चिंतन के भेद

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञानात्मक प्रक्रियाओं को समझने की कड़ी के रूप में चिंतन की अभिप्रेरणा पर चर्चा की थी, इस बार हम चिंतन के भेदों पर विचार करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय  अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


चिंतन के भेद

सामान्यतः मनोविज्ञान में चिंतन के निम्न रूपों में भेद किया जाता है : संवेदी-क्रियात्मक, बिंबात्मक और अमूर्त ( सैद्धांतिक )।

संवेदी-क्रियात्मक चिंतन ( sensory-operational thinking )
 

मानवजाति के इतिहास के आरंभिक दौर में लोग अपनी समस्या को शुद्ध व्यावहारिक ( practical ) आधार पर हल किया करते थे, सैद्धांतिक ( theoretical ) सक्रियता का जन्म बाद में जाकर हुआ। उदाहरण के लिए, हमारे सुदूर पूर्वजों ने शुरू-शुरू में अपने क़दमों, आदि को गिनकर भूमि को नापना सीखा था और इस व्यावहारिक सक्रियता के दौरान शनैः शनैः जो अनुभव संचित होता गया, वह एक विशेष सैद्धांतिक शाखा के रूप में ज्यामिति ( geometry ) की उत्पत्ति तथा विकास का आधार बना। व्यावहारिक और सैद्धांतिक सक्रियताएं परस्पर-अविभाज्य हैं, किंतु दोनों में पहले व्यावहारिक सक्रियता पैदा हुई और बाद में सैद्धांतिक सक्रियता। व्यावहारिक सक्रियता के विकास के एक अपेक्षाकृत ऊंचे चरण में ही सैद्धांतिक सक्रियता का जन्म हुआ।

मानवजाति के ऐतिहासिक विकास और हर बच्चे के मानसिक विकास का आरंभ-बिंदु व्यावहारिक सक्रियता है, न कि सैद्धांतिक सक्रियता। बच्चे का चिंतन व्यावहारिक सक्रियता के दायरे में विकसित होता है। शैशवावस्था और आरंभिक बाल्यकाल में ( ३ वर्ष की आयु तक ) बच्चे का चिंतन अधिकांशतः संवेदी-क्रियात्मक रूप का होता है। बच्चा वस्तुओं को अपने हाथों से, व्यावहारिक रूप से उलट-पलट करके, उन्हें जोड़-तोड़ करके, उनके बीच मिलान करके उनका विश्लेषण व संश्लेषण करता है, उनके बारे में अपना ज्ञान बढ़ाता है। जिज्ञासू बच्चे प्रायः अपने खिलौने तोड़ते हैं, क्योंकि वे मालूम करना चाहते हैं कि ‘उनके भीतर क्या है’।

बिंबात्मक चिंतन ( imagery thinking ) 
 
अपने सरलतम रूप में बिंबात्मक चिंतन मुख्यतः स्कूलपूर्व अवस्था ( ४-७ वर्ष ) की विशेषता है। चिंतन अभी भी व्यावहारिक क्रियाओं से जुड़ा होता है, किंतु यह संबंध अब इतना घनिष्ठ और प्रत्यक्ष नहीं होता। अपनी रुचि की वस्तु के बारे में जानने के लिए बच्चे के वास्ते अब जरूरी नहीं कि वह उसे हाथों से छुए। बहुत सारे मामलों में अब उसके लिए वस्तु का क्रमबद्ध ढ़ंग से प्रहस्तन ( handling ) जरूरी नहीं होता, किंतु उसका प्रत्यक्ष किए बिना, मस्तिष्क में उसका बिंब बनाए बिना उसका काम नहीं चल सकता। दूसरे शब्दों में, स्कूलपूर्व आयु के बच्चे केवल चित्रों और बिंबों के ज़रिए सोच सकते हैं और शब्द के सही अर्थ में संकल्पनाओं ( concepts ) से अपरिचित होते हैं। स्कूलपूर्व आयु के बच्चों में संकल्पनात्मक चिंतन का अभाव निम्न तरह के प्रयोगों से सिद्ध होता है। 

कुछ बच्चों को पेस्ट्री की बनी दो बिल्कुल एक जैसी बड़ी गोलियां दिखाई गईं। उन्होंने गोलियों को ध्यान से देखा और कहा कि वे बराबर-बराबर हैं। इसके बाद उनके सामने ही एक गोली को दबाकर टिकिया की शक्ल दे दी गयी। बच्चों ने ख़ुद देखा कि गोली में और पेस्ट्री नहीं मिलाई गई है और सिर्फ़ उसकी शक्ल बदल दी गई है। फिर भी उनका सोचना था कि टिकिया में पेस्ट्री की मात्रा बढ़ गई है।

बात यह है कि बच्चों का बिंबात्मक चिंतन अभी व्यवहित नहीं होता और पूर्णतः उनके प्रत्यक्ष ( perception ) द्वारा नियंत्रित किया जाता है। वे अभी संकल्पनाओं की मदद से अपने को प्रत्यक्षीकृत वस्तु की कतिपय सर्वाधिक स्पष्ट विशेषताओं से अलग नहीं कर सकते। टिकिया के बारे में सोचते हुए बच्चे देखते हैं कि वह मेज़ पर गोली से ज़्यादा जगह घेरती है। उनका सोचना, जो बुनियादी तौर पर बिंबात्मक है और प्रत्यक्ष से नियंत्रित होता है, उन्हे इस निष्कर्ष पर पहुंचाता है कि टिकिया में गोली से ज़्यादा पेस्ट्री है।

