कौशल और उसकी निर्माण-प्रक्रिया

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने क्रियाशीलता और सक्रियता को समझने की कोशिशों की कड़ी में आदतों की अन्योन्यक्रियाओं के सिद्धांतों को समझने की कोशिश की थी इस बार हम कौशल और उसके निर्माण की प्रक्रिया पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


कौशल और उसकी निर्माण-प्रक्रिया

नई परिस्थितियों में अथवा नई वस्तुओं के संबंध में किया जाने वाला हर क़िस्म का व्यवहार संक्रियाओं के अंतरण पर आधारित होता है। अपनी बारी में संक्रियाओं का अंतरण उन परिस्थितियों अथवा वस्तुओं के गुणधर्मों के साम्य पर आधारित होता है, जो व्यक्ति की सक्रियता के लक्ष्यों के लिए महत्त्वपूर्ण हैं।

व्यक्ति को इस साम्य का ज्ञान हो भी सकता है और नहीं भी हो सकता है। सक्रियता जितनी ही पेचीदी होगी, लक्ष्य जितने ही दूरवर्ती होंगे और उनके लिए वस्तुओं का जितना ही अधिक रूपांतरण आवश्यक होगा, उतनी ही व्यापक सफल अंतरण कर पाने के लिए जरूरी मध्यवर्ती बौद्धिक सक्रियता होगी। फिर भी हर हालत में हम ऐसे अंतरण को कौशल की संज्ञा दे सकते हैं। कौशल को, उपलब्ध ज्ञान तथा आदतों का निर्धारित लक्ष्य के अनुसार क्रिया-प्रणालियों के चयन तथा प्रयोग के लिए इस्तेमाल करने की योग्यता कह सकते हैं

कौशल के लिए बाह्यीकरण, यानि ज्ञान का शारीरिक क्रियाओं में रूपांतरण आवश्यक है। इसका आरंभ-बिंदु प्रत्ययात्मक स्तर पर, यानि चेतना में सूचना का संसाधन होता है और परिणाम व्यवहारिक कार्यों में इस प्रत्ययात्मक सक्रियता के परिणामों का नियमन करना। उदाहरण के लिए, एक व्यक्ति को किसी ज्यामितीय पिंड़ का आयतन निकालना है। इसके लिए उसे पहले यह तय करना होगा कि दत्त पिंड ज्यामितीय पिंडों की किस श्रेणी में आता है। इसके बाद उसे ऐसे पिंडों के आयतन का परिकलन करने की प्रणालियां याद करनी होंगी, मालूम करना होगा कि कौन-कौन से माप लेने हैं, फिर ये माप लेने होंगे और अंत में आवश्यक परिकलन करने होंगे। इस तरह हम देख सकते हैं कि ज्ञान को कौशल में परिवर्तित करने के लिए कई सारी आदतों व संक्रियाओं की आवश्यकता होती है।

इस प्रकार कौशल का अर्थ व्यक्ति द्वारा अपने ज्ञान तथा आदतों के द्वारा सक्रियता के सोद्देश्य नियमन के लिए आवश्यक मानसिक और व्यवहारिक क्रियाओं के जटिल तंत्र में सिद्धहस्त होना है। इस तंत्र में कार्यभार से संबद्ध जानकारी का चयन, कार्यभार के लिए आवश्यक गुणधर्मों को पहचानना, इस आधार पर रूपांतरणों की एक ऐसी श्रृंखला का निर्धारण करना कि जो दत्त कार्यभार की पूर्ति की ओर ले जाती हैं, प्राप्त परिणामों का निर्धारित लक्ष्य से मिलान करने उनपर नियंत्रण रखना और इस आधार पर उपरोक्त सारी प्रक्रियाओं में सुधार करना शामिल हैं।

कौशल-निर्माण की प्रक्रिया का अर्थ ज्ञान में उपलब्ध और वस्तु से प्राप्त सूचना के संसाधन से संबद्ध सभी संक्रियाओं में भी और इस सूचना के अभिज्ञान तथा क्रियाओं से इसके सहसंबंध से जुड़ी हुई संक्रियाओं में भी प्रवीणता हासिल करना है।

