मनोविज्ञान पर डाउनलोडे़बल पीडीएफ़ सामग्री

हे मानवश्रेष्ठों,
मनोविज्ञान पर यहां पेश की जा रही सामग्री के बारे में कुछ मानवश्रेष्ठों द्वारा यह आकांक्षा व्यक्त की गई है कि अब तक प्रस्तुत हो चुकी सामग्री को, और बाद में आने वाली सामग्री को भी, पीडीएफ़ फ़ाइल-रूप में डाउनलोड किये जाने की व्यवस्था कर दी जाए।
इसी हेतु अब तक की सामग्री को पांच भागों में समेकित कर, उनके पीडीएफ़ डाउनलोड करने के लिए लिंक इस बार यहां दिये जा रहे हैं। बाकी सामग्री के लिंक भी यथासमय प्रस्तुत कर दिये जाएंगे।
इन्हें साइड बार में भी डाल दिया गया है, जहां ये बाद में भी उपलब्ध रहेंगे।


इस भाग में हम जानेंगे कि मनोविज्ञान क्या है? इसकी विषयवस्तु क्या है? हम देखेंगे कि मनोविज्ञान संबंधी धारणाओं का इतिहास क्या है? मन, मस्तिष्क और चेतना क्या है?
इस भाग में हम जानेंगे कि समकालीन मनोविज्ञान की प्रवृत्तियां कौनसी हैं? व्यवहारवाद और मनोविश्लेषण क्या है? सामान्य मनोविज्ञान की संकल्पना क्या है? इसकी शोध प्रणालियां क्या है?
इस भाग में हम जानेंगे कि मन, चिंतन और चेतना क्या हैं? मन और चेतना का विकास कैसे हुआ? सहजवृत्तियां और अनुकूलित संबंध क्या है? पशुओं के बौद्धिक व्यवहार के मूल में क्या है? मानस की परिवेश पर निर्भरता क्या है? पशुओं और मनुष्य के मानस में क्या भेद हैं? चेतना के विकास में श्रम और भाषा की क्या भूमिका है?
इस भाग में हम देखेंगे कि सक्रियता के स्रोत के रूप में आवश्यकताएं क्या हैं? आवश्यकताओं की क़िस्में क्या हैं? उनका विकास कैसे हुआ? सक्रियता और उसके लक्ष्य क्या हैं? सक्रियता की संरचना क्या है? आदतें और उनकी संरचना क्या है? अभ्यास क्या है? कौशल क्या है? मनुष्य की सक्रियता के प्रमुख रूप क्या हैं और उनका विकास कैसे हुआ? खेल और उनकी सक्रियता में भूमिका क्या है? अधिगम और अध्ययन क्या है? श्रम क्या है?
इस भाग में हम देखेंगे कि संप्रेषण की अवधारणा क्या है? संप्रेषण और सक्रियता के संबंध क्या हैं? संप्रेषण के साधन के रूप में भाषा क्या है? शाब्दिक और अशाब्दिक संप्रेषण क्या है? वाक् का विकास किस तरह होता है? सक्रियता और संप्रेषण में सामाजिक प्रतिमानों की क्या भूमिका है? संप्रेषण में भूमिका अपेक्षाएं क्या हैं? मनोवैज्ञानिक संपर्क और अंतर्वैयक्तिक टकराव क्या हैं? मित्रों के बीच और परस्पर समझ के रूप में संप्रेषण क्या है? एक दूसरे को जनने के क्रियातंत्र क्या होते हैं? संप्रेषण में प्रतिपुष्टि और प्रशिक्षण क्या है?


