खेल और सक्रियता में उसकी भूमिका

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने मनुष्य की सक्रियता के मुख्य प्ररूप और उनके विकास के अंतर्गत सक्रियता के निर्माण पर चर्चा की थी इस बार हम इसी के अंतर्गत खेल और सक्रियता में उसकी भूमिका पर विचार करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


खेल और सक्रियता में उसकी भूमिका

अपने जीवन के पहले वर्ष में ही बच्चा सक्रियता के सरलतम रूपों को सीखने की पूर्वापेक्षाएं विकसित कर लेता है। ऐसी पहली पूर्वापेक्षा खेल है।

ज्ञात है कि उछलकूद, दौड़-भाग, झूठमूठ की लड़ाई, आदि के रूप में खेल जीव-जंतुओं के बच्चों की भी विशेषताएं है। कुछ जीव चीज़ों से खेलना पसंद करते हैं, जैसे बिल्ली का बच्चा गेंद या गोले से और कुत्ते का बच्चा चीथड़े से। खेल के दौरान नन्हें जीवों के व्यवहार को मुख्य रूप से उनके शरीर की सक्रियता की आवश्यकता की पूर्ति और संचित उर्जा के उन्मोचन की अभिव्यक्ति माना जा सकता है। इसकी पुष्टि इससे होती है कि उनकी क्रीड़ात्मक व्यवहार की प्रवृत्ति भूख, अल्पपोषण तथा उच्च परिवेशी तापमान की अवस्था में, शरीर का तापमान बढ़ा या मस्तिष्क की सक्रियता को मंद कर देनेवाले रासायनिक द्रव्यों के प्रभाव की अवस्था में अवरुद्ध हो जाती है। यदि पशु को कुछ समय तक के लिए उसके खेल के साथी से वंचित कर दिया जाए, तो बाद में उसकी उत्तेजनशीलता और क्रीड़ात्मक क्रियाशीलता एकाएक बहुत अधिक बढ़ जाएगी, जो इसका प्रमाण है कि वह अपनी संचित उर्जा को उन्मोचित करना चाहता है। मनोविज्ञान में इस परिघटना को ‘खेल की भूख’ कहा जाता है।

खेल की प्रेरणा इसलिए पैदा होती है कि क्रीड़ा-सक्रियता और शरीर के उर्जा-विनिमय के बीच संबंध है। किंतु व्यवहार के वे रूप कहां से आते हैं, जिनके दायरे में क्रीड़ा-सक्रियता साकार बनती है? प्रेक्षण दिखाते हैं कि इनमें से कुछ रूप जीवों की जन्मजात, सहजवृत्तिमूलक क्रियाएं ही होते हैं। इसकी एक मिसाल बिल्ली के बच्चे का शिकार से संबंधित व्यवहार है। दूसरे रूप अनुकरण का परिणाम होते हैं, जैसे शिशु चिंपांज़ी द्वारा अपनी जाति के बड़े जीवों की अथवा लोगों की क्रियाओं को दोहराया जाना। कुछेक रूप जानवर द्वारा परिवेशी विश्व के साथ अन्योन्यक्रिया के दौरान स्वयं विकसित किये जाते हैं। इस प्रकार छोटे जानवरों द्वारा की जानेवाली क्रियाओं के स्रोत वे ही होते हैं, जो व्यस्क जानवरों की क्रियाओं के होते हैं, यानि विशिष्ट सहजवृत्तियां, अनुकरण और सीखना। इसलिए छोटों की क्रियाओं का बड़े जानवरों के विशिष्ट व्यवहार के समान होना अनिवार्य ही है। किंतु जहां व्यस्क पशुओं की क्रियाओं का उद्देश्य आहार, शत्रुओं से रक्षा, परिवेश में अभिविन्यास, ख़तरे से बचना, आदि यथार्थ जैविक आवश्यकताओं की तुष्टि होता है, वहीं इसके विपरीत अवयस्क पशुओं की क्रियाओं में ऐसी यथार्थ जैविक आवश्यकताओं का तत्व नहीं होता और वे मात्र कुछ करने के लिए ही की जाती हैं। क्रीड़ामूलक व्यवहार का मुख्य विभेदक लक्षण यही है। क्रीड़ामूलक व्यवहार का लक्ष्य स्वयं सक्रियता है, न कि इसके द्वारा प्राप्त व्यवहारिक परिणाम

अनुसंधानों ने दिखाया है कि मानव बच्चे के लिए भी खेल अपनी क्रियाशीलता को साकार बनाने का एक रूप, जीवनीय सक्रियता का एक रूप है। इस नाते यह कार्यमूलक आनंद से जुड़ा हुआ है। क्रियाशीलता की आवश्यकता इसे प्रेरित करती है और इसके स्रोत अनुकरण तथा अनुभव होते हैं। फिर भी बच्चे की क्रीड़ामूलक क्रियाएं शुरू से ही वस्तुओं को इस्तेमाल करने के मानवसुलभ तरीक़ों और मानव व्यवहार के उन रूपों के आधार पर विकसित होती है, जिन्हें बड़ों से संपर्क के दौरान तथा उनके मार्गदर्शन में सीखा जाता है। यह बच्चों के खेल की वह बुनियादी विशेषता है, जो इसके रूपों, स्रोतों, क्रियातंत्रों, कार्यों और परिणामों को जीव-जंतुओं के खेलों से भिन्न बनाती है।

अपनी व्यवहारिक सक्रियता के दौरान बच्चे का उपकरण का काम करनेवाली वस्तुओं के अलावा अन्य प्रकार की वस्तुओं – खिलौनों – से भी साक्षात्कार होता है। उनके इस्तेमाल का मनुष्य का तरीक़ा खेल, यानि उनके ज़रिए किन्हीं अन्य, वास्तविक वस्तुओं तथा क्रियाओं का चित्रण है। बच्चे खिलौने के इस्तेमाल का यह तरीक़ा बड़ों से सीखते हैं, जो उन्हें दिखाते हैं कि गुड़िया को पानी कैसे पिलाना चाहिए, कैसे उसे सुलाना चाहिए, कैसे घुमाना चाहिए, खिलौने के भालू को कैसे खिलाना चाहिए, खिलौने की कार को कैसे चलाना चाहिए, वग़ैरह।

फिर भी खिलौने के बारे में यह रवैया कि वह एक ‘वास्तविक’ वस्तु का एवज़ी है, बच्चे में तभी पैदा होता है, जब उसके खेल में एक नया तत्व शामिल हो जाता है। और यह नया तत्व है शब्द

छोटा बच्चा ( १-२ वर्ष की आयु का बच्चा ), मिसाल के लिए, झुलाने, खाना खिलाने, आदि की क्रियाओं को गुड़िया से किसी डंडी पर अंतरित नहीं कर सकता। वह संबद्ध वस्तु के बिना किसी क्रिया का अनुरूपण या इस क्रिया का एक वस्तु से दूसरी वस्तु में अंतरण नहीं कर सकता। ऐसी संक्रियाएं तभी संभव बनती हैं, जब बच्चा बोलना सीख जाता है। लकड़ी के किसी टुकड़े से गुड़िया जैसा बर्ताव करने के लिए बच्चे को गुड़िया को कोई नाम देना होगा। खिलाने की क्रिया को गुड़िया से खिलौने के घोड़े पर अंतरित करने के लिए बड़ों को उसे कहना होगा – घोड़े को खाना खिलाओ, वग़ैरह। बाद में शब्द, बच्चे को बड़ों की ‘वास्तविक’ वस्तुओं पर क्रियाओं को, जिन्हें वह देख सकता है, खिलौने पर स्वतंत्र रूप से अंतरित करने में समर्थ बना देता है। व्यवहारिक क्रियाओं के ज़रिए शब्द का अर्थ जानकर या बड़ों की क्रियाओं को देखकर बच्चा इन क्रियाओं को शब्द के साथ-साथ खेलने की चीज़ों पर अंतरित करता है। यहां खेल यह हो जाता है कि वस्तु के अर्थ को निर्धारित करने वाली क्रियाऒ को स्वयं वस्तु से अलग लिया जाता है और फिर उन्हें दूसरी वस्तु – खिलौने – पर अंतरित किया जाता है। खेल के माध्यम से बच्चा शब्द के अर्थ को वस्तु के बाह्य रूप से अलग करना सीखता है और इस अर्थ को वस्तु पर क्रिया से, मनुष्य के व्यावहारिक कार्यकलाप में इस वस्तु के प्रकार्यों से जोड़ता है।

यह प्रक्रिया जितनी ही आगे बढ़ती है, उतने ही ज़्यादा शब्द वस्तुओं से अपने प्रत्यक्ष संबंधों से मुक्त हो जाते हैं। शब्द का अर्थ पहले बाह्य क्रिया से और फिर उस क्रिया के प्रत्यय से अधिकाधिक एकाकार हो जाता है। वस्तुओं से वास्तविक क्रियाओं का काम शाब्दिक क्रियाओं से चला लेने की संभावना पैदा हो जाती है। ४-५ वर्ष की अवस्था में पहुंचने पर खेल में खिलौने के साथ वास्तविक क्रियाएं घट जाती हैं और उनका स्थान शाब्दिक क्रियाएं ले लेती हैं। गुड़िया को खाना खिलाने की प्रक्रिया को सविस्तार संपन्न करने की बजाए छोटी बच्ची चम्मच को केवल एक बार गुड़िया के मुंह से छुआकर कह सकती है – अब मैं इसे खाना खिला रही हूं…इसने खाना खा लिया है, वग़ैरह।

तीसरे वर्ष के मध्य तक बच्चा अपनी क्रियाओं की दूसरों की क्रियाओं से तुलना करने और सक्रियता तथा इच्छाओं के वाहक के रूप में अपने आपको शेष विश्व व लोगों से अलग करने लग जाता है। वस्तुओं के संबंध में क्रियाएं, वस्तुओं के संबंध में लोगों के प्रकार्यों के रूप में सामने आने लगती हैं। बच्चा भूमिकामूलक खेलों के दौर में प्रवेश करता है। भूमिकामूलक खेल में बच्चा अपने द्वारा देखे गये बड़ों के सामाजिक प्रकार्यों और व्यक्ति के रूप में बड़ों के व्यवहार की पुनर्प्रस्तुति करता है। यदि दो वर्ष की बच्ची गुड़िया को खाना खिलाते हुए खिलाने का खेल खेलती है, तो चार वर्ष की बच्ची गुड़िया को खाना खिलाते हुए उसकी मां की भूमिका भी अदा करती है, जैसे मां अपनी बच्ची को खाना खिला रही है। जैसे-जैसे बच्चे का सामाजिक अनुभव बढ़ता है, वैसे-वैसे घरेलू विषयों पर आधारित खेलों ( ‘मां’, ‘शिक्षिका’, ‘स्कूल’, ‘चिड़ियाघर’ ) में पहले तकनीक और ओद्योगिक विषयों पर आधारित खेल ( ‘बस ड्राईवर’, ‘विमान चालक’, ‘कार’, ‘फैक्ट्री’, आदि ) और फिर सामाजिक-राजनैतिक विषयों पर आधारित खेल ( ‘लड़ाई’, ‘युद्ध’, ‘चोर-सिपाही’, आदि ) जुड़ते जाते हैं। खेल की अंतर्वस्तु, वस्तुसापेक्ष क्रियाओं की पुनर्प्रस्तुति से अधिकाधिक लोगों के परस्पर-संबंधों के चित्रण में बदलती जाती है।

वास्तव में यह वह अवस्था है कि जब बच्चा शब्दों और परिवेशी परिघटनाओं के अर्थों का व्यावहारिक आत्मसात्करण शुरू करता है। इस प्रक्रिया में व्यस्कों के प्रकार्यों तथा रवैयों के सामाजिक अर्थों से परिचय, जिस रूप में कि वे अपने को बच्चे द्वारा देखे गये उनके व्यवहार में प्रकट करते हैं, उस रूप में परिचय शामिल है। आजकल तो रेड़ियो, टेलीविजन और फ़िल्मों की वज़ह से ऐसे प्रेक्षणों का दायरा बहुत ही व्यापक हो गया है।

डॉक्टर की भूमिका करते हुए बच्चा ‘डॉक्टर जैसे’ बर्ताव करता है। छोटे बच्चे किसी भी वस्तु को स्टेथस्कोप के तौर पर इस्तेमाल करते हैं, गुड़िया को बिस्तर पर लिटाते हैं और गंभीरता से सिर हिलाते हुए कह सकते हैं कि इसे तो इंजेक्शन लगाना होगा, वगै़रह। बच्चे की क्रियाएं डॉक्टर के प्रकार्यों की उसकी समझ से निदेशित होती हैं, न कि वह दत्त क्षण में जिन वस्तुओं का इस्तेमाल कर रहा है, उन वस्तुओं के गुणधर्मों से। दूसरे शब्दों में, बच्चा अपने में अपनी क्रियाओं को ओढ़ी गई सामाजिक भूमिका तथा यथोचित आचरण की अपनी समझ के मुताबिक़ नियंत्रित करने की क्षमता पैदा करता है। भूमिकामूलक खेलों की विकसित अवस्था में पहुंचने पर बच्चा दूसरे बच्चों के साथ अन्योन्यक्रिया करने लगता है। भूमिकाएं बांटते और एक दूसरे से ओढ़ी गई भूमिकाओं ( मां-बेटी, डॉक्टर-रोगी, आदि ) के अनुरूप बर्ताव करते हुए बच्चे सामाजिक व्यवहार सीखते हैं और अपनी क्रियाओं का समूह की आवश्यकताओं के अनुसार समन्वय करने की शिक्षा पाते हैं।

अगले चरण, नियमों के अनुसार खेल, में ये प्रवृत्तियां और भी सुस्पष्ट बन जाती हैं और क्रियाएं अमूर्त अपेक्षाओं अथवा नियमों द्वारा नियंत्रित होने लगती हैं। दूसरे लोग, यानि खेल में भाग लेने वाले इन नियमों के वाहक के रूप में सामने आने लगते हैं। सामाजिक दृष्टि से सार्थक परिणाम ( खेल में जीतना ) सक्रियता का लक्ष्य बनने लगता है। इस बिंदु पर आकर खेल वास्तव में ख़त्म हो जाता है। सामाजिक मानदंडों के अनुसार, खेल ( उपयोगी उत्पाद का अभाव ) रहते हुए भी यह सक्रियता मनोवैज्ञानिक संरचना के अनुसार श्रम ( जिसमें लक्ष्य स्वयं सक्रियता नहीं, अपितु उसका उत्पाद है) और अधिगम ( जिसमें लक्ष्य खेल को सीखना है ) से मिलती-जुलती बन जाती है

इस प्रकार खेल, बच्चे में वस्तुओं तथा परिघटनाओं के भाषाई व्यवहार द्वारा स्थिरीकृत अर्थों का आभ्यंतरीकरण करने तथा इन अर्थों से व्यवहार में काम लेने की क्षमता विकसित करता है। वह उसे अपनी क्रियाओं को संक्रियाएं मानने की ओर अभिमुख करता है, उसे ऐसी संक्रियाएं आत्मनियमन ( नियमों ) के आधार पर करना सिखाता है और उसकी आत्मचेतना को अपने वस्तुसापेक्ष क्रियाओं का कर्ता होने की चेतना से अपने एक सामाजिक भूमिका का वाहक, अर्थात् मानव-संबंधों का कर्ता होने की चेतना तक विस्तारित करता है।


इस बार इतना ही। अगली बार अधिगम और अध्ययन पर बातचीत होगी।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

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2 टिप्पणियाँ (+add yours?)

  1. दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi
    जनवरी 05, 2011 @ 18:15:27

    बहुत तार्किक विश्लेषण है। हमारी तो क्लास हो गई।

    प्रतिक्रिया

  2. महेन्द्र मिश्र
    जनवरी 07, 2011 @ 10:50:03

    सुन्दर सारगर्वित प्रस्तुति…आभार

    प्रतिक्रिया

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