संवेदन और मनुष्य की जीवन-सक्रियता में इनकी भूमिका

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संप्रेषण में प्रतिपुष्टि और प्रक्षिक्षण पर विचार किया था, इस बार हम संज्ञानात्मक प्रक्रियाओं को समझने की कड़ी के रूप में संवेदन और मनुष्य की जीवन-सक्रियता में इनकी भूमिका पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय  अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


संज्ञानात्मक प्रक्रियाएं ( cognitive processes )

संवेदन और मनुष्य की जीवन-सक्रियता में इनकी भूमिका
( sensation and their role in human life-activity )

हम परिवेशी विश्व की बहुविधता का, ध्वनियों तथा रंगों, गंधों तथा ताप, आकारों तथा बहुत सारी दूसरी चीज़ों का ज्ञान अपनी ज्ञानेन्द्रियों ( sense organs ) के ज़रिए पाते हैं, जो मानव शरीर को संवेदनों के रूप में बाह्य तथा आंतरिक परिवेशों की अवस्था के बारे में विपुल जानकारी प्रदान करती हैं

संवेदन ( sensation ) एक सामान्य मानसिक प्रक्रिया है, जो ग्राहियों ( receptors ) पर भौतिक क्षोभकों ( exciter ) के प्रत्यक्ष प्रभाव से शुरू होती है और वस्तुजगत् के गुणधर्मों ( properties ) तथा परिघटनाओं ( phenomena ) और शरीर की आंतरिक दशाओं को प्रतिबिंबित करती है

ज्ञानेन्द्रियां सूचना पाती, छांटती तथा संचित करती हैं और फिर मस्तिष्क को संप्रेषित करती हैं, जो उसके अंतहीन प्रवाह का निरंतर संसाधन करके यथार्थ जगत का और शरीर की दशाओं का चेतना में समुचित प्रतिबिंबन ( परावर्तन ) करता है। इस आधार पर पैदा होनेवाले तंत्रिका-आवेग शरीर के तापमान के नियमन, पाचक अंगों, प्रेरक-तंत्रों तथा अंतःस्रावी ग्रंथियों के कार्य, स्वयं ज्ञानेन्द्रियों की क्रियाप्रणाली, आदि के लिए उत्तरदायी कार्यकारी अंगों तक पहुंचते हैं। प्रति सैकंड हज़ारों संक्रियाओंवाला यह अत्यंत जटिल कार्य अनवरत रूप से जारी रहता है।

वास्तव में संवेदन परिवेश को, बाह्य विश्व ( external world ) को मनुष्य की चेतना ( consciousness ) से जोड़नेवाली एकमात्र कड़ी है। यदि संवेदन न हों तो हमें पदार्थ और गति के रूपों के बारे में कुछ नहीं मालूम हो पाएगा। ज्ञानेन्द्रियां परिवेशी जगत में मनुष्य का मार्गदर्शन करती हैं। यदि मनुष्य की ज्ञानेन्द्रियां काम नहीं करती, तो वह नहीं जान सकता कि उसके चारों ओर क्या हो रहा है, वह न किसी से संप्रेषण कर सकता है, न खाना खोज सकता है और न खतरे से ही बच सकता है।

मनुष्य को अपने चारों ओर की दुनिया से स्थायी संपर्क बनाए रखने की ज़रूरत होती है। व्यापक अर्थ में लिये जाने पर शरीर का परिवेश से अनुकूलन, परिवेश तथा शरीर के बीच सूचना के एक निश्चित संतुलन की अपेक्षा करता है। यदि सूचनाधिक्य या सूचनाभाव के कारण यह संतुलन भंग हो जाता है, तो शरीर के कार्य में गंभीर गड़बड़ियां आ जाती हैं।

इसकी पुष्टि अंतरिक्ष अनुसंधान कार्यक्रम के अंतर्गत किये गये परिवेश से संवेदनात्मक संपर्क के परिसीमन ( limitation ) से संबंधित आयुर्वैज्ञानिक व जीववैज्ञानिक अध्ययनों के परिणामों से भी होती है। जब अध्ययनाधीन व्यक्ति को विशेष कक्षों में रखा गया, जो उन्हें बाह्य विश्व से पूरी तरह अलग कर देते थे ( उनमें हर समय एक उबाऊ आवाज़ ही सुनी जा सकती थी, धुंधले कांचों से केवल जरा-सा प्रकाश अंदर आता था, बाहों और टांगों पर सुरक्षात्मक सिलेंडर आवरण चढ़े होने के कारण उनसे किसी भी प्रकार का स्पर्शमूलक संवेदन पाना असंभव था ), तो वे कुछ ही घंटों में बेहद घबड़ा गये और प्रयोग रोके जाने की मांग करने लगे। आंशिक संवेदनात्मक वंचन ( उदारहणार्थ, शरीर के कुछ भागों को बाह्य प्रभावों से अलग-थलग रखने ) के प्रयोगों ने दिखाया है कि ऐसे भागों की स्पर्श, पीड़ा और ताप से संबंधित संवेदनशीलता क्षीण हो गई। जिन लोगों को लंबे समय तक एक ही रंग के प्रकाश में रखा गया, उनमें दृष्टि-विभ्रांतियां पैदा हो गईं।