उल्लेखनीय है कि कौशल-निर्माण की प्रक्रिया विभिन्न तरीक़ों से साकार बन सकती है, जिन्हें हम दो मुख्य वर्गों में विभाजित कर सकते हैं। पहले में सीखनेवाले को पहले से ही आवश्यक ज्ञान होता है। उसके सामने रखे गये कार्यभार उससे इस ज्ञान के विवेकसंगत उपयोग का तक़ाज़ा करते हैं और वह स्वयं प्रयत्न-त्रुटि प्रणाली से उचित संदर्भ-बिंदुओं, उपलब्ध जानकारी के संसाधन की प्रणालियों तथा सक्रियता की प्रणालियों का पता लगाकर स्वयं उन कार्यभारों के समाधान खोजता है। सबसे कम कारगर होने पर भी यह तरीक़ा ही आज सबसे अधिक प्रचलित है।

दूसरे वर्ग में वे तरीक़े आते हैं, जिनमें प्रशिक्षक विद्यार्थी को उपलब्ध ज्ञान का कारगर उपयोग करने के लिए प्रेरित करके उसकी मानसिक सक्रियता का नियमन करता है। इस मामले में शिक्षक उसे अर्थपूर्ण संकेतों तथा संक्रियाओं के चयन के लिए आवश्यक संदर्भ-बिंदुओं की जानकारी देता है और निर्धारित समस्याओं के समाधान के लिए उपलब्ध जानकारी के संसाधन तथा उपयोग में उसकी सक्रियता का संगठन करता है। शिक्षा मनोविज्ञान में अब इस उपागम पर अधिक ध्यान दिया जाने लगा है।


इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

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आदतों की अन्योन्यक्रिया

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने क्रियाशीलता और सक्रियता को समझने की कोशिशों की कड़ी में अभ्यास और आदतों पर चर्चा की थी इस बार हम आदतों की अन्योन्यक्रियाओं के सिद्धांतों को समझने की कोशिश करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


आदतों की अन्योन्यक्रिया

हर आदत पहले से विद्यमान आदतों की पद्धति के अंतर्गत बनती और कार्य करती है। उनमें से कुछ नई आदत को जड़ें जमाने तथा सक्रिय बनने में मदद करती हैं, तो कुछ उसे पनपने नहीं देतीं और कुछ बदलाव लाने का प्रयत्न करती हैं। मनोविज्ञान में इस परिघटना को आदतों की अन्योन्यक्रिया कहा जाता है। इस अन्योन्यक्रिया का स्वरूप क्या है? कोई भी क्रिया उसके उद्देश्य, विषय और परिस्थितियों से निर्धारित होती है, किंतु वह साकार, गतिशील निष्पादन, संवेदी नियंत्रण और केंन्द्रीय नियमन की प्रणालियों की एक पद्धति के रूप में होती है। क्रिया की सफलता, यानि आदत की कारगरता इसपर निर्भर होती है कि ये प्रणालियां लक्ष्य, विषयों और परिस्थितियों के किस हद तक अनुरूप हैं।

कोई नया कार्यभार पैदा होने पर मनुष्य पहले उसे उन विधियों से हल करने की कोशिश करता है, जिनमें उसे दक्षता प्राप्त है, और यह आदत-निर्माण की प्रक्रिया की एक आम विशेषता है। नये लक्ष्य से निदेशित होते हुए वह उसकी प्राप्ति के लिए वे प्रणालियां इस्तेमाल करता है, जिनसे उसने पहले कभी वैसे ही कार्यभार हल किये थे। अतः सक्रियता की ज्ञात प्रणालियों के अंतरण में सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि व्यक्ति कार्यभारों का उनके समाधान की दृष्टि से कैसे मूल्यांकन करता है। वास्तव में आदत-निर्माण की प्रक्रिया चरम स्थितियों का प्रतिनिधित्व करने वाली दो दिशाओं में से कोई एक दिशा ग्रहण करती है।

