चिंतन और वाक् ( thinking and speech )

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञानात्मक प्रक्रियाओं को समझने की कड़ी के रूप में चिंतन पर चर्चा शुरू की थी, इस बार हम चिंतन और वाक् के संबंधों पर विचार करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय  अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


चिंतन और वाक्
( thinking and speech )

चिंतन ऐंद्रीय ज्ञान से ही नहीं, भाषा और वाक् ( language and speech ) से भी संबद्ध है। इसमें मानव और पशु मानस का एक मूलभूत भेद प्रकट होता है। पशुओं का अति साधारण, अविकसित चिंतन सदा बिंबसापेक्ष तथा प्रभावोत्पादनमूलक होता है और बिंब की सीमाओं को लांघकर अमूर्तनों ( abstracts ) और मनन के स्तर तक नहीं पहुंच सकता। इसका संबंध केवल प्रत्यक्षणीय वस्तुओं से, जो वस्तुएं पशु की आंखों के सामने हैं, उनसे होता है। ऐसा अविकसित चिंतन वस्तुओं का प्रयोग केवल बिंब तथा प्रभावोत्पादन के धरातल पर करता है और उससे ऊपर नहीं उठ पाता।

संज्ञान की वस्तु से उसके किसी गुण को अपाकर्षित करने की संभावना यथार्थ तभी बन सकी, जब वाक् ( speech ) की उत्पत्ति हुई, जिसकी बदौलत मनुष्य ऐसे गुण की धारणा ( concept ) अथवा प्रत्यय ( idea ) को एक एक विशेष शब्द ( word ) में स्थिर कर सका। विचार शब्द में साकार होता है और अन्य लोगों के लिए भी और हमारे लिए भी एक प्रत्यक्ष वास्तविकता बन जाता है। चिंतन कोई भी रूप क्यों न ले, वह भाषा के बिना असंभव है। हर विचार, वाक् के साथ अटूट एकता बनाए रखते हुए पैदा होता तथा विकास करता है। विचार जितना ही गहन तथा व्यापक होगा, मौखिक और लिखित वाक् में उसे उतने ही स्पष्ट, सटीक शब्दों में व्यक्त किया जाता है। इसी तरह किसी विचार की वाचिक प्रस्तुति जितनी परिष्कृत और सटीक होगी, वह विचार उतना ही स्पष्ट तथा बोधगम्य बनेगा।

मनोवैज्ञानिक प्रयोगों के दौरान विशेष अध्ययनों ने दिखाया है कि कुछ छात्र – और वयस्क भी – अपने विचारों को बोलकर व्यक्त किये बिना सवाल हल करने में कठिनाई अनुभव करते हैं। जब वे अपने विचारों को उच्चारित शब्दों का रूप देना और मुख्य प्रस्थापनाओं एक-एक करके तथा बढ़ती सटीकता के साथ ( आरंभ में वे ग़लत भी हो सकती हैं ) दोहराना शुरू करते हैं, तो उन्हें लगता है कि उनका कार्य आसान हो गया है। कोई आदमी जब दूसरों को कोई बात समझाता या अपने विचारों को अपने शब्दों में सूत्रबद्ध करता है, तो वह साथ ही उन्हें अपने लिए भी स्पष्ट बना रहा होता है। विचार की शब्दों में ऐसी प्रस्तुति के लिए उसे अलग-अलग घटकों में तोड़ा जाता है, हर घटक पर पूरा-पूरा ध्यान दिया जाता है और इस तरह से आदमी को अपने ही विचारों को ज़्यादा अच्छी तरह से समझने में मदद मिलती है।

इस प्रकार चिंतन की प्रक्रिया विमर्श ( discussion ) का, सचेतन तथा तर्कपरक विचारणा का रूप ले लेती है, जिसमें इस प्रक्रिया के दौरान पैदा हुए सभी विचार आपस में स्पष्ट और सही ढ़ंग से जुड़े होते हैं। इसलिए शब्द या विचार का वाचिक निरूपण, विमर्शात्मक, यानि बुद्धिसंगत, तर्कपरक और सचेतन चिंतन की पूर्वापेक्षा ( prerequisites ) है।

शब्दों में सूत्रबद्ध और अभिव्यक्त किए जाने पर विचार की अकाल मृत्यु नहीं होती। वह मौखिक अथवा लिखित वाक् में जीवित रहता है और आवश्यकता पड़ने पर हम फिर उसपर लौट सकते हैं, पहले से अधिक ग़ौर से उसे जांच या तौल सकते हैं और अपने मन में स्थित अन्य विचारों से उसकी तुलना भी कर सकते हैं। विचारों का वाचिक प्रक्रिया में सूत्रीकरण उनके निर्माण के लिए अत्यावश्यक है। इस प्रक्रिया में तथाकथित आंतरिक वाक् भी महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करती है : कोई समस्या हल करते हुए मनुष्य जैसे कि अपने से ही परामर्श करता है, बोलकर नहीं सोचता, बल्कि मौन रहकर सोचता है।

कहने का सार यह है कि मनुष्य का चिंतन भाषा से, वाक् से अभिन्न रूप से जुड़ा हुआ है। चिंतन के लिए भौतिक, शाब्दिक रूप धारण करना अनिवार्य है।


इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

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1 टिप्पणी (+add yours?)

  1. Kajal Kumar
    जून 04, 2011 @ 18:16:10

    सारगर्भित लेखन के लिए आभार.

    प्रतिक्रिया

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