अधिगम और अध्ययन

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने मनुष्य की सक्रियता के मुख्य प्ररूप और उनके विकास के अंतर्गत खेल और सक्रियता में उसकी भूमिका पर विचार किया था, इस बार हम इसी के अंतर्गत अधिगम और अध्ययन पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


अधिगम और अध्ययन

बच्चे के व्यवहार तथा सक्रियता पर विचार करते समय हमारा एक बुनियादी महत्त्व के तथ्य से साक्षात्कार होता है। कुछेक अनुकूलित प्रतिवर्तों के अलावा व्यवहार तथा सक्रियता के उन सभी रूपों का बच्चे में शुरू में अभाव होता है, जिनका वह बाद के चरणों में प्रदर्शन करता है। व्यावहारिक और संप्रेषणात्मक व्यवहार, अभिविन्यासात्मक तथा अन्वेषणात्मक सक्रियता, पकड़ने तथा उलटने-पलटने की गतियां, रेंगना, चलना, बोलना, खेलना और सामाजिक अन्योन्यक्रिया अपने को बच्चे के जन्म के कुछ समय के बाद ही प्रकट कर देते हैं और विकास करने लगते हैं। इतना ही नहीं, हर प्रकार के व्यवहार और हर प्रकार की सक्रियता के प्रकट होने का लगभग निश्चित समय, विकास की निश्चित गतियां और परिणामात्मक तथा गुणात्मक परिवर्तनों से गुजरने के निश्चित चरण होते हैं। वे सभी बच्चे के विकास के परिचायक होते हैं, जो निश्चित जन्मजात कारकों तथा आनुवंशिक प्रोग्रामों से, शरीर की उच्चतर तंत्रिका सक्रियता के क्रियातंत्रों के निर्माण तथा विविधीकरण से अभिन्नतः जुड़ा हुआ है।

किंतु व्यवहार का इनमें से कोई भी रूप, सक्रियता का कोई भी भेद स्वतः और परिवेशी परिस्थितियों से स्वतंत्र रूप से प्रकट नहीं होता है। वे सभी बच्चे के व्यावहारिक तथा सामाजिक अनुभव के आधार पर और अन्य लोगों तथा विभिन्न वस्तुओं से उसकी अन्योन्यक्रिया के परिणाम के तौर पर पैदा तथा विकसित होते हैं। मानव बनने की प्रक्रिया में बच्चा जो कुछ भी अर्जित करता है, वह अधिगम का, अर्थात अनुभव के आत्मसात्करण का परिणाम होता है।

मानव व्यवहार जैविक नहीं, अपितु सामाजिक अनुभव से निर्धारित होता है। सामाजिक अनुभव को जैविकतः अंतरित नहीं किया जा सकता। वह शरीर के गुणों पर नहीं, अपितु व्यक्ति जिस समाज में रहता है, उस समाज की विशेषताओं पर निर्भर होता है। शरीर के जो गुण सामाजिक अनुभव और व्यवहार तथा सक्रियता के मानवीय रूपों के व्यावहारिक आत्मसात्करण के लिए आवश्यक हैं, केवल वे ही अंतर्जात गुणों के रूप में जैविकतः अंतरित किये जा सकते हैं। जैव पूर्वनिर्धारण से बच्चे के व्यवहार की यह स्वतंत्रता पशु की तुलना में मनुष्य को अत्यंत लाभकर स्थिति में रख देती है। इस लाभ के कारण ही मानव व्यवहार के रूपों तथा सक्रियता की प्रणालियों के उदविकास का निर्धारण मानव शरीर के जैव विकास ने नहीं, अपितु समाज के ऐतिहासिक विकास ने किया है।

अतः अधिगम विकास का एक प्रमुख कारक है, जिसकी मदद से बच्चे में व्यवहार तथा वास्तविकता के परावर्तन के मानवीय रूपों का निर्माण होता है।

फिर भी बच्चे के व्यवहार तथा सक्रियता के अब तक चर्चित सभी रूपों में यह अंतिम परिणाम, सामाजिक अनुभव का आत्मसात्करण स्वयं सक्रियता के उद्देश्यों से मेल नहीं खाता है। शिशु चीज़ों को इसलिए नहीं उलटता-पलटता कि उसे कुछ सीखना है। जब वह पहले डग भरता है या पहले शब्द बोलने की कोशिश करता है, तो इसके पीछे चलना और बोलना सीखने की इच्छा नहीं होती। उसकी क्रियाएं अन्वेषणात्मक क्रियाशीलता की उसकी तात्कालिक आवश्यकता की तुष्टि की ओर, वस्तुओं को पाने, आसपास के लोगों को प्रभावित करने, आदि की ओर लक्षित होती हैं। बच्चे द्वारा क्रियाओं और जानकारियों का आत्मसात्करण लक्ष्य नहीं, बल्कि किन्हीं आवश्यकताओं की तुष्टि का साधन होता है।