अमूर्त चिंतन ( abstract thinking )
 
अमूर्त चिंतन, यानि अमूर्त अवधारणाओं के ज़रिए चिंतन व्यावहारिक और ऐंद्रीय अनुभव के आधार पर स्कूली आयु के बच्चों में विकसित होता है और आरंभ में इसके रूप सरल होते हैं। स्कूली आयु के बच्चे में चिंतन अपने को व्यावहारिक कार्यों तथा बिंबों ( प्रत्यक्षों तथा परिकल्पनों ) में ही नहीं, अपितु मुख्यतः अमूर्त संकल्पनाओं और तर्कों ( logic ) के रूप में भी व्यक्त करता है।

स्कूली बच्चों द्वारा गणित, भौतिकी, इतिहास, आदि विभिन्न विषयों का आधारिक ज्ञान प्राप्त करने की प्रक्रिया उनके बौद्धिक विकास के लिए अत्यंत महत्त्व रखती है। विषयों से संबद्ध संकल्पनाओं के निर्माण तथा आत्मसात्करण का अनेक मनोवैज्ञानिक अनुसंधानों के दौरान अध्ययन किया गया है और पता लगाने का प्रयत्न किया गया है कि संकल्पनाओं के कौन-से लक्षण किस क्रम में और किन परिस्थितियों में छात्रों द्वारा आत्मसात् किये जाते हैं। स्कूली अवस्था की समाप्ति तक बच्चे कमोबेश मात्रा में संकल्पनाओं की एक पद्धति विकसित कर लेते हैं। वे न केवल अलग-अलग अवधारणाओं ( जैसे गुरुत्व, स्तनपायी ) को बल्कि अवधारणाओं के पूरे वर्गों या पद्धतियों ( जैसे ज्यामितीय संकल्पनाओं की पद्धति ) को भी इस्तेमाल करना शुरू कर देते हैं।

जैसा कि बताया जा चुका है, इंद्रियजन्य ज्ञान की सीमाओं के बाहर स्थित सर्वाधिक अमूर्त चिंतन भी कभी संवेदनों, प्रत्यक्षों और परिकल्पनों से नाता पूर्णतः नहीं तोड़ पाता। चिंतन-प्रक्रिया और ऐंद्रीय अनुभव के बीच अटूट संबंध छात्रों की संकल्पना-निर्माण प्रक्रिया में विशेषतः महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करता है।

आरंभिक अवस्था में बच्चों को चाक्षुष ( visual ) बिंबों, ठोस ऐंद्रीय सामग्री इस्तेमाल करने में आसानी रहती है। उदाहरण के लिए, बच्चे द्वारा बहुत सारी ऐतिहासिक संकल्पनाओं का आत्मसात्करण बड़ा आसान हो जाता है, यदि उसे इनसे संबंधित चित्र, मॉडल्स, आदि भी दिखाए जाएं और कविताएं व कहानियां भी सुनायी जाएं। दूसरी ओर, हर तरह का चाक्षुषीकरण ( visualization ) और हर तरह की परिस्थिति बच्चों में अमूर्त चिंतन की क्षमता में विकास में सहायक नहीं होती। दृश्य तथा श्रव्य सामग्री की अतिशयता अध्ययनगत विषय के बुनियादी, महत्त्वपूर्ण पहलुओं से बच्चे का ध्यान हटा सकती है और इस तरह उसकी चिंतनात्मक संक्रियाओं ( विश्लेषण तथा सामान्यीकरण ) में बाधा डाल सकती है। इस कारण पढ़ाते समय मूर्त ( concrete ) इंद्रियगम्य और अमूर्त ( abstract ) घटकों में संतुलन बनाए रखे जाना आवश्यक हो जाता है।

किंतु यह सोचना ग़लत होगा कि संकल्पनाओं के आत्मसात्करण के दौरान अमूर्त चिंतन का विकास स्कूली बच्चों के संवेदी-क्रियात्मक और बिंबात्मक चिंतन के विकास को खत्म कर देता या रोक देता है। उल्टे, चिंतन के ये प्राथमिक और आरंभिक रूप पहले जैसे ही जारी रहते हैं और अमूर्त चिंतन के साथ तथा उसके प्रभाव से बदलते तथा सुधरते रहते हैं। चिंतन के सभी भेद और रूप ( बच्चों में भी और बड़ों में भी ) निरंतर विकास करते हैं, हालांकि अलग-अलग श्रेणियों के लोगों में उनके विकास की मात्राएं अलग-अलग हो सकती हैं। उदाहरण के लिए, तकनीशियनों, इंजीनियरों और डिजायनरों में संवेदी-क्रियात्मक चिंतन अधिक विकसित होता है और साहित्य-कला से जुड़े लोगों में बिंबात्मक ( मूर्त-प्रत्यक्षपरक चिंतन )।



इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

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चिंतन की अभिप्रेरणा ( motivation for thinking )

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञानात्मक प्रक्रियाओं को समझने की कड़ी के रूप में चिंतन के कुछ विशिष्ट नियमों विश्लेषण और संश्लेषण पर चर्चा की थी, इस बार हम चिंतन की अभिप्रेरणा पर विचार करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय  अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