ये और बहुत सारे अन्य प्रयोग दिखाते हैं कि कि मनुष्य का शरीर संवेदनों के रूप में परिवेश के संपर्क की घोर आवश्यकता अनुभव करता है। मनुष्य की जीवन-सक्रियता के लिए संवेदनों के महत्त्व का अतिमूल्यांकन शायद ही किया जा सकता है, क्योंकि विश्व तथा अपने विषय में हमारे ज्ञान का स्रोत ये ही हैं। तो संवेदनों का सारतत्व क्या है?

संवेदनों की भौतिकवादी परिभाषा बताती है कि वस्तुएं और उनके गुणधर्म मूल हैं और संवेदन ज्ञानेन्द्रियों पर पदार्थ की क्रिया ( प्रभाव ) के परिणाम। वह यह भी कहती है कि संवेदन हमें यथार्थ वास्तविकता की सही प्रतिकृति देते हैं, यानि वे विश्व को वैसा प्रतिबिंबित करते हैं, जैसा वह वास्तव में है। संवेदनों की और यथार्थ के किसी भी अन्य परावर्तन की प्रामाणिकता ( authenticity ) की कसौटी व्यवहार है, मनुष्य की सक्रियता है

ज्ञानेन्द्रियों का विशेषीकरण लंबे उदविकास का परिणाम है और स्वयं इन्द्रियां, उनकी संरचनागत विशेषताएं तथा गुणधर्म परिवेश से मनुष्य के अनुकूलन को प्रतिबिंबित करते हैं। मनुष्य की संवेदनों में सूक्ष्म भेद करने की क्षमता उसके सामाजिक व श्रमिक कार्यकलाप और उसके समस्त इतिहास व सामाजिक विकास का परिणाम हैं। ज्ञानेन्द्रियां शरीर का परिवेशी विश्व से अनुकूलन सुनिश्चित करती हैं किंतु अपना यह कार्य वे सफलतापूर्वक तभी कर सकती हैं, जब वे परिवेश के वास्तविक गुणधर्मों का सही-सही परावर्तन करें। इसलिए संवेदनों का विशिष्ट स्वरूप जानेन्द्रियों के विशिष्ट स्वरूप की उपज नहीं, बल्कि ज्ञानेन्द्रियों का विशिष्ट स्वरूप संवेदनों के विशिष्ट स्वरूप ( बाह्य विश्व के विशिष्ट गुणों ) की उपज है

संवेदन, मनुष्य की ज्ञानेन्द्रियों पर प्रभाव डालनेवाली और मन से स्वतंत्र रूप से विद्यमान भौतिक विश्व की वस्तुओं तथा परिघटनाओं के यथार्थ गुणों को प्रतिबिंबित करते हैं।

संवेदन वस्तुपरक विश्व ( objective world ) के आत्मपरक बिंब ( subjective images ) हैं। फिर भी संवेदन शरीर पर किसी भौतिक क्षोभक की क्रिया से ही नहीं, अपितु स्वयं शरीर की सक्रियता से भी उत्पन्न होता है। इस सक्रियता को या तो केवल आंतरिक प्रक्रियाओं से व्यक्त किया जा सकता है, या फिर आंतरिक प्रक्रियाओं और बाह्य गतियों, दोनों से। पर उसे हमेशा होना चाहिए। संवेदन एक निश्चित क्षण पर ग्राही पर क्रिया करनेवाले क्षोभक की विशिष्ट उर्जा के तंत्रिका-प्रक्रियाओं की उर्जा में रूपांतरण के फलस्वरूप पैदा होता है। अतः संवेदन, चेतना में प्रतिबिंबित होने वाला बिंब या उसका घटक ही नहीं है, वह सक्रियता या उसका घटक भी है।


इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

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2 टिप्पणियाँ (+add yours?)

  1. दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi
    फरवरी 19, 2011 @ 14:38:25

    बिना किसी सक्रियता के बिंब भी कहाँ हो सकता है।

    प्रतिक्रिया

  2. Trackback: संज्ञान की प्रक्रिया में संवेदनों की भूमिका – १ | समय के साये में

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