श्रम – सक्रियता का प्रमुख रूप

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने मनुष्य की सक्रियता के मुख्य प्ररूप और उनके विकास के अंतर्गत अधिगम और अध्ययन पर विचार किया था, इस बार हम इसी के अंतर्गत श्रम पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


श्रम
( श्रम पर एक प्रविष्टि ‘चेतना के आधार के रूप में श्रम’ पहले भी थी, उससे गुजरना भी समीचीन रहेगा। )

श्रम का शास्त्रीय मतलब है, मनुष्य द्वारा अपने किसी विशेष प्रयोजन के लिए प्रकृति में किया जा रहा सचेत परिवर्तन। श्रम एक ऐसी सक्रियता है, जिसका उद्देश्य निश्चित समाजिकतः उपयोगी ( अथवा समाज द्वारा उपयुक्त ) उत्पादों को पैदा करना है, जो भौतिक और आत्मिक, दोनों तरह के हो सकते हैं। श्रम मनुष्य की सक्रियता का प्रमुख और बुनियादी रूप है। श्रम के बिना मानवजाति का अस्तित्व कभी का ख़त्म हो गया होता। इसलिए श्रम को लोगों के जैविक जातिगत व्यवहार का एक विशिष्ट रूप कहा जा सकता है, जो उनकी उत्तरजीविता, अन्य जैविक जातियों पर विजय और प्रकृति की शक्तियों व संसाधनों का विवेकसंगत उपयोग सुनिश्चित करता है।

श्रम-सक्रियता के लक्ष्य वे वस्तुएं हो सकती हैं, जिन्हें लोगों द्वारा उपयोग किया जाता है और जो ऐसी उपभोज्य वस्तुओं, मसलन रोटी, मशीनों, फ़र्नीचर, उपकरणों, कपड़ों, कारों, आदि के उत्पादन के लिए आवश्यक हैं। श्रम का उद्देश्य ऊर्जा ( ताप, प्रकाश, विद्युत, गति आदि ) और सूचना-साधनों ( पुस्तकों, चित्रों, फ़िल्मों, आदि ) का उत्पादन भी है। उसके परिणाम वैचारिक उत्पाद ( वैज्ञानिक अविष्कार, कलाकृतियां, विचार, आदि ) और लोगों के व्यवहार तथा श्रम के संगठन की ओर लक्षित क्रियाएं ( प्रबंधन, नियंत्रण, संरक्षण, शिक्षा, आदि ) भी हो सकते हैं।

यह आवश्यक नहीं है कि श्रम के उत्पाद व्यक्ति द्वारा अपनी आवश्यकताओं की तुष्टि के लिए ही इस्तेमाल किये जाएं। मुख्य यह है कि उत्पाद समग्रतः समाज की आवश्यकता हो। इसलिए मनुष्य की व्यष्टिक सक्रियता के लक्ष्य उसकी अपनी ही आवश्यकताओं से निर्धारित नहीं होते। व्यक्ति के लिए उन्हें समाज तय करता है और इसलिए व्यक्ति की सक्रियता बहुत कुछ एक निश्चित सार्वजनिक दायित्व की पूर्ति जैसी बन जाती है। मनुष्य की सक्रियता बुनियादी तौर पर सामाजिक सक्रियता है और इसे समाज की आवश्यकताएं प्रेरित, निदेशित तथा नियमित करती हैं।

श्रम के सामाजिक स्वरूप का एक महत्त्वपूर्ण पहलू और भी है। आज के समाज में श्रम के विभाजन के कारण व्यक्ति कभी भी अपनी आवश्यकता की सभी वस्तुएं स्वयं नहीं पैदा करता, न वह कभी किसी वस्तु के उत्पादन की शुरू से लेकर आख़िर तक सारी प्रक्रिया में भाग ही लेता है। इस कारण व्यक्ति को अपने अस्तित्व के लिए आवश्यक सब कुछ समाज से अपने श्रम के एवज़ में पाना होता है। वैसे भी व्यक्ति की आवश्यकताओं की तुष्टि समाज द्वारा, न कि उसके अपने श्रम द्वारा, की जाती है। तुष्टि के इस विशिष्ट तरीक़े का स्रोत समाज में प्रचलित उत्पादन-संबंधों की पद्धति है। इसलिए समाज में किसी भी चीज़ का उत्पादन साथ ही, लोगों के बीच श्रम की प्रक्रिया में और उसके उत्पादों के वितरण, विनिमय तथा उपभोग के दौरान निश्चित संबंधों का निर्माण भी है।

मनुष्य द्वारा श्रम-सक्रियता के दौरान की जानेवाली क्रियाएं उसकी अपनी शारीरिक आवश्यकताओं द्वारा नहीं, बल्कि उत्पादन के लक्ष्य द्वारा और इस लक्ष्य को पाने के दौरान अन्य लोगों से बने संबंधों के द्वारा निर्धारित होती हैं। इस प्रकार की क्रियाओं का निष्पादन तथा नियमन कर पाने के लिए मनुष्य को सूचना का संसाधन करने की उच्चतर प्रक्रियाओं, विशेषतः कल्पना और चिंतन का उपयोग करना चाहिए। इससे यह निष्कर्ष भी निकलता है कि मानव मन की इन असामान्य योग्यताओं के स्रोत का स्पष्टीकरण करने के लिए ‘आत्मा’ के किन्हीं विशेष गुणधर्मों का आविष्कार करने की कोई आवश्यकता नहीं है। इन योग्यताओं का स्रोत और कोई नहीं, बल्कि मनुष्य की सक्रियता की नियमसंगतियां ही हैं। दूसरे शब्दों में, वे श्रम करने वाले सामाजिक प्राणी के रूप में मानव के अस्तित्व की ही उपज हैं।

मानवजाति के इतिहास में सामूहिक श्रम-सक्रियता ने मनुष्य से अपनी उच्चतम मानसिक क्षमताओं के उपयोग की मांग करते हुए साथ ही उन क्षमताओं के विकास के लिए आवश्यक पूर्वापेक्षाएं तथा परिस्थितियां भी पैदा की हैं।

उदाहरण के लिए, आदिम शिकारी यूथ में हांका करनेवाले के व्यवहार को लें। उसकी क्रियाएं अपने आप में शिकार को पकड़ने की ओर लक्षित नहीं होती थीं। इतना ही नहीं, यदि वह अकेला होता , तो परिणाम उल्टा ही निकलता, शिकार आसानी से बच निकलता और वह भूखा ही रह जाता। उसकी सारी सक्रियता सार्थक तभी बनती है, जब वह अन्य शिकारियों की सक्रियता के साथ संपन्न की जाती है। इस लक्ष्य को पाने के लिए हांका करनेवाले को शिकारियों की क्रियाओं को भी ध्यान में रखना पड़ता था, यानि हिरण का पीछा करने के साथ-साथ उसे शिकारियों की ओर खदेड़ना भी पड़ता था।

इस तरह उसके लक्ष्य ने अपना जैविक अर्थ खो दिया और सामाजिक अर्थ ग्रहण कर लिया। वह अब आंतरिक सहजवृत्तिमूलक अनुभवों के रूप में नहीं, बल्कि बाह्य वस्तुओं पर क्रियाओं के अवबोधन के जरिए अपने को प्रकट करता था। इस तरह मनुष्य के व्यावहारिक कार्यकलाप ने ही वस्तुओं और वस्तुसापेक्ष क्रियाओं के बिंबों को मनुष्य को सक्रियता के लिए उकसानेवाली जैव आवश्यकताओं के अनुभव से पृथक किया।

