अनुकूलित संबंध और सहज-क्रियाएं

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार यहां व्यवहार के सहज रूप और सहजवृत्तियों पर हमने एक चर्चा शुरू की थी जिसे विस्तार से समझने के लिए इस बार इसे और आगे बढ़ाएंगे और देखेंगे कि इनकी सीमाएं लांघ कर जीव किस तरह अनुकूलित संबंध विकसित करते हैं।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।
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अनुकूलित संबंध और सहज-क्रियाएं

उल्लेखनीय है कि कतिपय सहजवृत्तियां एक जाति के सभी प्राणियों में समान होने पर भी, अपने को उनमें से हरेक में कुछ अलग ढ़ंग से प्रकट करती है। सहजवृत्तियों के साकारीकरण में ऐसी सापेक्ष असमानता की बदौलत ही जाति अपने परिवेश में सहसा परिवर्तन होने की सूरत में जीवित रह पाती हैं। युवा प्राणियों की सहजवृत्तिमूलक क्रियाओं का प्रेक्षण दिखाता है कि ये क्रियाएं बिना किसी पूर्व-प्रशिक्षण के और मानक ढ़ंग से की जाती हैं। किंतु उनमें थोड़ा-सा कुशलता का अभाव भी होता है। उनके व्यष्टिक विकास की प्रक्रिया में उनकी क्रियाओं की प्रभावोत्पादकता बढती जाती है और इस तरह उनका जीवनानुभव उनके व्यवहार के अंतर्जात प्रोग्राम की पूर्ति में सहायक बनता है।

प्रकृतिविज्ञानियों ने पाया है कि कीट अपने जीवनकाल में बहुत सारे अनुकूलित संबंध विकसित करते हैं। ये संबंध विभिन्न ग्राहियों के कार्य का परिणाम हो सकते हैं। उदाहरणार्थ, वे गति-संकेतों पर आधारित शारीरिक क्रियाओं की स्मृति अथवा वस्तुओं के रंग या आकार की चाक्षुष स्मृति से व्युत्पन्न हो सकते हैं।

मिसाल के लिए, यदि हम मधुमक्खियों के छत्ते को उसकी जगह से दो मीटर दूर हटा दें , तो फूलों का रस और पराग लेकर घर लौट रही मधुमक्खियां उस जगह हवा में एकत्र होंगी, जहां छत्ता पहले स्थित था। कई मिनट तक वे काल्पनिक द्वार के गिर्द मंडराएंगी और इसके बाद ही छत्ते की ओर मुड़ेंगी। इसका मतलब यह है कि दिक् में मधुमक्खियां मुख्यतः गति-संकेतों से निदेशित होती हैं और दृष्टि का उपयोग केवल असफलता की सूरत में करती हैं। वे आसानी से अनुकूलित संवेदनशीलता विकसित कर लेती हैं, जिससे उन्हें फूलों की आकृतियों में, विभिन्न वस्तुओं के चमकने की मात्राओं में अंतर करने में मदद मिलती है।

प्रेक्षणों ने दिखाया है कि कीटों के सबसे अच्छे अनुकूलित संबंध उन उत्तेजकों के सिलसिले में बनते हैं, जो सामान्यतः व्यवहार के सहजवृत्ति-जन्य प्रोग्रामों को प्रवर्तित करते हैं।

प्रयोगों में पाया गया कि मधुमक्खियों को जटिल डिज़ायनों की बजाए त्रिभुजों और चतुर्भुजों के बीच भेद करना सिखाना कहीं अधिक कठिन है। अप्रत्याशित से लगने वाले ये परिणाम वास्तव में जटिल ज्यामितीय आकृतियों के जैव महत्व के परिचायक हैं, क्योंकि मधुमक्खियां जिन फूलों से मधु एकत्र करती हैं, वे उनकी आकृति से साम्य रखती हैं।

अतः गुच्छिकीय तंत्रिका-तंत्रवाले जीव उन वस्तुओं के मामले में अस्थायी संबंध बड़ी आसानी से विकसित कर लेते हैं, जिनके गुण जैविक दृष्टि से महत्वपूर्ण संकेत होते हैं : आश्रित संबंध केवल सहजवृत्तिमूलक व्यवहार प्रोग्रामों के दायरे में ही बनाए जाते हैं