इस बार इतना ही।
अगली बार संज्ञानात्मक प्रक्रियाओं को समझने की कड़ी में चिंतन पर चर्चा शुरू करेंगे।
जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय

ऐच्छिक स्मरण ( voluntary memorization ) – २

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञानात्मक प्रक्रियाओं को समझने की कड़ी के रूप में ऐच्छिक स्मरण पर विचार शुरु किया था, इस बार हम उसी चर्चा को और आगे बढ़ाएंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय  अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


ऐच्छिक स्मरण – २
( voluntary memorization )

जब सामग्री बहुत होती है, जिससे उसे बार-बार दोहराना जरूरी हो जाता है, तो उसे तीन तरीक़ों से याद किया जा सकता है : आंशिकतः ( आंशिक प्रणाली ), पूर्णतः ( अविभाज्य प्रणाली ), और आंशिकतः व पूर्णतः ( संयुक्त प्रणाली )। सबसे अधिक युक्तिसंगत अंतिम प्रणाली है और सबसे कम युक्तिसंगत प्रथम प्रणाली। आंशिक प्रणाली में अलग-अलग भागों को एक दूसरे से स्वतंत्र रूप से और समष्टि को ध्यान में रखे बिना याद किया जाता है। इसमें धारण-अवधि बहुत कम हो जाती है। इससे अधिक उत्पादक अविभाज्य प्रणाली है, जो कर्ता के सामने सामग्री की सामान्य अंतर्वस्तु प्रस्तुत करती है और इस तरह से अलग-अलग भागों को उनके अन्योन्यसंबंध को ध्यान में रखते हुए समझने तथा स्मरण करने की संभावना देती है।

किंतु जटिलता की दृष्टि से विभिन्न भागों में अंतर हो सकता है। यह पाया गया है कि यदि सामग्री बहुत अधिक है, तो आरंभिक और अंतिम भागों की तुलना में बीच के भाग को याद कर पाना सामान्यतः ज़्यादा कठिन होता है। ऐसे मामलों में सर्वाधिक कारगर संयुक्त प्रणाली सिद्ध होती है, जिसमें पहले सामग्री को उसकी समग्रता में समझा और साथ ही अलग-अलग भागों में बांटा जाता है, फिर इन भागों, विशेषतः सबसे कठिन भागों को एक-एक करके याद किया जाता है और अंत में सारी सामग्री को एक साथ दोहराया जाता है। स्मरण की यह प्रणाली स्मृतिक क्रिया की संरचना के अधिकतम अनुरूप है, जिसमें निम्न संक्रियाएं शामिल है : सामग्री के स्वरूप की सामान्य समझ, अलग-अलग समूहों का निर्धारण और पहले अंतरासमूह और फिर अंतर्समूह संबंधों की स्थापना

सामग्री को पुनर्प्रस्तुत करने की योग्यता उसके अनिवार्यतः लंबे समय तक याद रहने की परिचायक नहीं होती। अतः शिक्षक को हमेशा सामग्री की कई-कई बार आवृति ( repetition ) करवानी चाहिए, ताकि वह छात्र को अच्छी तरह याद हो जाए। किंतु यह भी याद रखा जाना चाहिए कि दोहराना तभी फलप्रद हो सकता है, जब वह सोद्देश्य, सार्थक और सक्रिय हो। अन्यथा वह रटकर याद कर लेने की ओर ले जाएगा। इसलिए पुनरावृत्ति की सर्वोत्तम प्रणाली यह है कि आत्मसात्कृत सामग्री को छात्र की सक्रियता में शामिल कर दिया जाए।

प्रयोगात्मक शिक्षण के अनुभवों ने दिखाया है कि यदि पाठ्यक्रम-सामग्री को कार्यभारों की एक सुविचारित पद्धति में व्यवस्थित कर दिया जाए, जिसमें हर चरण पूर्ववर्ती चरण पर आधारित होता है, तो सारी महत्त्वपूर्ण सामग्री अपने को छात्र की सक्रियता में अनिवार्यतः दोहराएगी, जिसमें छात्र का उससे हर स्तर पर और अलग-अलग संदर्भों में बार-बार सामना होगा। ऐसी परिस्थितियों में छात्र आवश्यक जानकारी को याद किये बिना भी, यानि अनैच्छिक रूप से आत्मसात् कर लेते हैं। नयी जानकारी में विलयित ( merged ) होकर पहले का आत्मसात्कृत ज्ञान न केवल दोहराया और अद्यतन ( updated ) बनाया जाता है, बल्कि एक नये परिप्रेक्ष्य ( perspective ) में रखे जाकर तथा एक और आयाम ( dimension ) ग्रहण करके गुणात्मकतः ( qualitatively ) बदल जाता है