श्रम की जो मुख्य विशेषता उसे प्राकृतिक उत्पादों के साधारण हस्तगतकरण से भिन्न बनाती है, वह औजारों का निर्माण तथा प्रयोग, यानि कुछ वस्तुओं के ज़रिए अन्य वस्तुओं पर काम करना है। इस तरह श्रम एक दूसरे के संबंध में वस्तुओं के यथार्थ गुणधर्मों को प्रकट करता है। हर प्रकार की श्रम-सक्रियता वस्तुओं के जैव महत्त्व की बजाए इन यथार्थ गुणधर्मों पर आधारित होती है। उदाहरण के लिए, हड्डी का बल्लम-सिरा बनाने के लिए हड्डियों की आपेक्षिक कठोरता को ध्यान में रखना पड़ता है, न कि उनके खाद्य गुण को। हड्डी की वस्तुओं के निर्माण के लिए आवश्यक क्रियाएं हड्डियों के इन यथार्थ गुणधर्मों से निदेशित होती हैं, न कि उनके स्वाद अथवा पौष्टिकता से।

इस प्रकार वस्तुओं के नये अर्थ और उनके प्रति नये रवैये, मनुष्य की व्यावहारिक सक्रियता और सामाजिक श्रम से पैदा हुए हैं। सामूहिक सक्रियता वस्तुओं के यथार्थ गुणधर्मों में भेद करती है, उसकी बदौलत लोग आपस में जानकारियों का आदान-प्रदान करते हैं और उन्हें वाक् नामक विशेष संप्रेषणात्मक क्रियाओं में ठोस रूप देते हैं। सामूहिक सक्रियता के माध्यम से ही व्यक्ति अपने को और अन्य व्यक्तियों को सक्रियता में भाग लेने वाले के रूप में जान सकता है। इसके अलावा, यह भी सामूहिक सक्रियता ही है कि जो मनुष्य को अपने सामने निश्चित प्रात्ययिक लक्ष्य रखना और सामाजिक अनुभव को अपनी क्रियाओं में मार्गदर्शन के लिए इस्तेमाल करना सिखाती है।

यथार्थ के प्रति यह रवैया ही चेतना का आधार है। वही मनुष्य को वस्तुओं के संबंध में सक्रियता का कर्ता और लोगों के संबंध में व्यक्ति बनाती है। यह रवैया ही मनुष्य को परिवेशी विश्व के दास से उसके स्वामी में परिणत करता है, उसे इस विश्व का रूपांतरण करने तथा दूरस्थ लक्ष्यों की ओर बढ़ने में समर्थ बनाता है और उसकी क्रियाओं को सचेतन, सुनियोजित सक्रियता में तथा पृथ्वी पर उसके अनुकूलनमूलक अस्तित्व को अर्थपूर्ण तथा उदात्त लक्ष्योंवाले सक्रिय जीवन में रूपांतरित करता है।


इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

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7 टिप्पणियाँ (+add yours?)

  1. दर्शन लाल बवेजा
    जनवरी 12, 2011 @ 15:50:43

    सही कहा …

    प्रतिक्रिया

  2. संदीप
    जनवरी 12, 2011 @ 18:40:49

    मित्र, बहुत दिनों बाद ब्‍लॉग पर आना हुआ, और दायीं ओर पीडीएफ के लिंक देखे, क्‍या इन ई-पुस्तिकाओं में रेफरेंस भी दिए गए हैं….

    प्रतिक्रिया

  3. दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi
    जनवरी 12, 2011 @ 18:41:38

    ये वाला पाठ फटाफट समझ में आ गया।

    प्रतिक्रिया

  4. Krishna Kumar Mishra
    जनवरी 14, 2011 @ 16:11:21

    बेहतरीन विवरण व विश्लेषण

    प्रतिक्रिया

  5. thewordsoflight
    जनवरी 15, 2011 @ 08:09:24

    shandar. . .

    प्रतिक्रिया

  6. संदीप
    जनवरी 15, 2011 @ 12:28:05

    समय भाई, क्‍या मेरे कमेंट का उत्तर देने के लिए समय निकाल सकते हैं… 🙂

    प्रतिक्रिया

  7. Trackback: समाज के विकास तथा कार्यात्मकता के आधार के रूप में उत्पादन पद्धति – १ | समय के साये में

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