संप्रेषण और भाषा

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संप्रेषण की अवधारणा पर चर्चा की थी, इस बार हम सूचना के विनिमय के रूप में संप्रेषण और भाषा पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


संप्रेषण और भाषा

संप्रेषण की यह परिभाषा कि वह एक ऐसी साझी चीज़ का उत्पादन है, जो लोगों को उनकी अन्योन्यक्रिया ( Interaction ) तथा संयुक्त सक्रियता ( Joint activity ) के दौरान एक सूत्र में पिरोती है, इस धारणा पर आधारित है कि वह साझी चीज़ सर्वप्रथम भाषा है, जो संप्रेषण का साधन है। भाषा एक दूसरे के संपर्क में आनेवालों के बीच संप्रेषण सुनिश्चित करती है, क्योंकि इसे दोनों ही पक्षों द्वारा समझा जाता है, जो कोडित रूप में, यानि विशेषतः चुने गये शब्दों के अर्थों के रूप में सूचना अंतरित करता है, उसके द्वारा भी और जो विकोडित करके, यानि इन अर्थों को समझ कर इस सूचना को ग्रहण करता है तथा तदनुसार अपना व्यवहार बदलता है, उसके द्वारा भी।

दूसरे को सूचना देनेवाले व्यक्ति ( संप्रेषक ) और यह सूचना पानेवाले व्यक्ति ( प्रापक ) को संप्रेषण और संयुक्त सक्रियता के उद्देश्य से एक ही तरह की कोडन और विकोडन पद्धति इस्तेमाल करनी चाहिए, यानि ‘साझी भाषा’ बोलनी चाहिए। अगर वे अलग-अलग कोडन पद्धतियां इस्तेमाल करते हैं तो वे एक दूसरे को कभी नहीं समझ पाएंगे और अपनी संयुक्त सक्रियता में सफल नहीं होंगे। बाइबिल में बाबुल की मीनार की एक कहानी मिलती है, जो कभी नहीं बन सकी, क्योंकि अचानक सभी बनानेवाले अलग-अलग भाषाएं बोलने लग गये। यह कहानी दिखाती है कि भाषाओं में अंतर के कारण कोडन तथा विकोडन प्रक्रियाओं के रुक जाने से कैसी गंभीर कठिनाइयां पैदा होती हैं और अन्योन्यक्रिया तथा संयुक्त सक्रियता असंभव बन जाती है।

सूचना का आदान-प्रदान तभी संभव होता है, जब प्रयुक्त संकेतों ( शब्दों, इशारों, चित्राक्षरों, आदि ) को दिये गये अर्थ, संप्रेषण में भाग लेनेवाले दोनों पक्षों को मालूम होते हैं। संकेत परिवेशी विश्व के संज्ञान का एक माध्यम हैं और अर्थ संकेत का अंतर्वस्तु से संबंधित पहलू है। जिस प्रकार लोग औजारों के माध्यम से श्रम करते हैं, उसी प्रकार संकेत उनकी संज्ञानात्मक सक्रियता ( cognitive activities ) तथा संप्रेषण के माध्यम का काम करते हैं।

शाब्दिक संकेतों की पद्धति, भाषा को सामाजिक-ऐतिहासिक अनुभव के वास्तवीकरण ( realization ), आत्मसात्करण ( absorption ) और अंतरण ( transference ) का माध्यम बनाती है

सामाजिक अनुभव के संचय तथा अंतरण के माध्यम के रूप में भाषा का जन्म श्रम की प्रक्रिया में हुआ और आदिम समाज के उषाकाल में ही उसका विकास शुरू हो गया। एक दूसरे को आवश्यक सूचना देने के लिए लोगों ने उच्चारित ध्वनियों का इस्तेमाल शुरू किया, जिनसे शनैः शनैः कुछ निश्चित अर्थ जुड़ गये। संप्रेषण के साधन के रूप में उच्चारित ध्वनियां बहुत सुविधाजनक थीं, विशेषतः तब, जब आदिम मानव के हाथ खाली नहीं होते थे, यानि वह उनमें कोई चीज़ या औजार पकड़े हुए होता था और आंखों का हाथों की गतियों को देखते रहना जरूरी था। ध्वनियां तब भी सुविधाजनक होती थीं, जब संप्रेषक तथा प्रापक एक दूसरे से दूर होते थे या अंधेरा अथवा कोहरा छाया होता था या पेड़ों-झाड़ियों की वजह से एक दूसरे को देख पाना मुमकिन न था।

भाषा के जरिए संप्रेषण की बदौलत व्यक्ति के मस्तिष्क में विश्व का परावर्तन ( reflection ) , अन्य व्यक्तियों के मस्तिष्क में हुए परावर्तनों के आपसी विनिमय से निरंतर विकसित होता गया। लोग आपस में अपने विचारों और प्रेक्षणों ( observations ) का विनिमय करते हुए इसे और समृद्ध करते रहे।

परस्पर संपर्क के दौरान मनुष्य लगातार महत्त्वपूर्ण को महत्त्वहीन से, आवश्यक को सांयोगिक से अलग करना, वस्तुओं के बिंबों से उनके सामान्य गुणधर्मों को अलग करना और फिर उन्हें शब्दों के अर्थ में प्रतिबिंबित करने की ओर बढ़ना सीखता रहता है। शब्दों का अर्थ वस्तुओं के पूरे वर्ग की बुनियादी विशेषताओं को इंगित करता है और ठीक इसी कारण वह किसी निश्चित वस्तु से भी संबंध रख सकता है। जैसे कि, जब हम ‘समाचारपत्र’ कहते हैं, तो हमारा आशय दत्त क्षण में हमारे हाथ में मौजूद समाचारपत्र से ही नहीं होता, बल्कि वस्तुओं के जिस वर्ग में समाचारपत्र आता है, उस पूरे वर्ग को और अन्य मुद्रित सामग्रियों से इसके अंतरों को भी इंगित करते हैं।

हर शब्द का एक निश्चित अर्थ, अर्थात वास्तविक जगत से निश्चित संबंध होता है और जब कोई उस शब्द को इस्तेमाल करता है, तो उसको सुननेवाला उसे एक निश्चित परिघटना से ही जोड़ता है और इस संबंध में उन्हें कोई भ्रम नहीं होता। अर्थों की पद्धति मनुष्य के जीवन-भर बढ़ती तथा समृद्ध होती रहती है।


इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

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1 टिप्पणी (+add yours?)

  1. ZEAL
    जनवरी 19, 2011 @ 16:36:36

    एक ऐसे विषय पर लिखा है आपने जिस पर जानने की हमेशा से उत्कंठा थी। कोडन और विकोडन के बारे में पढ़कर सम्प्रेषण के पीछे के मनोविज्ञान का पता चला। और भी ज्यादा जानने की इच्छा है इस विषय पर। आपके अग्रिम लेखों का इंतज़ार रहेगा।

    प्रतिक्रिया

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