चिंतन और ऐंद्रीय ज्ञान

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञानात्मक प्रक्रियाओं को समझने की कड़ी के रूप में ऐच्छिक स्मरण पर विचार किया था, इस बार हम चिंतन को समझने के लिए उस पर चर्चा शुरू करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय  अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


चिंतन की सामान्य विशेषताएं

( general characteristics of thinking )

मनुष्य जीवनभर गंभीर और फ़ौरी कार्यभार तथा समस्याएं हल करता रहता है। ऐसी समस्याओं और अप्रत्याशित कठिनाइयों की उत्पत्ति इसका ज्वलंत प्रमाण है कि परिवेशी विश्व में असंख्य अज्ञात, अपरिचित और प्रच्छन्न ( disguised ) वस्तुएं तथा परिघटनाएं ( phenomenon ) हैं तथा वे उसके जीवन को प्रभावित करती रहती हैं। वे मनुष्य को सोचने को विवश करती हैं और उसे प्रकृति के रहस्यों में अधिकाधिक गहरे पैठने, नयी-नयी प्रक्रियाएं, गुणधर्म और लोगों व वस्तुओं के संबंध खोजने की चुनौती देते हैं।

चिंतन ( thinking ) मनुष्य के जीवन के दौरान निरंतर सामने आनेवाली वस्तुओं के नये, अज्ञात गुणधर्मों को समझने की आवश्यकता के कारण उत्पन्न होता है। मनुष्य का पुराना ज्ञान-भंडार अपर्याप्त सिद्ध होता है। ब्रह्मांड़ अनंत-असीम है और इसके संज्ञान की प्रक्रिया का भी कोई अंत नहीं है। चिंतन सदा नये, अज्ञात की ओर लक्षित होता है। सोचते हुए हर मनुष्य नयी खोजें करता है, चाहे वे अत्यंत छोटी और केवल उसके अपने लिए ही क्यों ना हों।

चिंतन वाक् ( speech ) से अविभाज्यतः जुड़ा हुआ है और तात्विकतः नये की तलाश व खोज की एक समाजसापेक्ष मानसिक प्रक्रिया है। चिंतन व्यावहारिक सक्रियता के आधार पर ऐंद्रिय ज्ञान से पैदा होता है और इसकी सीमाओं से कहीं दूर तक व्याप्ति रखता है। यह विश्लेषण ( analysis ) और संश्लेषण ( synthesis ) की मदद से वास्तविकता ( reality ) का व्यवहित तथा सामान्यीकृत परावर्तन करने में सक्षम होता है।

ऐंद्रीय ज्ञान और चिंतन

संज्ञान ( cognition ) से संबंधित सक्रियता संवेदनों ( sensations ) और प्रत्यक्षों ( perceptions ) से शुरू होती है और फिर चिंतन में संक्रमण करती है। कोई भी चिंतन, यहां तक कि अति विकसित चिंतन भी ऐंद्रीय ज्ञान से, यानि संवेदनों, प्रत्यक्षों और परिकल्पनों से निरपेक्ष नहीं होतासोचने की सामग्री का एक ही स्रोत है – ऐंद्रीय ज्ञान। संवेदनों और प्रत्यक्षों के ज़रिए चिंतन बाह्य विश्व और उसके परावर्तन से सीधे जुड़ा होता है। इस परावर्तन की यथातथ्यता ( preciseness ) के बारे में, प्रकृति तथा समाज के रूपांतरण के दौरान व्यवहार द्वारा निरंतर जांच की जाती है।

