मानस की परिवेश और अंग-संरचना पर निर्भरता

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने यहां पशुओं के बीच संप्रेषण और उनकी ‘भाषा पर चर्चा की थी, इस बार विकसित होते मानस की परिवेश और अंग-संरचना पर निर्भरता पर एक नज़र डालेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।
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मानस की परिवेश और अंग-संरचना पर निर्भरता

        यदि जीवधारियों का वासस्थान सर्वत्र एक ही जैसा होता, तो सारी पृथ्वी पर शायद एक ही जाति के जीव रह रहे होते। किंतु वास्तव में जलवायु और वासीय परिस्थितियों के लिहाज़ से परिवेश बहुत ही विविध है और इसी कारण जीवजातियों में इतनी अधिक विविधता पाई जाती है। पृथ्वी पर १० लाख से अधिक क़िस्मों की जीवजातियां रहती हैं। फिर अपनी सारी विविधताओं की बावज़ूद पर्यावरणीय परिघटनाओं में वार्षिक चक्र, दिन और रात्रि का एकांतरण, तापमान में उतार-चढ़ाव, आदि चक्रीय परिवर्तन आते रहते हैं। सभी जीव अवयवियों को अपने को विद्यमान स्थितियों के अनुरूप ढ़ालना पड़ता है।

        सामान्य उत्तेजनशीलता से आरंभ होनेवाला आत्म-नियमन मनुष्य की सृजनात्मक तर्कबुद्धि में अपनी पराकाष्ठा पर पहुंचता है।

        परावर्तन की प्रणालियां जितनी ही उन्नत होंगी, जीवजाति परिवेश के प्रत्यक्ष प्रभाव से उतना ही अधिक स्वतंत्र होगी। एककोशीय अवयवी पूरी तरह और प्रत्यक्ष रूप से परिवेशीय परिस्थितियों पर निर्भर होता है। उच्चतर जीवों का व्यवहार निम्नतर जीवों से अत्यधिक भिन्न होता जाता है। बहुत से जीव देशांतरण करते हैं। स्तेपियाई कछुए औए चूहे अपने को ज़मीन में गहरे गाड़ लेते हैं, जहां तापमान उनके अस्तित्व के ज़्यादा अनुकूल होता है। ऐसा वे सहजवृत्तिवश करते हैं। अधिक गर्मी में हाथी अपने पर ठंड़ा पानी डालता है तथा घनी छांह में शरण लेता है। इसी तरह बंदर भी ऐसी जगह चुनता है, जहां गर्मी को ज़्यादा आसानी से झेला जा सकता है। वे सहजवृत्तियों के अलावा, अनुकूलित संबंधों यानि जीवनकाल में संचित अनुभवों से भी निदेशित होते हैं।

        इस तरह जीव-जंतु अपने को परिवेश पर प्रत्यक्ष निर्भरता से शनैः शनैः मुक्त करते जाते हैं। किंतु जीवधारी पर्यावरण से पूर्णतः स्वतंत्र कभी नहीं होंगे, चाहे उनके विकास का स्तर कितना ही ऊंचा ही क्यों न हो। पर्यावरण जीव अवयवियों के लिए अस्तित्व की एक आवश्यक शर्त और जीवन का एक मुख्य निर्धारक कारक है। दूसरे शब्दों में कहें, तो सभी जीवधारियों का अस्तित्व परिवेशी परिस्थितियों द्वारा निर्धारित होता है

        परावर्तन की पर्याप्तता मुख्य रूप से ज्ञानेन्द्रियों और तंत्रिका-तंत्र की संरचना पर निर्भर होती हैं। किसी क्षोभक या उत्तेजक के बारे में ग्राही की प्रतिक्रिया जितनी ही सही होगी, उतनी ही पर्याप्त वह प्रतिक्रिया होगी। कुछ सीमाओं के भीतर इन दोनों के बीच प्रत्यक्ष संबंध है। उदाहरण के लिए, चाक्षुष ग्राही का विकास अवयवी द्वारा अपने को सूर्य के विसरित प्रकाश के परावर्तन के अनुकूल बनाने पर निर्भर था।

        एककोशीय और सरलतम बहुकोशीय सीलेंटरेटा में प्रकाश की केवल सामान्य प्रतिक्रिया, प्रकाशानुवर्तन देखी जा सकती है। केंचुए की बाह्यत्वचा में प्रकाशसंवेदी कोशिकाएं होती हैं, ये कोशिकाएं प्रकाश और अंधकार के बीच भेद कर सकती हैं। चपटे मोलस्क में प्रकाशसंवेदी कोशिकाओं के कई समूह पाये जाते हैं, जो शरीर में धंसी हुई एक छोटी थैली पर बनी होती हैं। दर्शनेंद्रिय की ऐसी रचना की बदौलत मोलस्क प्रकाश की विद्यमानता और अभाव को दर्ज़ कर लेने के साथ-साथ यह भी जान लेता है कि प्रकाश किधर से आ रहा है। कीटों की आंखों की फलकित रचना उन्हें छोटी वस्तुओं की आकृति का पता लगाने में मदद देती है। अधिकांश कशेरुकियों की आंखों में विशेष अपवर्तन लेंस बने होते हैं, जिनकी बदौलत वस्तु की रूपरेखा स्पष्टतः देखी जा सकती है।

        ग्राहियों का विकास कुछ सीमाओं के भीतर तंत्रिका-तंत्र के एक विशेष प्ररूप के विकास से जुड़ा हुआ है। ज्ञानेंद्रियों और तंत्रिका-तंत्र के विकास का स्तर अनिवार्यतः मानसिक परावर्तन के स्तर तथा रूपों का निर्धारण करता है

        विकास की निम्नतर अवस्था के जालनुमा तंत्रिका-तंत्रवाले जीव उद्दीपनों का उत्तर मुख्यतः अनुवर्तनों से देते हैं। उनके अस्थायी संबंध कठिनता से बनते हैं और जल्दी ही लुप्त हो जाते हैं। गुच्छिकीय तंत्रिका-तंत्र वाले अवयवियों के परावर्तन में गुणात्मक परिवर्तन आते हैं। अधिक उन्नत गुच्छिकीय तंत्रिका-तंत्र से युक्त जीव जन्मजात और अर्जित, दोनों तरह के प्रतिवर्तों की मदद से बाह्य प्रभावों का परावर्तन करते हैं। किंतु इस चरण में बहुसंख्य आनुवांशिक प्रतिक्रियाएं स्पष्टतः प्रमुख भूमिका अदा करती हैं।

        नलिकादार तंत्रिका-तंत्र इससे उच्चतर क़िस्म का तंत्रिका-तंत्र है। उदविकास के दौरान कशेरुकी मेरु-रज्जु और मस्तिष्क, यानि केंन्द्रीय तंत्रिका-तंत्र का विकास कर लेते हैं। तंत्रिका-तंत्र के विकास के साथ-साथ जीवों की ज्ञानेन्द्रियों की उत्पत्ति तथा सुधार भी होता रहता है। तंत्रिका-तंत्र और ग्राही जैसे-जैसे परिष्कृत बनते जाते हैं, वैसे-वैसे मानसिक परावर्तन के रूप भी जटिलतर होते जाते हैं। उदविकास नये मानसिक प्रकार्यों को जन्म देता है और जो पहले से विद्यमान थे, उनमें सुधार करता है। ( संवेदन, प्रत्यक्ष, स्मृति और अंततः चिंतन ) तंत्रिका-तंत्र जितना ही जटिल होगा, मानस उतना ही परिष्कृत बनेगा। कशेरुकियों के उदविकास में मस्तिष्क और इसके स्थानीय प्रकार्यात्मक केंद्रों का विभेदन का विशेष महत्व है। जितने उच्च स्तर का प्राणी होगा, ये क्षेत्र उतने ही परिष्कृत होंगे।

        इस प्रकार मानस का उदविकास ग्राहियों और संकेतन-सक्रियता के रूपों तथा कार्यों के उत्तरोत्तर जटिलीकरण में प्रकट होता है

        प्राणियों के शरीर, तंत्रिका-तंत्र और ज्ञानेंद्रियों के विकास के फलस्वरूप परावर्तन के रूपों में परिमाणात्मक और गुणात्मक परिवर्तन आते हैं और परिवेश के साथ जीवधारियों के उत्तरोत्तर जटिल एवं बहुविध संबंध जन्म लेते हैं। मानसिक क्रियाएं जीव के वासस्थान और जीव की बनावट की विशिष्टताओं के अनुरूप विकास करती हैं। किंतु यह सोचना गलत होगा कि यदि परिस्थितियां एक जैसी हैं, तो सभी जीवों में एक ही जैसे मुख्य ग्राही विकसित होंगे। उनमें संवेदिता का जातिगत विकास मुख्यतः इसपर निर्भर होता है कि किस प्रकार के उत्तेजन जैविक महत्त्व प्राप्त करते हैं। एक ही जैसे परिवेश में मकड़ी कंपन से निदेशित होती है, मेंढ़क मनुष्य के लिए लगभग अश्रव्य सरसराहट से, चमगादड़ पराश्रव्य ध्वनियों से और कुत्ता मुख्यतः गंधों से ( सभी तरह की गंधों से नहीं, अपितु जैव अम्लों की गंधों से, क्योंकि कुत्ते की घ्राणशक्ति फूलों, जड़ी बूटियों, आदि की गंध के मामले में इतनी अधिक तीव्र नहीं होती )।

        मानस का विकास ऋजुरैखिक ढ़ंग से नहीं होता। वह एक साथ बहुत-सी दिशाओं में होता है। एक ही तरह के परिवेश में बहुत ही भिन्न परावर्तन-स्तरोंवाले जीव पाये जाते हैं। यही बात उल्टे क्रम में भी होती ह, यानि बहुत ही भिन्न परिवेशों में एक जैसे परावर्तन-स्तरवाले जीव मिल सकते हैं। उदाहरण के लिए, सामान्यतः माना जाता है कि इस दृष्टि से डोल्फ़िनों, हाथियों और भालूओं का समान रूप से ऊंचा परावर्तन स्तर है।

        परिवेश अपरिवर्तनशील नहीं है। सब कुछ की भांति परिवेश भी बदलता रहता है और उसमें रहने वाली जीवजातियां अपने को उसके अनुकूल ढ़ालती रहती हैं। मगर हो सकता है कि कुछ जातियों के लिए परिवेश इतना अधिक बदल जाए कि उसका उनकी मानसिक क्रियाओं पर गंभीर प्रभाव पड़े, जबकि अन्य जातियों की मानसिक क्रियाओं का विकास उससे नाममात्र को ही प्रभावित हो। उदाहरणार्थ, वासीय परिस्थितियों में आमूल परिवर्तन से प्राचीन मानवाभ वानरों के व्यवहार में गुणात्मक परिवर्तन आया था और अंततः यह पृथ्वी पर मनुष्य की उत्पत्ति का कारण बना

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इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

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4 टिप्पणियाँ (+add yours?)

  1. uthojago
    अक्टूबर 06, 2010 @ 14:35:33

    worthwhile

    प्रतिक्रिया

  2. ज़ाकिर अली ‘रजनीश’
    अक्टूबर 07, 2010 @ 10:34:58

    इस धीर गम्भीर आलेख के लिए हार्दिक बधाई।

    प्रतिक्रिया

  3. Dorothy
    अक्टूबर 13, 2010 @ 18:14:22

    काफ़ी विचारोत्तेजक, गहन विश्लेषण युक्त ज्ञानवर्धक प्रस्तुति.बधाई और ढेरों शुभकामनाएं. धन्यवाद.सादर डोरोथी.

    प्रतिक्रिया

  4. Dorothy
    अक्टूबर 14, 2010 @ 07:47:26

    काफ़ी विचारोत्तेजक, गहन विश्लेषण युक्त ज्ञानवर्धक प्रस्तुति.बधाई और ढेरों शुभकामनाएं. धन्यवाद.सादर डोरोथी.

    प्रतिक्रिया

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