संप्रेषण-प्रक्रियाओं में भूमिका-अपेक्षाएं

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने वाक् का विकास, संप्रेषण और सामाजिक प्रतिमान पर विचार किया था, इस बार हम संप्रेषण-प्रक्रियाओं में भूमिका-अपेक्षाओं पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय  अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



संप्रेषण-प्रक्रियाओं में भूमिका-अपेक्षाएं
( roles-expectations in communication-processes )

अन्योन्यक्रियाओं में सामाजिक नियत्रंण संप्रेषण में भाग लेनेवालों की भूमिकाओं के अनुसार किया जाता है। भूमिका ( role ) से मनोविज्ञानियों का आशय व्यक्ति से उसकी सामाजिक हैसियत ( पद, लिंग, आयु, परिवार में स्थिति, आदि ) के अनुसार अपेक्षित व्यवहार के मानक रूप में स्वीकृत मॉडल से होता है। व्यक्ति शिक्षक अथवा छात्र, चिकित्सक अथवा रोगी, वयस्क अथवा बच्चे, अफ़सर अथवा मातहत, माता अथवा दादी, पुरुष अथवा स्त्री, मेहमान अथवा मेज़बान, किसी की भी भूमिका अदा कर सकता है। हर भूमिका को कुछ निश्चित अपेक्षाएं और इर्द-गिर्द के लोगों की विभिन्न आशाएं पूरी करनी होती हैं।

सामान्यतः एक ही व्यक्ति अलग-अलग संप्रेषणात्मक परिस्थितियों में अलग-अलग भूमिकाएं निभाता है। उदाहरण के लिए, एक ही व्यक्ति कारख़ाने में प्रबंधक, डॉक्टर के लिए रोगी ( यदि वह बीमार है ), घर में मां का आज्ञाकारी बेटा, मेहमानों के लिए अच्छा मेज़बान, आदि सभी कुछ हो सकता है। भूमिकाओं की अनेकता बहुत बार उनके बीच टकराव, भूमिकाओ का टकराव, पैदा कर देती है। उदाहरण के लिए, शिक्षाशास्त्री के रूप में शिक्षक अपने पुत्र की कमियों को देखता है और इससे कड़ाई से पेश आने की आवश्यकता महसूस करता है, किंतु पिता के नाते वह कभी-कभी उसके नख़रे बर्दाश्त कर जाता है और इस तरह उसके चरित्र के नकारात्मक पहलुओं को बढ़ावा देता है। कक्षा से अनुपस्थित रहनेवाले मां-बाप से मिलने जाने पर शिक्षक को मेहमान के नाते अपने मेज़बानों को उनके बच्चे के व्यवहार से संबंधित अप्रिय लगनेवाली बातें नहीं बतानी चाहिए, मगर शिक्षक के नाते ऐसा करना उसका कर्तव्य है।

विभिन्न भूमिकाएं अदा करनेवाले लोगों की अन्योन्यक्रिया का नियमन ( regulation ) भूमिका-अपेक्षाओं से होता है। व्यक्ति की वास्तविक इच्छाएं कुछ भी क्यों ना हो, उसके परिवेश के लोग उससे एक निश्चित ढ़ंग के व्यवहार की अपेक्षा करते हैं। समाज भूमिका-निर्वाह के ढ़ंग का नियंत्रण तथा मूल्यांकन करता है और मानक ( standards ) से किसी भी प्रकार के गंभीर विचलन ( deviation ) को निंदनीय ठहराता है।

उदाहरण के लिए, सामान्यतः माना जाता है कि माता-पिता को अपने बच्चे के प्रति दयालु, स्नेहपूर्ण तथा नरम होना चाहिए। ऐसा रवैया ( attitude ) भूमिका-अपेक्षा के अनुरूप है और समाज उसे मान्य ठहराता तथा बढ़ावा देता है। किंतु मां-बाप द्वारा बच्चे को अतिशय प्यार दिये जाने और उसकी सभी ग़लतियां माफ़ किये जाने की कठोर भर्त्सना की जाती है। समाज की दृष्टि में मां-बाप द्वारा बच्चे के प्रति अत्यधिक कड़ाई बरता जाना, उन्हें लाड़-प्यार न दिया जाना वैसे ही निंदनीय है, जैसे अतिशय लाड़ करना। इन दो ध्रुवों के बीच वे बहुत सारे रवैये आते हैं, जिन्हें समाज ने माता-पिता की भूमिका का अंग बनाया और मान्य ठहराया है। यही बात परिवार के अन्य बड़ी पीढ़ी के सदस्यों पर भी लागू होती है।
जहां तक बच्चे का संबंध है, तो उसकी भूमिका की अपेक्षाएं हर कोई जानता है, हर कोई उसे विनम्र तथा मेहनती, बड़ों का आदर करनेवाला और पढ़ाई में मन लगानेवाला, आदि देखना चाहता है। घर में भी और बाहर भी बड़े लोग बच्चे को यह बताने का अवसर कभी नहीं चूकते कि वह उनकी आशाओं के अनुकूल निकल रहा है या नहीं।

संप्रेषण की प्रक्रिया सफल तभी हो सकती है, जब उसमें भाग लेनेवाले पक्षों का व्यवहार उनकी पारस्परिक ( mutual ) अपेक्षाओं को पूरा करता है। संप्रेषण की प्रक्रिया में शामिल होने पर हर व्यक्ति न्यूनाधिक सही ढ़ंग से तय कर लेता है उसके शब्दों तथा कार्यों के संबंध में प्रक्रिया के दूसरे भागीदारों की क्या अपेक्षाएं होंगी। दूसरों की अपेक्षाओं का सही पूर्वानुमान और उनके अनुरूप व्यवहार करने की व्यक्ति की क्षमता तथा योग्यता को व्यवहारकुशलता कहा जाता है

बेशक इसका यह अर्थ नहीं कि व्यवहारकुशल आदमी को हमेशा और सभी परिस्थितियों में इन अपेक्षाओं को उचित ठहराने का प्रयत्न करना चाहिए। यदि ऐसी स्थिति पैदा होती है कि आदमी के सिद्धांत और विश्वास, उससे की जा रही अपेक्षाओं से मेल नहीं खाते, तो वह व्यवहारकुशलता को ताक में रखकर दृढ़ता का प्रदर्शन कर सकता है। गैलीलियो के इन प्रसिद्ध शब्दों को कि “फिर भी वह घूमती है” बेशक उससे अपने ‘पृथ्वी के सूर्य के चारो ओर घूमने वाले’ मत का पूर्ण तथा बिलाशर्त त्याग की अपेक्षा करनेवालों के संबंध में व्यवहारकुशलता का उल्लंघन नहीं माना जा सकता। इसे सिद्धांतनिष्ठा, वैज्ञानिक ईमानदारी और नागरिक साहस की अनुपम मिसाल ही कहा जा सकता है।

फिर भी दैनंदिन जीवन में दूसरे लोगों की अपेक्षाओं का ग़लत अर्थ लगाने या उनकी अवहेलना करने को व्यवहारकुशलता की कमी ही माना जाएगा। इससे संप्रेषण की प्रक्रिया में लोगों की अपेक्षाओं पर तुषारपात होता है, संप्रेषण में भाग लेनेवाले व्यक्तियों की अन्योन्यक्रिया में बाधा पड़ती है और कभी-कभी द्वंद की स्थितियां भी पैदा हो जाती हैं। व्यवहारकुशलता की कमी अपेक्षाकृत अहानिकर भी हो सकती हैं, जैसे, उदाहरण के लिए, तब, जब कोई आदमी इस औपचारिक-से प्रश्न के उत्तर में कि ‘आप कैसे हैं?’ अपने और अपने नाते-रिश्तेदारों की सेहत के बारे में और नवीन, किंतु मामूली घटनाओं के बारे में विस्तार से बताने लगता है। किंतु अधिकांशतः व्यवहारकुशलता के नियमों के उल्लंघन के, विशेषतः शैक्षिक संप्रेषण में, गंभीर परिणाम निकलते हैं। इसकी एक मिसाल देखिए।

एक शिक्षक ने सस्वर पाठ की कला सीखने के इच्छुक छात्रों की मंडली बनाई, सप्ताहांत की सांस्कृतिक बाल-सभा में इसकी प्रस्तुतियां सराही जा रही थीं। किंतु एक दिन की अप्रिय घटना ने मंडली के ताने-बाने को हिला दिया। शिक्षक ने अभ्यास के लिए एक नीतिकथा सुझाई, किंतु ज्यों ही उसने उसे पढ़कर सुनाना शुरु किया, एक छात्र ने उठकर कोई और नीतिकथा चुनने को कहा। जब शिक्षक ने कारण जानना चाहा, तो छात्र ने धीमे स्वर में जवाब दिया कि वह कारण नहीं बता सकता। शिक्षक ने उसके अनुरोध को मामूली सनक समझकर उससे बैठ जाने को कह दिया। किंतु जब नीतिकथा का पाठ करते हुए शिक्षक इन अंतिम पंक्तियों तक पहुंचा कि ‘ अंत में भाग्य उसका यह निकला, पति जो मिला वह था लंगड़ा,’ तो वह समझ गया कि अनर्थ हुआ है। मंडली में बोझिल ख़ामोशी छाई हुई थी, लड़कों के चेहरों पर आक्रोश का भाव था और एक लड़की की आंखों में आंसू छलक आए थे। शिक्षक को तब याद हो आया कि मंडली में एक ऐसा लड़का था, जो कोई दो साल पहले एक सड़क दुर्घटना में अपनी एक टांग गंवा बैठा था और उस ड़बडबायी आंखोंवाली लड़की के प्रति वह भावनात्मक लगाव रखता था।

यह सदा याद रखना चाहिए कि व्यक्तियों के किसी भी समूह में सभी ज़िंदा इंसान होते हैं और उनमें से हर एक की भावनाओं का समुचित ध्यान रखा जाना चाहिए। समूह में परस्पर मनोवैज्ञानिक संपर्क की जरा-सी कमी के भी, चाहे वह थोड़े से समय के लिए ही क्यों ना हो, गंभीर व अप्रत्याशित परिणाम निकल सकते हैं। परस्पर समझ के इस तरह बार-बार क्षीण होने से उनके बीच एक दुर्गम खाई पैदा हो जाती है, और सामूहिक लक्ष्यों की शांतिपूर्ण प्राप्ति कठिन हो सकती है।


इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

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4 टिप्पणियाँ (+add yours?)

  1. दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi
    जनवरी 29, 2011 @ 17:00:43

    बहुत महत्वपूर्ण पाठ था, यह। प्रत्येक व्यक्ति के पढ़ने योग्य ही नहीं, उस की जरूरत है उन्हें।

    प्रतिक्रिया

  2. Satish Chandra Satyarthi
    जनवरी 30, 2011 @ 05:53:44

    बेहतरीन श्रृंखला…..बधाई….

    प्रतिक्रिया

  3. महेन्द्र मिश्र
    जनवरी 30, 2011 @ 06:33:38

    प्रेरक ज्ञानवर्धक जानकारी दी है … आभार

    प्रतिक्रिया

  4. लेखिका - Rashmi Swaroop
    जनवरी 30, 2011 @ 08:17:21

    :)padha bhi aur samjha bhi.. Sir.

    प्रतिक्रिया

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