अल्पकालिक और दीर्घकालिक स्मरण

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञानात्मक प्रक्रियाओं को समझने की कड़ी के रूप में स्मरण पर विचार शुरू किया था, इस बार हम अल्पकालिक और दीर्घकालिक स्मरण पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय  अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


अल्पकालिक और दीर्घकालिक स्मरण
( short-term and long-term memorization )

अल्पकालिक स्मरण क्या है? यदि हमें कुछे बेतरतीब संख्याएं, अक्षर या शब्द लिखाए जाते हैं और फिर इसके तुरंत बाद ही उन्हें काग़ज़ पर देखे बिना दोहराने को कहा जाता है, तो हम यह शायद बिना किसी विशेष कठिनाई के कर देंगे। पर अगर यही काम हमसे कुछ समय बाद करने को कहा जाए, तो हम नहीं कर पाएंगे। यह अल्पकालिक स्मरण ( short-term memorization ) की मिसाल है। उन संख्याओं, अक्षरों या शब्दों को दीर्घकाल तक याद रखने के लिए हमें उन्हें कई बार दोहराना होगा और शायद कुछ विशेष तकनीकें भी इस्तेमाल करनी होंगी ( उदाहरण के लिए, पहले से याद सामग्री के साथ उनके बीच संबंध स्थापित करना, अक्षरों को जोड़कर शब्द बनाना, शब्दों को जोड़कर कृत्रिम वाक्य बनाना, आदि )। यह दीर्घकालिक स्मरण ( long-term memorization ) होगा।

‘अल्पकालिक स्मरण’ नाम ही दिखाता है कि यह वर्गीकरण काल पर आधारित है, फिर भी स्मृति की परिघटना को समझने के लिए, काल का यह प्राचल ( parameter ) महत्त्वपूर्ण होने पर भी, अल्पकालिक स्मरण की विशद व्याख्या के लिए पर्याप्त नहीं है। वास्तव में स्मृति की प्रक्रियाओं के विश्लेषण को स्मृति की विभिन्न कालगत परिस्थितियों में मनुष्य की सक्रियता के स्वरूप पर निर्भरता को स्पष्ट करना चाहिए। यह सिद्ध किया जा चुका है कि स्मरण का नियंत्रण ऊपर से निर्धारित, यानि स्मरण की जानेवाली सामग्री के प्रति मनुष्य की सक्रियता के स्वरूप द्वारा नियत कार्यक्रम से होता है

हाल तक अल्पकालिक स्मरण विषयक अनुसंधानों का संबंध मुख्यतः दो कारकों के रूपांतरों से था, स्मरण के लिए उपलब्ध समय ( उद्‍भासन अवधि ) और स्मरण की जानेवाली सामग्री। प्रयोगाधीन व्यक्ति की सक्रियता का लक्ष्य अपरिवर्तित रहा, क्योंकि उसके सामने सदा स्मरण का कार्यभार रखा गया। अतः स्वाभाविक ही है कि दत्त उद्‍भासन अवधि ( exposure period ) में स्मरण की मात्रा स्थिर रहती थी। नवीनतम तथ्य दिखाते हैं कि संज्ञान तथा स्मरण से संबंधित विभिन्न कार्यभार, अल्पकालिक स्मरण की उत्पादिता ( productivity ) पर विभिन्न प्रभाव ड़ालते हैं। ये तथ्य इसके साक्षी हैं कि अल्पकालिक स्मरण, उद्‍भासित सामग्री ( exposed content ) की मनुष्य के मस्तिष्क पर प्रत्यक्ष छाप मात्र नहीं है।

पाया गया है कि क्षणिक उद्‍भासन ( momentary or transient exposure ) की परिस्थितियों में केवल वे कार्यभार उत्पादक सिद्ध होते हैं, जिनकी पूर्ति के लिए रटने का सहारा लिया जाता है। दूसरी ओर, जिन कार्यभारों के लिए सामग्री के सर्वतोमुखी संसाधन ( versatile processing ) की ज़रूरत पड़ती है, वे अल्पकालिक उ‍द्‍भासन की परिस्थितियों में किये जानेवाले स्मरण की प्रभाविता घटा देते हैं। अतः अल्पकालिक स्मरण को एक ऐसी प्रक्रिया कहा जा सकता है, जो मनुष्य की सक्रियता की ऐसी कालगत सीमाओं में संपन्न होती है, जिनमें उद्‍भासित सामग्री का केवल स्वचालित संसाधन किया जा सकता है

तथाकथित संक्रियात्मक स्मरण को अल्पकालिक और दीर्घकालिक स्मरणों के बीच का एक स्तर कहा जा सकता है। वह स्मृति की ऐसी प्रक्रिया है, जो मनुष्य की वर्तमान क्रियाओं में सहायक बनती है और दत्त क्रिया के दायरे में हर निश्चित संक्रिया का परिणाम पाने की एक पूर्वशर्त है। जांचों से पता चला है कि संक्रियात्मक स्मृति की मात्रा, यथातथ्यता ( preciseness ), अस्थिरता, आदि विशेषताएं, एक ओर, सक्रियता की अंतर्वस्तु तथा संरचना द्वारा और, दूसरी ओर, उसके विकास की मात्रा द्वारा निर्धारित होते हैं।

अतः संक्रियात्मक स्मृति की कारगरता और वह जिस सक्रियता में सहायक बनती है, उसकी सफलता काफ़ी हद तक स्मृति की संक्रियात्मक इकाइयों, यानि क्रिया के लक्ष्य की प्रप्ति के दौरान स्मृति द्वारा धारित सामग्री की मात्रा पर निर्भर करती है। संक्रियात्मक इकाइयों के विभिन्न स्तर हो सकते हैं। संक्रियात्मक स्मृति की और वह जिस सक्रियता में काम आती है, उसकी उत्पादकता बढ़ाने का तरीक़ा इष्टतम संक्रियात्मक इकाइयों का निर्माण है।

सूचना संक्रियात्मक स्मरण के स्तर पर अल्पकालिक स्मृति से दीर्घकालिक स्मृति में संक्रमण करती है। उदाहरण के लिए, कोई सुगठित पाठ पढ़ते हुए हमें अक्षरों के जुड़कर शब्द बनने से पहले उन अक्षरों के महत्त्व और शब्दों के जुड़कर वाक्य बनने से पहले उन शब्दों के अर्थों को अवश्य याद रखना चाहिए। यही क्रम आगे भी जारी रहता है। इनमें से प्रत्येक संक्रिया के पूरा कर लिये जाने के बाद संबंधित ठोस अर्थ भुला दिये जाते हैं ( उदाहरण के लिए, हम याद नहीं रखते कि पिछले पन्ने के तीसरे पैराग्राफ़ के दूसरे वाक्य का पहला शब्द क्या था )। किंतु यदि हम मध्यवर्ती संक्रियाओं में ‘संसाधित’ ( processed )  सारी सामग्री को भूल जाते हैं, तो हम एक क्रिया के बाद अगली क्रिया नहीं कर पाएंगे। हर उच्चतर स्तर पर, उत्तरोत्तर अधिक सामान्य अर्थ अंतरित किये जाते हैं, जो शब्दार्थक फ़िल्टरों की पद्धति से गुज़ारे गए विशिष्ट अर्थों को एक सूत्र में पिरोते हैं।

दीर्घकालिक स्मृति सामयिक महत्त्व की सूचना नहीं, वरन् दूरगामी महत्त्व की सूचना ग्रहण करती है, जिसकी मनुष्य के जीवनावश्यक लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए आवश्यकता होती है। मनुष्य की सक्रियता का सहज उत्पाद होने के कारण दीर्घकालिक स्मृति मनुष्य की क्रियाओं की सहगामी छाप ही नहीं है, बल्कि मुख्य रूप से इस छाप की एक अनिवार्य आंतरिक शर्त भी है। दूसरे शब्दों में कहें, तो किसी भी सामग्री का स्मरण पूर्ववर्ती क्रिया का उत्पाद है और इसके साथ ही अगली क्रिया के निष्पादन की शर्त भी है तथा साधन भी है।


इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

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1 टिप्पणी (+add yours?)

  1. bhagat
    मई 02, 2011 @ 04:24:49

    ज्ञानवर्धक परिचर्चा |समय जी आपको बधाई |मैं आपके ब्लॉग पर भाई रवि जी के ब्लॉग कि मदद से पहुंचा हूँ |इसकेलिए उन्हें भी धन्यबाद |और में आपके द्वारा पहले कि गयी पोस्ट को भी पढने कि कोशिश में लगा हुआ हूँ |"समय" पर आकर अच्छा लगा |इतनी गहराई और बौधिकता लिए हुई ये सभी पोस्ट ज्ञानवर्धन के लिए अत्यंत उपयोगी है |एक बार पुनश्च आपके इस कार्य के लिए धन्यबाद |

    प्रतिक्रिया

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