चिंतन की अभिप्रेरणा ( motivation for thinking )

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञानात्मक प्रक्रियाओं को समझने की कड़ी के रूप में चिंतन के कुछ विशिष्ट नियमों विश्लेषण और संश्लेषण पर चर्चा की थी, इस बार हम चिंतन की अभिप्रेरणा पर विचार करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय  अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


चिंतन की अभिप्रेरणा
( motivation for thinking )

विश्लेषण तथा संश्लेषण ही नहीं, सारा चिंतन और सभी सक्रियताएं भी सदा मनुष्य की किन्हीं आवश्यकताओं ( needs ) का परिणाम होते हैं। आवश्यकता के अभाव में कुछ भी नहीं किया जाता है।

किसी भी अन्य मानसिक सक्रियता की भांति ही चिंतन की प्रक्रिया का अध्ययन करते हुए मनोविज्ञान उन आवश्यकताओं तथा अभिप्रेरकों ( motives ) को ध्यान में रखता है और उनका विशेषतः अध्ययन करता है, जो मनुष्य को संज्ञानमूलक सक्रियता में प्रवृत्त होने के लिए उकसाते हैं। इसी तरह वह उन ठोस परिस्थितियों को भी ध्यान में रखता तथा जांचता है, जिनमे विश्लेषण तथा संश्लेषण की आवश्यकता उत्पन्न होती है।

चिंतन ‘शुद्ध’ विचार या तार्किक प्रक्रिया द्वारा नहीं किया जाता, वह भावनाओं और आवश्यकताओं से युक्त मानव की क्रिया है। चिंतन और आवश्यकताओं का अटूट सहसंबंध ( correlation ) अपने को इस अत्यंत महत्त्वपूर्ण तथ्य में व्यक्त करता है कि चिंतन सदा एक निश्चित व्यक्ति का चिंतन होता है, जिसके प्रकृति, समाज और अन्य मनुष्यों के साथ बहुविध संबंध हैं।

मनोविज्ञान में चिंतन के दो प्रकार के अभिप्रेरकों का अध्ययन किया जाता है : विशिष्ट संज्ञानात्मक अभिप्रेरक ( specific cognitive motives ) और अविशिष्ट अभिप्रेरक ( unspecified motives )। पहले मामले में चिंतन उन रुचियों तथा अभिप्रेरकों का उत्पाद होता है, जो संज्ञानमूलक आवश्यकताओं ( बौद्धिक जिज्ञासा, आदि ) का प्रतिनिधित्व करते हैं। दूसरे मामले में चिंतन शुद्ध संज्ञानात्मक कारकों के बजाए कमोबेश बाह्य कारकों के प्रभाव से आरंभ होता है।

उदाहरण के लिए, जब कोई छात्र पाठ की तैयारी या किसी सवाल पर मगज़पच्ची शुरू करता है, तो कोई जरूरी नहीं कि इसके पीछे उसकी कोई नयी बात सीखने की इच्छा हो। हो सकता है कि चह ऐसा केवल बड़ों की मांग पूरी करने के लिए, या अपने साथियों से पिछड़ जाने के डर से या ऐसे ही किसी अन्य कारण से कर रहा हो। फिर भी चिंतन की आरंभिक अभिप्रेरणा चाहे कुछ भी हों, यदि मनुष्य चिंतन की प्रक्रिया में प्रवृत्त होता है, तो वह संज्ञानात्मक अभिप्रेरकों के प्रभाव में आ ही जाता है। प्रायः ऐसा होता है कि छात्र मजबूर किये जाने पर ही पाठ की तैयारी करने बैठता है, किंतु बाद में उसकी, जो वह कर, पढ़ या लिख रहा है, उसमें शुद्ध संज्ञानमूलक रुचि पैदा हो जाती है।

संक्षेप में, मनुष्य सोचना किन्हीं आवश्यकताओं के प्रभाव में शुरू करता है और इस प्रक्रिया में वह शनैः शनैः संज्ञान के लिए अधिकाधिक गहन तथा प्रबल अभिप्रेरक विकसित कर लेता है।


इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

Advertisements

1 टिप्पणी (+add yours?)

  1. दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi
    जून 22, 2011 @ 16:29:23

    मनुष्य सोचना किन्हीं आवश्यकताओं के प्रभाव में शुरू करता है और इस प्रक्रिया में वह शनैः शनैः संज्ञान के लिए अधिकाधिक गहन तथा प्रबल अभिप्रेरक विकसित कर लेता है।यहाँ भी द्वंदवाद है।

    प्रतिक्रिया

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

%d bloggers like this: