प्रत्यक्ष की स्थिरता तथा सार्थकता

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञानात्मक प्रक्रियाओं को समझने की कड़ी के रूप में प्रत्यक्ष और उसके विशिष्ट स्वरूप पर विचार किया था, इस बार हम प्रत्यक्ष की स्थिरता और सार्थकता पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय  अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


प्रत्यक्ष की स्थिरता
( stability of perception )

प्रत्यक्षकर्ता से अपनी स्वतंत्रता के असंख्य स्तरों और उसके सामने अत्यंत विभिन्न परिस्थितियों में प्रकट होने के कारण बाह्य जगत की वस्तुएं अपना रूप निरंतर बदलती और अपने नये-नये गुण व विशेषताएं दिखाती रहती हैं। इसी के अनुसार प्रत्यक्षमूलक प्रक्रियाएं भी बदलती रहती हैं। किंतु प्रत्यक्ष-तंत्र ( अर्थात प्रत्यक्षण की दत्त क्रिया सुनिश्चित करनेवाले विश्लेषकों की समष्टि ) की इन परिवर्तनों का प्रतिसंतुलन ( counterbalance ) करने की योग्यता की बदौलत हम वस्तुओं की आकृति, आकार, रंग, आदि को अपेक्षाकृत स्थिर, अपरिवर्तित समझते हैं।

प्रत्यक्ष के इस गुण को आकार की विशिष्ट मिसाल लेकर समझा जा सकता है। ज्ञात है कि किसी भी वस्तु का बिंब ( दृष्टिपटल पर पड़नेवाला बिंब भी ) उसके और ग्राही के बीच की दूरी घटने के साथ बढ़ता और दूरी बढ़ने के साथ घटता जाता है। किंतु प्रेक्षण की दूरी के साथ दृष्टिपटल ( retina ) पर पड़नेवाले बिंब ( image ) में परिवर्तन होबे पर भी वस्तु के प्रत्यक्षीकृत आयाम ( percepted dimension ) लगभग अपरिवर्तित रहते हैं। किसी भी थियेटर में दर्शकों पर दृष्टिपात करें, सभी के चहरे आकार में लगभग एक बराबर लगते हैं, हालांकि पीछे की क़तारों में बैठे लोगों के चहरों के बिंब वास्तव में हमारे नज़दीक स्थित अगली क़तारों के लोगों के चहरों के बिंबों से छोटे हैं। अब अपने हथेलियों को आगे-पीछे थोड़ा दूर रखकर उंगलियों को देखें, वे आपको समान आकार की लगेंगी, हालांकि उनके दृष्टिपटल पर बनने वाले बिंब असमान आकार के होंगे।

प्रत्यक्ष की स्थिरता का स्रोत क्या है ? क्या यह उसका सहज गुण ( innate properties ) है ?

इस प्राक्कल्पना ( hypothesis ) की जांच के लिए मनोविज्ञानियों ने ऐसे लोगों के प्रत्यक्ष का अध्ययन किया, जो एक घने जंगल में रहते थे और जिन्होंने वस्तुओं को बहुत अधिक दूरी पर कभी नहीं देखा था। जब इन लोगों को ऐसी दूर की वस्तुएं दिखाई गईं, तो उन्हें वे दूर नहीं, बल्कि छोटी लगीं। प्रत्यक्ष के ऐसे ही दोष बहुत अधिक ऊंचाई से नीचे देखनेवाले मैदानी लोगों में भी मिले। जब हम किसी गगनचुंबी इमारत की एक ऊपरी मंज़िल से नीचे सड़क पर लोगों या कारों को देखते हैं, तो हमें उनका आकार छोटा लगता है। किंतु ऐसी ऊंचाइयों पर काम करनेवाले निर्माण मज़दूरों को भूतल की वस्तुएं उनके वास्तविक आकार की ही दिखाई देती हैं।
प्रत्यक्ष की स्थिरता के उसका एक सहज गुण होने की प्राक्कल्पना का खंडन निम्न तथ्य से भी होता है। बचपन में अंधा हुआ एक आदमी जब प्रौढ़ावस्था में आंखों के ऑपरेशन के बाद फिर से देखने लगा, तो वह सोचता था कि वह अपने वार्ड़ की खिड़की से नीचे ज़मीन पर कूद सकता है और उसे कोई चोट नहीं पहुंचेगी, हालांकि खिड़की ज़मीन से १०-१२ मीटर की ऊंचाई पर थी। ऊंचाई का उसका ग़लत अनुमान शायद दूर ज़मीन की चीज़ों को मात्र छोटा समझने का परिणाम था।

प्रत्यक्ष की स्थिरता का वास्तविक स्रोत स्वयं प्रत्यक्ष-तंत्र ( perception-system ) की क्रियाशीलता है। ग्राहियों की गतियों के बहुविध और परिवर्तनशील प्रवाह ( multifarious and variable flow ) और जवाबी संवेदनों में से मनुष्य प्रत्यक्ष का विषय बनी हुई वस्तु की एक अपेक्षाकृत स्थिर तथा अपरिवर्तनशील संरचना को चुनता है। उन्हीं वस्तुओं का विभिन्न परिस्थितियों में बार-बार प्रत्यक्षण इन परिवर्तनशील परिस्थितियों और ग्राही की गतियों के संदर्भ में प्रात्यक्षिक बिंब की निश्चरता को सुनिश्चित करता है और इस बिंब को स्थायित्व तथा स्थिरता प्रदान करता है।

वस्तुओं के प्रत्यक्ष को प्रभावित करनेवाली परिवेशी परिस्थितियों की अंतहीन विविधता के परिणामस्वरूप होनेवाली अपरिहार्य त्रुटियों को ठीक करने और सही बिंब बनाने की हमारे प्रत्यक्ष-तंत्र की योग्यता का प्रमाण ऐसे विशेष चश्मों की मदद से किये जानेवाले प्रयोगों से मिलता है, जो बिंबों को उलटकर, सीधी रेखाओं को वक्र रेखाएं बनाकर या किसी और ढंग से चाक्षुष प्रत्यक्षों को विकृत कर देते हैं। जब मनुष्य ऐसे चश्में लगाता है और उसे अपरिचित परिवेश में रखा जाता है, तो वह पहले शनैः शनैः विकृतियों को सही करना सीखता है और फिर उनपर ध्यान देना ही बंद कर देता है, हालांकि उसके दृष्टिपटल पर वे पूर्ववत् परावर्तित होती रहती हैं।

इस प्रकार स्थिरता का स्रोत प्रतिपुष्टि के तंत्र ( feedback system ) और अपने को प्रत्यक्षीकृत वस्तु तथा उसके अस्तित्व की परिस्थितियों के अनुरूप ढालने की योग्यता से युक्त एक विशिष्ट स्वनियामक ( self regulatory ) क्रिया के रूप में प्रत्यक्ष की प्रकृति ( nature ) ही है। मनुष्य की वस्तुसापेक्ष सक्रियता के दौरान पैदा होनेवाली प्रत्यक्ष की स्थिरता उसके जीवन की एक अनिवार्य शर्त है। ऐसी स्थिरता के बिना मनुष्य इस अति वैविध्यपूर्ण तथा परिवर्तनशील विश्व में दिग्भ्रमित ( confused ) हो जाएगा। प्रत्यक्ष की स्थिरता वस्तुओं और उनके अस्तित्व की परिस्थितियों की एकता को प्रतिबिंबित करते हुए परिवेशी विश्व की आपेक्षिक स्थिरता को सुनिश्चित करती है।

प्रत्यक्ष की सार्थकता
( meatiness or meaningfulness of perception )

यथार्थ प्रत्यक्ष ग्राहियों पर क्षोभकों की क्रिया का परिणाम होता है, फिर भी प्रात्यक्षिक बिंब उनके कर्ता के लिए किसी न किसी रूप में सदा सार्थक होते हैं। मनुष्य में प्रत्यक्ष, चिंतन से, वस्तु के सारतत्व ( essence ) की समझ से घनिष्ठतः जुड़ा हुआ होता है। किसी वस्तु का सचेतन रूप से प्रत्यक्षण करने का अर्थ है मन में उसे कोई नाम देना, अर्थात उसे वस्तुओं के एक निश्चित समूह अथवा श्रेणी में रखना, उसे शब्द में सामान्यीकृत ( generalized ) करना। जब हम कोई अज्ञात वस्तु देखते हैं, तो हम उसका ज्ञात वस्तुओं से कोई साम्य खोजने और उसे किसी श्रेणी में रखने का प्रयत्न करते हैं। प्रत्यक्ष हमारी ज्ञानेन्द्रियों पर प्रभाव डलनेवाले क्षोभकों पर निर्भर नहीं होता, बल्कि वह उपलब्ध जानकारी की सर्वोत्तम व्याख्या या स्पष्टीकरण की एक सक्रिय खोज है। इस संबंध में वे तथाकथित द्वयर्थक चित्र उल्लेखनीय हैं, जिन्हें कभी आकृति माना जाता है और कभी पृष्ठभूमि ( देखें साथ का चित्र )। ये चित्र स्पष्ततः दिखाते हैं कि वस्तु के प्रत्यक्ष में उसका अभिज्ञान ( recognition ) और वर्गीकरण ( classification ) शामिल रहते हैं ( दो पार्श्वचित्र और एक आधारयुक्त कटोरा )।

कहने का सार यह है कि प्रत्यक्ष बहुत सारी प्रत्यक्षज्ञानात्मक क्रियाओं से युक्त एक सक्रिय प्रक्रिया है, जिसका उद्देश्य किसी वस्तु का तदनुरूप बिंब बनाना है। प्रत्यक्ष की क्रियाशीलता मुख्यतः विश्लेषकों के प्रेरक-घटकों की प्रत्यक्ष की प्रक्रिया में भाग लेने में व्यक्त होती है ( जैसे स्पर्श में हाथ चलना, चाक्षुष प्रत्यक्ष में नेत्रों का गति करना, आदि )। क्रियाशीलता इसके अलावा बृहदस्तर पर भी आवश्यक है, ताकि प्रत्यक्षकर्ता मनुष्य वस्तु के संबंध में अपन स्थिति तुरंत बदल सके।


इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

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2 टिप्पणियाँ (+add yours?)

  1. दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi
    फरवरी 26, 2011 @ 14:47:48

    इस कड़ी ने मेरी धारणाओं को पुख्ता किया।

    प्रतिक्रिया

  2. Trackback: संवेदनात्मक संज्ञान या जीवंत अवबोधन | समय के साये में

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