विश्व के सर्वतोमुखी ( versatile ) संज्ञान के लिए उसका हमारे रोजमर्रा के संवेदनों तथा प्रत्यक्षों से पैदा होनेवाला ऐंद्रीय चित्र आवश्यक तो है, किंतु पर्याप्त नहीं है। इस प्रत्यक्षतः देखी गई वास्तविकता के बिंब से विभिन्न वस्तुओं, घटनाओं, व्यापारों, आदि की अत्यंत जटिल परस्पर-निर्भरता, उनके कारणों तथा परिणामों और एक से दूसरे में संक्रमण के बारे में शायद ही कोई जानकारी मिल पाती है। अपनी सारी बहुविधता तथा प्रत्यक्षता के साथ हमारे प्रत्यक्षों में प्रकट होनेवाली निर्भरताओं तथा संबंधों की इस गुत्थी को केवल इंद्रियों की मदद से सुलझा पाना असंभव है।

उदाहरण के लिए, हम हाथ से किसी वस्तु को छूकर ताप का जो संवेदन पाते हैं, वह हमें उस वस्तु की तापीय अवस्था का स्पष्ट आभास नहीं देगा। यह संवेदन एक ओर तो वस्तु की तापीय अवस्था पर निर्भर होता है और, दूसरी ओर , स्वयं मनुष्य की अवस्था पर ( यानि इस पर कि उसने दत्त वस्तु को छूने से पहले अधिक गर्म वस्तुओं को छुआ था या अधिक ठंड़ी वस्तुओं को )।

यह साधारण मिसाल ही दिखा देती है कि ऐंद्रीय ज्ञान में उपरोक्त निर्भरताएं एक अविभाज्य समष्टि के तौर पर सामने आती हैं। प्रत्यक्ष, संज्ञान के कर्ता ( मनुष्य ) और विषय ( वस्तु ) के बीच अन्योन्यक्रिया ( interaction ) के कुल, समुचित परिणाम को ही प्रस्तुत करता है। फिर भी रहने और काम करने के लिए यह जरूरी है कि हम सबसे पहले बाह्य वस्तुओं को उनकी हैसियत से ही, यानि कि जैसी वे वास्तव में हैं, वैसे ही रूप में जानें, चाहे वे हमें कैसी भी क्यों न लगती हों और चाहे उनका संज्ञान किया जा सकता हो या न किया जा सकता हो।

संपूर्ण चित्र जिन छोटे अंशों से बना है, उन्हें समझ पाने के लिए, अर्थात उन्हें उनके परिवेश से पृथक करके हरेक की अलग से जांच करने के लिए, दूसरे शब्दों में कहें, तो संज्ञान के कर्ता तथा वस्तु की अन्योन्यक्रिया के प्रत्यक्ष प्रभाव से परे भी जाने के लिए ऐंद्रीय ज्ञान के दायरे के भीतर ही रहने से काम नहीं चल सकता, तो संवेदनों और प्रत्यक्षों से चिंतन में संक्रमण आवश्यक है। भारतीय योग दर्शन सिखाता है कि वास्तविक ज्ञान तभी प्राप्त किया जा सकता है, जब समस्त ध्यान वस्तु पर केंद्रित किया जाए और अन्य सभी अनावश्यक मानसिक सक्रियताओं को दबा दिया जाये। योग-दर्शन ने शरीर के नियंत्रण ( आसन, प्राणायाम, आदि के ज़रिए ) और ध्यान तथा चिंतन जैसी मानसिक प्रक्रियाओं के नियंत्रण के लिए अष्टांग-योग नामक एक विशेष प्रणाली भी विकसित की।

चिंतन बाह्य विश्व में आगे, और गहरे पैठना सुनिश्चित करता है और वस्तुओं, परिघटनाओं, आदि के सहसंबंधों की जानकारी देता है। वस्तुओं की तापीय अवस्था के निर्धारण की उसी सरल मिसाल से इसे भी समझा जा सकता है। चिंतन के ज़रिए हम उपरोक्त दो निर्भरताओं को मानसिकतः एक दूसरी से अलग अथवा अपाकर्षित कर सकते हैं। यह मध्यस्थता के द्वारा किया जाता है – हम वस्तु की तापीय अवस्था का निर्धारण करने वाले व्यक्ति की अवस्था को अनदेखा कर सकते हैं, क्योंकि वस्तु के तापमान को सीधे हाथ से छूकर नहीं, अपितु अप्रत्यक्ष, व्यवहित ढ़ंग से, थर्मामीटर की मदद से भी मापा जा सकता है। इस अपाकर्षण के परिणामस्वरूप वस्तु का ऐंद्रीय बिंब वस्तु की ही क्रिया के रूप में प्रकट होता है, यानि वस्तुपरक रूप से निर्धारित होता है। यह मिसाल दिखाती है कि अमूर्त, व्यवहित चिंतन कैसे काम करता है : वह जैसे कि वस्तु के कुछ गुणधर्मों ( उदाहरणार्थ, हाथ तथा वस्तु की अन्योन्यक्रिया ) को अनदेखा करके ध्यान अन्य गुणधर्मों ( वास्तविक तापमान, आदि ) पर संक्रेंद्रित कर देता है

संवेदनों, प्रत्यक्षों और परिकल्पनों पर आधारित चिंतन की प्रक्रिया ऐंद्रीय ज्ञान की सीमाएं लांघ जाती है, अर्थात् मनुष्य बाह्य विश्व की ऐसी परिघटनाओं, उनके गुणधर्मों तथा संबंधों का ज्ञान करने लगता है जिनका वह सीधे इंद्रियों द्वारा अवबोध नहीं कर सकता और इसलिए जो प्रत्यक्ष रूप से प्रेक्षणीय नहीं हैं। उदाहरण के लिए, समकालीन भौतिकी की एक सर्वाधिक पेचीदी समस्या मूलकणों के सिद्धांत का विकास है। किंतु इन अतिसूक्ष्म कणॊं को अत्यंत शक्तिशाली माइक्रोस्कोपों की मदद से भी नहीं देखा जा सकता। दूसरे शब्दों में, उनका प्रत्यक्ष प्रेक्षण संभव नहीं है और उनकी केवल मानसिकतः परिकल्पना की जा सकती है। वैज्ञानिकों ने अमूर्त व्यवहित चिंतन के ज़रिए ही सिद्ध किया है कि ऐसे अदृश्य मूलकणों का वास्तव में अस्तित्व है और उनके अपने निश्चित गुणधर्म हैं। इन गुणधर्मों का ज्ञान भी अप्रत्यक्ष रूप से, चिंतन द्वारा प्राप्त किया गया है।

चिंतन वहां शुरू होता है, जहां ऐंद्रीय ज्ञान अपर्याप्त या शक्तिहीन सिद्ध हो जाता है। चिंतन संवेदनों, प्रत्यक्षों और परिकल्पनों में आरंभ किये गए मन के संज्ञानमूलक कार्य को आगे जारी रखता है और उसकी सीमाओं से आगे बहुत दूर तक जाता है

उदाहरण के लिए, हम आसानी से जान सकते हैं कि किसी सुदूर नक्षत्र की ओर ५०,००० किलोमीटर प्रतिसेकंड की रफ़्तार से जा रहे अंतर्ग्रहीय यान की गति प्रकाश की गति के केवल छठे भाग के बराबर है। हालांकि हम ३,००,००० किलोमीटर प्रतिसेकंड और ५०,००० किलोमीटर प्रतिसेकंड की रफ़्तार से चल रही वस्तुओं की गतियों में अंतर को न सीधे देख सकते हैं और न कल्पना ही कर सकते हैं। हर मनुष्य की यथार्थ संज्ञानात्मक सक्रियता में ऐंद्रीय ज्ञान और चिंतन अन्योन्याश्रित ( Interdependent ) होते हैं और निरंतर एक दूसरे में संक्रमण करते रहते हैं


इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

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2 टिप्पणियाँ (+add yours?)

  1. दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi
    जून 01, 2011 @ 17:46:59

    सोचने की सामग्री का एक ही स्रोत है – ऐंद्रीय ज्ञान।

    प्रतिक्रिया

  2. Richa P Madhwani
    जून 10, 2011 @ 13:47:32

    nice post..

    प्रतिक्रिया

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