चिंतन की अभिप्रेरणा
( motivation for thinking )

विश्लेषण तथा संश्लेषण ही नहीं, सारा चिंतन और सभी सक्रियताएं भी सदा मनुष्य की किन्हीं आवश्यकताओं ( needs ) का परिणाम होते हैं। आवश्यकता के अभाव में कुछ भी नहीं किया जाता है।

किसी भी अन्य मानसिक सक्रियता की भांति ही चिंतन की प्रक्रिया का अध्ययन करते हुए मनोविज्ञान उन आवश्यकताओं तथा अभिप्रेरकों ( motives ) को ध्यान में रखता है और उनका विशेषतः अध्ययन करता है, जो मनुष्य को संज्ञानमूलक सक्रियता में प्रवृत्त होने के लिए उकसाते हैं। इसी तरह वह उन ठोस परिस्थितियों को भी ध्यान में रखता तथा जांचता है, जिनमे विश्लेषण तथा संश्लेषण की आवश्यकता उत्पन्न होती है।

चिंतन ‘शुद्ध’ विचार या तार्किक प्रक्रिया द्वारा नहीं किया जाता, वह भावनाओं और आवश्यकताओं से युक्त मानव की क्रिया है। चिंतन और आवश्यकताओं का अटूट सहसंबंध ( correlation ) अपने को इस अत्यंत महत्त्वपूर्ण तथ्य में व्यक्त करता है कि चिंतन सदा एक निश्चित व्यक्ति का चिंतन होता है, जिसके प्रकृति, समाज और अन्य मनुष्यों के साथ बहुविध संबंध हैं।

मनोविज्ञान में चिंतन के दो प्रकार के अभिप्रेरकों का अध्ययन किया जाता है : विशिष्ट संज्ञानात्मक अभिप्रेरक ( specific cognitive motives ) और अविशिष्ट अभिप्रेरक ( unspecified motives )। पहले मामले में चिंतन उन रुचियों तथा अभिप्रेरकों का उत्पाद होता है, जो संज्ञानमूलक आवश्यकताओं ( बौद्धिक जिज्ञासा, आदि ) का प्रतिनिधित्व करते हैं। दूसरे मामले में चिंतन शुद्ध संज्ञानात्मक कारकों के बजाए कमोबेश बाह्य कारकों के प्रभाव से आरंभ होता है।

उदाहरण के लिए, जब कोई छात्र पाठ की तैयारी या किसी सवाल पर मगज़पच्ची शुरू करता है, तो कोई जरूरी नहीं कि इसके पीछे उसकी कोई नयी बात सीखने की इच्छा हो। हो सकता है कि चह ऐसा केवल बड़ों की मांग पूरी करने के लिए, या अपने साथियों से पिछड़ जाने के डर से या ऐसे ही किसी अन्य कारण से कर रहा हो। फिर भी चिंतन की आरंभिक अभिप्रेरणा चाहे कुछ भी हों, यदि मनुष्य चिंतन की प्रक्रिया में प्रवृत्त होता है, तो वह संज्ञानात्मक अभिप्रेरकों के प्रभाव में आ ही जाता है। प्रायः ऐसा होता है कि छात्र मजबूर किये जाने पर ही पाठ की तैयारी करने बैठता है, किंतु बाद में उसकी, जो वह कर, पढ़ या लिख रहा है, उसमें शुद्ध संज्ञानमूलक रुचि पैदा हो जाती है।

संक्षेप में, मनुष्य सोचना किन्हीं आवश्यकताओं के प्रभाव में शुरू करता है और इस प्रक्रिया में वह शनैः शनैः संज्ञान के लिए अधिकाधिक गहन तथा प्रबल अभिप्रेरक विकसित कर लेता है।


इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

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समय

विश्लेषण और संश्लेषण ( analysis and synthesis )

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञानात्मक प्रक्रियाओं को समझने की कड़ी के रूप में चिंतन के सामाजिक स्वरूप पर चर्चा की थी, इस बार हम चिंतन के कुछ विशिष्ट नियमों विश्लेषण और संश्लेषण पर विचार करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय  अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


विश्लेषण और संश्लेषण
( analysis and synthesis )

संक्रियात्मक दृष्टि से चिंतन तार्किक संक्रियाओं ( logical operations ) की एक पद्धति है, जिनमें से प्रत्येक संक्रिया, संज्ञान ( cognition ) की प्रक्रिया में एक निश्चित भूमिका अदा करती है और अत्यंत जटिल ढ़ंग से अन्य संक्रियाओं – विश्लेषण ( analysis ), संश्लेषण (synthesis ) तथा सामान्यीकरण ( generalization ) – आदि से जुड़ी होती है।

विश्लेषण वस्तु का उसके विभिन्न घटकों में विभाजन और उसके विभिन्न पहलुओं, तत्वों, गुणधर्मों, संबंधों, आदि का समष्टि ( collectivity, totality ) से अपाकर्षण ( abstraction, अमूर्तकरण ) करने को कहते हैं। उदाहरण के लिए, किसी मशीन या यंत्र के काम करने के सिद्धांत को जानने के लिए हम पहले उसके विभिन्न घटकों, पुर्जों की पहचान करते हैं और फिर उसे अलग-अलग हिस्सों में बांटकर देखते हैं। संज्ञान की हर प्रक्रिया में हर वस्तु के साथ भी हम मुख्य रूप से ऐसे ही करते हैं।