स्थिति एक : व्यक्ति द्वारा दो क्रियाओं के लक्ष्यों, अथवा विषयों, अथवा परिस्थितियों को एक जैसा माना जाता है, जबकि क्रियाओं के बीच वास्तव में उनके निष्पादन की प्रणाली, अथवा नियंत्रण प्रक्रियाओं, अथवा केंद्रीय नियमन की प्रणालियों के अनुसार भेद होता है। यह स्थिति प्रणालियों की अल्प-कारगरता के रूप में पैदा होती है। चूंकि इस अपूर्णता का उजागर होना, उसके परिणामों से छुटकारा पाना और नयी कारगर प्रणालियां खोजना होता है, तो स्पष्टतः समय ज़्यादा लगता है और बार-बार प्रयत्न करने पड़ते हैं। आदत का निर्माण कठिनतर और धीमा हो जाता है। मनोविज्ञान में इस परिघटना को आदतों का नकारात्मक अंतरण अथवा आदतों का व्यतिकरण कहते हैं।

स्थिति दो : कार्यभारों के लक्ष्य, विषय और परिस्थितियां बाहरी तौर पर भिन्न हैं, किंतु उनकी पूर्ति के लिए आवश्यक क्रियाएं निष्पादन, नियंत्रण और केंद्रीय नियमन की प्रणालियों की दृष्टि से एक जैसी हैं। उदाहरण के लिए, लोहा काटने की आरी से काम करना सीख रहे प्रशिक्षार्थी के लिए रेती से काम करने की अच्छी आदतें प्रायः बड़ी सहायक होती हैं। इसका कारण यह है कि क्रियाओं के विषयों और लक्ष्यों में भेद के बावजूद उनके निष्पादन और संवेदी नियंत्रण की प्रणालियां मिलती-जुलती होती हैं। दोनों ही स्थितियों में काम के दौरान औजार को क्षैतिज अवस्थाओं में रखने के लिए दो हाथों के बीच बल का वितरण और बाद की गतियां एक जैसी ही हैं। इस स्थिति में क्रियाएं शुरू से ही सही होती हैं, जिससे आवश्यक आदतों का निर्माण आसान हो जाता है। इसे सकारात्मक अंतरण अथवा आदतों का प्रेरण कहा जाता है।

नयी आदतों के निर्माण पर अनुभव और पुरानी आदतों का प्रभाव क्रियाओं तथा उनके विषयों के स्वरूप पर ही नहीं, इन क्रियाओं तथा विषयों के प्रति व्यक्ति के रवैये पर भी निर्भर होता है। अधिगम और पुनरधिगम की प्रक्रिया में बाधक नकारात्मक अंतरण का प्रतिकूल प्रभाव काफ़ी घट सकता है, बशर्ते कि छात्र को उनके बुनियादी अंतरों के बारे में बता दिया जाए। दूसरी ओर, आदत के अंतरण का सकारात्मक प्रभाव कहीं अधिक बढ़ सकता है और अधिगम का काल घट सकता है, बशर्ते कि शिक्षक छात्रों के सामने देखने में भिन्न लगनेवाले कार्यभारों की बुनियादी समानता विशेष रूप से दिखा दे।

नये विषयों की ओर पुनरभिविन्यास और इसके साथ क्रिया का जिन परिस्थितियों में वह बनी है, उनसे संबंध-विच्छेद अथवा पृथक्करण एक ऐसी महत्त्वपूर्ण घटना है, जिसके दूरगामी परिणाम निकलते हैं। कई मामलों में ऐसे अंतरण की बदौलत ही व्यक्ति बिना प्रयत्नों और त्रुटियों के नये प्रकार के कार्यभार संपन्न कर लेता है, यानि व्यवहार के एक मौलिकतः नये प्ररूप – बौद्धिक व्यवहार – का मार्ग प्रशस्त कर देता है। अपने मूल परिवेश से कटी हुई ऐसी ‘पुनरारोपित’ क्रिया के महत्त्व के कारण ही उसे ‘संक्रिया’ के विशेष नाम से पुकारा जाता है।