ज्ञान के आत्मसात्करण में ऐच्छिक और अनैच्छिक स्मरण

शिक्षण में ऐच्छिक ही नहीं, अनैच्छिक स्मरण पर भी जोर दिया जाना चाहिए। तुलनात्मक अध्ययनों से छात्रों द्वारा नये ज्ञान के आत्मसात्करण में उनका स्थान व भूमिका प्रकट हुए हैं और वे परिस्थितियां मालूम की गयी हैं, जिनमें वे सबसे अधिक कारगर सिद्ध होते हैं।

वस्तुओं के वर्गीकरण की प्रक्रिया में, यानि सक्रिय मानसिक क्रिया के दौरान उन वस्तुओं के अनैच्छिक स्मरण ने, सामग्री के केवल प्रत्यक्ष पर आधारित ऐच्छिक स्मरण की तुलना में बेहतर परिणाम दिये। इसी प्रकार जब विद्यार्थी एक अपेक्षाकृत कठिन टेक्स्ट की योजना बना रहे थे, ताकि उसकी अंतर्वस्तु को समझ लिया जाए, तो उन्होंने केवल साधारण पठन पर आधारित ऐच्छिक स्मरण की तुलना में बेहतर परिणाम दिखाए। अतः जब अनैच्छिक स्मरण सामग्री के संसाधन की सार्थक तथा सक्रिय प्रणाली पर आधारित होता है, तो वह ऐच्छिक स्मरण की तुलना में ज़्यादा कारगर और उत्पादक पाया जाता है, यदि यह ऐच्छिक स्मरण भी ऐसी ही प्रणालियों पर आधारित न रहा हो।

जब एक ही जैसी सामग्री-संसाधन प्रणालियां प्रयोग में लाई जाती हैं ( जैसे, उदाहरण के लिए, सामग्री का वर्गीकरण ) तब आरंभ में अनैच्छिक स्मरण ( आरंभिक स्कूली अवस्था में ) अधिक उत्पादक होता है, किंतु बाद में शनैः शनैः अपनी उत्कृष्टता खो देता है और वयस्कों के मामले में तो ऐच्छिक स्मरण ही अधिक फलदायी होता है। अनैच्छिक और ऐच्छिक स्मरण की प्रभाविता में इन परिवर्तनों का कारण, संज्ञानात्मक और स्मृतिक क्रियाओं के बीच उनके निर्माण की प्रक्रिया में बननेवाले जटिल संबंध होते हैं। स्मृतिक क्रिया, संज्ञानात्मक क्रिया के आधार पर बनकर उसके पीछे रहती है। वर्गीकरण एक संज्ञानात्मक प्रक्रिया के तौर पर जब विकास के पर्याप्त ऊंचे स्तर पर पहुंचता है, तो स्मरण में सहायक बन सकता है। वास्तव में सामग्री का वर्गीकरण करना सीखने के बाद ही मनुष्य इस मानसिक क्रिया को स्वैच्छिक स्मरण की एक प्रणाली के रूप में इस्तेमाल कर सकता है।

