सक्रियता और उसके लक्ष्य

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने जीवधारियों की क्रियाशीलता और सक्रियता को समझने की कोशिशों की कड़ी में मनुष्य की आवश्यकताओं के विकास पर एक छोटी सी चर्चा की थी इस बार सक्रियता और उसके लक्ष्यों को समझने की कोशिश करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।
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सक्रियता और उसके लक्ष्य

जीव-जंतुओं का व्यवहार पूर्णतः उनके प्रत्यक्ष परिवेश से निदेशित होता है, किंतु मनुष्य की क्रियाशीलता का नियमन बचपन से ही समस्त मानवजाति के अनुभव तथा सामाजिक अपेक्षाओं द्वारा किया जाता है। यह इतने विशिष्ट ढ़ंग का व्यवहार है कि मनोविज्ञानियों ने इसे नाम भी विशेष दिया है, सक्रियता। इस अनन्यतः मानव क्रियाशीलता अथवा सक्रियता की मनोवैज्ञानिक विशेषताएं क्या हैं।

पहली विशेषता तो यह है कि इस सक्रियता की अंतर्वस्तु केवल उसे जन्म देनेवाली आवश्यकता से ही निर्धारित नहीं होती। जहां अभिप्रेरक के नाते आवश्यकता व्यक्ति की सक्रियता की शुरुआत करती है तथा उसे बढ़ावा देती है, वहां स्वयं इस सक्रियता के रूप तथा अंतर्वस्तु सामाजिक परिस्थितियों, सामाजिक अपेक्षाओं और अनुभव पर निर्भर होते हैं। मनुष्य काम करने के लिए आहार की आवश्यकता से अभिप्रेरित हो सकता है। फिर भी, उदाहरण के लिए, कोई ख़रादी अपना काम इसलिए नहीं करता है कि काम से उसकी भूख शांत होती है, बल्कि इसलिए करता है कि उसे एक निश्चित पुरज़ा बनाने का ज़िम्मा सौंपा गया है और ख़राद ( lathe machine ) पर काम करके वह अपनी इस ज़िम्मेदारी को पूरा करता है। उसकी सक्रियता की अंतर्वस्तु आवश्यकता से नहीं, अपितु लक्ष्य – समाज द्वारा अपेक्षित निश्चित उत्पाद को तैयार करना – से निर्धारित होती है। सक्रियता का कारण और सक्रियता का लक्ष्य एक ही चीज़ नहीं है। मनुष्य के कार्यों के प्रणोदक तथा अभिप्रेरक इन कार्यों के प्रत्यक्ष लक्ष्य से भिन्न होते हैं। अतः सक्रियता की पहली विशेषता यह है कि वह आवश्यकता से पैदा और सचेतन लक्ष्य द्वारा नियंत्रित होती है। आवश्यकता उसका स्रोत है और सचेतन लक्ष्य उसका नियामक।

सक्रियता का मानसिक नियमन तभी सफल हो सकता है, जब मानस वस्तुओं के यथार्थ गुणों को परावर्तित करे और उन्हें ( न कि अवयवी की आवश्यकताओं को ) मार्गदर्शक के तौर पर इस्तेमाल करते हुए निर्धारित लक्ष्य को पाने की विधियां तय करे। इसके अतिरिक्त सक्रियता के दौरान मनुष्य को अपने व्यवहार का नियंत्रण करने में इसलिए समर्थ होना चाहिए कि लक्ष्योद्दिष्ट कार्य कर सके, यानि ऐसी आवश्यक क्रियाशीलता पैदा कर सके तथा बनाए रख सके, जो अपने आप में किन्हीं भी पैदा हो रही आवश्यकताओं की तत्काल तुष्टि नहीं करती। सक्रियता सीधे संज्ञान और इच्छा से जुड़ी होती है, उनसे समर्थन पाती है और संज्ञानात्मक तथा इच्छामूलक प्रक्रियाओं के बिना संपन्न नहीं होती। अतः सक्रियता मनुष्य की सचेतन लक्ष्य द्वारा नियमित आंतरिक ( मानसिक ) और बाह्य ( शारीरिक ) क्रियाशीलता है

इस प्रकार सक्रियता के लिए एक सचेतन लक्ष्य का होना आवश्यक है, जो अपने को मनुष्य की क्रियाशीलता में प्रकट करता है। सक्रियता के अन्य सभी पहलू, जैसे उसके अभिप्रेरक, ठोस कार्य और आवश्यक सूचना का चयन तथा संसाधन, चेतना के स्तर को छू भी सकते हैं और नहीं भी छू सकते हैं। यह भी संभव है कि व्यक्ति को उनकी आंशिक चेतना ही हो या वह उनके वास्तविक रूप को गलत ढ़ंग से समझे। उदाहरण के लिए, स्कूलपूर्व आयु के बच्चे को अपनी खेलने की इच्छा के मूल में निहित आवश्यकता की या निचली कक्षाओं के बच्चों को पाठ याद करने के अभिप्रेरकों की विरले ही चेतना होती है। अनुशासनहीन किशोर भी अपने कार्यों के वास्तविक अभिप्रेरकों को पूरी तरह नहीं जान पाता और प्रायः उन्हें गलत ढ़ंग से समझता है। यहां तक कि बड़े भी अक्सर उनकी चेतना द्वारा उनके ग़लत तथा अनुचित व्यवहार के औचित्य के तौर पर उन्हें सुझाए गये ‘गौण’ अभिप्रेरकों में विश्वास कर लेते हैं।

मनुष्य अभिप्रेरकों को ही नहीं, बल्कि बहुत-सी चिंतन प्रक्रियाओं को भी, जिनके फलस्वरूप सक्रियता की कोई निश्चित योजना चुनी जाती है, पूरी तरह विरले ही समझ पाता है। जहां तक सक्रियता को साकार बनाने की प्रणालियों का सवाल है, तो उनमें से अधिकांश का नियमन अचेतन रूप से होता है। ऐसा ही आदतवश किये जानेवाले कार्यों, जैसे टहलना, बोलना, लिखना, वाहन चलाना, कोई बाजा बजाना, आदि के मामले में भी होता है।

सक्रियता से संबंधित व्यक्ति की चेतना का स्तर इससे निर्धारित होता है कि सक्रियता के ये सभी पहलू चेतना में किस हद तक प्रतिबिंबित हुए हैं

किंतु चेतना का स्तर कोई भी क्यों न हो, लक्ष्य की चेतना हमेशा सक्रियता की एक आवश्यक विशेषता होती है। जिन मामलों में सक्रियता में यह विशेषता नहीं होती, वहां हमारे सामने केवल आवेगी व्यवहार होता है, न कि मानवसुलभ सक्रियता। सक्रियता के विपरीत, आवेगी व्यवहार सीधे आवश्यकताओं और संवेगों से नियमित होता है। वह मनुष्य के भावों और वृत्तियों को ही व्यक्त करता है, जो बहुत बार स्वार्थमूलक और असामाजिक होते हैं। उदाहरणार्थ, क्रोध या अदम्य वासना से अंधे हुए व्यक्ति का व्यवहार आवेगी ही होता है।

आवेगी व्यवहार अचेतन व्यवहार नहीं है। किंतु आवेगवश ( स्वतःस्फूर्त ढ़ंग से ) काम करते हुए मनुष्य को केवल व्यक्तिगत अभिप्रेरक की चेतना होती है, जो उसके व्यवहार का नियंत्रण करता है। इस स्थिति में मनुष्य को लक्ष्य में निहित इसकी सामाजिक अंतर्वस्तु की चेतना नहीं होती।

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इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

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3 टिप्पणियाँ (+add yours?)

  1. shyam1950
    नवम्बर 13, 2010 @ 13:45:14

    आपका बहुत बहुत आभार और धन्यवाद..केवल एक दिक्कत आ रही है तकनीकी शब्दों के साथ अंग्रेजी के समानार्थी भी होते तो ठीक रहता ..लेखमाला की भाषा थोड़ी क्लिष्ठ सी हो रही है ..विनम्र निवेदन है शेष आप मालिक हैं

    प्रतिक्रिया

  2. दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi
    नवम्बर 14, 2010 @ 02:48:03

    आवेगी व्यवहार और मानव सुलभ सक्रियता का अंतर बहुत सही तरीके से स्पष्ट कर दिया गया है।

    प्रतिक्रिया

  3. vinay
    नवम्बर 15, 2010 @ 12:28:57

    मानव श्रिखंला पर लिखा अच्छा लेख,थोड़ा ध्यान से पड़्ने की आवश्यकता थी ।

    प्रतिक्रिया

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