कल्पना के भेद

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञानात्मक प्रक्रियाओं को समझने की कड़ी के रूप में कल्पना पर चर्चा शुरू की थी, इस बार हम कल्पना के भेदों पर विचार करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय  अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


कल्पना के भेद

कल्पना की लाक्षणिक विशेषताएं हैं क्रियाशीलता ( activeness ) और प्रभाविता ( effectiveness )। किंतु कल्पना को मनुष्य की, परिवेशी विश्व के रूपांतरण ( conversion ) की ओर लक्षित सक्रियता के उपकरण के तौर पर ही इस्तेमाल नहीं किया जा सकता, बल्कि कतिपय ( certain ) परिस्थितियों में वह सक्रियता का स्थानापन्न ( substitute ) भी बन जाती है। ऐसे मामलों में अस्थाय़ी तौर पर मनुष्य , असमाध्य प्रतीत होने वाले कार्यभारों, काम करने की आवश्यकता, जीवन की कठिनाइयों, अपनी त्रुटियों के परिणामों, आदि से बचने के लिए यथार्थ से कटी हुई काल्पनिक विचारों व धारणाओं की दुनिया में सिमट जाता है। कई मनुष्य सक्रियता से कतराकर खोखले स्वप्नों की दुनियां में जा छिपते हैं। यहां कल्पना ऐसे बिंबों की रचना करती है, जिन्हें यथार्थ में साकार न किया जाता है और न प्रायः वे साकार हो सकते हैं। कल्पना के इस रूप को निष्क्रिय कल्पना ( passive imagination ) कहा जाता है।

मनुष्य जान-बूझकर भी निष्क्रिय कल्पना का सहारा ले सकता है। जान-बूझकर पैदा किए गए, किंतु उन्हें यथार्थ में साकार बनाने में सक्षम इच्छा से कटे हुए काल्पनिक बिंबों को मनोविलास या दिवास्वप्न कहते हैं। आनंददायी, सुखद, प्रीतिकर वस्तुओं या स्थितियों के दिवास्वप्न सभी देखते हैं। वे दिखाते हैं कि कल्पना के उत्पादों और आवश्यकताओं के बीच प्रत्यक्ष संबंध है। किंतु कल्पना की प्रक्रियाओं में दिवास्वप्नों की प्रधानता मनुष्य की निष्क्रियता और उसके व्यक्तित्व के विकास में कुछ दोषों की परिचायक होती है। यदि मनुष्य निष्क्रिय है, यदि वह बेहतर भविष्य के लिए प्रयत्न नहीं करता और उसका वर्तमान जीवन कठिन तथा निरानंद है, तो वह प्रायः दिवास्वप्नों का सहारा लेगा, और अपने लिए ऐसे भ्रामक, काल्पनिक कल्पनालोक की रचना करेगा जहां उसकी आवश्यकताएं पूर्णतः तुष्ट होती हैं, जहां वह हमेशा ख़ुशक़िस्मत साबित होता है और ऐसी स्थिति पाता है, जिसे वास्तविक जीवन में पाने की वह कभी आशा भी नहीं कर सकता। निष्क्रिय कल्पना अनजाने में भी पैदा हो सकती है। ऐसा मुख्यतः चेतना के धुंधला पड़ने और दूसरी संकेत पद्धति के आंशिकतः अवरुद्ध होने की अवस्था में, अस्थायी निष्क्रियता के काल में, निद्रालुता तथा स्वप्न में, भावावस्था तथा विभ्रमों में होता है।

निष्क्रिय कल्पना को सायास ( intended ) और अनायास ( unintended ) में और सक्रिय कल्पना को सृजनात्मक ( creative ) तथा पुनरुत्पादक ( reproductive ) में विभाजित किया जा सकता है
 

पुनरुत्पादक कल्पना, वर्णनों के अनुरूप विभिन्न बिंबों के निर्माण पर आधारित होती है। उदाहरण के लिए, जब हम कोई पाठ्‍यपुस्तक या उपन्यास पढ़ते हैं अथवा किसी भौगोलिक मानचित्र या ऐतिहासिक वर्णनों का अध्ययन करते हैं, तो हमें इन स्रोतों में प्रतिबिंबित सामग्री को अपनी कल्पना में पुनरुत्पादित करते रहना पड़ता है। बहुत से स्कूली बच्चों में पुस्तक पढ़ते समय प्रकृति-वर्णनों या चरित्र-चित्रणों पर मात्र निगाह दौड़ा लेने या उन्हें बिल्कुल ही छोड़ देने की आदत पाई जाती है। परिणामस्वरूप वे अपनी पुनरुत्पादक कल्पना का इस्तेमाल नहीं करते और अपने कलात्मक बोध तथा संवेगात्मक विकास को अवरुद्ध कर डालते हैं। भौगोलिक मानचित्रों का अध्ययन पुनरुत्पादक कल्पना को इस्तेमाल करने का एक अच्छा साधन है। मानचित्र को देख-देखकर विभिन्न स्थानों की कल्पना करने से बच्चे में प्रेक्षण क्षमता का विकास होता है। रेखाचित्रों को और विभिन्न कोणों से वास्तविक पिंडों को ग़ौर से देखने से त्रिविम ज्यामिती के अध्ययन के लिए आवश्यक देशिक कल्पना के विकास में मदद मिलती है।

पुनरुत्पादक कल्पना के विपरीत सृजनात्मक कल्पना ऐसे नये बिंबों के स्वतंत्र निर्माण से संबंध रखती है, जिन्हें सक्रियता के मौलिक तथा मूल्यवान उत्पादों में साकार किया जाता है। श्रम की प्रक्रिया में पैदा हुई सृजनात्मक कल्पना, तकनीकी, कलात्मक, आदि हर प्रकार की सृजनात्मक सक्रियता का एक अनिवार्य घटक है और आवश्यकताओं की तुष्टि के उपायों व साधनों की खोज में चाक्षुष बिंबों ( visual images ) के सक्रिय व सोद्देश्य उपयोग का रूप लेती है।

मनुष्य का व्यक्तित्व का महत्त्व काफ़ी हद तक इसपर निर्भर होता है कि उसकी संरचना में किस प्रकार की कल्पना का प्राधान्य है। यदि किसी युवा में निष्क्रिय, खोखले मनोविलास की तुलना में सृजनात्मक कल्पना का प्राधान्य है, जो उसकी सक्रियता में साकार भी बनता है, तो यह दिखाता है कि उसके व्यक्तित्व का अच्छा विकास हुआ है।


इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

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5 टिप्पणियाँ (+add yours?)

  1. L.Goswami
    जुलाई 09, 2011 @ 15:29:20

    Behtar..

    प्रतिक्रिया

  2. L.Goswami
    जुलाई 09, 2011 @ 15:30:38

    Behtar..

    प्रतिक्रिया

  3. L.Goswami
    जुलाई 09, 2011 @ 15:31:43

    Behtar..

    प्रतिक्रिया

  4. ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ (Zakir Ali 'Rajnish')
    जुलाई 10, 2011 @ 10:24:40

    गूढ ज्ञान, आभार।——TOP HINDI BLOGS !

    प्रतिक्रिया

  5. चंदन कुमार मिश्र
    जुलाई 24, 2011 @ 14:49:25

    सुना है आइंस्टाइन के अनुसार कल्पना यथार्थ से अधिक ताकतवर है।

    प्रतिक्रिया

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