अनैच्छिक स्मरण अधिकतम फलदायी तब होता है, जब छात्र कोई संज्ञानात्मक ( cognitive ) कार्य संपन्न करते हैं, यानि जब सामग्री के विशद ह्रदयंगमन की आवश्यकता होती है। इसका कारण यह है कि ह्रदयंगमन की प्रक्रिया और स्मरणात्मक कार्यभार ( assignment ) को साथ-साथ संपन्न करना कठिन या सर्वथा असंभव है। इसके विपरीत ऐच्छिक स्मरण सर्वाधिक परिणामदायी तब होता है, जब सामग्री के ह्रदयंगमन की तुलना में पूरी तरह स्मरणात्मक कार्यभार की पूर्ती को प्राथमिकता दी जाती है। अतः नयी सामग्री का अध्ययन करते समय अनैच्छिक स्मरण पर ज़ोर देना चाहिए और स्मरणात्मक कार्यभार को उसके स्थायीकरण के चरण में ही निर्धारित कर देना चाहिए। इस प्रकार छात्रों की स्मृति-प्रक्रियाओं पर शिक्षक के नियंत्रण की कारगरता काफ़ी हद तक संज्ञानात्मक और स्मरणात्मक कार्यभारों के निर्धारण ( determination ) तथा विभेदन ( discrimination ) पर निर्भर होता है।


इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

ऐच्छिक स्मरण ( voluntary memorization ) – १

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञानात्मक प्रक्रियाओं को समझने की कड़ी के रूप में अनैच्छिक स्मरण पर विचार किया था, इस बार हम ऐच्छिक स्मरण पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय  अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


ऐच्छिक स्मरण – १
( voluntary memorization )

ऐच्छिक स्मरण ( voluntary memorization ) किसी वस्तु को स्मृति में अंकित कर लेने की ओर लक्षित विशेष स्मृतिक क्रियाओं का उत्पाद है। इन क्रियाओं की उत्पादकता लक्ष्यों, अभिप्रेरकों और लक्ष्य-प्राप्ति के साधनों की विशिष्टता पर भी निर्भर होती है। विशेष अध्ययनों ने दिखाया है कि ऐच्छिक स्मरण की एक मुख्य पूर्वापेक्षा ( prerequisites ) सामग्री को सही-सही, पूर्णतः और समुचित क्रम में याद कर लेने के कार्यभार ( assignment ) का स्पष्ट निर्धारण है। विभिन्न स्मरणात्मक लक्ष्य, स्मरण की प्रक्रिया के स्वरूप तथा उचित प्रणालियों के चयन को प्रभावित करते है और इसीलिए प्राप्त परिणामों को भी प्रभावित करते हैं।

एक प्रयोग में छात्रों से दो कहानियां याद कर लेने को कहा गया। उन्हें बताया गया कि पहली कहानी अगले दिन पूछी जाएगी और दूसरी लंबे समय तक याद रखनी होगी। वास्तव में दोनों कहानियां चार सप्ताह बाद पूछी गईं। पाया गया कि दूसरी कहानी, पहली कहानी की अपेक्षा बेहतर याद रही। विदित है कि केवल परीक्षा पास करने के लिए याद की गई सामग्री, दॄढ़ और दीर्घकालिक धारण के लक्ष्य के अभाव में बहुत जल्दी ही भूल जाती है।

इस तरह स्मरणात्मक कार्यभार की भूमिका को, याद करने के इरादे तक ही सीमित नहीं किया जा सकता। विभिन्न स्मरणात्मक कार्यभार सामग्री, उसकी अंतर्वस्तु, संरचना, भाषागत रूप, आदि के प्रति विभिन्न रवैये पैदा करते हैं और इस तरह से स्मरण की यथानुरूप प्रणालियां तय कर देते हैं।

स्मरण के अभिप्रेरक ( motivational ), ऐच्छिक स्मरण की प्रक्रिया में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं। छात्र ह्रदयगंम और याद कर ली गई सामग्री को बहुत जल्दी भूल भी सकते हैं, यदि वह उनके लिए दीर्घकालिक महत्त्व की नहीं है। जिन लोगों में कर्तव्य और उत्तरदायित्व की भावना कम होती है, वे अवश्य याद रखी जानेवाली चीज़ों में से प्रायः बहुत कुछ को भूल जाते हैं।

फलप्रद ऐच्छिक स्मरण की सबसे मुख्य शर्त, युक्तिसंगत ( rationalize ) स्मरण तकनीकों ( memorization techniques ) का समुचित प्रयोग है। ज्ञान तथ्यों, संकल्पनाओं और निर्णयों की एक निश्चित पद्धति है। उन्हें याद करने के लिए यह आवश्यक है कि हम कुछ शब्दार्थ इकाइयों को अलग कर लें, उनके बीच संबंध कायम करें और चिंतन की कमोबेश विकसित प्रक्रियाओं से जुड़ी तार्किक प्रणालियां इस्तेमाल करें। समझ तार्किक, सचेत स्मरण की आवश्यक शर्त है। सामग्री को यदि समझ लिया गया है, तो वह अधिक सहजता से याद हो जाती है और स्मृति में अधिक देर तक सुरक्षित रहती है, क्योंकि वह पहले से आत्मसात्कृत ज्ञान से, मनुष्य के विगत अनुभव से सार्थक रूप से जुड़ गई होती है। इसके विपरीत अस्पष्ट या न समझी गई सामग्री सदा एक ऐसी चीज़ होती है कि जो मनुष्य की चेतना की अंतर्वस्तु से अलग है और उसके विगत अनुभव से कोई ठोस संबंध नहीं रखती। सामग्री यदि समझ में नहीं आती, तो मनुष्य आम तौर पर उसमें विशेष रुचि नहीं दिखाता

तार्किक स्मरण की एक मुख्य प्रणाली याद की जानेवाली सामग्री की योजना बनाना है। इसमें तीन चरण होते हैं : सामग्री को घटकों ( ingredients ) में बांटना ; उन्हें उपयुक्त शीर्षों ( headings ) के अंतर्गत वर्गीकृत करना अथवा किसी दिये हुए भाग को सारी अंतर्वस्तु से आसानी से संबद्ध कुछ आधारभूत मुद्दों के गिर्द व्यवस्थित करना ; और आधारभूत मुद्दों को साहचर्यों की एक अविभाज्य श्रृंखला में जोड़ना। अलग-अलग विचारों और प्रस्थापनाओं का शब्दार्थमूलक घटकों में समेकन, सामग्री की कुल मात्रा में कमी किये बिना, याद की जानेवाली इकाइयों की संख्या घटा देता है। सामग्री को याद करना इसलिए भी आसान हो जाता है कि योजना सामग्री को एक सुव्यवस्थित और सुविभाजित रूप दे देती है और इस तरह वह पढ़ने के चरण में ही समझ में आ जाने योग्य बन जाती है।

सामग्री के स्मरण के लिए, समझने में मदद करनेवाली योजना के विपरीत निर्मित योजना सभी छोटे मुद्दों को अलग-अलग कर देती है और शीर्ष ( headings ) केवल उसे दिखाते या याद दिलाते हैं जिसे पुनर्प्रस्तुत किया जाना है ( जिसकी वज़ह से वे प्रायः आंशिक या अधूरे होते हैं )।

तार्किक स्मरण के लिए तुलना ( comparison ) और विशेषतः वस्तुओं के बीच अंतरों ( differences ) पर दिये जाने वाले बल बहुत महत्त्व रखते हैं। वस्तुओं के बीच जितने ही स्पष्ट अंतर होंगे, स्मृति में वे उतनी ही जल्दी तथा दृढ़तापूर्वक अंकित हो जाएंगी। इस कारण शुरूआत सदा स्पष्ट अंतरोंवाली वस्तुओं की तुलना से करनी चाहिए और इसके बाद ही कम स्पष्ट ब्योरों पर आना चाहिए। इसी तरह, जब सामग्री का तार्किक संसाधन ( logical processing ) व्यापक बिंबमूलक संबंधों ( image-oriented relations ) के आधार पर किया जाता है, स्मरण अधिक सार्थक तथा दीर्घकालिक बन जाता है। अतः जहां भी संभव हो, स्मरण की जानेवाली सामग्री को समुचित बिंबों से संबद्ध किया जाना चाहिए।

स्मरण का एक मुख्य तरीक़ा सामग्री की पुनर्प्रस्तुति और अपने को सुनाना है। किंतु यह प्रणाली, सामग्री को ह्रदयंगम करने के बाद ही अपनानी चाहिए, ख़ास तौर पर यदि सामग्री दुर्बोध है। सामग्री को अपने शब्दों में दोहराने से उसे बेहतर समझने में मदद मिलती है। यदि सामग्री को ठीक से नहीं समझा गया है, तो यह उसे दोहराने में अटपटी, ‘परायी’ भाषा के इस्तेमाल में प्रकट हो जाता है। दूसरी ओर, यदि उसे समझ लिया गया है, तो उसे आसानी से ‘अपनी’ भाषा में ढ़ाल लिया जाता है। इस तरह से बोलकर सुनाकर हम अपनी कमजोरियां सामने लाते हैं और अपने पर नियंत्रण करने की कोशिश करते हैं। यह पुनर्प्रस्तुति, प्रत्यास्मरण की योग्यता ही है जो हमें अपने ज्ञान के बारे में आवश्यक आत्म-विश्वास प्रदान करती है


अगली बार भी ऐच्छिक स्मरण पर ही चर्चा जारी रहेगी।
इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

अनैच्छिक स्मरण ( involuntary memorization )

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञानात्मक प्रक्रियाओं को समझने की कड़ी के रूप में अल्पकालिक और दीर्घकालिक स्मरण पर विचार किया था, इस बार हम अनैच्छिक स्मरण पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय  अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


अनैच्छिक स्मरण
( involuntary memorization )

सक्रियता, जिसमें की स्मरण की प्रक्रियाएं भी शामिल हैं, के लक्ष्यों के अनुसार हम स्मरण के दो मुख्य रूपों में भेद कर सकते हैं : अनैच्छिक स्मरण और ऐच्छिक स्मरण

अनैच्छिक स्मरण ( involuntary memorization ) संज्ञानात्मक ( cognitive ) और व्यावहारिक क्रियाओं का उत्पाद और उनके निष्पादन ( execution ) की पूर्वापेक्षा ( prerequisites )  है। चूंकि स्वयं स्मरण हमारा लक्ष्य नहीं होता, इसलिए हमें लगता है कि वह एक स्वतःस्फूर्त क्रिया है। किंतु वास्तव में यह हमारी सक्रियता की विशिष्टताओं द्वारा निर्धारित एक अत्यंत व्यवस्थित प्रक्रिया है। अनुसंधान दिखाते हैं कि अनैच्छिक स्मरण की परिणामदायिता काफ़ी हद तक कर्ता की सक्रियता के लिए सामग्री के महत्त्व पर निर्भर होती है। यदि सामग्री, कर्ता की सक्रियता के लक्ष्य का अभिन्न हिस्सा है, तो वह मस्तिष्क ( स्मृति ) में उस स्थिति की तुलना में कि जब वह इस लक्ष्य की प्राप्ति की परिस्थितियों या प्रणालियों से जुड़ी होती है, कहीं आसानी से अंकित हो जाती है

एक प्रयोग-श्रृंखला में दूसरी कक्षा के बच्चों और कॉलेज के छात्रों को पांच साधारण सवाल करने को दिये गये। बाद में अप्रत्याशित रूप से दोनों समूहों से सवालों की शर्तों और उनमें जो संख्याएं दी हुई थीं, उनका प्रत्यास्मरण करने को कहा गया। पाया गया कि दूसरी कक्षा के बच्चों को कॉलेज के छात्रों से तिगुनी ज़्यादा संख्याएं याद रह सकीं। इसका सीधा-सीधा कारण यह था कि वे अभी यंत्रवत जोड़-घटाव करना नहीं जानते थे और सवाल हल करना उनके लिए एक सार्थक सोद्देश्य क्रिया थी।

दूसरी कक्षा के बच्चों के विपरीत, जिनके लिए संख्याओं के साथ संक्रियाएं करना उनका लक्ष्य था, कॉलेज के छात्रों ने उसे प्रणाली में शामिल किया, यानि महत्त्व की दृष्टि से उसे गौण माना।

मनुष्य की सक्रियता में विभिन्न भूमिकाएं अदा करनेवाली सामग्री उसके लिए विभिन्न महत्त्व रखती है और इसलिए उसके प्रति उसके रवैये भी अलग-अलग होते हैं तथा उसका प्रबलन ( reinforcement ) भी वह अलग-अलग ढ़ंग से करता है। मुख्य लक्ष्य की अंतर्वस्तु अधिक सक्रिय रवैये का तकाज़ा करती है और सक्रियता के प्राप्त कर लिए गए लक्ष्य के रूप में अधिक प्रबलन पाती है। स्वभाविकतः वह मनुष्य की स्मृति में अधिक आसानी से घुस जाती है और लक्ष्य-प्राप्ति की परिस्थितियों से संबंधित सामग्री की तुलना में अधिक मज़बूती से वहां जमी रहती है।

यह भी दिखाया गया है कि लक्ष्यसापेक्ष सामग्री में स्थापित होनेवाले संबंध जितने ही सारगर्भित होंगे, वह उतने ही बेहतर ढंग से याद होगी और ज़्यादा देर तक स्मृति में बनी रहेगी

छात्रों को ह्र्दयंगम करने के लिए दिये गए टेक्स्टों के अनैच्छिक स्मरण से संबंधित अनुसंधानों ने दिखाया है कि मध्यम कठिनाई का टेक्स्ट, बहुत आसान टेक्स्ट की तुलना में जल्दी याद हो जाता है। जहां तक कठिन टेक्स्ट का सवाल है, तो वह भी आसानी से स्मरण हो जाता है, यदि उसके विश्लेषण की अधिक सक्रिय प्रणालियां इस्तेमाल की जाएं।

इस तरह जिस सामग्री के लिए सक्रिय बौद्धिक प्रयास ( active mental efforts ) की आवश्यकता होती है, उस सामग्री का अनैच्छिक स्मरण अधिक आसान होता है

सर्वविदित है कि हम अनजाने में वही चीज़ें अच्छी तरह और पूरी तरह, कभी-कभी तो जीवनभर के लिए, अपनी स्मृति में अंकित करते हैं, जो हमारे लिए अतिशय महत्त्व रखती हैं और हमारी रुचि तथा संवेग जगाती हैं। हम अपने कार्य की अंतर्वस्तु में जितनी ही गहरी रुचि लेंगे, अनैच्छिक स्मरण उतना ही अधिक कारगर होगा। यदि छात्र को पाठ रोचक लगता है, तो वह उसकी अंतर्वस्तु आसानी से याद कर लेगा। ऐसा तब नहीं होता, जब छात्र शिष्टतावश शिक्षक को सुनता है। प्रशिक्षण के दौरान अनैच्छिक स्मरण की शर्तों के एक विशेशः अध्ययन ने दिखाया है कि ऐसी एक शर्त, सीखने के लिए आंतरिक संज्ञानात्मक अभिप्रेरकों का निर्माण है। वांछित लक्ष्य अध्ययन के उद्देश्यों की एक ऐसी पद्धति विकसित करके पाया जा सकता है, जिसमें हर उपलब्धि अगली उपलब्धि की प्राप्ति का एक अनिवार्य साधन होती है।


अगली बार ऐच्छिक स्मरण पर चर्चा होगी।
इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय