संप्रेषण में प्रतिपुष्टि और प्रशिक्षण

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने एक दूसरे को जानने के क्रियातंत्रों पर विचार किया था, इस बार हम संप्रेषण में प्रतिपुष्टि के महत्त्व तथा संप्रेषण-प्रक्षिक्षण पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय  अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


संप्रेषण में प्रतिपुष्टि
( feedback in communication )

संप्रेषण मात्र सूचना का सामान्य अंतरण ही नहीं है, उसके सफल होने के लिए उसमें प्रतिपुष्टि ( feedback ) यानि व्यक्ति द्वारा दूसरे व्यक्ति के साथ संप्रेषणात्मक अन्योन्यक्रिया ( communicative interaction ) के परिणामों से संबंधित जानकारी पाना भी शामिल होना चाहिए

जब कोई आदमी किसी अन्य आदमी को कोई जानकारी देता है, कुछ करने को कहता है, अनुरोध करता है या प्रश्न पूछता है, तो उसे अपनी इन क्रियाओं की कारगरता के बारे में निरंतर सूचनाएं मिलती रहती हैं। परावर्तन के बिना संप्रेषण एक अधूरी क्रिया है। इस जवाबी सूचना से निदेशित ( directed ) होकर आदमी अपने व्यवहार में परिवर्तन, अपनी क्रियाओं की पद्धति का पुनर्गठन ( restructuring ) और शाब्दिक संप्रेषण के साधनों में सुधार करता रहता है, ताकि उसे सही-सही समझा जाए और वांछित ( desired ) परिणाम प्राप्त हो सकें। आत्मपरक ( subjective ) दृष्टि से संप्रेषक को इस प्रतिपुष्टि की जानकारी होना जरूरी नहीं है, किंतु अनजाने में वह हमेशा उसका सहारा लेता है।

संप्रेषणकर्ता प्रतिपुष्टि की भूमिका में किसी कारणवश विघ्न ( disturbance ) पड़ने पर ही उग्रता अनुभव करता है। दूरभाष के जरिए, श्रोता की जानी-पहचानी अनुक्रिया के अभाव में सामान्य बातचीत तक में कठिनाई होती है, हिचक पैदा होती है, बोलने का सामान्य लहज़ा बदल जाता है, वग़ैरह। यदि वक़्ता अपने सहभागी को देख नहीं सकता, तो वह अपने को बंधा हुआ-सा महसूस करता है और अपनी आंगिक क्रियाएं भूल जाता है। सामने वाले यानि संभाषी के व्यवहार के, संप्रेषण के साथ-साथ किये जा रहे प्रत्यक्षण के दौरान प्राप्त संकेत मनुष्य को अपनी आगे की क्रियाएं सुधारने और जो बातें वह कहने वाला है, उनमें आवश्यक परिवर्तन करने की संभावना देते हैं।

संप्रेषण के दौरान संभाषी अथवा श्रोता को देखना या जानना परस्पर समझ की एक महत्त्वपूर्ण पूर्वापेक्षा ( prerequisites ) है। यदि शिक्षक इस बारे में प्राप्त प्रतिपुष्टि-सूचना पर ध्यान नहीं देता है कि उसे छात्रों द्वारा किस हद तक समझा जा रहा है, तो अन्योन्यक्रिया असंभव हो जाएगी और शैक्षिक संप्रेषण टूट जाएगा। यही कारण है कि संप्रेषण के एकालापात्मक ( monologue ) रूप संवादात्मक ( dialogue ) रूपों की तुलना में अधिक कठिन होते हैं। अनुभवी शिक्षक कक्षा में बैठे दर्जनों छात्रों की मुख-मुद्राओं, इशारों से बोलने के ढ़ंग, आदि का अर्थ तुरंत समझ जाता है, उनकी मानसिक अवस्था, भयों, आशाओं, दुख तथा इरादों को भांप जाता है, अपने व्यवहार को उनके अंतर्जगत की अपनी समझ के मुताबिक़ बदलता है और उनपर प्रभाव डालने की सर्वाधिक उपयुक्त विधियां चुनता है। इस तरह अंतर्वैयक्तिक प्रत्यक्षण की प्रक्रियाओं में प्रतिपुष्टि सूचनात्मक तथा स्वनियात्मक भूमिकाएं ( informative and self-appointed roles ) अदा करती हैं।

