चिंतन का सामाजिक स्वरूप

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञानात्मक प्रक्रियाओं को समझने की कड़ी के रूप में चिंतन और वाक् पर चर्चा की थी, इस बार हम चिंतन के सामाजिक स्वरूप पर विचार करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय  अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


चिंतन का सामाजिक स्वरूप
( social aspects of thinking )

चिंतन का भाषा से आंगिक, अविच्छेद्य संबंध ( inalienable relation ) मानव-चिंतन के सामाजिक-ऐतिहासिक स्वरूप का अकाट्य प्रमाण है। संज्ञान की एक आवश्यक पूर्वापेक्षा मनुष्य द्वारा ऐतिहासिक विकास के दौरान अर्जित सारे ज्ञान का सातत्य ( continuum ) है। यह ऐतिहासिक सातत्य तभी संभव है, जब ज्ञान का स्थायीकरण व समेकन किया जाए, सुरक्षित रखा जाए और एक पीढ़ी द्वारा दूसरी, अगली पीढ़ी को सिखाया जाए। संज्ञान के मुख्य परिणामों का ऐसा स्थायीकरण भाषा, पुस्तकों, पत्रिकाओं, आदि के ज़रिए किया जाता है और इन सब में मानव-चिंतन की सामाजिक प्रकृति ( social nature ) स्पष्टतः उभरकर सामने आती है।

मनुष्य के बौद्धिक विकास ( intellectual development ) के लिए मानवजाति द्वारा अपने पूर्ववर्ती सामाजिक-ऐतिहासिक विकास के दौरान संचित ज्ञान का आत्मसात्करण आवश्यक है। मनुष्य द्वारा विश्व के संज्ञान की प्रक्रिया वैज्ञानिक ज्ञान के ऐतिहासिक विकास पर निर्भर होती है और मनुष्य इस विकास के परिणामों को शिक्षा, प्रशिक्षण तथा सारी मानवजाति से संप्रेषण के माध्यम से आत्मसात् करता है।

स्कूल में पढ़ाई की सारी अवधि में बच्चे का मानवजाति द्वारा अपने इतिहास के दौरान अर्जित तथा विकसित ज्ञान, संकल्पनाओं ( concepts), आदि की तैयारशुदा, ऐतिहासिकतः स्थापित तथा ज्ञात पद्धति से साक्षात्कार होता है। फिर भी मानवजाति के लिए जो जाना-पहचाना है और नया नहीं है, वह बच्चे के लिए आरंभ में अनिवार्यतः नया और अनजाना होता है। इसलिए मानवजाति द्वारा संचित ज्ञान-भंडार को आत्मसात् करने के लिए बच्चे को काफ़ी अधिक चिंतनात्मक और सृजनात्मक ( creative ) प्रयास करना पड़ता है। बेशक उसे पहले से विद्यमान संकल्पनाएं और जानकारियां ही आत्मसात् करनी होती है और इस कार्य में बड़े उसका मार्गदर्शन करते हैं, फिर भी इसका मतलब यह नहीं है कि उसे स्वयं सोचना नहीं पड़ता या सृजनात्मक रवैया नहीं अपनाना होता।

यदि बात ऐसी होती, तो ज्ञान का आत्मसात्करण एक नितांत औपचारिक ( formal ), सतही और यांत्रिक प्रक्रिया बन जाती। इसे आज के संदर्भों में ऐसे भी कहा जा सकता है कि यदि ज्ञान के आत्मसात्करण को, बच्चों की चिंतनात्मक और सृजनात्मक प्रक्रियाओं से यदि नहीं जोड़ा जाता है ( जो कि अक्सर आजकल शिक्षा की भाषा और चिंतन की भाषा यानि मातृभाषा के अलग-अलग होने के कारण ज़्यादातर हो रहा है ) तो यह एक औपचारिक, सतही और यांत्रिक प्रक्रिया बन कर रह जाता है और बच्चों के बौद्धिक विकास में बाधा पड़ती है

चिंतन या प्रत्ययन पहले से विद्यमान ज्ञान के भी ( उदाहरणार्थ, बच्चे द्वारा ) और नये ज्ञान के अर्जन के लिए भी ( मुख्यतः वैज्ञानिकों द्वारा ) आत्मसात्करण की मुख्य पूर्वापेक्षा ( rerequisites ) है।


इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

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4 टिप्पणियाँ (+add yours?)

  1. रेखा
    जून 11, 2011 @ 15:56:43

    हिंदी की पुस्तकों के डाउनलोड लिंक देने के लिए धन्यवाद

    प्रतिक्रिया

  2. दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi
    जून 12, 2011 @ 02:25:29

    आत्मसात्करण के बिना किसी ज्ञान का कोई अर्थ नहीं।

    प्रतिक्रिया

  3. महेन्द्र मिश्र
    जून 12, 2011 @ 09:36:28

    प्रेरक और सुन्दर चिंतन करने योग्य…. आभार

    प्रतिक्रिया

  4. ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ (Zakir Ali 'Rajnish')
    जून 12, 2011 @ 11:50:16

    प्रतिक्रिया

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