मन का परावर्ती स्वरूप

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में दिये जाने की योजना है। पिछली बार यहां मन के संदर्भ में पैदा हुई धारणाओं के विकास का संक्षिप्त ऐतिहासिक विवरण का दूसरा हिस्सा प्रस्तुत किया गया था। इस बार मन के परावर्ती स्वरूप पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।
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मन का परावर्ती स्वरूप
सचेतन और अचेतन जीवन की सभी क्रियाएं अपने मूल की दृष्टि से प्रतिवर्त ( reflex ) हैं। इस प्रकार चेतना का कार्य ( मानसिक परिघटना ) अमूर्त आत्मा का गुण नहीं, बल्कि एक प्रक्रिया है जो अपनी उत्पत्ति के तरीके की दृष्टि से प्रतिवर्त के सदॄश है। मानसिक परिघटना सिर्फ़ वह नहीं है, जो मनुष्य अपने संवेदनों, विचारों और भावनाओं का प्रेक्षण करने पर पाता है। प्रतिवर्त की भांति उसमें भी बाह्य क्षोभक ( exciter ) का प्रभाव और इसके उत्तरस्वरूप हुई क्रिया शामिल रहते हैं। हमारी चेतना में विद्यमान बिंब, धारणाएं और विचार, उन अविभाज्य मानसिक प्रकियाओं के केवल कुछ पहलू ही हैं, जो परिवेश के साथ अवयवी की अन्योन्यक्रिया का एक विशेष रूप हैं। यह एक बड़ा भ्रम है कि मानसिक प्रक्रियाएं चेतना में आरंभ होती हैं और चेतना में ही ख़त्म भी हो जाती हैं।

प्रतिवर्त की मस्तिष्क से संबद्ध कड़ी को उसके नैसर्गिक मूल ( ज्ञानेन्द्रियों पर प्रभाव ) और अंत ( अनुक्रियात्मक गति ) से अलग करना ठीक नहीं है। मानसिक परिघटना एक अविभाज्य परावर्ती क्रिया में उत्पन्न होती है, उसका उत्पाद बनती है, किंतु इसके साथ ही वह एक ऐसा कारक भी होती है, जिसका कोई कार्यमूलक परिणाम ( क्रिया, गति ) अवश्य निकलता है

मानसिक प्रक्रियाओं की भूमिका क्या है? वे संकेत ( indicator ) अथवा नियामक ( regulator ) का कार्य करती हैं। इसका मतलब उनकी भूमिका, क्रिया को बदलती परिस्थितियों के अनुरूप बनाना और इस तरह उपयोगी एवं अनुकूली प्रभाव सु्निश्चित करना है। मानसिक क्रियाएं स्वयंमेव नहीं, अपितु बाह्य जगत से संबंधित सूचनाएं मस्तिष्क के जिन प्रभागों में पहुंचती हैं, सुरक्षित रहती हैं तथा संसाधित होती हैं, उन प्रभागों के गुण अथवा प्रकार्य के रूप में ही , जवाबी क्रिया की नियामक होती हैं। इस प्रकार प्रतिवर्त की क्रिया में मनु्ष्य का परिवेश विषयक ज्ञान तथा धारणाएं, अर्थात व्यक्ति का समस्त अनुभव भी सम्मिलित रहता है। मानसिक परिघटना बाह्य, अर्थात परिवेश के प्रभाव और आंतरिक, अर्थात एक शारीरिक तंत्र के रूप में अवयवी की अवस्थाओं के प्रभाव का, मस्तिष्क द्वारा प्रदत्त उत्तर ( मस्तिष्क की प्रतिक्रिया ) है।

मानसिक परिघटनाएं, मनुष्य के क्षोभों के उत्तर में पैदा होनेवाली क्रियाशीलता के वे स्थायी नियामक हैं, जो इस समय सक्रिय हैं ( संवेदन, प्रत्यक्ष ) अथवा पहले कभी, यानि विगत अनुभव में सक्रिय थे ( स्मृति ) , जो इन प्रभावों का सामान्यीकरण करते तथा वे जिन परिणामों पर पहुंचाएंगे, उनका पूर्वानुमान सुनिश्चित बनाते हैं ( चिंतन, कल्पना ), जो कुछ प्रभावों के अंतर्गत क्रियाशीलता को बढ़ाते हैं तथा कुछ के अंतर्गत उसे घटाते अथवा अवरुद्ध करते हैं ( भावनाएं, इच्छा ) और जो लोगों के व्यवहार में भिन्नता पैदा करते हैं ( स्वभाव, चरित्र, इत्यादि )

इस तरह मन के परावर्ती स्वरूप और मनुष्य के क्रियाकलाप के मन द्वारा नियमन का सिद्धांत प्रतिपादित हुआ। आगे चलकर इस महती सैद्धांतिक प्रस्थापना की प्रयोगों द्वारा पुष्टि हुई, और बाह्य परिवेश से जीवों की और मनुष्य की भी अन्योन्यक्रिया का मस्तिष्क द्वारा नियंत्रण किये जाने के नियमों का अविष्कार किया गया। इन नियमों की समष्टि को सामान्यतः दो संकेत पद्धतियों का सिद्धांत कहा जाता है।

वस्तु का बिंब ( दृश्य, श्रव्य, घ्राणजनित, इत्यादि ) जीव के लिये किसी क्षोभक के संकेत का कार्य करता है, जिससे उसके व्यवहार में परिवर्तन आ जाता है और यह अनुकूलित प्रतिवर्त कहलाता है।

जैसा कि ज्ञात है, अनुकूलित ( conditioned ) प्रतिवर्त इससे पैदा होता है कि किसी अनुकूलित क्षोभक ( उदाहरणार्थ जलती-बुझती बत्ती ) का किसी अननुकूलित ( unconditioned ) उत्तेजक की क्रिया ( उदाहरणार्थ, खाने की वस्तु देना ) से संयोजन किया जाता है, जिसके परिणामस्वरूप मस्तिष्क में दो केंद्रों ( दृष्टि और आहार से संबंधित केंद्रों ) के बीच अल्पकालिक तंत्रिका संपर्क उत्पन्न हो जाता है और जीव के दो क्रियाकलाप ( दृष्टि और आहार से संबंधित क्रियाकलाप ) आपस में जुड़ जाते हैं। बत्ती का जलना-बुझना जीव के लिए खाना दिये जाने का संकेत बन जाता है और उसके मुंह से लार टपकने लग जाती है।

जीव-जंतु अपने व्यवहार में संकेतों से निर्देशित होते हैं, जिन्हें पहली संकेत प्रणाली के संकेत ( “पहले संकेत” ) कहा गया। जीवों का सारा मानसिक क्रियाकलाप पहली संकेत प्रणाली के स्तर पर संपन्न होता है। मनुष्य के मामले में भी पहली संकेत प्रणाली के संकेत ( ठोस बिंब, धारणाएं ) काफ़ी बड़ी भूमिका निभाते हैं और उसके व्यवहार का नियमन व निर्देशन करते हैं। उदाहरण के लिए, चौराहे की लाल बत्ती, वाहन के चालक के लिए संकेतमूलक क्षोभ होती है तथा उससे कई सारी आंगिक क्रियाएं करवाती है, जिनके फलस्वरूप चालक ब्रेक लगाता है और वाहन को रोक देता है। उल्लेखनीय है कि संकेतमूलक क्षोभ स्वयं ही यांत्रिकतः मनुष्य के व्यवहार का नियमन नहीं करते, बल्कि यह कार्य मस्तिष्क में उनके बिंबरूप संकेतों द्वारा किया जाता है। ये पहले से अनुकूलित बिंबरूप संकेत वस्तुओं के बारे में सूचना देते हैं और इस तरह से मनुष्य के व्यवहार का नियमन करते हैं।

जीवों के विपरीत मनुष्य में पहली संकेत प्रणाली के अतिरिक्त दूसरी संकेत प्रणाली भी होती है, जो केवल उसी की खूबी है। इस प्रणाली के संकेत हैं शब्द ( “दूसरे संकेत” ), जिन्हें बोला, सुना या पढ़ा जाता है। शब्द की मदद से से पहली संकेत प्रणाली के संकेतों, बिंबरूप संकेतों को संप्रेषित अथवा प्रतिस्थापित किया जा सकता है। शब्द उनकी जगह ले लेता है, उनका सामान्यीकरण करता है और वे ही क्रियाएं करवा सकता है, जो पहली संकेत प्रणाली के संकेतों द्वारा करवायी जाती है। इस तरह शब्द “संकेतों का संकेत” है। संकेतमूलक क्षोभों ( उच्चारित ध्वनि, लेख ) का इन शब्दमूलक क्षोभों के बिंब के नाते मस्तिष्क में शब्द के अर्थ के रूप में विद्यमान संकेतों से अंतर किया जाना चाहिए। मनुष्य द्वारा समझे जाने पर शब्द उसके व्यवहार का नियमन करता है तथा परिवेशी विश्व में उसे मार्ग दिखाता है। यदि शब्द को समझा नहीं जाता तथा वह बेमानी ही रहता है, तो वह मनुष्य को मात्र पहली संकेत प्रणाली के संकेत के तौर पर प्रभावित करेगा अथवा उदासीन ही छोड देगा। इसी से संबंधित करके कुछ पशुओं को ध्वनि-शब्दों के जरिए किसी विशेष व्यवहार को किये जाने के लिए दी जाने वाली प्रशिक्षण प्रक्रिया को समझा जा सकता है, पशुओं के लिए उच्चारित किये जाने वाले शब्दों का कोई अर्थ नहीं होता, वे सिर्फ़ अनुकूलित प्रतिवर्त के लिए क्षोभकों का कार्य करते हैं।

इस तरह हम देखते हैं कि परावर्तन का सिद्धांत ( पहले इस पर चर्चा की जा चुकी है ) ही वैज्ञानिक मनोविज्ञान का ज्ञानमीमांसीय आधार है। दार्शनिकतः परिभाषा दी जाए तो मन वस्तुगत विश्व का आत्मपरक बिंब है, मस्तिष्क में यथार्थ की प्रतिछाया है। मन परावर्तन की प्रक्रिया है और परावर्तन मस्तिष्क का गुण है। परावर्तन सिद्धांत मानसिक परिघटनाओं के बारे में प्रत्ययवादी और यंत्रवादी, दोनों तरह के दृष्टिकोणों का खंड़न करता है। प्रत्ययवाद मन को पदार्थ से अलग करके परिवेशी वास्तविकता से स्वतंत्र, बंद, अंतर्जगत बना ड़ालता है, वहीं यंत्रवाद पदार्थ से मन के गुणात्मक अंतर को नहीं देख पाता और उसे मात्र तंत्रिकीय प्रक्रियाओं तक सीमित कर देता है।

क्रियाशीलता मन की विशेषता है। अभिप्रेरण, सर्वोत्तम समाधान की सक्रिय खोज और संभावित व्यवहार के विभिन्न रूपांतरों में से किसी एक का चयन उसका एक अनिवार्य पहलू है। मानसिक परावर्तन दर्पणवत् या निष्क्रिय नहीं होता, अपितु उसके साथ तलाश, चयन, क्रिया के विभिन्न रूपांतरों का मूल्यांकन जुड़े होते हैं। वह व्यक्ति के क्रियाकलाप का एक अनिवार्य पक्ष है। व्यवहार के सक्रिय नियमन के लिए प्रतिपुष्टि ( feedback ) के तंत्र का काम करना आवश्यक है। मनोविज्ञान और शरीरक्रियाविज्ञान में इसका अर्थ यह है कि मस्तिष्क द्वारा हर प्रतिक्रिया को हल की जा रही समस्या के दृष्टिकोण से आंका जाता है। प्रतिपुष्टि-तंत्र की मदद से क्रिया के परिणाम की उस बिंब से तुलना की जा सकती है, जो इस परिणाम से पहले पैदा होता है और यथार्थ के एक विशिष्ट मॉडल के नाते उसका पूर्वाभास देता है।

मन मनुष्य को क्रमबद्ध क्रियाओं की योजना बनाने और उसके क्रियान्वयन से पहले कई सारी मानसिक क्रियाएं ( जैसे कि सर्वोत्तम तरीके के चयन से संबंधित क्रियाएं ) पूरी करने में समर्थ बनाता है। जैव उद्‍विकास की प्रक्रिया में आचरण के एक नियंत्रण-तंत्र के रूप में विकसित हो्कर मनुष्य का मन, गुणात्मकतः बिल्कुल भिन्न बन जाता है। सामाजिक जीवन के नियमों के प्रभाव से लोग व्यक्ति बन जाते हैं और हर कोई अपने पर उन ठोस ऐतिहासिक परिस्थितियों की छाप लिये होता है, जिनमें उसका व्यक्तित्व ढ़ला था। परिणाम के तौर पर मनुष्य के व्यवहार में व्यक्तित्वमूलक विशेषताएं आ जाती हैं

अब हम मनोविज्ञान की विषय-वस्तु की पहले दी गयी परिभाषा को अधिक ठोस और सुस्पष्ट बना सकते हैं: मनोविज्ञान मन, जो कि मस्तिष्क में बनने वाला और मनुष्य को अपने व्यक्तित्वमूलक विशेषताओं से युक्त व्यवहार तथा क्रियाकलाप का नियंत्रण करने में समर्थ बनानेवाला यथार्थ का बिंब है, के तथ्यों , नियमों और क्रियातंत्रों का अध्ययन करता है
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इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

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4 टिप्पणियाँ (+add yours?)

  1. नन्हीं लेखिका - Rashmi Swaroop
    जुलाई 05, 2010 @ 05:55:13

    :)halanki itni shudhh hindi smaajhne me arambh me thodi kathinaai hui par jab samajh me aane lagi to ruchi badhti gayi… bahut gyaanwardhak aur vaigyanic post…saadar.

    प्रतिक्रिया

  2. Maria Mcclain
    जुलाई 06, 2010 @ 17:26:40

    interesting blog, i will visit ur blog very often, hope u go for this website to increase visitor.Happy Blogging!!!

    प्रतिक्रिया

  3. shyam1950
    सितम्बर 27, 2010 @ 18:34:14

    क्लिष्टता इस लेख का भाषाई विक्षेप है .. मनोविज्ञान को ईसापूर्व २००० वर्ष तक के काल खंड में सीमित कर देना ऐतिहासिक दृष्टि से युक्त नहीं लगता … मनोविज्ञान के ऐसे अध्ययन की तुलना में पतंजलि का योग-दर्शन कहीं अधिक सम्यक तथ्य प्रस्तुत करता है.. हालाँकि इस approach से भी इनकार नहीं क्योंकि यह भौतिक रूप से तथ्यों को प्रमाणित करने में सहायक है लेकिन इसकी गति "ख़ाक हो जायेंगे हम तुमको खबर होने तक" वाली है ..लेकिन कुल मिलकर बहुत सार्थक प्रयास है जिसकी जितनी सराहना की जाए उतनी कम है .. शायद कहीं आगे चल कर हम भी आपसे कुछ शेयर करें

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  4. समय
    सितम्बर 28, 2010 @ 13:01:44

    सम्माननीय श्याम जी,वैज्ञानिक और ऐतिहासिक दृष्टि से संपृक्त तथ्यों को ही यहां रखा जा रहा है। पूरी संभावना है कई तथ्य हमारे वैचारिक अनुकूलन के विपरीत से लग सकते हैं।हमारी चेतना के इसी वैचारिक अनुकूलन के परिष्कार की आवश्यकता है, जिसमें जाहिरा तौर पर काफ़ी समय और ऊर्जा खर्च होगी ही।आपकी तारीफ़, आपकी ज़र्रानवाज़ी है। आपकी ‘शेयरिंग’ जरूर लाभप्रद रहेगी।शुक्रिया।

    प्रतिक्रिया

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