विश्लेषण के दौरान वस्तु के गुणधर्म, जो उसके सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण, आवश्यक और दिलचस्प गुणधर्म है, अत्यंत प्रबल क्षोभक सिद्ध होते हैं और इसलिए वे प्रमुख बन बैठते हैं। ये क्षोभक उत्तेजन ( stimulation, excitation ) की सक्रिय प्रक्रिया आरंभ करते हैं ( विशेषतः प्रांतस्था में  ) और प्रेरण के शरीरक्रियात्मक नियम के अनुसार उस वस्तु के अन्य गुणधर्मों के, जो दुर्बल क्षोभक हैं, विभेदन ( discrimination ) को अवरुद्ध कर डालते हैं। अतः मस्तिष्क के उच्चतर भागों में उत्तेजन और अवरोधन के बीच एक निश्चित संबंध विश्लेषण की मानसिक प्रक्रिया की नींव है।

संश्लेषण, विश्लेषण द्वारा अलग-अलग किये गये भागों से समष्टि के, पूर्ण के निर्माण को कहते हैं। संश्लेषण की प्रक्रिया में वस्तु के अलग किये हुए तत्वों का समेकन ( consolidation ) और सहसंबंधन ( correlation ) किया जाता है। उदाहरण के लिए, मशीन या यंत्र के विभिन्न पुर्जों को आपस में मिलान करके उनके बीच मौजूद संबंध और उनकी अन्योन्यक्रिया का ढ़ंग मालूम किये जा सकते हैं। संश्लेषण का शरीरक्रियात्मक आधार प्रांतस्था के कालगत तंत्रिका-संबंधों का आपस में जुड़ना है।

विश्लेषण और संश्लेषण सदा अन्योन्याश्रयी ( interdependent ) होते हैं। उनकी एकता अपने को सहसंबंधन की संज्ञानात्मक प्रक्रिया में ही प्रकट कर देती है। बाह्य विश्व के संज्ञान की आरंभिक अवस्था में मनुष्य मुख्यतया तुलना ( comparison ) के ज़रिए विभिन्न वस्तुओं का ज्ञान प्राप्त करता है। दो या कई वस्तुओं की हर तुलना उन्हें एक दूसरी से संबद्ध ( relate ) करने, यानि संश्लेषण से आरंभ होती है। इस संक्रिया के दौरान मनुष्य संबंद्ध परिघटनाओं, वस्तुओं, घटनाओं, आदि का विश्लेषण करता है, अर्थात वह पता चलाता है कि उनके बीच क्या समान है और क्या असमान। उदाहरण के लिए, बच्चा विभिन्न स्तनपायी जीवों की तुलना करता है और शिक्षक की मदद से शनैः शनैः उनकी समान विशेषताओं को पहचानना सीखता है। इस तरह तुलना सामान्यीकरण की ओर ले जाती है।

सामान्यीकरण विभिन्न वस्तुओं की तुलना और विश्लेषण का परिणाम है। सामान्यीकरण से तुलनागत वस्तुओं की साझी विशेषताओं का अपाकर्षण किया जाता है। ये विशेषताएं दो प्रकार की हो सकती हैं : साम्यमूलक ( similarity based ) और बुनियादी ( basic )। उदाहरण के लिए, हम ऐसी कोई चीज़ पा सकते हैं, जो बहुत विविध वस्तुओं में देखी जाती है। जैसे कि, साझे रंग को कसौटी बना कर हम चेरी के फूल, रक्त, कच्चे मांस, आदि को एक समूह या श्रेणी में शामिल कर सकते हैं। फिर भी यह समानता ( साझी विशेषता ) उपरोक्त वस्तुओं के वास्तव में बुनियादी गुणधर्मों को प्रतिबिंबित नहीं करती। दत्त प्रसंग में उनकी समानता बहुत ही सतही और गौण विशेषता पर आधारित है। ऐसे उथले, सतही विश्लेषण के आधार पर किये गए सामान्यीकरण बहुत कम मूल्य रखते हैं और निरंतर ग़लतियों का कारण बनते हैं। उदाहरण के लिए, ह्वेल की बाह्य विशेषताओं के सतही विश्लेषण पर आधारित सामान्यीकरण से हमें भ्रम हो सकता है कि ह्वेल स्तनपायी जीव नहीं, बल्कि मछली है। इन जीवों की ऊपर बताये ढ़ंग से तुलना करके हम साम्यमूलक लक्षणों ( बाह्य आकृति, मछली जैसा शरीर ) के आधार पर वर्गीकरण करते हैं, न कि बुनियादी लक्षणों के आधार पर। इसके विपरीत यदि हम विश्लेषण के ज़रिए उन विशेषताओं का पता लगाएं, जो बुनियादी हैं, तो हम निश्चय ही ह्वेल को स्तनपायी जीवों में शामिल करेंगे।

इस तरह सभी समजातीय वस्तुओं में साझी बुनियादी विशेषता होती है, किंतु हर साझी साम्यमूलक विशेषता का बुनियादी विशेषता भी होना अनिवार्य नहीं है। साझी बुनियादी विशेषताओं के गहन विश्लेषण तथा संश्लेषण के दौरान और उनके परिणामस्वरूप ही पहचाना जा सकता है।