व्यवहार के सहजवृत्तिमूलक रूप आर्थोपोडा में ही नहीं , सभी उच्चतर कशेरुकियों ( मछलियों, उभयचरों, सरीसृपों तथा स्तनपायियों ) में पाये जाते हैं। मछलियों की कतिपय जातियां अपनी संतान को बचाने की बड़ी ही जटिल सहजवृत्ति का प्रदर्शन करती हैं।

उदाहरण के लिए, नर स्टिकलबैक जलाशय के तल में एक गड्ढ़ा बनाता है, उसमें नीचे शैवाल बिछाता है, पानी में उगने वाले ज़्यादा बड़े पौधों की पत्तियों से उसकी दीवारें तथा छत बनाता है और अपने शरीर की श्लेष्मा से उन्हें चिपकाता है। इसके बाद वह मादा को अंडे देने के लिए उसमें धकेलता है और तब तक गुफा की रक्षा करता है, जब तक अंडों से पोने नहीं निकल आते।

संतान को पालने, जनने, खिलाने, बचाने, आदि से संबंधित बड़ी जटिल सहजवृत्तियां अधिकांश कशेरुकियों में पाई जा सकती है। पक्षियों और स्तनपायियों में नीड़-निर्माण और शिशुओं की देखभाल की सहजवृत्ति बहुत ही कार्यसाधक प्रतीत होती है। किंतु यह कार्यसाधकता पूर्णतः बाह्य कारकों पर निर्भर होती है तथा बड़ी सतही है। सहजवृत्ति-जन्य क्रियाओं की एक पूरी श्रृंखला को जन्म देने वाली निश्चित परिस्थितियों में किंचित् परिवर्तन आने पर सारा विशद कार्यक्रम गड़बड़ा जाता है। पक्षी अपने शावकों को छोड़ सकते हैं और स्तनपायी अपने बच्चों को दांतों से काटकर मार सकते हैं।

जीवजंतुओं के सहजवृत्ति-जन्य प्रतिरक्षात्मक व्यवहार में भी अत्यधिक जड़ता देखी जाती है। इसकी अनगिनत मिसाले हैं। उनमें से एक यह है।

उत्तरी अमरीका में काली खालवाला एक छोटा जीव पाया जाता है, जिस पर अन्य जीव हमला करने की हिम्मत नहीं करते। वे उसकी काली पीठ पर बनी सफ़ेद धारी के कारण उसे दूर से ही पहचान जाते हैं। इस जीव को स्कंक कहते हैं। उसके शरीर में एक ऐसी ग्रंथि होती है, जिससे बहुत ही बदबूदार द्रव निकलता है। ज्यों ही उसे कोई ख़तरा महसूस होता है, वह शत्रु की ओर पीठ कर देता है, फिर पूंछ उठाता है और बदबूदार द्रव का ऐसा गुबार छोड़ता है कि बड़े से बड़ा हिंस्र जानवर भी घंटों तक होश में नहीं आ पाता।

इस जीव को एक अलग ही जलवायु का आदी बनाने का फ़ैसला किया गया। पहले उसके बच्चों को बाड़ों में रखा गया और लोगों द्वारा उनकी देखभाल किये जाने के लिए उनकी उक्त ग्रंथियां निकाल दी गईं। फिर उन्हें वन में छोड़ दिया गया। मगर जब कुत्ते उनपर हमला करने लगे, तो उन्होंने भागने की कोशिश नहीं की, बल्कि पीछा करने वालों की ओर पीठ कर दी और इस तरह आसानी से उनका शिकार बन गये। बाद में उनकी देखभाल करने के अन्य तरीक़े खोजे गये और उनकी ग्रंथियां निकालना बंद कर दिया गया।

सहज प्रतिक्रियाएं, सामान्य उद्दीपनों की अनुक्रियास्वरूप पैदा होती हैं, जो व्यवहार के जन्मजात संरूपों को सक्रिय बनाते हैं। इस संबंध में जीव-जंतुओं के व्यवहार के सहज रूपों का अध्ययन करने वाले कुछ जीव-पारिस्थितिकीविदों की खोजें काफ़ी दिलचस्प हैं। वे दिखाती हैं कि सहज क्रियाएं सर्वथा निश्चित संकेतों का परिणाम होती हैं

उदाहरणार्थ, मेंढ़क ज्यों ही अपने सामने किसी कीट को हरकत करते देखता है, त्यों ही वह उस पर झपट पड़ता है। यह एक तेज़ी से चलते क्षोभक से संबंधित प्रतिक्रिया है, यदि हम पतले धागे पर कागज़ का टुकड़ा बांधकर मेंढ़क के आगे हिलायें, तो मेंढ़क निश्चय ही उसकी ओर लपकेगा। स्तनपायियों में भी सहजक्रियाएं किसी एक क्षोभक के उत्तर में शुरू होती हैं और विभिन्न जातियों के जीवों की विभिन्न उद्दीपनों के संबंध में वही प्रतिक्रिया हो सकती है।

मिसाल के लिए, मालूम है कि बच्चा कुत्ते का हो या भेड़ का, वह पैदा होते ही मां के स्तन खोजने लगता है और ज्यों ही वह मिल जाता है, त्यों ही ताक़त लगाकर उसे चूसने लग जाता है। पाया गया है कि इन क्रियाओं के प्रोग्रामों पर अमल विभिन्न संकेतों के फलस्वरूप शुरू होता है। पिल्ला केवल गरम रोयों पर ही प्रतिक्रिया दिखाता है। यदि हम कुतिया की जगह पर गरम पानी की बोतल रख दें, तो पिल्ला कोई खोजमूलक प्रतिक्रियाएं पैदा नहीं करेगा। किंतु यदि एक गरम खाल का टुकड़ा रख दिया जाए, तो वह तुरंत मां का स्तन खोजने लग जाएगा।

मेमना सिर के ऊपरी भाग के ढ़के जाने पर प्रतिक्रिया करता है। जब उसके मुंह में दूध पिलाने की बोतल लगाई गई, तो उसने चूसने की कोई क्रिया नहीं की, किंतु जब साथ ही उसके सिर के ऊपरी भाग को ढ़का गया, तो वह बोतल को तुरंत चूसने लगा।

अतः सहज क्रियाएं बड़ी संख्या में विविध क्षोभकों का परावर्तन नहीं होती, वे सिर्फ़ निश्चित संकेतों का परिणाम होती हैं। कहा जा सकता है कि वे कशेरुकियों की परावर्तन क्षमता को सीमित कर देती हैं। कशेरुकियों में एक नलिकाकार तंत्रिका-तंत्र ( मेरूरज्जु और प्रमस्तिष्क सहित ) विकसित होता है, जो उनकी परिवेशीय परिवर्तनों के अनुरूप प्रतिक्रिया करने की योग्यता को और बढ़ा देता है। गुच्छिकीय तंत्रिका-तंत्र वाले जीवों की तुलना में कशेरुकियों में ग्राहियों का विभेदीकरण ( विशिष्टीकरण ) कहीं ज़्यादा होता है। उदविकास की प्रक्रिया द्वारा पेश की गई संभावनाओं को मात्र सहज व्यवहार द्वारा ही यथार्थ में परिणत नहीं किया जा सकता। इस हेतु परावर्तन कई नये आयाम विकसित करता है।

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इस बार इतना ही। अगली बार हम इन नये आयामों के रूप में अवयवियों द्वारा उपार्जित व्यवहारों के उदाहरणों पर चर्चा को आगे बढ़ाएंगे।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

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1 टिप्पणी (+add yours?)

  1. दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi
    अगस्त 22, 2010 @ 04:26:31

    हिन्दी ब्लागीरी की अमूल्य निधि बनता जा रहा है यह ब्लाग। विशेष रूप से यह श्रंखला तो हमें चकित किए दे रही है।

    प्रतिक्रिया

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