संप्रेषण की प्रक्रिया में इसका ध्यान रखा जाना चाहिए कि आदमी के बाह्य रूप के कुछ घटक ( चहरा, हाथ, कंधे ), उसकी भंगिमाएं, अंगविक्षेप और लहज़ा भी सूचना के वाहक होते हैं। प्रतिपुष्टि के संकेतों की दृष्टि से संभाषी अथवा श्रोता का चहरा विशेष सूचनात्मक महत्त्व रखता है। अनुभवी वक़्ता सामने वाले के चहरे को देखकर बता सकता है कि वह उसे ध्यान से सुन रहा है ( ‘भावशून्य आंखें’ ), उसकी बातों का विश्वास कर रहा है अथवा नहीं कर रहा है ( ‘संदेहसूचक भाव’ )। वास्तव में दूसरा पक्ष संप्रेषक को समझ रहा है या नहीं, इसका सबसे अच्छा अनुमान इस पक्ष से मिलनेवाले तरह-तरह के संकेतों और मुख्यतः उसकी क्रियाओं से लगाया जा सकता है। शिक्षक के डांटते समय छात्र उसकी बातें ध्यान से सुनता हुआ लग सकता है, किंतु असल में वह बड़ी व्यग्रता से डांट ख़त्म होने और अपने साथियों के साथ खेलने जा पाने की प्रतीक्षा कर रहा हो सकता है।

संप्रेषण का प्रशिक्षण
( training of communication )

फलप्रद संप्रेषण की योग्यताएं या तो स्वतःस्फूर्त ( spontaneous ) ढ़ंग से विकसित होती हैं या फिर वे प्रशिक्षण का उपोत्पाद ( by-product ) होती हैं ( शुरुआती कक्षा के छात्र को ‘पूरा उत्तर’ देना, बड़े द्वारा संबोधित किये जाने पर उसे खड़ा होकर सुनना, आदि सिखाया जाता है )। बड़ी कक्षाओं के छात्र संप्रेषण के मानकों की जानकारी शिष्टाचार विषयक पुस्तकें पढ़कर पाते हैं। फिर भी संप्रेषण-कौशल का विकास एक विशेष कार्य है और उसके लिए विशेष प्रशिक्षण, सामाजिक-मनोवैज्ञानिक ( social-psychological ) या संप्रेषण प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है। शिक्षक के लिए इस प्रशिक्षण का बहुत महत्त्व है।

सामाजिक-मनोवैज्ञानिक प्रशिक्षण के दो उद्देश्य होते हैं, एक, संप्रेषण के नियमों और विशेषतः शैक्षिक संप्रेषण के नियमों का अध्ययन और दो, शैक्षिक संप्रेषण की तकनीक सीखना, यानि अपने में व्यावसायिक शैक्षिक संप्रेषण की आदतें और कौशल विकसित करना।

इसलिए मनोविज्ञान-विशेषज्ञ सामाजिक-मनोवैज्ञानिक प्रशिक्षण की समस्या के सैद्धांतिक तथा व्यावहारिक पहलुओं में भेद करते हैं। व्यावहारिक पहलू के अंतर्गत वे अभ्यास आते हैं, जिनका उद्देश्य शिक्षक को छात्रों से संप्रेषण की आदतें व कौशल विकसित करने में मदद देता है। इन आदतों व कौशलों में निम्न शामिल हैं, पाठ के सभी चरणों में सुसंगत ढ़ंग से काम करने की योग्यता ( जिसे मुख्यतः व्यावहारिक पाठों के दौरान विकसित किया जाता है ), पाठ के दौरान पेशियों को तनावरहित बनाने की योग्यता, ऐच्छिक ध्यान को बांटने की योग्यता और प्रेक्षण योग्यता। वाक् कला के वे अभ्यास विशेषतः महत्त्वपूर्ण हो सकते हैं, जिनका उद्देश्य मौखिक वाक् के मानकों को सुधारना होता है और जो प्रतिपुष्टिकारी श्रव्य टेपों ( audio tapes ) के उपयोग पर आधारित होते हैं। वीडियो रिकार्डिंग की तकनीक से हाव-भाव तथा अंगविक्षेपों का परिष्कार ( refinement ) करने में मदद मिलती है। हर कोई जानता है कि कि टेप पर अपनी आवाज़ सुनकर या पर्दे पर अपने को देखकर, जो कि किसी अन्य व्यक्ति को सुनने या देखने के समान है, मनुष्य अपने बोलने के ढ़ंग, हाव-भाव, अंग-संचालन, आदि की कमियां दूर कर सकता है।

यह प्रक्षिक्षण व्यावसायिक खेलों के रूप में भी आयोजित किया जा सकता है, जिनमें अधिक यथार्थपरक परिस्थितियों का प्रतिरूपण किया जाता है। ऐसे खेलों में सभी नये कौशलों के विकास का उद्देश्य भागीदारों के भावी कार्य को आसान बनाना होता है। संप्रेषण का अभ्यास मनोवैज्ञानिक प्रभाव की कारगरता बढ़ाने का एक साधन है। वह व्यक्ति की संप्रेषण तथा सामूहिक सक्रियता में कारगर भाग लेने की क्षमता और वैयक्तिक गुणों में वृद्धि करता है।


इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

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1 टिप्पणी (+add yours?)

  1. Tarkeshwar Giri
    फरवरी 13, 2011 @ 03:03:27

    काफी अच्छी जानकारी दी हैं अपने.

    प्रतिक्रिया

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