विश्लेषण, संश्लेषण और सामान्यीकरण के नियम चिंतन के मुख्य विशिष्ट नियम हैं और केवल उनके आधार पर ही उसकी सभी बाह्य अभिव्यक्तियों की व्याख्या की जा सकती है।


इस बार इतना ही।

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समय

चिंतन का सामाजिक स्वरूप

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञानात्मक प्रक्रियाओं को समझने की कड़ी के रूप में चिंतन और वाक् पर चर्चा की थी, इस बार हम चिंतन के सामाजिक स्वरूप पर विचार करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय  अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


चिंतन का सामाजिक स्वरूप
( social aspects of thinking )

चिंतन का भाषा से आंगिक, अविच्छेद्य संबंध ( inalienable relation ) मानव-चिंतन के सामाजिक-ऐतिहासिक स्वरूप का अकाट्य प्रमाण है। संज्ञान की एक आवश्यक पूर्वापेक्षा मनुष्य द्वारा ऐतिहासिक विकास के दौरान अर्जित सारे ज्ञान का सातत्य ( continuum ) है। यह ऐतिहासिक सातत्य तभी संभव है, जब ज्ञान का स्थायीकरण व समेकन किया जाए, सुरक्षित रखा जाए और एक पीढ़ी द्वारा दूसरी, अगली पीढ़ी को सिखाया जाए। संज्ञान के मुख्य परिणामों का ऐसा स्थायीकरण भाषा, पुस्तकों, पत्रिकाओं, आदि के ज़रिए किया जाता है और इन सब में मानव-चिंतन की सामाजिक प्रकृति ( social nature ) स्पष्टतः उभरकर सामने आती है।

मनुष्य के बौद्धिक विकास ( intellectual development ) के लिए मानवजाति द्वारा अपने पूर्ववर्ती सामाजिक-ऐतिहासिक विकास के दौरान संचित ज्ञान का आत्मसात्करण आवश्यक है। मनुष्य द्वारा विश्व के संज्ञान की प्रक्रिया वैज्ञानिक ज्ञान के ऐतिहासिक विकास पर निर्भर होती है और मनुष्य इस विकास के परिणामों को शिक्षा, प्रशिक्षण तथा सारी मानवजाति से संप्रेषण के माध्यम से आत्मसात् करता है।

स्कूल में पढ़ाई की सारी अवधि में बच्चे का मानवजाति द्वारा अपने इतिहास के दौरान अर्जित तथा विकसित ज्ञान, संकल्पनाओं ( concepts), आदि की तैयारशुदा, ऐतिहासिकतः स्थापित तथा ज्ञात पद्धति से साक्षात्कार होता है। फिर भी मानवजाति के लिए जो जाना-पहचाना है और नया नहीं है, वह बच्चे के लिए आरंभ में अनिवार्यतः नया और अनजाना होता है। इसलिए मानवजाति द्वारा संचित ज्ञान-भंडार को आत्मसात् करने के लिए बच्चे को काफ़ी अधिक चिंतनात्मक और सृजनात्मक ( creative ) प्रयास करना पड़ता है। बेशक उसे पहले से विद्यमान संकल्पनाएं और जानकारियां ही आत्मसात् करनी होती है और इस कार्य में बड़े उसका मार्गदर्शन करते हैं, फिर भी इसका मतलब यह नहीं है कि उसे स्वयं सोचना नहीं पड़ता या सृजनात्मक रवैया नहीं अपनाना होता।

यदि बात ऐसी होती, तो ज्ञान का आत्मसात्करण एक नितांत औपचारिक ( formal ), सतही और यांत्रिक प्रक्रिया बन जाती। इसे आज के संदर्भों में ऐसे भी कहा जा सकता है कि यदि ज्ञान के आत्मसात्करण को, बच्चों की चिंतनात्मक और सृजनात्मक प्रक्रियाओं से यदि नहीं जोड़ा जाता है ( जो कि अक्सर आजकल शिक्षा की भाषा और चिंतन की भाषा यानि मातृभाषा के अलग-अलग होने के कारण ज़्यादातर हो रहा है ) तो यह एक औपचारिक, सतही और यांत्रिक प्रक्रिया बन कर रह जाता है और बच्चों के बौद्धिक विकास में बाधा पड़ती है

चिंतन या प्रत्ययन पहले से विद्यमान ज्ञान के भी ( उदाहरणार्थ, बच्चे द्वारा ) और नये ज्ञान के अर्जन के लिए भी ( मुख्यतः वैज्ञानिकों द्वारा ) आत्मसात्करण की मुख्य पूर्वापेक्षा ( rerequisites ) है।


इस बार इतना ही।

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समय

चिंतन और वाक् ( thinking and speech )

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञानात्मक प्रक्रियाओं को समझने की कड़ी के रूप में चिंतन पर चर्चा शुरू की थी, इस बार हम चिंतन और वाक् के संबंधों पर विचार करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय  अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


चिंतन और वाक्
( thinking and speech )