क्रिया का संक्रिया में रूपांतरण केवल एक निश्चित मानसिक सक्रियता – समानता का अवबोधन, सामान्यीकरण, आदि – के आधार पर हो सकता है। ऐसे रूपांतरणों की संभावना के दायरे में क्रिया के केंद्रीय नियमन से संबद्ध प्रक्रियाएं, अर्थात मानसिक क्रियाओं का संक्रियाओं में रूपांतरण भी आ जाता है।

केंद्रीय नियमन की संरचनाओं में साम्य के कारण, एक जैसी व्याकरण पद्धतियों और शब्दावलियों वाली भाषाओं को सीखना परस्पर असमान भाषाओं को सीखने की तुलना में कम कठिन होता है। अंतरण का यह प्ररूप ही सीखी हुई परिकलन को अत्यंत संख्याओं पर लागू करने, विभिन्न समस्याओं के समाधानार्थ साझे सूत्रों का उपयोग करने, आदि की संभावना देता है। सूचनाओं के आत्मसात्करण तथा संसाधन के दौरान मनुष्य द्वारा तार्किक निर्मितियों के स्वतःअनुप्रयोग के मूल में यह अंतरण का सिद्धांत ही होता है।

यह संयोग नहीं है कि आदत के अंतरण के प्रश्न को शिक्षा मनोविज्ञान का एक सबसे महत्त्वपूर्ण प्रश्न माना जाता है। आदतमूलक क्रियाओं का नये कार्यभारों की ओर सही और सफल पुनरभिविन्यास करके व्यक्ति थोड़े ही समय के भीतर और कम से कम गलतियां करके नये प्रकार की सक्रियताओं में दक्षता प्राप्त कर लेता है। आदतमूलक क्रियाओं के प्रयोग द्वारा प्राप्य लक्ष्य जितनें ही विविध होंगे, उतना ही व्यापक उन कार्यभारों का दायरा होगा, जिन्हें मनुष्य अपनी आदतों के बल पर पूरा कर सकता है। दूसरे शब्दों में कहें, तो अर्जित सचेतन स्वचलताओं का अंतरण जितना व्यापक और जितना परिशुद्ध होगा, उसके अध्ययनों के परिणाम उतने ही फलप्रद और उसकी सक्रियता में उतने ही ज़्यादा सहायक सिद्ध होंगे


इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

अभ्यास और आदत

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने  क्रियाशीलता और सक्रियता को समझने की कोशिशों की कड़ी में आदतों पर चर्चा शुरू की थी इस बार हम इसे और आगे बढ़ाते हुए अभ्यास और आदतों पर कुछ और विचार करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


सक्रियता का आभ्यंतरीकरण और अभ्यास

क्रिया की प्रणालियों में परिवर्तन कैसे आते हैं और उनका मनोवैज्ञानिक रचनातंत्र क्या है?

मुख्य रूप से यह एक ऐसा रचनातंत्र है, जिसमें अनुसंधान और वरण के तत्व सम्मिलित हैं। जब कोई मनुष्य किसी क्रिया में दक्षता पाने के प्रयत्न करता है और उसके परिणामों को जांचता है, तो वह शनैः शनैः सबसे कार्यसाधक गतियां, सबसे उपयुक्त संदर्भ-बिंदु और नियमन-प्रणालियां चुनता है तथा अपने को उनका आदी बनाता है और जो अनुपयुक्त है, उन्हें ठुकराता है। किन्हीं क्रियाओ अथवा सक्रियता के रूप की ऐसी बारंबार आवृत्ति, जिसका उद्देश्य उनमें दक्षता पाना है और जो समझ पर आधारित हैं तथा सचेतन नियंत्रण व सुधार जिसके अनिवार्य अंग हैं, अभ्यास कहलाती है