एक समय आता है कि जब बच्चा कोई नई सक्रियता आरंभ करता है। तात्कालिक लक्ष्य कुछ निश्चित जानकारियां, कुछ निश्चित क्रियाओं अथवा व्यवहार-संरूपों को आत्मसात् करना होता है। नई सामग्री के आत्मसात्करण अथवा शिक्षण की ओर लक्षित यह विशिष्ट सक्रियता अध्ययन कहलाती है। इसमें निम्न चीज़ें शामिल हैं : क) कुछ ख़ास प्रकार की प्रात्ययिक और व्यावहारिक सक्रियता के सफल संगठन के लिए विश्व के महत्त्वपूर्ण गुणधर्मों की जो जानकारी आवश्यक है, उस जानकारी का आत्मसात्करण ( इस प्रक्रिया के उत्पाद को ज्ञान कहते हैं ) ; ख) ऐसी प्रणालियों तथा संक्रियाओं में दक्षता प्राप्त करना, जिनसे सक्रियता की ये सभी क़िस्में बनती हैं ( इस प्रक्रिया का उत्पाद आदतें हैं ) ; ग)  किसी निश्चित कार्यभार की परिस्थितियों और निर्धारित लक्ष्य के अनुरूप प्रणालियों व संक्रियाओं के सही चयन व परिवीक्षण के लिए आत्मसात्कृत सूचना के उपयोग की प्रणालियों को सीखना ( इस प्रक्रिया का उत्पाद कौशल होते हैं )।

इस प्रकार अध्ययन एक ऐसी सोद्देश्य सक्रियता है, जिसमें व्यक्ति की क्रियाएं उनके सचेतन लक्ष्य के रूप में निश्चित ज्ञान, आदतों और कौशलों के आभ्यंतरीकरण की ओर निर्दिष्ट होती है

ऊपर जो कहा गया है, उससे स्पष्ट है कि अध्ययन एक अनन्यतः मानवीय सक्रियता है। जानवर केवल सीख सकते हैं। मनुष्य भी अध्ययन करने में तभी समर्थ बनता है, जब उसमें अपनी क्रियाओं का नियमन करने की योग्यता आ जाती है और इस योग्यता को एक सचेत प्रात्ययिक लक्ष्य माना जाता है। बच्चे में यह योग्यता केवल छठे या सातवें वर्ष में ही और सक्रियता के पूर्ववर्ती रूपों – खेल, बोलना, व्यावहारिक आचरण, आदि – के आधार पर पैदा हो सकती है। सक्रियता के एक रूप के नाते अध्ययन की पहली पूर्वापेक्षा बच्चे में निश्चित जानकारियों के आत्मसात्करण और निश्चित आदतों व कौशलों के अर्जन के लिए सचेतन अभिप्रेरकों का विकास करना है।

बच्चे के विकास पर सामाजिक प्रभाव के सक्रिय वाहकों की भूमिका वयस्क अदा करते हैं। वे स्वीकृत सामाजिक संरूपों के दायरे में उसके व्यवहार तथा सक्रियता का संगठन करते हैं। बच्चे की सक्रियता व व्यवहार का मानवजाति के सामाजिक अनुभव के आत्मसात्करण की ओर सक्रिय अभिमुखन शिक्षण कहलाता है। बच्चे के व्यक्तित्व के विकास पर उसके प्रभाव की दृष्टि से इस प्रक्रिया को चरित्र-निर्माण कहते हैं। शिक्षण और चरित्र-निर्माण के मुख्य साधन निदर्शन और व्याख्या, प्रोत्साहन और दंड, कार्य-निर्धारण तथा अपेक्षाएं करना, जांच और सुधार हैं। इन उपकरणों की मदद से वयस्क बच्चे की संज्ञान-मूलक तथा व्यावहारिक सक्रियता का नियंत्रण करते हैं और उसकी क्रियाओं को प्रेरित व निदेशित करते हैं, उन पर नज़र रखते हैं तथा उन्हें सुधारते हैं।

शिक्षण की विधियों, साधनों, उद्देश्यों, प्रदत्त जानकारी के स्वरूप और जो आदतें व कौशल सिखाए जा रहे हैं, उनसे संबंधित सभी बहुविध प्रश्न शिक्षाशास्त्र के दायरे में आते हैं, जो शिक्षण के सिद्धांत और व्यवहार से संबंध रखनेवाला एक विशेष विज्ञान है।

सक्रियता के एक रूप के नाते अध्ययन, मनुष्य को सामाजिक व्यवहार के विभिन्न क्षेत्रों में उसके काम आनेवाले ज्ञान, आदतों और कौशलों से सज्जित ही नहीं करता। वह अपनी मानसिक प्रक्रियाओं का नियंत्रण करने और अपनी क्रियाओं, संक्रियाओं, आदतों तथा अनुभव का अपने समक्ष उपस्थित कार्यभारों से अनुरूप चयन, संगठन व निदेशन करने की उसकी योग्यता का विकास भी करता है। दूसरे शब्दों में, अध्ययन मनुष्य को श्रम के लिए तैयार करता है।


इस बार इतना ही। अगली बार सक्रियता के एक और मुख्य प्ररूप श्रम पर बातचीत होगी।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

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3 टिप्पणियाँ (+add yours?)

  1. Tarkeshwar Giri
    जनवरी 08, 2011 @ 13:53:21

    Bahut khub , bahut achha lekh

    प्रतिक्रिया

  2. दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi
    जनवरी 08, 2011 @ 14:37:16

    महत्वपूर्ण कड़ी, जो शिक्षा और अध्ययन को परिभाषित करती है।

    प्रतिक्रिया

  3. shivkumar
    जनवरी 11, 2011 @ 15:30:57

    व्यावहारिक मनोविज्ञान का काफ़ी ज्ञान प्राप्त हुआ.

    प्रतिक्रिया

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