चिंतन ऐंद्रीय ज्ञान से ही नहीं, भाषा और वाक् ( language and speech ) से भी संबद्ध है। इसमें मानव और पशु मानस का एक मूलभूत भेद प्रकट होता है। पशुओं का अति साधारण, अविकसित चिंतन सदा बिंबसापेक्ष तथा प्रभावोत्पादनमूलक होता है और बिंब की सीमाओं को लांघकर अमूर्तनों ( abstracts ) और मनन के स्तर तक नहीं पहुंच सकता। इसका संबंध केवल प्रत्यक्षणीय वस्तुओं से, जो वस्तुएं पशु की आंखों के सामने हैं, उनसे होता है। ऐसा अविकसित चिंतन वस्तुओं का प्रयोग केवल बिंब तथा प्रभावोत्पादन के धरातल पर करता है और उससे ऊपर नहीं उठ पाता।

संज्ञान की वस्तु से उसके किसी गुण को अपाकर्षित करने की संभावना यथार्थ तभी बन सकी, जब वाक् ( speech ) की उत्पत्ति हुई, जिसकी बदौलत मनुष्य ऐसे गुण की धारणा ( concept ) अथवा प्रत्यय ( idea ) को एक एक विशेष शब्द ( word ) में स्थिर कर सका। विचार शब्द में साकार होता है और अन्य लोगों के लिए भी और हमारे लिए भी एक प्रत्यक्ष वास्तविकता बन जाता है। चिंतन कोई भी रूप क्यों न ले, वह भाषा के बिना असंभव है। हर विचार, वाक् के साथ अटूट एकता बनाए रखते हुए पैदा होता तथा विकास करता है। विचार जितना ही गहन तथा व्यापक होगा, मौखिक और लिखित वाक् में उसे उतने ही स्पष्ट, सटीक शब्दों में व्यक्त किया जाता है। इसी तरह किसी विचार की वाचिक प्रस्तुति जितनी परिष्कृत और सटीक होगी, वह विचार उतना ही स्पष्ट तथा बोधगम्य बनेगा।

मनोवैज्ञानिक प्रयोगों के दौरान विशेष अध्ययनों ने दिखाया है कि कुछ छात्र – और वयस्क भी – अपने विचारों को बोलकर व्यक्त किये बिना सवाल हल करने में कठिनाई अनुभव करते हैं। जब वे अपने विचारों को उच्चारित शब्दों का रूप देना और मुख्य प्रस्थापनाओं एक-एक करके तथा बढ़ती सटीकता के साथ ( आरंभ में वे ग़लत भी हो सकती हैं ) दोहराना शुरू करते हैं, तो उन्हें लगता है कि उनका कार्य आसान हो गया है। कोई आदमी जब दूसरों को कोई बात समझाता या अपने विचारों को अपने शब्दों में सूत्रबद्ध करता है, तो वह साथ ही उन्हें अपने लिए भी स्पष्ट बना रहा होता है। विचार की शब्दों में ऐसी प्रस्तुति के लिए उसे अलग-अलग घटकों में तोड़ा जाता है, हर घटक पर पूरा-पूरा ध्यान दिया जाता है और इस तरह से आदमी को अपने ही विचारों को ज़्यादा अच्छी तरह से समझने में मदद मिलती है।

इस प्रकार चिंतन की प्रक्रिया विमर्श ( discussion ) का, सचेतन तथा तर्कपरक विचारणा का रूप ले लेती है, जिसमें इस प्रक्रिया के दौरान पैदा हुए सभी विचार आपस में स्पष्ट और सही ढ़ंग से जुड़े होते हैं। इसलिए शब्द या विचार का वाचिक निरूपण, विमर्शात्मक, यानि बुद्धिसंगत, तर्कपरक और सचेतन चिंतन की पूर्वापेक्षा ( prerequisites ) है।

शब्दों में सूत्रबद्ध और अभिव्यक्त किए जाने पर विचार की अकाल मृत्यु नहीं होती। वह मौखिक अथवा लिखित वाक् में जीवित रहता है और आवश्यकता पड़ने पर हम फिर उसपर लौट सकते हैं, पहले से अधिक ग़ौर से उसे जांच या तौल सकते हैं और अपने मन में स्थित अन्य विचारों से उसकी तुलना भी कर सकते हैं। विचारों का वाचिक प्रक्रिया में सूत्रीकरण उनके निर्माण के लिए अत्यावश्यक है। इस प्रक्रिया में तथाकथित आंतरिक वाक् भी महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करती है : कोई समस्या हल करते हुए मनुष्य जैसे कि अपने से ही परामर्श करता है, बोलकर नहीं सोचता, बल्कि मौन रहकर सोचता है।

कहने का सार यह है कि मनुष्य का चिंतन भाषा से, वाक् से अभिन्न रूप से जुड़ा हुआ है। चिंतन के लिए भौतिक, शाब्दिक रूप धारण करना अनिवार्य है।


इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

चिंतन और ऐंद्रीय ज्ञान

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञानात्मक प्रक्रियाओं को समझने की कड़ी के रूप में ऐच्छिक स्मरण पर विचार किया था, इस बार हम चिंतन को समझने के लिए उस पर चर्चा शुरू करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय  अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


चिंतन की सामान्य विशेषताएं

( general characteristics of thinking )