अभ्यास के दौरान मनुष्य की क्रियाओं के स्वरूप में परिवर्तन इन क्रियाओं के निष्पादन के दौरान उसकी मानसिक सक्रियता के परिवर्तनों को प्रतिबिंबित करता है। सचेतन नियंत्रण और सुधार के साथ हर नये प्रयत्न से से क्रियाओं की प्रणालियां और उद्देश्य ही याद नहीं हो जाते, वरन् उसमें कार्यभार को देखने का ढ़ंग, उसकी पूर्ति के तरीक़ों और क्रिया के नियमन में परिवर्तन भी शामिल रहता है।

मिसाल के तौर पर, कई सारे एक ही तरह के पुरजों पर निशान बनाने की बारंबार की जानेवाली क्रिया के दौरान प्रशिक्षार्थी की सक्रियता में आनेवाले पारिवर्तनों पर ग़ौर करें। पहले पुर्जे में प्रशिक्षार्थी को एक ऐसी क्रिया करनी है जो उसके लिए नई है। अभी तक उसने देखा और समझा ही है कि इस क्रिया को कैसे किया जाना चाहिए। अब उसे क्रिया को स्वतंत्र रूप से करने के लिए अपने शिक्षक के मौखिक निर्देशों और प्रदर्शन के दौरान बने चाक्षुष बिंबों को स्वतःगतिशीलता, यानि अपनी गतियों के नियमन की भाषा मे अनूदित करना है। क्रिया के मानसिक चित्र और चाक्षुष बिंब के साथ, गतियों के विनियमन के लिए पेशिय संवेदन भी आ जुड़ता है। इस चरण में क्रिया के सामान्य प्रत्यय, और उसके वास्तविक निष्पादन के बीच की खाई ख़त्म होती है। इस आधार पर प्रशिक्षार्थी संक्रिया का एक प्रेरक-संवेदी बिंब और उसकी वस्तुसापेक्ष-बौद्धिक धारणा, यानि क्रिया का मानसिक मॉडल बनाता है, जो उसके निष्पादन का नियमन तथा नियंत्रण करता है।

दूसरे पुर्जे के दौरान उसे अधिकांश कठिनाईयों का सामना नहीं करना पड़ता। गुणता और रफ़्तार, दोनों दृष्टियों से उसके कार्य में छलांगनुमा सुधार होता है। तीसरे-चौथे पुरजे पर काम करते हुए कार्य-प्रक्रिया में परिवर्तन पहले जितने बड़े नहीं होते और मुख्यतया अनावश्यक गतियों से छुटकारा पाने, ग़लत गतियों को सुधारने, परस्परसंबद्ध गतियों को एक अविकल श्रृंखला में संयोजित करने और प्रणालियों का अधिकाधिक मानकीकरण करने तक सीमित रहते हैं। इस एकीकरण के फलस्वरूप गतियां अधिक स्वचालित, चेतना के नियंत्रण से मुक्त और सोपाधिक प्रतिवर्तों से मिलती-जुलती बन जाती हैं।

बाद के पुरजों में, मुख्य नियंत्रण और नियमन-संरूपों का स्वचलन मन को जैसे कि क्षुद्र संरक्षण से छुटकारा दिलाता है और उसे क्रिया की परिस्थितियों का अधिक व्यापक ध्यान रखने में समर्थ बनाता है। प्रशिक्षार्थी अपनी क्रियाओं की रफ़्तार को नियंत्रित करनाम उन्हें बदलते कार्यभार, बई स्थितियों और नये पुरजों के अनुरूप ढ़ालना सीखता है।

सचेतन रूप से स्वचालित क्रिया के रूप में आदत

किसी भी क्रिया को करने की आदत तभी बनती है, जब उस क्रिया को बार-बार दोहराया जाए। इस प्रकट तथ्य के आधार पर कुछ मनोविज्ञानियों और विशेषतः व्यवहारवादियों ने पशुओं और  मनुष्यों की आदत-निर्माण की प्रक्रियाओं में समानता दिखाने की कोशिशें की हैं। किंतु मनोवैज्ञानिक क्रियातंत्रों की समानता के सामने आदत-निर्माण की प्रक्रियाओं के बुनियादी अंतरों को महत्त्वहीन नहीं समझना चाहिए। जीव-जंतुओं के विपरीत मनुष्य द्वारा किसी क्रिया का किया जाना हमेशा किसी न किसी रूप में मन द्वारा नियंत्रित होता है। इस कारण जीव-जंतुओं से संबद्ध प्रक्रियाओं का स्वरूप मनुष्य की तुलना में बिल्कुल ही भिन्न होता है। मनुष्य के व्यवहारिक प्रयोग निश्चित गतियों के पुनरुत्पादन के सचेतन प्रयत्न होते हैं। परिणामों का सत्यापन, परिस्थितियों का मूल्यांकन और क्रियाओं का सुधार भी न्यूनाधिक हद तक चेतना पर आधारित होते हैं। यह अनुसंधान के प्रयत्नों के स्रोत को ही पुनर्गठित कर देता है। उदाहरण के लिए, अनुकरण का स्थान शनैः शनैः आत्मसात् की जा रही मॉडल क्रियाओं का सचेतन सोद्देश्य प्रेक्षण ले लेता है। किंतु इससे भी ज़्यादा महत्त्वपूर्ण तथ्य तो यह है कि मनुष्य द्वारा प्रणालियों के चयन तथा नियमन की प्रक्रिया इन प्रणालियों के प्रयोजन की उसकी समझ पर और उनकी अंतर्वस्तु की उसकी धारणा पर अधिकाधिक निर्भर करती हैं।

आदत-निर्माण की प्रक्रिया में मुख्य कारक वाचिक सक्रियता ( मनुष्य द्वारा प्रेक्षणीय तथा निष्पादनीय क्रियाओं का शाब्दिक पुनरुत्पादन ) और प्रत्ययात्मक सक्रियता ( किये जानेवाले कार्य के बिंब का मन में पुनरुत्पादन ) हैं। मनुष्य में आदत-निर्माण के क्रियातंत्र की ये बुनियादी विशेषताएं ही आदत-निर्माण की प्रक्रिया के नियमों का आधार हैं।

आदत का अर्थ सचेतन रूप से स्वचालित क्रिया अथवा कोई स्वचालित क्रिया करने की प्रणाली समझा जाता है। आदत का उद्देश्य मन को किसी क्रिया के निष्पादन की प्रक्रिया पर नियंत्रण के कार्य से मुक्ति दिलाना और क्रिया के लक्ष्यों तथा जिन परिस्थितियों में वह की जाती है, उन पर ही ध्यान देने को विवश करना है। व्यक्ति की आदत का निर्माण कभी भी एक स्वतंत्र, अलग-थलग प्रक्रिया नहीं होता है। मनुष्य का सारा संचित अनुभव उसे प्रभावित करता है और उसमें व्याप्त भी रहता है।


इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

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आदतें – सक्रियता का आत्मसात्करण

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने जीवधारियों की क्रियाशीलता और सक्रियता को समझने की कोशिशों की कड़ी में सक्रियता के आभ्यंतरीकरण और बाह्यीकरण पर चर्चा की थी इस बार हम सक्रियता के आत्मसात्करण यानि आदतों पर विचार करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


आदतें – सक्रियता का आत्मसात्करण

हर कार्य मनुष्य द्वारा सचेतन और अचेतन, दोनों ढ़ंग से किया जा सकता है। उदाहरणार्थ, शब्दों का उच्चारण करने के लिए कंठ द्वारा की जानेवाली गतियां मनुष्य द्वारा हमेशा अचेतन ढ़ंग से संपन्न्न की जाती हैं। इसके विपरीत व्यक्ति जो वाक्य बोलने जा रहा है, उसके व्याकरणिक रूप और विषयवस्तु हमेशा उसकी चेतना की उपज होते हैं। व्यक्ति आम तौर पर पेशियों के उन जटिल संकुचनों और फैलावों से अनजान होता हैं, जो गति करने के लिए अपेक्षित हैं। ऐसी गतियां स्पष्टतः शुद्ध शरीरक्रियात्मक आधार पर, अचेतन रूप से की जाती हैं। फिर भी मनुष्य को सामान्यतः अपनी क्रियाओं के अंतिम लक्ष्य की, उनके सामान्य स्वरूप की चेतना रहती है। उदाहरण के लिए, वह पूर्ण अचेतनता की अवस्था में साइकिल नहीं चला सकता, उसे अपने गंतव्य, मार्ग, रफ़्तार, आदि की चेतना होनी चाहिए। यही बात श्रम, खेलकूद या किसी अन्य कार्य पर भी लागू होती है। कुछ गतियां सचेतन नियमन और अचेतन नियमन, दोनों के स्तर पर की जाती हैं। चलना एक ऐसी सक्रियता की ठेठ मिसाल है, जिसमें अधिकांश गतियां अचेतन रूप से की जाती हैं। किंतु रस्सी पर चलने में वे ही गतियां, संवेदी नियंत्रण और केंद्रीय नियमन अत्यधिक तनावभरी चेतना का विषय बन जाते हैं, विशेषतः यदि रस्सी पर चलनेवाला अनाड़ी है।

ऐसा भी हो सकता है कि सक्रियता के कुछ पहलुओं के लिए पहले विस्तृत सचेतन की जरूरत पड़े, जो फिर शनैः शनैः बढ़ती हुई स्वचलताओं के कारण अनावश्यक होता जाता है। सोद्देश्य गतियों के निष्पादन तथा नियमन की यह आंशिक स्वचलता ही आदत कहलाती है

इस तथ्य पर ध्यान दिया जाना चाहिए कि अचेतन या स्वतःनियमन की बात केवल गतियों के संबंध में की जा रही है, कि गतियों का नियमन और क्रियाओं का नियमन एक ही चीज़ नहीं है। गतियों की स्वचलता का बढ़ना और ये गतियां जिन क्रियाओं का अंग हैं, उनके सचेत नियमन का विस्तार, ये दोनों प्रक्रियाएं साथ-साथ चल सकती हैं। जैसे कि, साइकिलचालक गतियों की जिस स्वचलता की बदौलत संतुलन बनाए रखता है, वह उसे अपने इर्द-गिर्द के वाहनों, सड़क की हालत, आदि का ध्यान रखने की संभावना देती हैं और इस तरह वह अपनी क्रियाओं का बेहतर सचेत नियंत्रण करता है।

‘शुद्ध आदत’ की बात स्पष्टतः केवल जीव-जंतुओं के संदर्भ में की जा सकती है, क्योंकि विकारग्रस्त लोगों के अलावा अन्य सभी मनुष्यों की सक्रियता चेतना द्वारा नियंत्रित होती है। क्रिया के किन्हीं घटकों की स्वचलता केवल सचेतन नियंत्रण के विषय को बदल देती है और चेतना में क्रिया के सामान्य लक्ष्यों, उसके निष्पादन की अवस्थाओं और उसके परिणामों के नियंत्रण व आकलन को आगे ले जाती है।

आदतों की संरचना

आंशिक स्वचलता के कारण क्रिया की संरचना में आनेवाले परिवर्तन गतियों के ढ़ांचों, क्रिया के संवेदी नियंत्रण की प्रणालियों और केंद्रीय नियमन की प्रणालियों को प्रभावित करते हैं।

१. गतियों के ढ़ाचें – बहुत सी व्यष्टिक गतियां, जो अब तक अलग-अलग की जाती थीं, एक ही क्रिया में, अलग-अलग घटकों ( साधारण गतियों ) के बीच विराम या अंतराल से रहित एक समेकित गति में विलयित हो जाती हैं। उदाहरण के लिए, प्रशिक्षार्थी द्वारा क्रमिक क्रिया के तौर पर की जानेवाली गियर बदलने की प्रक्रिया अनुभवी ड्राइवर द्वारा हाथ की एक ही तथा झटकारहित गति के रूप में संपन्न की जाती है। सभी अनावश्यक गतियां छोड़ जाती हैं। बच्चा जब लिखना सीखता है, तो बहुत सारी फालतू गतियां करता है, जैसे मुंह से जीभ निकालना, कुर्सी में हिचकोले खाना, सिर झुकाना, आदि। ज्यों-ज्यों दक्षता बढ़ती है, सारी अनावश्यक गतियां लोप होती जाती हैं। इस तरह रफ़्तार बढ़ती जाती है, आदत के पक्की होने के साथ-साथ क्रिया की स्वतः गतिशीलता हर लिहाज़ से ज़्यादा प्रभावी बन जाती है, गतियों का ढ़ांचा ज़्यादा सरल हो जाता है और व्यष्टिक गतियां एक अनवरत, साथ-साथ तथा तेज़ रफ़्तार से संपन्न की जा रही प्रक्रिया में विलयित हो जाती हैं।

२. क्रिया के संवेदी नियंत्रण की प्रणालियां – गतियों के चाक्षुष नियंत्रण का स्थान काफ़ी हद तक पेशीय नियंत्रण ले लेता है। यह परिवर्तन एक ऐसे कुशल टाइपिस्ट की मिसाल से देखा जा सकता है, जो अपने काम को की-बोर्ड़ पर देखे बिना करता है। अभ्यास और समय के साथ विकसित विशेष संवेदी संश्लेषण मनुष्य को गतियों के स्वरूप का निर्धारण करनेवाले विभिन्न चरों के सहसंबंध को आंकने में समर्थ बना देते हैं। ऐसे संश्लेषणों की मिसालें ड्राइवर की तेज़ निगाह और गति का बोध, बढ़ई की लकड़ी की पहचान, ख़रादी का पुरजे के आकार का अहसास और विमान चालक का ऊंचाई का बोध है। मनुष्य अपनी क्रियाओं के परिणामों का नियंत्रण करने के लिए महत्त्वपूर्ण संदर्भ-बिंदुओं को तुरंत पहचानना और अलग करना सीख लेता है

३. क्रिया के केंद्रीय नियमन की प्रणालियां – मनुष्य का ध्यान अब क्रियाओं की प्रणालियों के अवबोधन से हटकर, मुख्य रूप से स्थिति और क्रिया के परिणामों पर केंद्रित हो जाता है। कुछ परिकलन, समाधान और अन्य बौद्धिक संक्रियाएं जल्दी और एक अनवरत प्रक्रिया में  ( सहज ढ़ंग से ) की जाने लगती हैं। इससे तुरंत प्रतिक्रिया करना संभव बन जाता है। जैसे, इंजन की आवाज़ से ही, ड्राइवर तुरंत, बिना सोचे, पता कर लेता है कि उसे किस गियर पर चलाना चाहिए। उपकरणों पर सरसरी निगाह डालकर ही ऑपरेटर मालूम कर लेता है कि कहां क्या गड़बड़ी है। विमान को उतारना शुरू करते समय विमानचालक सभी बंधी-बंधाई आवश्यक क्रियाओं के लिए पहले से ही मानसिकतः तैयार रहता है। इसलिए एक गति से दूसरी गति में संक्रमण बिना किसी पूर्व योजना के कर लिया जाता है। योजना केवल उतराई की प्रणाली की बनाई जाती है। जो प्रणालियां इस्तेमाल की जानी हैं, उनकी पूरी श्रृंखला की ऐसी पहले से विद्यमान चेतना को पूर्वाभास कहते हैं


इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय