मनोवैज्ञानिक संपर्क और अंतर्वैयक्तिक टकराव

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संप्रेषण-प्रक्रियाओं में भूमिका-अपेक्षाओं पर विचार किया था, इस बार हम मनोवैज्ञानिक संपर्क और अंतर्वैयक्तिक टकरावों पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय  अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


मनोवैज्ञानिक संपर्क और अंतर्वैयक्तिक टकराव
( psychological contacts and interpersonal conflicts)

संपर्क के लिए संप्रेषण की प्रक्रिया का उभयपक्षी होना आवश्यक है। वह तभी बनाये रखा और बढ़ाया जा सकता है, जब सभी पक्ष एक दूसरे का आदर और विश्वास करते हैं। यदि शिक्षक अपेक्षाशील तथा सिद्धांतनिष्ठ होने के साथ-साथ अपने छात्रों का विश्वास भी करता है और उन्हें आदर भी देता है, तो वह निश्चित रह सकता है उसके द्वारा अत्यंत सरसरी तौर पर कही गई बातें भी किशोर द्वारा अनसुनी नहीं की जाएंगी, जबकि किशोर यदि महसूस करता है कि शिक्षक उसके व्यक्तित्व का सम्मान नहीं करता, तो उसके कितने भी अकाट्य और विश्वासोत्पादक तर्कों को भी वह सुनने के लिए तैयार नहीं होगा।

शिक्षक और छात्रों के संबंध न्यूनाधिक हद तक स्कूल के सामान्य वातावरण पर, बच्चे के मनोविज्ञान के बारे में शिक्षक की समझ पर और उसकी अध्यापकीय तथा मनोवैज्ञानिक व्यवहारकुशलता पर निर्भर होते हैं। जो शिक्षक कड़ाई बरतना भी जानते हैं और छात्र की गरिमा का आदर भी करते हैं, वे स्कूल में अनुकूल मनोवैज्ञानिक वातावरण पैदा करते हैं। छात्रों से संप्रेषण की प्रक्रिया में उनके प्रति आदर दिखाकर वे किशोरों में आत्मसम्मान ( self-esteem ) की भावना को प्रोत्साहित करते हैं, जो आगे के संपर्कों के लिए आधार बनती है। स्कूली बच्चों ( विशेषतः किशोरों ) के आत्मसम्मान पर भरोसा करना उनपर हितकर ( salutary ) शैक्षिक प्रभाव डालने का अचूक तरीका है।

किशोर में वयस्कों जैसी स्थिर आत्म-मूल्यांकन ( self-assessment ) की योग्यता नहीं होती। इस वज़ह से वह अपने कार्यों के मूल्यांकन के लिए उन व्यक्तियों का सहारा लेता है, जिनकी वह बड़ी कद्र करता है, जैसे माता-पिता, शिक्षक, आदि। इन बाहरी मूल्यांकनों में अंतर हो सकता है, इसलिए वह वांछित ( desired ) संप्रेषण के लिए विश्वसनीय आधार के तौर पर अपना आत्मसम्मान बनाए रखने का प्रयत्न करता है, यानि अपनी ऐसी छवि ( image ) बनाता है, जो उसकी नज़रों में उन्हें स्वीकार्य होगी। अनुभवी शिक्षक जानते हैं कि किशोरों से घनिष्ठ मनोवैज्ञानिक संपर्क स्थापित करने और बनाए रखने के लिए उनके आत्मसम्मान पर भरोसा करना कितना आवश्यक है।

इसकी एक ठोस मिसाल देखिए। सुनील पढ़ाई में कमजोर था और शेष कक्षा से पिछड़ गया था। उसने औरों के बराबर पहुंचने की आशा खो दी थी, और खराब नंबरों, सहपाथियों के मज़ाक, शिक्षकों की भर्त्सना और मां-बाप की डांट का उसपर कोई असर नहीं होता था। उसके कक्षाध्यापक ने, जो भौतिकी पढ़ाता था, इस स्थिति को सुधारने के लिए सुनील को अलग से भी पढ़ाना शुरु किया। वांछित मनोवैज्ञानिक प्रभाव पैदा करने के लिए वह उसे कक्षा के बाद नहीं, बल्कि उसे शेष कक्षा से आगे-आगे रखने के लिए पाठ से पहले ही नयी सामग्री समझा देता था। फिर जब कक्षा में शेष बच्चे नये सवालों से जूझ रहे होते थे और सबसे तेज़ लड़के भी हार-सी मान जाते थे, वह सुनील को आगे बुलाता और वह बिना किसी कठिनाई के उन सवालों को हल कर दिखाता। कक्षा का सुनील के प्रति रुख़ बदल गया और उसने भी तुरंत इसे महसूस कर लिया। कुछ समय बाद शिक्षक ने उसे कक्षा की ही एक कमजोर लड़की की मदद करने का जिम्मा सौंपा। लड़के को गर्व अनुभव हुआ कि शिक्षक ने उस पर भरोसा किया है, और वह उत्साहपूर्वक इस दायित्व को पूरा करने में जुट गया। लड़की के सामने अपनी गरिमा बनाए रखने के लिए वह नई सामग्री को मन लगाकर और अपनी ही पहल पर पढ़ता और साथ ही पुरानी सामग्री को भी दोहरा लेता, जिसमें कभी वह पिछड़ा हुआ था। अपना आत्मसम्मान वापस पा लेने से अब ढ़ाई के बारे में उसका रवैया बदल गया था। शनैः शनैः सभी विषयों में वह बड़ी अच्छी प्रगति दिखाने लगा। जो चीज़ उसने आखिरकार पा ली थी, उसे, यानि अपने सहपाठियों से मिलनेवाले सम्मान और इससे जुड़े आत्मसम्मान को वह अब गंवाना नहीं चाहता था।

आत्मसम्मान एक अचूक, किंतु नाज़ुक उपकरण ( critical tool ) है। अगर वयस्क लोग किशोर के आत्मसम्मान को ठेस पहुंचाते हैं, चाहे यह लापरवाही या अज्ञानतावश किया गया हो या जानबूझकर, तो वे बुरे प्रभावों का सामना करने की उसकी क्षमता को नष्ट करते तथा उसे अच्छी मिसालों के प्रति उदासीन बनाते हैं। बच्चा कितना भी गया-गुज़रा क्यों ना हो, जब तक उसमें आत्मसम्मान की भावना है, समाज के लिए वह असुधार्य ( incorrigible ) नहीं है, क्योंकि उसे अन्य लोगों और जिस समाज में वह रहता है, उसका आदर करना अभी भी सिखाया जा सकता है। दूसरे शब्दों में , उसके भविष्य के बारे में हम आशावादी रह सकते हैं। इसके विपरीत, यदि मनोवैज्ञानिक संपर्क टूट गया है, तो बिल्कुल संभव है कि अंतर्वैयक्तिक टकराव पैदा हो जाएं।

संप्रेषण की प्रक्रिया का सदा निर्बाध ( seamless ) होना अनिवार्य नहीं है और इसलिए यह नहीं सोचा जाना चाहिए कि उसमें कोई आंतरिक विरोध नहीं पैदा होंगे। कुछ स्थितियों में संप्रेषण की प्रक्रिया में भाग लेनेवाले पक्षों के परस्पर-विद्वेषसूचक रवैये होते हैं, जिनमें दूसरे पक्ष के मूल्यों, कार्यभारों तथा लक्ष्यों ( targets ) के लिए कोई स्थान नहीं होता, और वह अंतर्वैयक्तिक टकरावों का कारण बन जाता है। इन टकरावों का सामाजिक महत्त्व अलग-अलग हो सकता है और अंतर्वैयक्तिक संबंधों के आधार का काम करनेवाले मूल्यों ( values ) पर निर्भर करता है।

अंतर्वैयक्तिक टकरावों के कारणों तथा प्रयोजनों ( purposes ) पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए। संयुक्त सक्रियता के दौरान अंतर्वैयक्तिक टकराव दो प्रकार के निर्धारकों के कार्य के फलस्वरूप पैदा हो सकते हैं : वस्तुसापेक्ष व्यावसायिक मतभेद ( object-relative professional differences ) और व्यक्तिगत व्यावहारिक हितों की असमानता ( inequality of personal practical interests )।

यदि किसी सुनियोजित सामाजिकतः उपयोगी संयुक्त सक्रियता में भाग लेनेवाले लोगों की अन्योन्यक्रिया में वस्तुसापेक्ष व्यावसायिक मतभेदों की प्रधानता है, तो इससे पैदा होनेवाला टकराव विरले ही अंतर्वैयक्तिक संबंधों ( interpersonal relations ) के टूटने, संवेगात्मक तनाव ( emotional stress ) बढ़ने तथा शत्रुता में वृद्धि ( increasing hostility ) होने का कारण बनता है। विरोधी मतों पर खुली बहस के बाद किया गया निर्णय टकराव को ख़त्म कर देता है और साझा लक्ष्य ( common goal ) पाने में मदद करता है। इसके विपरीत व्यक्तिगत व्यावहारिक हितों की असमानताएं प्रायः विद्वेष ( rancor ) और कभी-कभी तो खुली शत्रुता का रूप ले लेती है। साझा ध्येय ना होने के कारण अपने संकीर्ण स्वार्थ ( self-interest ) की पूर्ति में लगे लोग प्रतिद्वंद्वी ( opponent ) बन जाते हैं, यानि अपने को एक ऐसी स्थिति में पाते हैं, जिसमें एक पक्ष की सफलता का मतलब दूसरे पक्ष के लिए हानि होता है। यह अपरिहार्यतः अंतर्वैयक्तिक संबंधों को बिगाड़ता है।

टकराव की स्थितियां संप्रेषण में अर्थविषयक बाधाओं के कारण भी उत्पन्न होती हैं, जो संप्रेषण में भागीदार पक्षों के बीच अन्योन्यक्रिया नहीं होने देतीं। अर्थविषयक बाधा का मतलब है पक्षों द्वारा मांगों, प्रार्थनाओं अथवा आदेशों की अलग-अलग ढ़ंग से व्याख्या किया जाना, जिससे परस्पर समझ और अन्योन्यक्रिया में रुकावट पैदा होती है। उदाहरण के लिए, वयस्कों और बच्चों के संबंधों में अर्थविषयक बाधा इस कारण पैदा हो सकती है कि बच्चा वयस्कों की मांगों के अर्थ को सही-सही समझते हुए भी इन मांगों को नहीं मानता है, क्योंकि वे उसके अनुभव, मत तथा दृष्टिकोण से मेल नहीं खातीं। इनको तभी दूर किया जा सकता है, जब वयस्क बच्चों के मानस, उसके हितों तथा विश्वासों, आयुगत विशेषताओं तथा विगत अनुभवों को जानते व ध्यान में रखते हैं और उसकी संभावनाओं तथा कठिनाइयों का लिहाज़ रखते हुए कार्य करते हैं।

बच्चों और बड़ों के बीच परस्पर समझ पैदा करने के लिए सबसे पहले यह आवश्यक है कि बच्चों को, बड़ों की भाषा तथा बड़ों को, बच्चों की भाषा इस्तेमाल करना सिखाया जाए। यहां तात्पर्य वाक्-प्रवृत्तियों, शब्द-भंड़ार, उच्चारण या वर्तनी से नहीं है, बल्कि इस बात से है कि सामान्यतः स्वीकृत अर्थों की पद्धति के अलावा शब्द मानव चेतना की अन्य सभी परिघटनाओं ( phenomena ) की भांति ही एक विशेष भाग, एक विशेष व्यक्तिगत अर्थ भी रखते हैं, जो अलग-अलग व्यक्तियों के मामले में अलग-अलग होता है। व्यक्तिगत भाव उससे निर्धारित होता है, जो व्यक्ति की सक्रियता के लक्ष्यों को उसके अभिप्रेरकों ( motives ) से जोड़ता है, यानि व्यक्ति की आवश्यकताओं का प्रतिनिधित्व करता है।

एक ही शब्द, क्रिया या स्थिति के अलग-अलग लोगों के लिए अलग-अलग भाव हो सकते हैं। शिक्षक द्वारा छात्र को पिलाई गई डांट ( ‘ तुम आज आधी छुट्टी में मोहन से फिर लड़े!’ ) का शिक्षक और छात्र के लिए एक ही अर्थ होता है और दोनों यह जानते हैं कि यह सब किस बारे में है। फिर भी इस बात का व्यक्तिगत भाव अलग-अलग हो सकता है, शिक्षक के लिए स्कूल में बच्चों का लड़ना अनुशासन का उल्लंघन है, जबकि छात्र के लिए यह अपने से शक्तिशाली छात्र मोहन को अपना मज़ाक उड़ाने से रोकने की एक और कोशिश हो सकता है।

वयस्कों को यह मुख्य लक्ष्य कि बच्चे को वयस्कों की भाषा को उसके व्यक्तिगत भावों की सारी पद्धति के साथ सीखना चाहिए, को ध्यान में रखते हुए बच्चे के व्यक्तिगत भावों की पद्धति को समझने का प्रयत्न भी करना चाहिए। यदि वह बच्चे के साथ अपना तादात्मय स्थापित कर लेता है, तो उसका कार्य बड़ा आसान हो जाएगा। शैक्षिक संप्रेषण में अंतर्वैयक्तिक टकराव प्रायः अध्यापक की स्कूली बच्चे के अंतर्वैयक्तिक भावों की पद्धति को समझने की अक्षमता अथवा अनिच्छा के कारण ही पैदा होते हैं।


इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

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2 टिप्पणियाँ (+add yours?)

  1. दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi
    फरवरी 02, 2011 @ 17:48:38

    बहुत महत्वपूर्ण कड़ी है। इस ने तो हमें बहुत सी बातें सिखाई।

    प्रतिक्रिया

  2. anitakumar
    फरवरी 03, 2011 @ 19:25:20

    आप ने हमारी बात का मान रखा उसके लिए धन्यवाद्। अब मजा आ रहा है पढ़ने में।

    प्रतिक्रिया

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