मनुष्य जीवनभर गंभीर और फ़ौरी कार्यभार तथा समस्याएं हल करता रहता है। ऐसी समस्याओं और अप्रत्याशित कठिनाइयों की उत्पत्ति इसका ज्वलंत प्रमाण है कि परिवेशी विश्व में असंख्य अज्ञात, अपरिचित और प्रच्छन्न ( disguised ) वस्तुएं तथा परिघटनाएं ( phenomenon ) हैं तथा वे उसके जीवन को प्रभावित करती रहती हैं। वे मनुष्य को सोचने को विवश करती हैं और उसे प्रकृति के रहस्यों में अधिकाधिक गहरे पैठने, नयी-नयी प्रक्रियाएं, गुणधर्म और लोगों व वस्तुओं के संबंध खोजने की चुनौती देते हैं।

चिंतन ( thinking ) मनुष्य के जीवन के दौरान निरंतर सामने आनेवाली वस्तुओं के नये, अज्ञात गुणधर्मों को समझने की आवश्यकता के कारण उत्पन्न होता है। मनुष्य का पुराना ज्ञान-भंडार अपर्याप्त सिद्ध होता है। ब्रह्मांड़ अनंत-असीम है और इसके संज्ञान की प्रक्रिया का भी कोई अंत नहीं है। चिंतन सदा नये, अज्ञात की ओर लक्षित होता है। सोचते हुए हर मनुष्य नयी खोजें करता है, चाहे वे अत्यंत छोटी और केवल उसके अपने लिए ही क्यों ना हों।

चिंतन वाक् ( speech ) से अविभाज्यतः जुड़ा हुआ है और तात्विकतः नये की तलाश व खोज की एक समाजसापेक्ष मानसिक प्रक्रिया है। चिंतन व्यावहारिक सक्रियता के आधार पर ऐंद्रिय ज्ञान से पैदा होता है और इसकी सीमाओं से कहीं दूर तक व्याप्ति रखता है। यह विश्लेषण ( analysis ) और संश्लेषण ( synthesis ) की मदद से वास्तविकता ( reality ) का व्यवहित तथा सामान्यीकृत परावर्तन करने में सक्षम होता है।

ऐंद्रीय ज्ञान और चिंतन

संज्ञान ( cognition ) से संबंधित सक्रियता संवेदनों ( sensations ) और प्रत्यक्षों ( perceptions ) से शुरू होती है और फिर चिंतन में संक्रमण करती है। कोई भी चिंतन, यहां तक कि अति विकसित चिंतन भी ऐंद्रीय ज्ञान से, यानि संवेदनों, प्रत्यक्षों और परिकल्पनों से निरपेक्ष नहीं होतासोचने की सामग्री का एक ही स्रोत है – ऐंद्रीय ज्ञान। संवेदनों और प्रत्यक्षों के ज़रिए चिंतन बाह्य विश्व और उसके परावर्तन से सीधे जुड़ा होता है। इस परावर्तन की यथातथ्यता ( preciseness ) के बारे में, प्रकृति तथा समाज के रूपांतरण के दौरान व्यवहार द्वारा निरंतर जांच की जाती है।

विश्व के सर्वतोमुखी ( versatile ) संज्ञान के लिए उसका हमारे रोजमर्रा के संवेदनों तथा प्रत्यक्षों से पैदा होनेवाला ऐंद्रीय चित्र आवश्यक तो है, किंतु पर्याप्त नहीं है। इस प्रत्यक्षतः देखी गई वास्तविकता के बिंब से विभिन्न वस्तुओं, घटनाओं, व्यापारों, आदि की अत्यंत जटिल परस्पर-निर्भरता, उनके कारणों तथा परिणामों और एक से दूसरे में संक्रमण के बारे में शायद ही कोई जानकारी मिल पाती है। अपनी सारी बहुविधता तथा प्रत्यक्षता के साथ हमारे प्रत्यक्षों में प्रकट होनेवाली निर्भरताओं तथा संबंधों की इस गुत्थी को केवल इंद्रियों की मदद से सुलझा पाना असंभव है।

उदाहरण के लिए, हम हाथ से किसी वस्तु को छूकर ताप का जो संवेदन पाते हैं, वह हमें उस वस्तु की तापीय अवस्था का स्पष्ट आभास नहीं देगा। यह संवेदन एक ओर तो वस्तु की तापीय अवस्था पर निर्भर होता है और, दूसरी ओर , स्वयं मनुष्य की अवस्था पर ( यानि इस पर कि उसने दत्त वस्तु को छूने से पहले अधिक गर्म वस्तुओं को छुआ था या अधिक ठंड़ी वस्तुओं को )।

यह साधारण मिसाल ही दिखा देती है कि ऐंद्रीय ज्ञान में उपरोक्त निर्भरताएं एक अविभाज्य समष्टि के तौर पर सामने आती हैं। प्रत्यक्ष, संज्ञान के कर्ता ( मनुष्य ) और विषय ( वस्तु ) के बीच अन्योन्यक्रिया ( interaction ) के कुल, समुचित परिणाम को ही प्रस्तुत करता है। फिर भी रहने और काम करने के लिए यह जरूरी है कि हम सबसे पहले बाह्य वस्तुओं को उनकी हैसियत से ही, यानि कि जैसी वे वास्तव में हैं, वैसे ही रूप में जानें, चाहे वे हमें कैसी भी क्यों न लगती हों और चाहे उनका संज्ञान किया जा सकता हो या न किया जा सकता हो।

