स्मृति के भेद ( classification of memory )

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञानात्मक प्रक्रियाओं को समझने की कड़ी के रूप में स्मृति के शरीरक्रियात्मक और जीवरासायनिक सिद्धांतों पर विचार किया था, इस बार हम स्मृति के भेदों पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय  अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


स्मृति के भेद
( classification of memory )

स्मृति मनुष्य के जीवन तथा सक्रियता के सभी क्षेत्रों में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करती है। इसलिए इसकी अभिव्यक्तियां भी अत्यंत बहुविध ( multifarious ) हैं। स्मृति का वर्गीकरण मुख्य रूप से सक्रियता की विशिष्टताओं पर आधारित होना चाहिए, जिसके दायरे में स्मरण तथा पुनर्प्रस्तुति की प्रक्रियाएं घटती है। यह बात तब भी लागू होती है, जब स्मृति का कोई एक ही रूप ( उदाहरणार्थ, चाक्षुष-स्मृति अथवा श्रवण-स्मृति ) मनुष्य की मानसिक संरचना ( mental structure ) की विशेषता के तौर पर सामने आता है। वास्तव में मानसिक गुण पहले सक्रियता के दौरान जन्मता है और इसके बाद जाकर ही अपने को मानसिक संरचना में प्रकट करता है।

स्मृति के वर्गीकरण का सबसे सामान्य आधार उसकी विषेषताओं की मनुष्य की सक्रियता पर निर्भरता है, जिसके दौरान ही याद करने, याद रखने तथा पुनर्प्रस्तुति की प्रक्रियाएं संपन्न होती हैं। आम तौर पर स्मृति के वर्गीकरण की तीन मुख्य कसौटियां हैं : १) मनुष्य की सक्रियता में प्रधान मानसिक क्रियाशीलता के स्वरूप के अनुसार, जब स्मृति को गत्यात्मक, संवेगात्मक, बिंबात्मक और शाब्दिक-तार्किक स्मृतियों में बांटा जाता है, २) मनुष्य की सक्रियता में निर्धारित लक्ष्यों के स्वरूप के अनुसार, जब स्मृति स्वैच्छिक और अनैच्छिक, इन दो प्रकार की होती है, ३) मनुष्य की सक्रियता के लिए आवश्यक सूचना के धारण की अवधि के अनुसार, स्मृति के तीन भेद बताए जाते हैं, अल्पकालिक, दीर्घकालिक और तात्कालिक

गत्यात्मक, संवेगात्मक, बिंबात्मक और शाब्दिक-तार्किक स्मृति

अलग-अलग प्रकार की सक्रियता में अलग-अलग ढंग की मानसिक क्रियाशीलता की प्रधानता होती है, जैसे पेशीय, संवेगात्मक और बौद्धिक। इनमें से हर प्रकार की क्रियाशीलता उससे संबंधित कार्यों और उनके उत्पादों – गतियां, संवेग, बिंब, विचार – में व्यक्त होती है। इनमें मदद करनेवाले स्मृति के विशिष्ट रूपों को मनोविज्ञान में गत्यात्मक, संवेगात्मक, बिंबात्मक और वाचिक-तार्किक स्मृतियां कहा जाता है।

गत्यात्मक स्मृति ( dynamic memory ) विभिन्न गतियों व उनकी श्रृंखलाओं को याद करने, याद रखने और पुनर्प्रस्तुत करने में व्यक्त होती है। बहुत से लोगों में इस प्रकार की स्मृति अन्य स्मृतियों से प्रबल होती है। इस प्रकार की स्मृति इसलिए महत्त्वपूर्ण है कि वह विभिन्न व्यावहारिक तथा श्रम संबंधी आदतों और चलने, लिखने, आदि की आदतों के निर्माण का आधार प्रदान करती हैं। गत्यात्मक स्मृति के बिना हमें किसी भी क्रिया को करना बार-बार सीखना पड़ेगा। सामान्यतः हम अच्छी गत्यात्मक स्मृतिवाले मनुष्य को उसकी दक्षता, कौशल और साफ़ काम से पहचान सकते हैं।

संवेगात्मक स्मृति ( emotional memory ) संवेगों को याद रखने की क्षमता है। संवेग सदा हमारी आवश्यकताओं व रुचियों की तुष्टि की मात्रा का और परिवेश से हमारे संबंधों का संकेत देते हैं। अतः हर मनुष्य के जीवन तथा सक्रियता में संवेगात्मक स्मृति बड़ी महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करती है। एक बार अनुभव और याद कर लिए गये संवेग संकेत बन जाते हैं और हमें या तो कोई काम करने को प्रेरित करते हैं या ऐसी कोई चीज़ करने से रोकते हैं, जिसने पहले कभी अप्रिय संवेग जगाए थे। अन्य व्यक्ति से सहानुभूति रखने और किसी कलात्मक रचना के नायक के भावनाजगत में भागीदार बनने की योग्यता संवेगात्मक स्मृति पर ही आधारित होती है। एक अर्थ में संवेगात्मक स्मृति अन्य सभी स्मृतियों से प्रबल सिद्ध हो सकती है। हर कोई अनुभव से जानता है कि बहुत-सी घटनाएं, पुस्तकें और फ़िल्में उनके द्वारा मन पर डाली गई छापों और जो भावनाएं उन्होंने जगाई हैं, उनसे ही याद रखी जाती हैं। फिर भी इस तरह की छापें निश्चित वस्तुओं से असंबद्ध नहीं होती, वे साहचर्यों की लंबी श्रृंखला में पहली कड़ी हो सकती हैं।

बिंबात्मक स्मृति ( imagery memory ) परिकल्पनों ( अर्थात् प्रकृति और जीवन के दृश्यों ) और अलग-अलग ध्वनियों, गंधों तथा स्वादों को धारण करती हैं। यह चाक्षुष, श्रवणमूलक, स्पर्शमूलक, घ्राणमूलक और आस्वादमूलक हो सकती हैं। चाक्षुष और श्रवणमूलक स्मृतियों के विपरीत, जो आम तौर पर काफ़ी विकसित होती हैं और सभी सामान्य लोगों के जीवन में प्रमुख भूमिका अदा करती हैं, स्पर्श, घ्राण तथा आस्वाद से संबंधित स्मृतियों को एक तरह से पेशेवर गुण माना जा सकता है। इनके समवर्ती संवेदनों की भांति ये स्मृतियां भी मनुष्य की सक्रियता की विशिष्ट परिस्थितियों में ही सघन विकास करती हैं। उदाहरण के लिए, अंधों और बहरों के मामले में वे चाक्षुष और श्रवणमूलक स्मृतियों की कमी पूरी करते अथवा उनका स्थान लेते हुए विकास के आश्चर्यजनक रूप से ऊंचे स्तर पर पहुंच सकती हैं। बिंबात्मक स्मृति कलाओं से संबंधित पेशों के लोगों में विशेषतः विकसित होती है।

वाचिक-तार्किक स्मृति ( literal-logical memory ) विचारों से संबंध रखती है। इस स्मृति को शाब्दिक भी और तार्किक भी इसलिए कहा गया है कि विचारों का भाषा के बाहर अस्तित्व नहीं होता। चूंकि उन्हें विभिन्न भाषाई माध्यमों से व्यक्त किया जा सकता है, इसलिए उनकी पुनर्प्रस्तुति या तो केवल उनकी अंतर्वस्तु पर लक्षित होगी या उनके शाब्दिक ( वाचिक ) रूप पर। शाब्दिक रूप वाले मामले में यदि सामग्री का कोई शब्दार्थ-विश्लेषण नहीं किया जाता है, तो इसे शब्दशः याद किया जाना अपना तार्किक गुण खो देगा और मात्र एक यांत्रिक क्रिया बन कर रह जाएगा।

दूसरी संकेत पद्धति ( मानवीय भाषा ) की प्रधानतावाली वाचिक-तार्किक स्मृति केवक मनुष्यों की विशेषता है। जहां तक गत्यात्मक, संवेगात्मक और बिंबात्मक स्मृतियों का प्रश्न है, तो अपने सरलतम रूपों में वे पशुओं में भी मिलती हैं। दूसरी स्मृतियों के विकास पर आधारित होकर, वाचिक-तार्किक स्मृति उनके संबंध में प्रधान बन जाती है और स्मृति के अन्य रूप सभी रूपों का विकास उसपर निर्भर होता है। वाचिक-तार्किक स्मृति शिक्षण की प्रक्रिया में छात्रों द्वारा ज्ञान के आत्मसात्करण में प्रमुख भूमिका निभाती है।


अगली बार स्मृति के अन्य भेदों पर चर्चा जारी रखेंगे।
इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

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