्षसों, आदि ) की परिकल्पना के मूल में यही योजन का सिद्धांत है। इसका उपयोग इंजीनयरी में भी किया जाता है ( जैसे जल-स्थलगामी टैंक, जिसमें टैंक तथा नौका की विशेषताओं का संयोजन ( combination ) किया गया है )।

परिकल्पनों के रूपांतरण के एक तरीक़े के नाते योजन से मिलती-जुलती अतिरंजना ( exaggeration ) है, जिसमें वस्तुओं का आवर्धन या लघुकरण ही नहीं किया जाता ( उदाहरणार्थ, बड़े डील-डौलवाले को पहाड़ जैसा बताना और नन्हें लड़के को हाथ के अंगूठे जैसा चित्रित करना ), बल्कि वस्तु के अंगों की संख्या अथवा उनकी स्थिति में परिवर्तन भी किया जा सकता है ( इसकी मिसालें बहुत हाथों या सिरों वाले देवी-देवता, सात सिरों वाले नाग आदि हैं )।

काल्पनिक बिंब की रचना प्रखरीकरण ( sharpening ) के ज़रिए, यानि किन्हीं बातों पर विशेष बल देकर भी की जाती है। दोस्ती की भावना से या द्वेष प्रकट करने के लिए बनाए गए कार्टून इसकी मिसालें हैं। एक और प्रणाली सरलीकरण ( simplification ) है, जिसमें कल्पना के बिंब एक दूसरे में समाहित हो जाते हैं और उनके अंतरों को अनदेखा करके केवल समानताओं पर ही ज़ोर दिया जाता है। इसकी एक मिसाल वह बेल-बूटों वाला डिज़ायन है, जिसके तत्व प्रकृति से लिए गए हैं। अंत में, कल्पना में बिंबों का संश्लेषण प्ररूपण ( typification ) द्वारा भी किया जाता है। यह प्रणाली कथा-साहित्य, मूर्तिशिल्प और चित्रकला में बहुप्रचलित है। इसमें एक जैसी वस्तुओं अथवा परिघटनाओं की तात्विक, मुख्य विशेषताओं को उभारकर उन्हें ठोस बिंबों में साकार किया जाता है।

सृजन की प्रक्रिया के लिए विभिन्न साहचर्यों का पैदा होना आवश्यक है। साहचर्यों के निर्माण की सामान्य प्रवृत्ति सृजन की आवश्यकताओं एवं अभिप्रेरकों पर निर्भर होती है। सृजनात्मक कल्पना की विशिष्टता यह है कि वह साहचर्यों के जाने-पहचाने क्रम का अनुसरण नहीं करती और उन्हें सृजनकर्ता के मन पर छाई हुई भावनाओं, विचारों तथा इच्छाओं के मातहत कर देती है। यद्यपि साहचर्यों का क्रियातंत्र वही रहता है ( यानि साहचर्यों का साम्य, संलग्नता अथवा विरोध के आधार पर उत्पन्न होना ), परिकल्पनों ( बिंबों ) का चयन फिर भी इन्हीं निर्धारणकारी प्रवृत्तियों से निदेशित होता है।

उदाहरण के लिए, घड़ीसाज़ का निशान साधारण आदमी के दिमाग़ में क्या साहचर्य पैदा कर सकता है? उसकी कल्पना शायद यों काम करेगी : “घड़ीसाज़…घड़ी…मेरी घड़ी धीमी हो जाती है…सफ़ाई करवा ही लेनी चाहिए।” यदि उसी निशान पर किसी कवि की नज़र पड़ती है, तो हो सकता है कि उसके मन में कुछ ऐसी पंक्ति उभरे : “कर दे कोई इस तरह ही…यों ही गुजरे साल की भी मरम्मत।” एक बाह्य छाप ( घड़ीसाज़ के निशान ) से जागॄत हुई उसकी कल्पना ने साहचर्यों की एक पूरी श्रॄंखला पैदा कर दी : “घड़ीसाज़…मरम्मत घड़ी की…समय की…मिनटों…हफ़्तों…महीनों…साल की…” और यही उसकी संवेगात्मक चेतना के फ़िल्टर से गुज़रकर उपरोक्त काव्यात्मक बिंब में साकार बना। जाने-पहचाने संबंधों के परंपरागत क्रम से हटे साहचर्यों की ऐसी विशिष्ट श्रॄंखला, सृजनात्मक कल्पना का एक अनिवार्य पहलू है।


इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

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4 टिप्पणियाँ (+add yours?)

  1. दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi
    जुलाई 16, 2011 @ 17:34:18

    तो ये बात है!तभी कहूँ दुनिया में जितने इंसान उतने ही भगवान कैसे हैं?

    प्रतिक्रिया

  2. रेखा
    जुलाई 17, 2011 @ 03:54:12

    इतनी सारी महत्वपूर्ण जानकारी देने के लिए बहुत -बहुत आभार

    प्रतिक्रिया

  3. शिवकुमार
    जुलाई 18, 2011 @ 04:10:04

    मन में उत्पन्न होने वाले प्रतिबिंब या कल्पनाओ की प्रक्रिया को स्प्श्ट करने के लिये शुक्रिया…..

    प्रतिक्रिया

  4. चंदन कुमार मिश्र
    जुलाई 24, 2011 @ 15:01:07

    कल्पना का ज्ञान ले रहा हूँ। आगे भी…

    प्रतिक्रिया

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