संपूर्ण चित्र जिन छोटे अंशों से बना है, उन्हें समझ पाने के लिए, अर्थात उन्हें उनके परिवेश से पृथक करके हरेक की अलग से जांच करने के लिए, दूसरे शब्दों में कहें, तो संज्ञान के कर्ता तथा वस्तु की अन्योन्यक्रिया के प्रत्यक्ष प्रभाव से परे भी जाने के लिए ऐंद्रीय ज्ञान के दायरे के भीतर ही रहने से काम नहीं चल सकता, तो संवेदनों और प्रत्यक्षों से चिंतन में संक्रमण आवश्यक है। भारतीय योग दर्शन सिखाता है कि वास्तविक ज्ञान तभी प्राप्त किया जा सकता है, जब समस्त ध्यान वस्तु पर केंद्रित किया जाए और अन्य सभी अनावश्यक मानसिक सक्रियताओं को दबा दिया जाये। योग-दर्शन ने शरीर के नियंत्रण ( आसन, प्राणायाम, आदि के ज़रिए ) और ध्यान तथा चिंतन जैसी मानसिक प्रक्रियाओं के नियंत्रण के लिए अष्टांग-योग नामक एक विशेष प्रणाली भी विकसित की।

चिंतन बाह्य विश्व में आगे, और गहरे पैठना सुनिश्चित करता है और वस्तुओं, परिघटनाओं, आदि के सहसंबंधों की जानकारी देता है। वस्तुओं की तापीय अवस्था के निर्धारण की उसी सरल मिसाल से इसे भी समझा जा सकता है। चिंतन के ज़रिए हम उपरोक्त दो निर्भरताओं को मानसिकतः एक दूसरी से अलग अथवा अपाकर्षित कर सकते हैं। यह मध्यस्थता के द्वारा किया जाता है – हम वस्तु की तापीय अवस्था का निर्धारण करने वाले व्यक्ति की अवस्था को अनदेखा कर सकते हैं, क्योंकि वस्तु के तापमान को सीधे हाथ से छूकर नहीं, अपितु अप्रत्यक्ष, व्यवहित ढ़ंग से, थर्मामीटर की मदद से भी मापा जा सकता है। इस अपाकर्षण के परिणामस्वरूप वस्तु का ऐंद्रीय बिंब वस्तु की ही क्रिया के रूप में प्रकट होता है, यानि वस्तुपरक रूप से निर्धारित होता है। यह मिसाल दिखाती है कि अमूर्त, व्यवहित चिंतन कैसे काम करता है : वह जैसे कि वस्तु के कुछ गुणधर्मों ( उदाहरणार्थ, हाथ तथा वस्तु की अन्योन्यक्रिया ) को अनदेखा करके ध्यान अन्य गुणधर्मों ( वास्तविक तापमान, आदि ) पर संक्रेंद्रित कर देता है

संवेदनों, प्रत्यक्षों और परिकल्पनों पर आधारित चिंतन की प्रक्रिया ऐंद्रीय ज्ञान की सीमाएं लांघ जाती है, अर्थात् मनुष्य बाह्य विश्व की ऐसी परिघटनाओं, उनके गुणधर्मों तथा संबंधों का ज्ञान करने लगता है जिनका वह सीधे इंद्रियों द्वारा अवबोध नहीं कर सकता और इसलिए जो प्रत्यक्ष रूप से प्रेक्षणीय नहीं हैं। उदाहरण के लिए, समकालीन भौतिकी की एक सर्वाधिक पेचीदी समस्या मूलकणों के सिद्धांत का विकास है। किंतु इन अतिसूक्ष्म कणॊं को अत्यंत शक्तिशाली माइक्रोस्कोपों की मदद से भी नहीं देखा जा सकता। दूसरे शब्दों में, उनका प्रत्यक्ष प्रेक्षण संभव नहीं है और उनकी केवल मानसिकतः परिकल्पना की जा सकती है। वैज्ञानिकों ने अमूर्त व्यवहित चिंतन के ज़रिए ही सिद्ध किया है कि ऐसे अदृश्य मूलकणों का वास्तव में अस्तित्व है और उनके अपने निश्चित गुणधर्म हैं। इन गुणधर्मों का ज्ञान भी अप्रत्यक्ष रूप से, चिंतन द्वारा प्राप्त किया गया है।

चिंतन वहां शुरू होता है, जहां ऐंद्रीय ज्ञान अपर्याप्त या शक्तिहीन सिद्ध हो जाता है। चिंतन संवेदनों, प्रत्यक्षों और परिकल्पनों में आरंभ किये गए मन के संज्ञानमूलक कार्य को आगे जारी रखता है और उसकी सीमाओं से आगे बहुत दूर तक जाता है

उदाहरण के लिए, हम आसानी से जान सकते हैं कि किसी सुदूर नक्षत्र की ओर ५०,००० किलोमीटर प्रतिसेकंड की रफ़्तार से जा रहे अंतर्ग्रहीय यान की गति प्रकाश की गति के केवल छठे भाग के बराबर है। हालांकि हम ३,००,००० किलोमीटर प्रतिसेकंड और ५०,००० किलोमीटर प्रतिसेकंड की रफ़्तार से चल रही वस्तुओं की गतियों में अंतर को न सीधे देख सकते हैं और न कल्पना ही कर सकते हैं। हर मनुष्य की यथार्थ संज्ञानात्मक सक्रियता में ऐंद्रीय ज्ञान और चिंतन अन्योन्याश्रित ( Interdependent ) होते हैं और निरंतर एक दूसरे में संक्रमण करते रहते हैं


इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय